अविनाशी रस

उपनिषद्‍‍में आया है—‘रसो वै स:’ (तैत्तिरीय०२।७) ‘वह परमात्मतत्त्व रसस्वरूप है।’ तात्पर्य है कि रस वास्तवमें परमात्मतत्त्वमें ही है जो शान्त, अखण्ड तथा अनन्त है। उस परमात्मतत्त्वका ही अंश होनेसे जीवात्मामें भी वह रस स्वत:स्वाभाविक है—

ईस्वर अंस जीव अबिनासी।

चेतन अमल सहज सुखरासी॥

(मानस ७। ११७। १)

परंतु शरीरसे सम्बन्धकी मान्यता मुख्य होनेके कारण जीवात्माको वह रस सांसारिक भोगोंमें, इन्द्रियोंके विषयोंमें दीखने लगता है अर्थात् उसकी भोगोंमें रसबुद्धि हो जाती है। भोगोंका यह रस नाशवान् होता है, जब कि परमात्माका रस अविनाशी होता है। अत: भोगोंका रस तो नीरसतामें बदल जाता है तथा उसका अन्त हो जाता है, पर परमात्माका रस नित्य-निरन्तर सरस रहता है तथा बढ़ता ही रहता है।

भोगोंके रसकी दो अवस्थाएँ होती हैं—संयोग (सम्भोग) और वियोग (विप्रलम्भ)। इनमें संयोग-रसकी अपेक्षा वियोगरस श्रेष्ठ है; क्योंकि वियोगमें जो रस मिलता है, वह संयोगमें नहीं मिलता। जैसे, जबतक भोजन न मिले, तबतक ‘भोजन मिलेगा’—इस (मिलनकी लालसा)-में जो सुख मिलता है, वह भोजन मिलनेपर नहीं रहता, प्रत्युत प्रत्येक ग्रासमें क्षीण होते-होते अन्तमें सर्वथा मिट जाता है और भोजनसे अरुचि पैदा हो जाती है! परंतु परमात्माका रस इससे बहुत विलक्षण है। वह संयोग और वियोग—दोनों ही अवस्थाओंमें समानरूपसे बढ़ता ही रहता है, न तो घटता है और न मिटता ही है!

भोगोंकी सत्ता और महत्ता माननेसे भीतरमें भोगोंके प्रति एक सूक्ष्म आकर्षण, प्रियता, मिठास पैदा होती है, उसका नाम ‘रस’ है। किसी लोभी व्यक्तिको रुपये मिल जायँ और कामी व्यक्तिको स्त्री मिल जाय तो भीतर-ही-भीतर एक खुशी आती है, यही ‘रस’ है। भोग भोगनेके बाद मनुष्य कहता है कि ‘बड़ा मजा आया’—यह उस रसकी ही स्मृति है। यह रस अहम‍् (चिज्जड़ग्रन्थि)-में रहता है। इसी रसका स्थूल रूप राग, सुखासक्ति है।

जबतक रसबुद्धि रहती है, तबतक प्रकृति और उसके कार्य (क्रिया और पदार्थ)-की पराधीनता रहती है। रसबुद्धि निवृत्त होनेपर पराधीनता मिट जाती है, भोगोंके सुखकी परवशता नहीं रहती, भीतरसे भोगोंकी गुलामी नहीं रहती।

भोगोंके रसमें जननेन्द्रियका रस बड़ा प्रबल माना गया है। इसलिये कामको जीतना बड़ा कठिन होता है। संसारमें रुपयोंके विषयमें ईमानदार आदमी तो मिल सकते हैं, पर स्त्रीके विषयमें ईमानदार आदमी मिलना अपेक्षाकृत कठिन है। ईमानदार आदमी किसीके लाखों रुपये अपने पास सुरक्षित रख सकता है, पर किसीकी स्त्रीको अपने पास सुरक्षित रखना, विचलित न होना बहुत कठिन है। भर्तृहरिजी लिखते हैं—

विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो

वाताम्बुपर्णाशना-

स्तेऽपि स्त्रीमुखपङ्कजं सुललितं

दृष्ट्वैव मोहं गता:।

शाल्यन्नं सघृतं पयोदधियुतं

भुञ्जन्ति ये मानवा-

स्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवे-

द्विन्ध्यस्तरेत्सागरे॥

‘जो वायु-भक्षण करके, जल पीकर और सूखे पत्ते खाकर रहते थे, वे विश्वामित्र, पराशर आदि भी सुन्दर स्त्रियोंके मुखको देखकर मोहको प्राप्त हो गये, फिर जो लोग शाली धान्य (सांठी चावल)-को घी, दूध और दहीके साथ खाते हैं, वे यदि अपनी इन्द्रियका निग्रह कर सकें तो मानो विन्ध्याचल पर्वत समुद्रपर तैरने लगा!’

