कर्मयोगसे कल्याण

परमात्माके साथ जीवका नित्ययोग अर्थात् नित्य-सम्बन्ध है। इस नित्ययोगको ही गीताने ‘योग’ नामसे कहा है। इस योगका कभी वियोग नहीं होता। परंतु जब जीव जड़ प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ अपना घनिष्ठ सम्बन्ध मान लेता है, तब वह इस नित्ययोगसे विमुख हो जाता है, इसको भूल जाता है। जड़के साथ माने हुए इस सम्बन्धको ही ‘अहम‍्’ (ग्रन्थिरूप अहंकार) कहते हैं। यद्यपि जीवका प्रकृति और उसके कार्यसे नित्यवियोग है, तथापि उसके साथ अपना संयोग मान लेनेके कारण उसको नित्ययोगमें वियोग और नित्यवियोगमें संयोग दीखने लगता है अर्थात् उसको नित्यप्राप्त परमात्मा अप्राप्त दीखने लगते हैं और नित्य-निवृत्त शरीर-संसार प्राप्त दीखने लगते हैं। इस भूलको मिटानेके लिये भगवान‍्ने तीन मुख्य योग-साधनोंका वर्णन किया है—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग*।

जबतक अहम‍् रहता है, तबतक साधकोंमें तथा उनके साधनोंमें भेद रहता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये तीन भेद भी अहम‍्के कारण ही हैं। अहम‍् मिटनेपर अर्थात् साधन सिद्ध होनेपर कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगका भेद भी सर्वथा मिट जाता है।

कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—इन तीन साधनोंमें ज्ञानयोग और भक्तियोगका प्रचार तो अधिक है, पर कर्मयोगका प्रचार बहुत कम है। भगवान‍्ने भी गीतामें कहा है कि ‘बहुत समय बीत जानेके कारण यह कर्मयोग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया है’—‘स कालेनेह महता योगो नष्ट: परंतप’ (४। २)। इसलिये कर्मयोगके सम्बन्धमें यह धारणा बनी हुई है कि यह परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन नहीं है। अत: कर्मयोगका पालन करनेवाला साधक या तो ज्ञानयोगमें चला जाता है अथवा भक्तियोगमें चला जाता है; जैसे—

तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।

मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते॥

(श्रीमद्भा०११।२०।९)

‘तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक भोगोंसे वैराग्य न हो जाय (ज्ञानयोगका अधिकारी न बन जाय) अथवा मेरी लीला-कथाके श्रवणादिमें श्रद्धा न हो जाय (भक्तियोगका अधिकारी न बन जाय)।’

आदौ स्ववर्णाश्रमवर्णिता: क्रिया:

कृत्वा समासादितशुद्धमानस:।

समाप्य तत्पूर्वमुपात्तसाधन:

समाश्रयेत् सद‍्गुरुमात्मलब्धये॥

(अध्यात्म०, उत्तर०५।७)

‘सबसे पहले अपने वर्ण और आश्रमके लिये शास्त्रोंमें वर्णित क्रियाओंका यथावत् पालन करके चित्त शुद्ध हो जानेपर उन क्रियाओंका त्याग कर दे। फिर शम-दमादि साधनोंसे सम्पन्न होकर आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये सद‍्गुरुकी शरणमें जाय।’

परंतु इसके साथ ही यह बात भी आती है कि कर्मयोग परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन भी है। गीतामें भगवान‍् कहते हैं—

सांख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता:।

एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥

यत्सांख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।

एकं सांख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति॥*

(५।४-५)

‘बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन। कारण कि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है। सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अत: जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है।’

गीतामें अनेक स्थानोंपर कर्मयोगके द्वारा स्वतन्त्रतापूर्वक तत्त्वज्ञान, परमशान्ति, मुक्ति अथवा परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिकी बात आयी है; जैसे—

तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति॥

(४।३८)

‘वह कर्मयोगी उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें पा लेता है।’

योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥

(५।६)

‘मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।’

यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते॥

(४।२३)

