प्रवचन—७

श्रेष्ठ साधन—शरणागति

सज्जनो! जितने साधन हैं उन साधनोंमें सबसे सरल व श्रेष्ठ भगवान‍्के चरणोंकी शरणागति है। सुगम भी है व श्रेष्ठ भी है। परंतु अपने मनमें जब बलका, विद्याका, बुद्धिका, वर्णका, आश्रमका, चतुराईका, कुलका कुछ अभिमान भीतर होता है तो उस पुरुषके द्वारा शरणागति कठिन होती है। क्योंकि अपनेमें कुछ भी अभिमान है वह बाधक होता है, शरण होने नहीं देता। अधिक अभिमानके कारण बाधा लगती है। वह अभिमान अगर न रहे, साथ-साथ अपने कल्याणकी इच्छा पैदा हो जाय कि मेरा उद्धार कैसे हो? मेरा कल्याण कैसे हो? मेरा सदाके लिये दु:ख कैसे मिट जाय? महान् आनन्दकी प्राप्ति कैसे हो जाय? ये एक जोरदार लालसा जाग्रत् हो जाय तो शरणागति बहुत सरल है।

जैसे मनुष्य सोता है तो नींद लेनेके लिये परिश्रम करना नहीं पड़ता। ऐसे नहीं कि इतनी तकलीफ देखनी पड़ेगी, ऐसा धन्धा किया जायगा, ऐसे परिश्रम करने पड़ेंगे तब नींद आयेगी। नींद तो कुछ न करनेसे आप-से-आप आ जाती है। वह तो मूढ़ता है, मोह है। भगवान‍्के चरणोंके शरण होकर कुछ अभिमान न रखे और कल्याण चाहता है उसके शरणागति स्वत: हो जाती है।

अपना कल्याण चाहता है और अपनेमें ऐसा बल नहीं दिखता, ऐसी योग्यता नहीं दिखती, ऐसा साधन नहीं दिखता कि जिससे मैं अपना उद्धार कर लूँ। ऐसी अवस्थामें हे नाथ! हे प्रभु! मैं आपके चरणोंके शरण हूँ। सज्जनो! ऐसा होनेपर लोक और परलोक सब तरहका भार भगवान् स्वयं अपनेपर ले लेते हैं। भार तो भगवान् पर है ही। अपना अभिमान और पुरुषार्थ करते हुए भी होगा तो वही जो भगवान् करेंगे, पर बोझा हमारे सिरपर रहता है।

शरणागत हो जाते हैं तो हमारा भार उतर जाता है। भाइयो-बहिनो, ध्यान दो। हम जो अपनी चिन्ता करते हैं कि कैसे काम चलेगा। यह बिलकुल फालतू, निरर्थक, मूर्खताभरा विचार है। काम तो चलानेवाला वे ही हैं। करनेवाला कुछ और ही है वह विलक्षण है। उसके ऊपर भार है। अपनी चिन्ता छोड़ दे। अर्जुनके कुछ चिन्ता रही। ‘न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह’(गीता २। ९) ये सातवें श्लोकमें शरण होते हैं। नवें श्लोकमें कहते हैं—मैं युद्ध नहीं करूँगा। तब भगवान् हँसते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं। भगवान‍्की अत्यधिक दयालुता है।

नहीं तो वहाँ अठारहवें अध्यायके ६३वें श्लोकमें कहते हैं— ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ वह बात यहीं कह सकते थे—युद्ध नहीं करेगा तो तेरी मर्जी। ‘यथेच्छसि तथा कुरु’—तेरे चाहे जैसे कर। परंतु भगवान‍्को एक विशेष दया आती है। जीवोंपर अत्यधिक दयालुता है। वे कहते हैं किसी तरहसे यह जीव अपना कल्याण कर ले, अपना उद्धार कर ले। सज्जनो! आपलोगोंके सामने जो कई-कई तरहकी घटना आती है, उसका अर्थ यही होता है कि भगवान् अपनी तरफ खींचते हैं। आप बड़ा-बड़ा सहारा लेते हैं—धन-सम्पत्ति-वैभवका,पुत्र-परिवारका, बल-विद्या-योग्यताका, राज्य आदिका तो भगवान् उसको हटा देते हैं। किसीका भी आज दिनतक लौकिक बल भगवान‍्ने रहने नहीं दिया और रहने देंगे नहीं। आप रुपयोंपर चाहे जितना भरोसा कर लें, विश्वास कर लें। कितना ही झूठ-कपट-बेईमानी कर लें ये रुपयोंका सहारा रहेगा नहीं।

