सभी भगवत्प्राप्तिके अधिकारी हैं
मनुष्यमात्र परमात्मप्राप्तिका समानरूपसे अधिकारी है; क्योंकि मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। इसलिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, पारसी, यहूदी, ईसाई, मुसलमान आदि कोई क्यों न हो, मात्र मनुष्य परमात्माको प्राप्त कर सकते हैं। आवश्यकता केवल परमात्मप्राप्तिकी उत्कट लालसाकी है। परन्तु जबतक सत्संग नहीं मिलता अथवा कोई आफत नहीं आती, तबतक मनुष्य मानो बेहोशीमें रहता है! उसके भीतर परमात्मप्राप्तिकी लालसा जाग्रत् नहीं होती! ऐसे भी कई लोग हैं, जो यह मानते हैं कि शास्त्रोंका अध्ययन करना, पारमार्थिक पुस्तकें पढ़ना, पूजा-पाठ करना, साधन-भजन करना तो ब्राह्मणोंका अथवा साधुओंका काम है, हमारा काम नहीं है! ऐसे लोग परमात्मप्राप्तिके अधिकारी होते हुए भी परमात्माकी प्राप्तिको, उसकी आवश्यकताको नहीं समझ पाते।
परमात्माका सम्बन्ध जीवमात्रके साथ समान है। सभी जीव परमात्माके अंश हैं। पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि भी परमात्माके अंश हैं, पर उनमें परमात्मप्राप्तिकी योग्यता, अधिकार, सामर्थ्य और स्वतन्त्रता नहीं है। परन्तु मनुष्यशरीरमें परमात्मप्राप्तिकी योग्यता भी है, अधिकार भी है, सामर्थ्य भी है और स्वतन्त्रता भी है; क्योंकि मनुष्य बननेका उद्देश्य भी यही है। इसलिये जिसके भीतर परमात्मप्राप्तिकी लालसा है, वह चाहे पापी-से-पापी हो या पुण्यात्मा-से-पुण्यात्मा, निम्न-से-निम्न हो या ऊँच-से-ऊँच, वह परमात्मप्राप्तिका अधिकारी हो जायगा! अत: परमात्मप्राप्तिके विषयमें कभी किसीको निराश नहीं होना चाहिये। परन्तु कोई परमात्माकी प्राप्ति चाहे ही नहीं, उसको परमात्मा कैसे मिलेंगे? जो चाहता है, उसीको परमात्मा मिलते हैं—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४। ११) ‘जो जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ।’
एक मार्मिक बात है कि परमात्माकी प्राप्ति ब्राह्मणको नहीं होती, क्षत्रियको नहीं होती, वैश्यको नहीं होती, शूद्रको नहीं होती, ब्रह्मचारीको नहीं होती, गृहस्थको नहीं होती, साधुको नहीं होती, वानप्रस्थको नहीं होती, भाइयोंको नहीं होती, बहनोंको नहीं होती, पापीको नहीं होती, पुण्यात्माको नहीं होती! तो फिर किसको होती है? ‘साधक’ को होती है। तात्पर्य है कि जो केवल परमात्मप्राप्तिकी इच्छा रखते हैं, उनको ही परमात्माकी प्राप्ति होती है। वर्ण, आश्रम, योग्यता, पद, अधिकार आदिका सम्बन्ध असत् का सम्बन्ध है। असत् का सम्बन्ध रखते हुए सत् की प्राप्ति कैसे हो सकती है? नहीं हो सकती। इसलिये ब्राह्मण होनेके नाते अथवा साधु होनेके नाते कोई परमात्मप्राप्तिका अधिकारी हो जाय—यह बात है ही नहीं। जिसके भीतर ब्राह्मणपनेका, साधुपनेका अभिमान नहीं है और जिसके भीतर परमात्मप्राप्तिकी जोरदार लालसा है, वही परमात्मप्राप्तिका अधिकारी है। जिसके भीतर परमात्मप्राप्तिकी अनन्य अभिलाषा नहीं है, वह ब्राह्मण अथवा साधु ही क्यों न हो, उसको परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी। अपने वर्णका अभिमान होनेके कारण ही अपनेमें बड़प्पन अथवा छोटापन दीखता है कि मैं तो ब्राह्मण हूँ अथवा मैं तो शूद्र हूँ! इसलिये परमात्मप्राप्तिके विषयमें अपनेको बड़ा मानना भी बाधक है और छोटा मानना भी बाधक है। साधकमें छोटे-बड़ेका अभिमान नहीं होना चाहिये, प्रत्युत परमात्मप्राप्तिकी भूख होनी चाहिये। भोजन वही करता है, जो भूखा हो, चाहे वह ब्राह्मण हो, चाहे शूद्र। ऐसे ही भगवत्प्राप्ति उसीको होती है, जिसमें जोरदार लालसा है।