‘केवल यज्ञके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं।’

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:॥

(४।१९)

‘जिस (कर्मयोगी महापुरुष)-के सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञानिजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं।’

युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।

(५।१२)

‘कर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है।’

श्रीमद्भागवतमें भी कर्मयोगको परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बताया गया है—

स्वधर्मस्थो यजन् यज्ञैरनाशी:काम उद्धव।

न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन्न समाचरेत्॥

(११।२०।१०)

‘जो स्वधर्ममें स्थित रहकर तथा भोगोंकी कामनाका त्याग करके अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा भगवान‍्का पूजन करता है तथा सकामभावपूर्वक कोई कर्म नहीं करता, उसको स्वर्ग या नरकमें नहीं जाना पड़ता अर्थात् वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।’

अस्मिँल्लोके वर्तमान: स्वधर्मस्थोऽनघ: शुचि:।

ज्ञानं विशुद्धमाप्नोति मद्भक्तिं वा यदृच्छया॥

(११।२०।११)

‘स्वधर्ममें स्थित वह कर्मयोगी इस लोकमें सब कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते हुए भी पाप-पुण्यसे मुक्त होकर बिना परिश्रमके तत्त्वज्ञानको अथवा परमप्रेम (पराभक्ति)-को प्राप्त कर लेता है।’

तात्पर्य यह हुआ कि कर्मयोग साधकको ज्ञानयोग अथवा भक्तियोगका अधिकारी भी बना देता है और स्वतन्त्रतासे कल्याण भी कर देता है। दूसरे शब्दोंमें, कर्मयोगसे साधन-ज्ञान अथवा साधन-भक्तिकी प्राप्ति भी हो सकती है और साध्य-ज्ञान (तत्त्वज्ञान) अथवा साध्य-भक्ति (परमप्रेम या पराभक्ति)-की प्राप्ति भी हो सकती है।

कर्मयोगी मिली हुई वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर, प्रत्युत संसारकी और संसारके लिये ही मानकर संसारकी ही सेवामें लगा देता है। इस प्रकार मिली हुई वस्तुओं (शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम‍्)-का प्रवाह संसारकी तरफ हो जानेसे उसका जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर चेतन-तत्त्व शेष रह जाता है अर्थात् कर्मयोगी अपने-आपसे अपने-आपमें (चेतन स्वरूपमें) स्थितिका अनुभव कर लेता है—

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।

आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

(गीता २। ५५)

‘हे पार्थ! जिस कालमें साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है, उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।’

कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषको अपने-आपमें स्थितिका अनुभव कैसे होता है, इसको बताते हैं—

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:।

आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।

न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय:॥

(गीता ३।१७-१८)

‘जो मनुष्य अपने-आपमें ही रमण करनेवाला और अपने-आपमें ही तृप्त तथा अपने-आपमें ही सन्तुष्ट है, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है। उस (कर्मयोगसे सिद्ध हुए) महापुरुषका इस संसारमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें (किसी भी प्राणीके साथ) इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता।’

अपने-आपमें स्थितिका अनुभव होनेपर उसका प्रकृति (गुणविभाग और कर्मविभाग)-से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। जबतक मनुष्य प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध (तादात्म्य) मानता है, तबतक वह प्रकृतिजन्य गुणोंके द्वारा की जानेवाली क्रियाओंको अपने द्वारा की जानेवाली मानता है—

प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥

(गीता ३।२७)

‘सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परंतु अहंकारसे मोहित अन्त:करणवाला अज्ञानी मनुष्य ‘मैं कर्ता हूँ’—ऐसा मानता है।’

परंतु जो गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जाननेवाला है अर्थात् जिसने प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है, वह कर्मयोगी महापुरुष न तो गुणोंमें आसक्त होता है और न कर्मोंमें ही आसक्त होता है—

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयो:।

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

(गीता ३।२८)

‘हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष ‘सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं’—ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता।’

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।

सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥

(गीता ६।४)

‘जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है।’