भगवान् पर जिम्मेवारी

समझदार आदमी क्यों पापोंमें फँसे? भगवान‍्के शरण होनेपर किसी बातकी कमी रहेगी नहीं। सज्जनो! लक्ष्मी माता पतिव्रता हैं। प्रभुके चरणोंके दास बन जाओगे तो ये मैया बड़े प्यारसे, स्नेहसे अपने गोदमें लेकर, हृदय लगाकर दूध पिलावेगी। बहुत कृपा करेगी। आपके कमी नहीं रहने देगी। बालककी कमी माँके हृदयमें खटकती है। बालक जानता ही नहीं। शीतकाल आनेवाला है ऐसा समझके माँ पहलेसे गर्म कपड़ा बनाती है। वह खेलमें जाता है खड़ा करके नाप लेती है। वह समझता है क्यों तंग करती है। हम खेलें खूब। माँ देखती है अभी ठण्डी आ गयी। जैसे उसको खयाल रहता है उससे बहुत अधिक जीवमात्रका भगवान‍्को खयाल है। वह चाहे सदाचारी है, चाहे दुराचारी है, स्वर्गमें है, चाहे नरकमें, चौरासी लाख योनिमें है या कहीं भी है परंतु भगवान‍्का अंश है। जीव विमुख हुआ है, भूला है। भगवान् विमुख नहीं हुए हैं, भूले नहीं हैं। सज्जनो! थोड़ी कृपा करो।

हे नाथ! हे नाथ! ऐसे पुकार करके प्रभुके चरणोंके शरण हो जाओ। भगवान‍्की आज्ञासे रात और दिन काम करो, परंतु चिन्ता मत करो। चिन्ता भगवान् पर धर दो। उसकी आज्ञा-पालन करना—तत्परतासे उसकी शरण रहना। उसकी हाँ-में-हाँ मिलाना। आज्ञा पालनमें बड़े तत्पर रहना। सब प्रभुकी सम्पत्ति समझ करके सुचारुरूपसे सुरक्षित रखना। सज्जनो! पाप नहीं करना, चिन्ता नहीं करनी। क्यों करें पाप? क्यों करें चिन्ता? जब भगवान्-जैसे हमारे मालिक हैं।

मन तूँ क्यूँ पछतावै रे,

सिर पर श्री गोपाल बेड़ा पार लगावै रे॥

भगवान् हमारे मालिक हैं तू क्यों चिन्ता करता है। क्यों घबराता है। क्यों पश्चात्ताप करता है। चिन्ता दीनदयाल को मो मन सदा आनन्द। चिन्ता-फिकर सब भगवान‍्के चरणोंमें रख दो सज्जनो! आप निश्चिन्त हो जाओ। प्रभु-आज्ञा-पालनमें तत्परतासे लगे रहो। जिस वर्णमें, जिस आश्रममें जहाँ आप हैं—चाहे भाई हो, चाहे बहिन हो वहाँका काम बड़े उत्साहसे सुचारुरूपसे करे परंतु चिन्ता हम क्यों करें? कैसी बढ़िया, बात है?

काम-धन्धा बड़ा सुन्दर होगा। चिन्ता करते काम करता है वह काम बढ़िया नहीं होता है। ‘बुद्धि: शोके नश्यति’ शोकसे बुद्धि नष्ट हो जाती है। प्रभुके चरणोंका आश्रय लेनेसे बुद्धि विकसित होती है। भगवान् कहते हैं स्वयं ‘तेषां सततयुक्तानाम्’ जो नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए हैं। प्रेमपूर्वक लगे हुए हैं। ‘तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्’। प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं, निरन्तर मेरेमें लगे हैं। ‘ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते’(गीता १०। १०)। वह बुद्धियोग दूँगा जिससे वे मेरेको प्राप्त हो जायँ।

चिन्ता करके आप बुद्धि पैदा करोगे झूठ, कपट, बेईमानी, ठगी, धोखेबाजी, ऐसी बुद्धि करोगे जिससे नरक और चौरासी लाख योनि जाना पड़े। ये अपनी चिन्तासे होता है। भगवान‍्के शरण होनेसे भगवान् वह बुद्धियोग देंगे जिससे बेड़ा पार हो जाय। ‘तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥’(गीता १०। ११) उनके ऊपर मैं कृपा करता हूँ। उनके अन्त:करणमें रहनेवाला अज्ञान संमोह है उस अन्धकारको मैं देदीप्यमान दीपकके ज्ञानद्वारा दूर कर देता हूँ।

भगवान् अन्धकार दूर करे और बुद्धियोग दे कितनी विलक्षण बुद्धि होगी। कितना विलक्षण प्रकाश मिलेगा। लोक और परलोक दोनोंमें करनेके लिये आपको बड़ा भारी प्रकाश मिलेगा। सब तरहका काम करनेके लिये आपको प्रकाश मिलेगा। मैंने कहा है—गीताका विचार करके ठीक तरहसे अनुभव करने लग जाय, उसके अनुसार चलने लग जाय तो जिन कामोंका गीतामें वर्णन नहीं है, ऐसे कामोंमें भी आपकी बुद्धि तेज हो जायगी। आपको याद होगा मैंने कहा—ब्याह-शादी करोगे तो उसमें क्या करना चाहिये, क्या नहीं करना चाहिये? आपकी बुद्धिमें विकास होगा। व्यापार आदि करोगे तो उसमें बुद्धिका विकास होगा। पापोंसे तो बच जाओगे और उन कामोंसे ही आपको पुण्य मिल जायगा। जीविकाके कर्म हैं वे भगवद्भक्तिमें भर्ती हो जायँगे।

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥

(गीता १८। ४६)

