नम्र निवेदन
प्राय: प्रत्येक साधकके भीतर यह जिज्ञासा रहती है कि तत्त्वज्ञान क्या है? तत्त्वज्ञान सुगमतासे कैसे हो सकता है? आदि। इस जिज्ञासाकी पूर्ति करनेके लिये प्रस्तुत पुस्तक साधकोंके लिये बड़े कामकी है। इसमें जो बातें आयी हैं, वे केवल सीखने-सिखानेकी, सुनने-सुनानेकी नहीं हैं, प्रत्युत अनुभव करनेकी हैं। इस पुस्तकको पढ़नेसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि तत्त्वज्ञान दूरसे देखनेमें तो कठिन दीखता है, पर प्रवेश करनेपर बड़ा ही सुगम और रसीला है।
परमात्मतत्त्वकी खोजमें लगे हुए साधकोंसे प्रार्थना है कि वे इस पुस्तकका अध्ययन-मनन करें और तत्त्वका अनुभव करें।