शरीरसे संसारका काम अथवा सेवा तो हो सकती है, पर परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। परमात्माकी प्राप्ति तो अपने-आपसे ही होती है और अपने-आपको ही होती है। शरीरकी प्रधानता व्यवहारमें है, परमार्थमें नहीं। इसलिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये चारों वर्ण सांसारिक व्यवहारके विषयमें हैं, परमात्मप्राप्तिके विषयमें नहीं। ब्राह्मण ब्राह्मणके साथ, क्षत्रिय क्षत्रियके साथ, वैश्य वैश्यके साथ और शूद्र शूद्रके साथ रोटी-बेटीका व्यवहार करे तथा अपने वर्णके अनुसार कर्तव्य-कर्मका आचरण करे—इस विषयमें चारों वर्ण हैं। परन्तु परमात्मप्राप्तिमें ये वर्ण काम नहीं आते। परमात्मप्राप्तिके लिये तो ‘मैं अमुक वर्ण, आश्रम आदिका हूँ’—इस अहंताको ही मिटाना होगा और अनन्यभावसे ‘मैं साधक (योगी, मुमुक्षु या भक्त) हूँ’—इसको स्वीकार करना होगा। अहंताको मिटाना क्या है? मैं न ब्राह्मण हूँ, न क्षत्रिय हूँ, न वैश्य हूँ, न शूद्र हूँ, न ब्रह्मचारी हूँ, न गृहस्थ हूँ, न साधु हूँ, न वानप्रस्थ हूँ, प्रत्युत मैं तो केवल भगवान्का हूँ।१ तात्पर्य है कि हमारी अहंताका सम्बन्ध भगवान्के साथ होना चाहिये, वर्ण-आश्रम आदिके साथ नहीं, जिसके भीतर वर्ण-आश्रम आदिकी मुख्यता है और भगवत्सम्बन्धकी गौणता है, उसको परमात्मप्राप्ति नहीं होती। इसलिये परमात्माकी प्राप्ति तब होगी, जब हमारी अहंताका सम्बन्ध परमात्माके साथ होगा कि ‘मैं तो भगवान्का ही हूँ’२।
जैसे, पहले स्त्रीमें यह अहंता होती है कि ‘मैं कुँआरी हूँ’, पर विवाह होनेपर यह अहंता बदल जाती है और ‘मैं सुहागन हूँ’—यह अहंता दृढ़ हो जाती है। इतनी दृढ़ हो जाती है कि अगर उसका पति मर भी जाय तो भी उसमें ‘मैं कुँआरी हूँ’—यह अहंता पुन: नहीं होती! वह विधवा तो हो जाती है, पर कुँआरी नहीं होती। ऐसे ही साधकमें ‘मैं ब्राह्मण हूँ, मैं साधु हूँ’ आदि कोई भी अहंता नहीं रहती, और ‘मैं परमात्माका हूँ’—यह अहंता दृढ़ हो जाती है। मैं परमात्माका हूँ—यह भाव दृढ़ होनेपर परमात्मप्राप्तिकी तत्परता, लगन, उत्कट लालसा स्वत: जाग्रत् हो जाती है। इसलिये जो परमात्माकी प्राप्ति चाहते हैं, वे अपनेमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, पुरुष आदिका अभिमान न करें, प्रत्युत ‘मैं तो भगवान्का हूँ’—ऐसा मानें। परमात्मप्राप्ति स्वयंको होती है, स्थूल-सूक्ष्म-कारणशरीरको नहीं। शरीर चाहे ब्राह्मणका हो, चाहे अन्त्यजका हो, उससे तो सम्बन्ध-विच्छेद करना है।
मनुष्यमात्रका परमात्माके साथ अकाट्य सम्बन्ध है। मनुष्य चाहे स्वर्गमें जाय, चाहे नरकोंमें जाय, किसी भी योनिमें जाय, उसका परमात्मासे सम्बन्ध कभी टूटा नहीं, टूटेगा नहीं, टूट सकता नहीं। भगवान्का अंश भगवान्से अलग हो ही कैसे सकता है? परंतु असत् के साथ सम्बन्ध मान लेनेसे वह भगवान्का सम्बन्ध भूल गया। अगर वह अपना सम्बन्ध केवल भगवान्से मान ले और अनन्यभावसे उनको पानेकी इच्छा करे तो उसको भगवत्प्राप्ति हो जायगी। जो भगवान्को नहीं चाहता, उसको ऊँचा पद मिल जायगा, तत्त्वज्ञान मिल जायगा, सिद्धियाँ मिल जायँगी, पर भगवान् और उनका प्रेम नहीं मिलेगा। परन्तु जो केवल भगवान्को ही चाहता है, वह अगर बिलकुल अनपढ़ और गँवार हो, भेड़-बकरी चरानेवाला हो, निम्न वर्णका हो, निम्न जातिका हो तो भी उसको भगवान् मिल जायँगे। कारण कि भगवान्के ही अंश होनेके नाते सब-के-सब मनुष्य भगवत्प्राप्तिके अधिकारी हैं।