जिस परमात्मासे संसार व्याप्त है, जिससे संसार पैदा हुआ है। जिससे सुरक्षित है संसार। ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ अपने कर्मोंसे उस परमात्माका पूजन करें। आज चिन्ता होती है कि लोगोंका निर्वाह कैसे होगा? आश्रितोंका पालन कैसे होगा? अर्जुनके भी चिन्ता थी कि युद्ध करेंगे और वे मर जायँगे, पीछे स्त्री-बच्चोंकी क्या दशा होगी? अधर्म आकर दबा लेगा तो फिर बहुत ही अनर्थ हो जायगा। अनर्थकी परम्परा लग जायगी। ये अर्जुनने बतायी है। अर्जुनकी चिन्ता होनेके कारण। जब भगवान‍्ने कह दिया तू एक मेरी शरण आ जा, चिन्ता मत कर। फिर चिन्ता नहीं की। ‘भार’ हृदयपर भार होता है वह भार ‘भार’ है। काम करना ‘भार’ नहीं होता। व्यवहारका, परमार्थका काम उत्साहसे करता है। अर्जुनने भी शरण होनेपर युद्ध किया है बड़े सुचारुरूपसे, साङ्गोपाङ्ग ठीक रीतिसे। युद्धमें अगर चूक जाय तो गला कट जाय। भगवान‍्के आश्रित होकर युद्ध किया तो भगवान‍्ने बचाया।

कर्णकी कथा

कर्णके पास एक शक्ति थी वीरघातिनी। बात क्या थी? कर्ण जब जन्मा है तो जन्मके समय ही उसके शरीरके ऊपर एक कवच था। चमड़ीकी तरह ही चमड़ी दिखे परंतु कोई शस्त्र-अस्त्र भेदन न कर सके। ऐसा स्वाभाविक कवच था। जन्मके समय कानोंमें कुण्डल थे। उनका बड़ा प्रभाव पड़ता था। माता कुन्तीने एक बक्सेमें बन्द करके खूब अच्छी तरह सुरक्षित करके नदीमें बहा दिया। हस्तिनापुरमें यमुनाजीकी धारा गयी। अधीरथ नामका एक सूत था, उसको वह बक्सा मिला, खोला तो उसमें छोटा-सा सुन्दर बालक। अपनी स्त्रीको लाकर दे दिया कि भगवान‍्ने तेरेको बेटा दे दिया। राधा नाम था उसका। उसने खूब पालन-पोषण किया। कर्ण सूर्यभगवान‍्की उपासनामें लग गया। सूर्यको वह इष्टदेव समझता था। सूर्य तो समझते थे मेरा पुत्र है, परंतु ये समझते थे इष्टदेव।

इसके पास विलक्षण शक्ति थी। इन्द्रको इसका डर था। इन्द्रका पुत्र अर्जुन है। सूर्यका पुत्र कर्ण है। एक दिन उसने कर्णसे वह कवच माँग लिया, कुण्डल माँग लिये। कर्ण दानी था। उसके लिये लोगोंमें ये कहावत है। सुबहके समय कोई आता है तो कहते हैं भाई! कर्णका वक्त है। दान देता भजन-स्मरण किया करता। उसका वक्त दिया हुआ था, समय दिया हुआ था। जब दान दिया करता तो कोई कुछ भी माँग ले तो न नहीं कहता था। कर्णके मरनेपर भगवान‍्ने अर्जुनसे कहा-आज इस भू-मण्डलसे एक विशेष दानी चला गया। उसके जोड़ीका दान देनेवाला नहीं है। इन्द्रने जब माँग लिया उनसे कवच तो वह चमड़ी उतारकर दे दी।

श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये कोई अदेय वस्तु नहीं है। त्वचा उतार-कर दे दी। कुण्डल दे दिये कर्णने। उससे उसकी रक्षामें बाधा पड़ी। मर गया, नहीं तो मरता नहीं उनसे। वैरीसे, किसीसे ही नहीं मरता। ऐसे वह कर्ण बड़ा धर्मात्मा-पुण्यात्मा था। पाण्डवोंके साथ इसका विरोध हो गया था—द्वेष हो गया था, जिसमें भी अर्जुनके साथ। इन्द्रने प्रसन्न होकर कर्णको एक ऐसी शक्ति दी कि वह जिसपर भी छोड़ दे तो जिन्दा नहीं बच सकता। वह शक्ति कर्णने अर्जुनको मारनेके लिये सुरक्षित रख रखी थी।