मत्तेभकुम्भदलने भुवि सन्ति शूरा:

केचित् प्रचण्डमृगराजवधेऽपि दक्षा:।

किन्तु ब्रवीमि बलिनां पुरत: प्रसह्य

कन्दर्पदर्पदलने विरला मनुष्या:॥

‘इस पृथ्वीपर कुछ लोग तो मतवाले हाथीका मस्तक विदीर्ण करनेमें शूर हैं और कुछ लोग प्रचण्ड सिंहको मारनेमें दक्ष हैं। परंतु ऐसे बलवान् पुरुषोंके सामने मैं दृढ़तापूर्वक कहता हूँ कि कामदेवके मदको चूर्ण करनेवाले पुरुष विरले ही हैं।’

ऐसी प्रबल जननेन्द्रियका रस भी रसबुद्धि निवृत्त होनेपर सर्वथा नष्ट हो जाता है! कारण कि काम कितना ही प्रबल क्यों न हो, है तो वह नाशवान् ही! कामको जीतना कठिन तो हो सकता है, पर असम्भव नहीं! कठिन भी उसीके लिये है, जिसने शरीरादि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी सत्ता और महत्ता मान रखी है। अगर साधक शरीरमें अपनी स्थिति मानेगा तो उसको काम सतायेगा ही। यदि वह स्वरूप (सत्तामात्र)-में अपनी वास्तविक स्थितिको पहचान ले तो काम नष्ट हो जायगा, क्योंकि स्वरूप (सत्तामात्र)-में काम, क्रोध आदि विकार नहीं हैं। कारण कि स्वरूपमें कोई कमी है ही नहीं, वह पूर्ण है, फिर उसमें काम कैसे आयेगा?

रसबुद्धिके रहते हुए जब भोगोंकी प्राप्ति होती है, तब मनुष्यका चित्त पिघल जाता है तथा वह भोगोंके वशीभूत हो जाता है। परंतु रसबुद्धि निवृत्त होनेके बाद जब भोगोंकी प्राप्ति होती है, तब तत्त्वज्ञ महापुरुषके चित्तमें किंचिन्मात्र भी कोई विकार पैदा नहीं होता। उसके भीतर ऐसी कोई वृत्ति पैदा नहीं होती, जिससे भोग उसको अपनी ओर खींच सकें। जैसे पशुके आगे रुपयोंकी थैली रख दें तो उसमें लोभवृत्ति पैदा नहीं होती और सुन्दर स्त्रीको देखकर उसमें काम-वृत्ति पैदा नहीं होती। पशु तो रुपयोंको और स्त्रीको जानता नहीं, पर तत्त्वज्ञ महापुरुष रुपयोंको भी जानता है और स्त्रीको भी! जैसे हम अंगुलीसे शरीरके किसी अंगको खुजलाते हैं तो खुजली मिटनेपर अंगुलीमें कोई फर्क नहीं पड़ता, कोई विकृति नहीं आती, ऐसे ही इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन होनेपर भी तत्त्वज्ञके चित्तमें कोई विकार नहीं आता, वह ज्यों-का-त्यों निर्विकार रहता है। कारण कि रसबुद्धि निवृत्त हो जानेसे वह अपने सुखके लिये किसी विषयमें प्रवृत्त होता ही नहीं। उसकी प्रत्येक प्रवृत्ति दूसरोंके हित और सुखके लिये ही होती है। अपने सुखके लिये किया गया विषयोंका चिन्तन भी पतन करनेवाला हो जाता है१ और अपने सुखके लिये न किया गया विषयोंका सेवन भी मुक्ति देनेवाला हो जाता है२।

जबतक अन्त:करणमें किंचिन्मात्र भी भोगोंकी सत्ता और महत्ता रहती है, भोगोंमें रसबुद्धि रहती है, तबतक परमात्माका अलौकिक रस प्रकट नहीं होता। बाहरसे इन्द्रियोंका विषयोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर अर्थात् भोगोंका त्याग करनेपर भी भीतरमें रसबुद्धि बनी रहती है। तत्त्वबोध होनेपर यह रसबुद्धि सूख जाती है, निवृत्त हो जाती है—

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:।

रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥

(गीता२।५९)

‘निराहारी* (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रसबुद्धि निवृत्त नहीं होती। परंतु परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेपर इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यकी रसबुद्धि भी निवृत्त हो जाती है।’

तात्पर्य है कि जब संसारसे अपनी भिन्नता तथा परमात्मासे अपनी अभिन्नताका अनुभव हो जाता है, तब नाशवान् (संयोगजन्य) रसकी निवृत्ति हो जाती है। नाशवान् रसकी निवृत्ति होनेपर अविनाशी (शान्त, अखण्ड तथा अनन्त) रसकी जागृति हो जाती है।

तत्त्वबोध होनेपर तो रस सर्वथा निवृत्त हो ही जाता है, पर तत्त्वबोध होनेसे पहले भी उसकी उपेक्षासे, विचारसे, सत्संगसे, सन्तकृपासे रस निवृत्त हो सकता है। जिनकी रसबुद्धि निवृत्त हो चुकी है, ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुषके संगसे भी रस निवृत्त हो जाता है।

कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग—तीनों साधनोंसे नाशवान् रसकी निवृत्ति हो जाती है। जब कर्मयोगमें सेवाका रस, ज्ञानयोगमें तत्त्वके अनुभवका रस और भक्तियोगमें भगवत्स्मरणका रस मिलने लगता है, तब नाशवान् रस स्वत: छूट जाता है। जैसे बचपनमें खिलौनोंमें रस मिलता था, पर बड़े होनेपर जब रुपयोंमें रस मिलने लगता है, तब खिलौनोंका रस स्वत: छूट जाता है, ऐसे ही साधनका रस मिलनेपर भोगोंका रस स्वत: छूट जाता है।