‘मनुष्य’ नाम उसीका है, जो परमात्मप्राप्तिका जन्मजात अधिकारी हो! इसलिये सब-के-सब मनुष्य परमात्माको प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु परमात्माकी प्राप्ति शरीरके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत शरीरके सम्बन्ध-विच्छेदसे होती है। इसलिये भीतरमें परमात्माकी चाहना होनी चाहिये, बाहरसे शरीर कैसा ही हो, चाहे स्त्रीका शरीर हो, चाहे पुरुषका शरीर हो, चाहे ब्राह्मणका शरीर हो, चाहे चमारका शरीर हो। कारण कि ऊपरका चोला तो बदलनेवाला है, पर भीतरका स्वरूप बदलनेवाला नहीं है। बदलनेवालेका सम्बन्ध बदलनेवाले (संसार)-के साथ है और न बदलनेवालेका सम्बन्ध न बदलनेवाले (परमात्मा)-के साथ है। न बदलनेवालेके साथ बदलनेवालेका सम्बन्ध नहीं है और बदलनेवालेके साथ न बदलनेवालेका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये ‘मेरेमें योग्यता कम है, मेरे पुण्य कम हैं, मैं स्वस्थ नहीं हूँ, मैं विद्वान् नहीं हूँ, मेरे आचरण अच्छे नहीं हैं’ आदि बातोंको लेकर किसीको परमात्माकी प्राप्तिसे कभी निराश नहीं होना चाहिये। अच्छे-बुरे आचरण तो पीछे हैं, पर परमात्माका अंश पहले है। शरीर पीछे है, परमात्माका अंश पहले है।
मनुष्यमात्रका भगवान्के साथ साक्षात् सम्बन्ध है। उसमें किसी माध्यमकी जरूरत नहीं है। भगवान्ने किसी एक वर्ण, आश्रम आदिके मनुष्यको अपना अंश नहीं बताया है, प्रत्युत जीवमात्रको अपना अंश बताया है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७)। इसलिये सब-के-सब मनुष्य परमात्मप्राप्तिके पूरे-के-पूरे अधिकारी हैं। जैसे, किसी माँके दस बालक हों तो बालकोंके लिये माँके दस हिस्से नहीं होते। दसों बालकोंके लिये माँ पूरी-की-पूरी है। एक-एक बालक पूरी माँको अपनी मान सकता है। कोई बालक ऐसा नहीं कहता कि माँका दसवाँ हिस्सा मेरा है अथवा इतनी माँ तो मेरी है, इतनी माँ तेरी है। ऐसे ही भगवान्के भी हिस्से नहीं होते। भगवान्के सब-के-सब अंश पूरे भगवान्की प्राप्तिके अधिकारी हैं। एक-एक मनुष्यके लिये भगवान् पूरे-के-पूरे हैं।
माँ किसी कारणको लेकर बालककी नहीं होती। क्या अनपढ़ और मूर्खकी माँ नहीं होती? क्या बीमारकी माँ नहीं होती? क्या माँ केवल पढ़े-लिखे और स्वस्थकी ही होती है? माँपर सब बालकोंका समान हक होता है, पर वह किसी योग्यता, पद, अधिकार, विद्या आदिके नाते नहीं होता, प्रत्युत माँके नाते होता है कि ‘मेरी माँ है’! इसी तरह भगवान् हमारे हैं। छोटा हो या बड़ा हो, अच्छा हो या मन्दा हो, दुराचारी हो या सदाचारी हो, ऊँचा हो या नीचा हो, समझदार हो या बेसमझ हो, भगवान् सबके हैं। माँमें तो पक्षपात हो सकता है, पर भगवान्में पक्षपात होना सम्भव ही नहीं है—‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ (गीता ९।२९), ‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’(मानस, उत्तर०८६।४)। इसलिये हम कैसे ही हों, भगवत्प्राप्तिसे हमें कभी निराश नहीं होना चाहिये; क्योंकि इसीके लिये मनुष्यशरीर मिला है।