एक दिन माता कुन्तीने कर्णसे एकान्तमें कहा। देख कर्ण! तू मेरा बेटा है। मैं तेरेसे माँगती हूँ। कर्ण बिगड़ा, तू माँ कैसी? जो माँ अपने बच्चेको नदीमें बहा दे, वह माँ है? ये कोई माँका काम होता है, परन्तु आप माँ हो तो माँगो क्या माँगती हो। क्या माँगना चाहती हो, बोलो? बेटा! तेरेसे पाँच बेटा चाहती हूँ। इन पाण्डवोंको मारना नहीं। कर्णने कह दिया कि माताजी! आपने पाँच बेटा माँगे, तो मैंने पाँच बेटा दिये। युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेवको तो मारूँगा नहीं। अर्जुनके साथ मेरा है वैर। अर्जुन अगर मेरेको मार दे तो आपके पाँच बेटे। मैं अर्जुनको मार दूँ तो मैं बेटा तुम्हारा। तुम्हारे पाँच बेटे तैयार। मैं तुम्हारे पक्षमें आ जाऊँगा। एक बातकी याद रखना। ये बात युधिष्ठिर महाराजसे मत कहना। अगर कह दोगी तो ये पाण्डव सदा दु:खी रहेंगे। ध्यान देना भाइयो! कर्णके मनमें कितना विलक्षण विचार है ? मैं मर जाऊँ बेशक दूसरोंको दु:ख न हो। पाण्डवोंको कष्ट न हो। ऐसे ही कृष्णभगवान‍्से कहा। कृष्णभगवान‍्ने कहा तू कुन्तीका बेटा है। इसने कहा आप युधिष्ठिरको मत कहना। युधिष्ठिरसे कह दोगे तो मेरे साथ युद्ध नहीं करेंगे। दुर्योधनके साथ करेंगे। दुर्योधन मेरेको नहीं छोड़ेगा, मैं दुर्योधनको नहीं छोड़ूँगा। मेरे साथ युद्ध युधिष्ठिर करेंगे नहीं। इसमें पाण्डव दु:ख पावेंगे। इस वास्ते युधिष्ठिरको मत कहना। युधिष्ठिरसे छिपी हुई बात रही। सब युद्ध समाप्त हो जाता है जब युधिष्ठिर महाराज अपने बड़ोंको पानी देने लगे हैं। उस समय माँ कुन्तीने कहा बेटा! कर्णको भी पानी दे। उनको भी जल दो वे तुम्हारे बड़े भाई हैं। युधिष्ठिरको बड़ा दु:ख हुआ।

कहते हैं माँ! आज दिनतक मैं इस बातको जान नहीं सका। मेरे मनमें आती थी। जब कर्णके चरणोंकी तरफ मेरी दृष्टि जाती तो माँ याद आ जाती। कुन्ती माँ याद आती। वे माँके चरणोंमें रोजाना नमस्कार करते। चरणोंके दर्शन रोजाना करते थे। कर्णके चरणोंको देखते ही कुन्ती याद आ जाती थी। मैं इस बातको जान नहीं सका। क्या कारण है? कर्णको देखता हूँ तो माँ याद आती है। आपके व कर्णके चरण मिलते-जुलते थे। इस वास्ते माँकी याद आ जाती थी। मैंने बड़ी गलती की, उस कर्णके साथ मैंने द्वेष रखा। मैंने कर्णको मरवा दिया, आपने ये बात प्रकट नहीं की। ऐसे पश्चात्ताप हुआ है। लोकोंमें एक कहावत है कि युधिष्ठिरने श्राप दे दिया कि स्त्रियोंके मनमें बात खटेगी नहीं। इतनी छिपा ली तैंने। कितना विलक्षण उन लोगोंका भाव। खास धर्मावतार युधिष्ठिरजी कितना भाव विचित्र रखते थे।

असली धन—समयका सदुपयोग

सज्जनो! अपने लिये पाप नहीं करते थे, अन्याय नहीं करते थे, बड़े धर्ममें रहते थे, अपनी मर्यादामें रहते थे। यहाँके लोभमें आकर अगर हम गड़बड़ी कर लेंगे तो गड़बड़ी करनेपर भी यहाँ धन हो जायगा, ये कारण नहीं हैं। बिलकुल ये नहीं हैं। कोल-किरातोंने क्या कहा? दिन और रात पाप करते हैं। पाप करत निसि बासर जाहीं । नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं॥ (मानस २। २५१। ५) कटि-पटका तात्पर्य लज्जा-निवारणके लिये तो पूरा कपड़ा नहीं है। पेट भरनेके लिये अन्न नहीं है। रात-दिन पाप करते हैं। पाप करनेवाले सब-के-सब धनी बन जायँ, ये बिलकुल गलती बात है। है नहीं। आप खूब दृष्टि पसारकर देख लें। पाप करो तो धन आनेवाला आ जायगा। पाप नहीं करो तो धन आनेवाला आ जायगा। पाप करते रहो तो धन जानेवाला चला जायगा। पाप न करो तो भी जानेवाला चला जायगा। धनका सम्बन्ध प्रारब्धसे है। अभी की हुई क्रियासे नहीं है।

जिसमें भी पाप-क्रियाका फल धन नहीं है। पाप-क्रियाका फल तो दण्ड है। चाहे नरक भोगो, चाहे चौरासी लाख योनि भोगो। इस वास्ते थोड़ा-सा खयाल रखो। रोगी आदमी थोड़ी-सी जीभ वशमें रखता है तो नीरोग हो जाता है। जिह्वाके वशमें हो कुपथ्य कर लेता है तो रोग बढ़ जाता है। ऐसा थोड़ा-सा धैर्य रख करके संयम करके आप अगर पापोंसे बच जायँ तो बड़ा भारी लाभ होगा। लौकिक लाभ तो होगा वह होना है जितना ही होगा। लिख दिया विधाता लेख नहीं टलने का, कछु राई नहीं घटे ना तिल कहीं बढ़ने का। राई-तिलका फरक नहीं पड़ेगा, तो वह आयेगा। अपना काम कर्तव्य करना है। बड़े उत्साहसे, तत्परतासे, न्याययुक्त काम करना है। ये तो मनुष्यका कर्तव्य है। ऐसे कर्तव्यका पालन नहीं करता वह मनुष्य कहलानेका अधिकारी नहीं है। आलस्य-प्रमादमें, खेल-तमाशोंमें, हँसी-दिल्लगीमें, बीड़ी-सिगरेटमें, ताश-चौपड़में, नाटक-सिनेमामें समय बरबाद कर देता है, बहुत बड़ा भारी नुकसान करता है। असली धन पासमें उम्र है। उसका नाश कर देते हो। सज्जनो! बड़ा टोटा लगता है, बड़ा घाटा लगता है। अभी आपको पता नहीं है।

अपनी चीज नष्ट नहीं होती है, विश्वास मनुष्यके नहीं होता है। सामने देख करके आदमी ललचा जाता है। ये रुपये ले लूँ परन्तु लोभ और पाप आपके साथमें रहते हैं। पैसे भी मरनेपर यहीं रहते हैं। कमाते हैं पैसे वे भी पूरे आप खर्च कर नहीं सकते। अपने कुटुम्बमें भी पूरे खर्च नहीं कर सकते, बचेंगे। आपलोग पैसेवाले हो। हमलोग बिलकुल ऐसे फकीर हैं उनके भी लँगोटी, तुम्बी बचती है मरते हैं तब। ये नहीं पहले सब खत्म हो जाय पीछे मरें ऐसा नहीं। निर्वाहकी चीजें बचती हैं। उसके लिये पाप क्यों करें? साथ ले जानेवाली पूँजीको खराब क्यों करें? काम उत्साहसे करो। बड़ी मुस्तैदीसे करो अच्छी तरहसे। समयको खर्च मत होने दो। समयको बर्बाद मत होने दो। सावधानीसे भजन, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय, अच्छी-अच्छी पुस्तकोंका पढ़ना, नाम-जप करना, कीर्तन करना, इसमें लगाओ समयको।‘एक-एक श्वास जात लाख-लाख हीरा को’सन्तोंने कहा, बड़ा कीमती श्वास है। ये कीमती श्वास हमारे निरर्थक न चले जायँ। संसारका काम-धन्धा उपकारका, सेवाका, घरका करो और भगवान‍्को याद रखो। भरोसा परमात्माका रखो। झूठ-कपटका भरोसा रखते हो। क्या ये कल्याण कर देंगे? ये उद्धार कर देंगे क्या? सज्जनो! कृपा करो! मनमें आती है कि आपको अपने उद्धारकी बात कौन सुनायेगा? ये सुननेको कब मिलेगी?

केवल भगवान‍्का सहारा

पैसा कमानेकी व झूठ-कपटकी बात तो आपके जो हितैषी कहलाते हैं वे भी सिखा देंगे। वकीललोग भी सिखा देंगे। पैसा देकर सीख लो, बिना पैसा देकर सीख लो, लोगोंको देखकर सीख लो, बड़ी पाठशाला चल रही है। परन्तु पापोंसे बचाकर आपका उद्धार कौन करेगा? भगवान् करेंगे। सिवाय भगवान‍्के और कोई है ही नहीं।

उमा राम सम हित जग माहीं।

गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥

(मानस ४। १२। १)

भगवान‍्के सिवाय भाइयो! बहनो! हमारा सच्चा हितैषी कोई नहीं है। उनके चरणोंके शरण हो जाओ बस। मनमें हे नाथ! मैं आपका हूँ। आप मेरे हैं। ऐसे चरणोंके शरण हो जाओ। ‘जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये’—(गीता ७। २९) प्रभुके चरणोंका आश्रय ले करके यत्न करो। शरण भगवान‍्की रखो भाई! बल, बुद्धि, विद्या, धनका नहीं। ये कच्चा सहारा है। गोस्वामीजी कहते हैं—‘और आस विश्वास भरोसो हरो जीव जड़ताई।’ जीवमें अगर जड़ता है, मूर्खता है, भूल है, बड़ी भारी गलती है तो क्या है? आपके सिवा अन्यका जो सहारा है, आश्रय है। ‘और आस विश्वास भरोसो।’ भगवान‍्के सिवा आशा रखना, विश्वास रखना, भरोसा रखना,‘ये हरेहु जीव जड़ताई।’ ये जीव की जड़ता है।

एक आसरो एक बल एक आस बिस्वास।

एक राम घनस्याम हित चातक तुलसीदास॥

भगवान‍्का आश्रय लिया गोस्वामीजी महाराजने, उनकी रामायणसे कितनोंका उद्धार हो रहा है और होगा और हुआ है जिसकी कोई गिनती नहीं कर सकता। उनमें इतनी विलक्षणता कहाँसे आ गयी? सज्जनो! उन चरणोंसे आयी। प्रभुके चरणोंसे।‘एक आसरो एक बल एक आस विस्वास’ उसीका ही बल, उसीकी ही आशा, उसीका ही विश्वास है। ‘एक राम घनस्याम हित’ जैसे चातक होता है बादलकी तरफ देखता है, ऐसे घनश्यामकी तरफ। ऐसे ‘चातक तुलसीदास।’ घनश्याम हमारे रामजीके चरणोंके शरण हों। उसके लिये मैं चातक हूँ और हमें लेना नहीं है।

सज्जनो! प्रभुके चरणोंके शरण हो जाओ। भगवान‍्ने मात्र जीवोंको शरण ले रखा है। सज्जनो! याद करो। सब जीवोंको भगवान‍्ने शरण ले रखा है। केवल आपकी हाँ-में-हाँ मिलानेकी जरूरत है। भगवान‍्ने तो शरण ले रखा है। कहें क्या पता? इतने भाई-बहिन बैठे हैं? मैं पूछूँ आपसे इतने भाई-बहिन बैठे हैं। कोई एक भी भाई हिम्मत करके बतावे कि मैंने जान करके यहाँ जन्म लिया है। है याद आपको। जन्मकी बात याद नहीं। अभी जैसा आप विचार करते हैं कि सुख मिले व दु:ख न मिले, ऐसा विचार भी करते हैं, उद्योग भी करते हैं, परिश्रम भी करते हैं, परंतु फिर भी मिल जाता है क्या? दु:ख हम नहीं चाहते तो भी भेज देते हैं। दु:खके भेजते समय भगवान् हमें पूछते ही नहीं, बोलते ही नहीं और भेज देते हैं। क्यों भेज देते हैं? कि भगवान् समझते हैं, मानते हैं कि ये मेरे हैं। भगवान् कहते हैं कि ये मेरे हैं। सोलहवें अध्यायमें आसुरी सम्पत्तिका वर्णन है। वहाँ भी कहते हैं, ‘तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्’ ऐसे द्वेष रखनेवाले मनुष्योंमें क्रूर, अधर्म उनको मैं आसुरीयोनिमें गिराता हूँ। भगवान‍्को पूछे क्यों गिराते हैं महाराज! तू पूछनेवाला कौन? दुष्ट-से-दुष्ट, पापी-से-पापी उनको भी भगवान् अपना समझते हैं। अपनी तरफसे आसुरीयोनिमें गिराते हैं, त्रास देते हैं, शुद्ध बनाते हैं।

जैसे सुनार जब सोनेको अपनाना चाहता है तो वह अग्निमें देकर खूब तपाता है, जलाता है कि जिससे उसकी विजातीय धातु जल जाय। ऐसे भगवान् किये हुए पापोंको दूर करके जलाते हैं, नष्ट करते हैं। बालक खेलता है तो खेलते-खेलते कादा, कीचड़, मैला लगा लेता है, माँ स्नान कराती है। स्नान करते समय रोता है। मौका लगे तो भाग जायगा। माँ हाथ पकड़कर लाती है। जाने नहीं देती। हाथसे रगड़कर मैल उतारती है। उसको साफ करती है। जल डाल देती है ऊपरसे। तो छोरेका श्वास ऊपर चढ़ जाता है। परन्तु इसको दया नहीं आती। अरे भाई! दया ही तो है भरी हुई। वह बालक नहीं समझता है। बच्चा है। ऐसे रगड़ देती है तो बच्चा समझता है अरे! माँ दु:ख क्यों देती है? तैंने मैल क्यों लगा लिया बता? अब कौन-सा धन्धा करने गया था। कौन-सा आवश्यक काम था। जो लगा लिया मैल, ऐसे आप झूठ-कपट करके मैल लगा लेते हो। मैल भगवान‍्को सुहाता नहीं है, ये अपना प्यारा लाला है, बच्चा है, इस वास्ते ज्यों कष्ट देते हैं त्यों चिल्लाता है, टीं-टीं करता है कि भगवान‍्ने दु:ख दे दिया। भगवान‍्के खजानेमें दु:ख है ही नहीं, तू दु:ख कहाँसे लाया। उधार लाया कहाँसे? वे साफ करना चाहते हैं। मैला देखना चाहते नहीं।

काशीजीमें एक विद्यार्थी रहता था। वह पढ़ाई करता था। मामूली खर्चा मिलता था और अपने पढ़ाई चलती थी। माता उसका प्रबन्ध करती थी। माँ जब बीमार हुई, मरने लगी तब कहा बेटा! तू घबरा मत। कुलदेवी है, शक्ति है, अपनी माँ है। तुम्हारे कोई आफत हो तो ये माँका मन्त्र जपो और माँको याद कर लेना! सदाकी माँ तो बेटा! वह ही है। हम तो नकली हैं उसको याद कर लेना। माँ मर गयी अब वह पढ़ाई करने लगा।

एक जगह ट्यूशन होता था, जहाँ कुछ तनख्वाह मिल जाय। पढ़ानेके लिये जगह खाली थी। कइयोंने दरख्वास्त दी। उसने भी पत्र लिखा कि मेरेको मिल जाय, नहीं मिली। दूसरेकी नियुक्ति हो गयी तो उसके हुआ दु:ख। रात्रिमें जपता था माँका मन्त्र। माला फेंक दी और रूठ करके सो गया। मेरी ट्यूशन मिलती थी जिसमें आपने बन्द कर दिया। अब खर्चा कहाँसे लाऊँ और मेरी पढ़ाई कैसे हो। सो गया नींद आ गयी। नींदमें माँ उसको गोदमें लेती है। ऊपर हाथ फेरती है कि बेटा! मैं तेरेको छोटी जगहपर नहीं देखना चाहती। ऐसा कहा नींद खुल गयी। अब मनमें आवे। छोटी-बड़ी जगह तो ठीक, पर खर्चा नहीं। रोटी और पुस्तकोंका भी खर्चा नहीं। कैसे काम चलाऊँ? कैसे पढ़ूँ? अब कहती है छोटी जगह देखना नहीं चाहती। छोटी-मोटी जगह क्या होती है। थोड़े दिनों बाद परीक्षा हुई—परीक्षामें बड़े अच्छे नम्बर आये। जितना ट्यूशन मिलता था उतनी छात्रवृत्ति मिलने लग गयी कि भाई! लड़का बड़ा अच्छा है। इतने रुपये दे दिये जायँ छात्रवृत्तिके। अब पढ़ाई खोटी भी करनी नहीं पड़ी और नौकरी भी करनी नहीं पड़ी। इज्जत भी बढ़ गयी, पैसा भी आ गया।

अब किस तरहसे भगवान् करते हैं तो हम जानते नहीं। उसके कुछ समझमें नहीं आयी बात कि माँ कहती है मैं तेरेको छोटी जगह देखना नहीं चाहती। क्या करेगी अब? माँ तो सब काम करती है। वह जगन्माता है। भगवान‍्को ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ ये तो हम अलग-अलग नाम कहते हैं। वही माता है, वही ही पिता है। ‘माता धाता पितामहः’। धाय भी वही है। दादा भी वही है। दादी भी वही है। सब कुछ हमारे ‘त्वमेव सर्वम्’ भगवान् हैं। ऐसे भगवान‍्के शरण रहो।

भगवान‍्ने शरण ले रखा है, अपना रखा है आपको। सुख-दु:ख भेजते हैं तो कोई सम्पत्ति नहीं लेते। क्यों भेज देते हैं कि अपना मानते हैं। ये मेरे हैं। इतना जब अपनापन भगवान् रखते हैं अपने तो चिन्ता क्यों करें। हमें तो भगवान‍्की आज्ञा पालन करना है। उनकी आज्ञाके अनुसार सुचारुरूपसे काम-धन्धा करना है। चिन्ता नहीं करनी है। अब कैसे करेंगे। वे जानें। बड़ी-बड़ी आफत आयी भक्तोंमें।

पाण्डवोंमें कोई कम आयी है क्या आफत। प्रह्लादजीके ऊपर त्रास कम आयी है क्या? सुनते हैं बावन त्रास दी गयी। इतनेपर भी प्रह्लाद भगवान‍्को याद करता है। ऐसा नहीं कि आफत है तो छोड़ो। इसमें बहुत त्रास आती है छोड़ दो। ऐसा छोड़ा नहीं। वह तो एक भगवान‍्का ही भजन करता है। ऐसे प्रभुके चरणोंके आश्रित रहनेवालोंकी सदा विजय होती है। सदा, परंतु कब होगी? कैसे होगी? कुछ पता नहीं। लोक-परलोकमें भला जरूर है। इसमें सन्देह नहीं। अपने तो भगवान् और सन्तोंकी वाणी पढ़ो। अच्छे-अच्छे महापुरुष हो गये हैं, कह गये हैं उनके वचनोंपर विश्वास करके, उन चरणोंके शरण हो जाओ। फिर कष्ट आयेगा, बेईज्जती होगी तो हमारी क्या होगी—उसकी होगी। द्रौपदीने क्या कहा—‘जाएगी लाज तिहारी नाथ मेरो का बिगड़ेगो, कन्हैया मेरो का बिगड़ेगो,’ मेरा क्या बिगड़ेगा महाराज! ‘मौ पति पाँच, पाँच के तुम पति, अब पत जाएगी तिहारी’ ये पत किसकी जायगी। आप सबके पति—मालिक हो।‘सूरके स्वामी तुम लाज मरोगे देखोगे द्रुपदा उघाड़ी’ द्रौपदी उघाड़ी हो गयी, तुम्हारेको शर्म नहीं आयेगी। अरे, जो मालिक होता है उसको शर्म आती है। लौकिक कहावत है कि बहू उघाड़ी फिरे तो ससुरेकी फूट गयी क्या। बड़े हैं, माइत हैं, क्या उनको शर्म नहीं आयेगी। नहीं आवे तो वे निशर्मे हैं, नहीं तो हम निशर्मे ही सही। हमारी क्या शर्म है। हमारी कोई इज्जत अलग है क्या? ऐसे भगवान‍्के चरणोंके शरण रहना बहुत बढ़िया उद्धारका उपाय है। गीताने तो कहा है कि ‘मामेकं शरणं व्रज’। अनन्यभावसे मेरे शरण हो जा, तू चिन्ता मत कर। धर्मका निर्णय न कर सके तो उस धर्मको मेरेपर छोड़ दे। ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’(गीता १८। ६६)।

महाभारत-युद्धकी घटना

कर्णके पास शक्ति थी। कुण्डल और कवचकी बात तो कह दी, युद्धके समय घटोत्कचने युद्ध किया। जो भीमसेनका हिडिम्बासे पैदा हुआ राक्षस था। पाण्डवोंके पक्षमें था। रात्रिमें इतना बड़ा भयंकर युद्ध किया कि कौरवोंको चकरा दिया एकदम। निराश हो गये जीनेसे, विजय तो दूर रही। दुर्योधनने कहा कर्ण! इसको मारो किसी तरहसे। उसी शक्तिसे मारो तो कर्णने कहा वह शक्ति मैंने अर्जुनके लिये रख छोड़ी है। कहते हैं रात्रिमें ये घटोत्कच पीस डालेगा पहले ही। फिर पीछे क्या काम आवेगी। कर्णको कहा तो कर्णने शक्ति छोड़ी। वह चमचमाती हुई शक्ति-जैसी। घटोत्कचने अपना शरीर बढ़ाया, आकाशमें था वह। इतना बढ़ाया कि कौरव-सेना सब-की-सब दब जाय। कहते हैं भागो-भागो यहाँसे। वह शक्ति लगी और गिरा धड़ामसे। एक चौथाई सेना तो दब गयी, मर गयी। ऐसी शक्ति छोड़ी। घटोत्कचके मरनेसे दु:ख हुआ पाण्डवोंको कि हमारा ऐसा वीर मर गया। भगवान् ऐसे पीताम्बर करके नाचने लगे और अर्जुनको उठाकर हृदय लगाते हैं। आज मेरा अर्जुन बच गया। मौज हो गयी। पाण्डवपक्षी कहते हैं आज हमारे पक्षका इतना बड़ा वीर मारा गया, आपको खुशी आती है। भगवान‍्ने कहा कि मैं पाण्डवोंका पक्षपाती नहीं हूँ। मैं धर्मका पक्षपाती हूँ। ये राक्षस बचता तो राक्षसपना करता—मेरेको मारना पड़ता। ये तो ठीक ही हुआ एक साथ दो काम हो गया। कर्णके पास जबतक शक्ति थी तबतक मेरेको रात्रिमें नींद नहीं आती थी। सोचता था और जब-जब कर्ण आता सामने तब उसको भुला देता कि कहीं शक्ति न छोड़ दे। शक्तिको याद नहीं रहने देता। ऐसी मैं सावधानी रखता था। अब मौज हो गयी, आनन्द हो गया। मेरा अर्जुन बच गया।

कर्णकी एक विलक्षण बात याद आ गयी। ये युद्ध करता था उस समय एक साँप आया। बड़ा जहरीला था, उसने कहा तू बाणमें मेरेको लगा दे। अर्जुनको मैं मार दूँगा। वह साँप था, खाण्डीव वन दाह किया। उस समय अर्जुनने शरपञ्जर बाँध दिया, जिससे कोई जन्तु भीतर जा न सके। बाहर सब-का-सब अग्निको जलाने दे दिया। अग्निको अजीर्ण हो गया था। उसे जलाते समय एक सर्पिणी अपने मुखमें बच्चेको लेकर ऊपरको जा रही थी। उस जाती हुईको अर्जुनने काट दिया। सर्पिणी तो मर गयी। वह बाहर गिर गया। वह कहता है मेरी माँको मार दिया उसको मैं मारूँ। तू मुझे ले ले। कर्णने कहा, ‘कर्ण दूसरेकी मदद नहीं लेता है। वह घुसकर बैठ गया तरकसमें। बाण लिया और कर्णने संधान किया। बाण अर्द्धचन्द्राकार भी होता है, जिससे गला कट जाता है। ऐसा बाण संधान किया। शल्य सारथी थे, कृष्णभगवान‍्के समान ही वे बड़े होशियार थे। वे कहते हैं कर्ण! तेरा बाण है ठीक, निशाना बढ़िया नहीं है, कारण कि ज्यों ही बाण संधान किया, संधान करते ही भगवान‍्ने देखा कि अब तो मौत आयी तो जोरसे ऐसा खुगेंका झटका दिया जिससे घुटनी टिक गयी। रथ नीचा हो गया। अर्जुनके वह बाण यहाँ लगा मुकुटमें। वह जलता हुआ खत्म हो गया। कहा शल्यने कि थोड़ा नीचे कर दो, तो कहा कि कर्ण संधान एक बार ही करता है। दो बार बदलता नहीं। बोलो बाण चलानेमें थोड़ी-सी नोंक ऐसे करनी पड़ती थी। सत्यपर कितनी निष्ठा है। एक बार संधान कर लिया। निशाना बना लिया। अब इतना नीचा करना भी असत्य मानते हैं।

आज झूठ-कपट करती है उन्हीं भाइयोंकी ये सन्तान। अपने बड़कोंने क्या किया। मरना स्वीकार, पर असत्य स्वीकार नहीं।

‘नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा॥’(मानस २। २८। ५) ऐसे डटे रहे तो आज कर्णका भी नाम लेते हैं। आदरसे नाम लेते हैं। वह अर्जुनके विपक्षमें था। अरे पक्षमें हो, विपक्षमें हो क्या बात है। सच्चे पुरुष सच्चे ही होते हैं, अच्छे पुरुष अच्छे ही होते हैं। किसी जगह जाय ठीक होते हैं।

भाइयो, बहिनो! भगवान‍्के चरणोंके शरण रहो और सच्चाईसे लोगोंमें व्यवहार करो।

(दिनांक १६ जुलाई, १९८२)