सबसे सुगम परमात्मप्राप्ति
परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके समान सुगम और जल्दी सिद्ध होनेवाला कार्य कोई है नहीं, था नहीं, होगा नहीं और हो सकता नहीं! परिश्रम और देरी तो उस वस्तुकी प्राप्तिमें लगती है, जो है नहीं, प्रत्युत बनायी जाय। जो स्वत:-स्वाभाविक विद्यमान है, उसकी प्राप्तिमें परिश्रम और देरी कैसी? जैसे, गंगाजीको पृथ्वीपर लानेमें बहुत जोर पड़ा और अनेक पीढ़ियाँ खतम हो गयीं, पर अब ‘गंगाजी हैं’—ऐसा जाननेमें क्या जोर पड़ता है? क्या देरी लगती है? परंतु स्वयंकी भूख, लगन न हो तो यह सुगमता किस कामकी? अगर स्वयंकी लगन हो तो सब-के-सब मनुष्य सुगमतापूर्वक और तत्काल जीवन्मुक्त हो सकते हैं!
परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति, जीवन्मुक्ति सबसे सुगम कैसे है—इस विषयको समझनेकी चेष्टा करें। प्रत्येक मनुष्यका यह अनुभव है कि ‘मैं हूँ’। बचपनसे लेकर आजतक शरीर सर्वथा बदल गया, पर मैं वही हूँ और आगे वृद्धावस्थामें शरीर बदलनेपर भी मैं वही रहूँगा। शरीर बदलेगा, पर मैं नहीं बदलूँगा। तात्पर्य है कि शरीरमें परिवर्तन होनेपर भी सत्तामें परिवर्तन नहीं होता। हम शरीरको छोड़कर दूसरी योनियोंमें भी जायँगे, तो भी सत्ता नहीं बदलेगी अर्थात् हम वही रहेंगे। अगर हम देवता बन जायँ तो भी हम वही रहेंगे, मनुष्य बन जायँ तो भी हम वही रहेंगे, पशु-पक्षी बन जायँ तो भी हम वही रहेंगे, वृक्ष-लता बन जायँ तो भी हम वही रहेंगे, भूत-प्रेत-पिशाच बन जायँ तो भी हम वही रहेंगे। स्थावर-जंगम किसी भी योनिमें जायँ, स्वयंकी सत्ता निरन्तर ज्यों-की-त्यों रहती है।
जाग्रत् , स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंमें हम वही रहते हैं। सुषुप्तिसे उठनेपर हम कहते हैं कि मैं ऐसे सुखसे सोया कि मेरेको कुछ भी पता नहीं था। परंतु ‘मेरेको कुछ पता नहीं था’—इसका पता तो था ही। अत: सुषुप्तिमें भी हमारी सत्ता सिद्ध होती है। सुषुप्तिकी तरह ही प्रलय-महाप्रलय होते हैं। प्रलय-महाप्रलयमें भी सब जीवोंकी सत्ता रहती है। जैसे सुषुप्तिसे जाग्रत् में आते हैं, ऐसे ही जीव प्रलय-महाप्रलयसे सर्ग-महासर्गमें आते हैं। तात्पर्य है कि महासर्ग और महाप्रलयमें, सर्ग और प्रलयमें, जन्म और मृत्युमें स्वयंकी सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है। वह चिन्मय सत्ता (होनापन) ही हमारा स्वरूप है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहम् हमारा स्वरूप नहीं है; क्योंकि ये सब दृश्य हैं।
शरीर बदलता है, मन बदलता है, बुद्धि बदलती है, भाव बदलते हैं, सिद्धान्त बदलते हैं, मान्यता बदलती है, देश बदलता है, काल बदलता है, वस्तु बदलती है, व्यक्ति बदलता है, अवस्था बदलती है, परिस्थिति बदलती है, घटना बदलती है, सब कुछ बदलता है, पर सत्ता नहीं बदलती। सबका संयोग और वियोग होता है, पर सत्ताका संयोग और वियोग नहीं होता। जो बदलता है और जिसका संयोग-वियोग होता है, वह हमारा स्वरूप नहीं है। जो कभी नहीं बदलता और जिसका कभी वियोग नहीं होता, वही हमारा स्वरूप है। मनुष्यका ढाँचा (बनावट) और तरहका है तथा कुत्तेका ढाँचा और तरहका है, पर सत्ता दोनोंमें एक ही है। वह सत्ता न तो स्त्री है, न पुरुष है, न देवता है, न पशु-पक्षी है, न भूत-प्रेत है। ऐसे ही सत्ता न ज्ञानी है, न अज्ञानी है; न मूर्ख है, न विद्वान् है; न निर्बल है, न बलवान् है; न साधु है, न गृहस्थ है; न ब्राह्मण है, न शूद्र है; न हलकी है, न भारी है; न छोटी है, न बड़ी है; न सूक्ष्म है, न स्थूल है। चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष हो, चाहे देवता हो, चाहे पशु हो, चाहे भूत-प्रेत हो, चाहे ज्ञानी हो, चाहे अज्ञानी हो, चाहे कसाई हो, चाहे सन्त-महात्मा हो, चाहे तत्त्वज्ञानी हो, चाहे भगवत्प्रेमी हो, सत्ता सबमें एक ही है। वह चिन्मय सत्ता न बदलती है, न मिटती है, न आती है, न जाती है। वह सत्ता हमारा स्वरूप है; बस, इतनी ही बात है। इससे अतिरिक्त कोई बात नहीं है। शास्त्रमें, वेदमें, वेदान्तमें इससे बढ़िया बात क्या आती है? ब्रह्मकी बात कहें तो वह भी सत्ता ही है। हमारेसे गलती यही होती है कि उस सत्ताके साथ कुछ-न-कुछ मिला लेते हैं। अगर कुछ न मिलायें तो जीवन्मुक्त ही हैं! कुछ भी मिलायेंगे तो बँध जायँगे। मैं स्त्री हूँ तो बँध गये, मैं पुरुष हूँ तो बँध गये, मैं बालक हूँ तो बँध गये, मैं जवान हूँ तो बँध गये, मैं बूढ़ा हूँ तो बँध गये, मैं रोगी हूँ तो बँध गये, मैं नीरोग हूँ तो बँध गये, मैं समझदार हूँ तो बँध गये, मैं बेसमझ हूँ तो बँध गये! चिन्मय सत्ताके साथ कुछ भी मिलाना बन्धन है और कुछ भी न मिलाना मुक्ति है। चिन्मय सत्ताके सिवाय हमारा और कोई स्वरूप है ही नहीं। यही तत्त्वज्ञान है। इसीको ब्रह्मज्ञान कहते हैं। कोई भले ही षट्शास्त्र पढ़ ले, अठारह पुराण पढ़ ले, अठारह उपपुराण पढ़ ले, चार वेद पढ़ ले, हजारों वर्षोंतक पढ़ाई कर ले, पर इससे बढ़कर कोई बात मिलेगी नहीं। इससे बढ़कर कोई बात है ही नहीं, मिले कहाँसे? इसलिये सन्तोंने कहा है—
बावर बेद बिदुष बावरियो, पोथी पुस्तक फंदा।
भोला नर मांही उलझाना, उलट न देखे अंधा॥
प्रश्न—जीवात्माकी सत्ता और परमात्माकी सत्ता—दोनों एक हैं या अलग-अलग?
उत्तर—सत्ता एक ही है; परंतु सत्तामें अहम् (‘मैं’)-को मिलानेसे सत्तामें भेद दीखने लग गया। कारण कि अहम्से परिच्छिन्नता पैदा होती है और परिच्छिन्नतासे सम्पूर्ण भेद पैदा होते हैं। वास्तविक सत्ता अहंरहित होनेसे अपरिच्छिन्न है। उस सत्तामें सबकी स्वत:-स्वाभाविक स्थिति है; परंतु अहम्की स्वीकृतिके कारण उसका अनुभव नहीं हो रहा है।
अहम्को जीवित न रखना साधकका खास काम है। ‘मैं ब्रह्म हूँ’—यह भाव अहम्को जीवित रखता है। कारण कि ‘मैं’ ब्रह्म नहीं है और ब्रह्ममें ‘मैं’ नहीं है। ‘मैं’ में ‘हूँ’ को मिलाना और ‘हूँ’ को ‘मैं’ में मिलाना ‘चिज्जड़ग्रन्थि’ है। यह ‘मैं’ अर्थात् अहम् केवल माना हुआ है, वास्तवमें है नहीं। इसलिये इसको जहाँ भी लगायें, वहीं प्रवेश कर जाता है। जड़में प्रवेश करके कहता है कि ‘मैं शरीर हूँ’, ‘मैं धनवान् हूँ’ आदि तथा चेतनमें प्रवेश करके कहता है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’, ‘मैं शुद्ध-बुद्ध-मुक्त आत्मा हूँ’ आदि। परंतु दोनोंमें अहम् वही-का-वही है।
‘मैं ब्रह्म हूँ’—यह अनात्मा (असत्, जड़, उत्पत्ति-विनाश-शील)-का तादात्म्य है। कारण कि अनात्माके तादात्म्यके बिना, अनात्माकी सहायताके बिना केवल आत्मतत्त्वसे परमात्माका चिन्तन, ध्यान, समाधि आदि हो ही नहीं सकते। चिन्तन, ध्यान आदि करेंगे तो अनात्माकी पराधीनता स्वीकार करनी ही पड़ेगी, अनात्माका आदर करना ही पड़ेगा। जिसकी सहायता लेंगे, उसका त्याग भी कैसे होगा और अनात्माका त्याग किये बिना आत्मतत्त्वका अनुभव भी कैसे होगा? आत्मतत्त्वका अनुभव तो अनात्मासे असंग होनेपर ही होगा।
जिसकी प्रतीति होती है, वह दृश्य (शरीर) भी हमारा स्वरूप नहीं है और जिसका भान होता है, वह अहम् भी हमारा स्वरूप नहीं है। अहम्को साथमें रखते हुए साधन करेंगे तो नयी अवस्थाकी प्राप्ति तो हो सकती है, पर अवस्थातीत तत्त्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अवस्थातीत तत्त्वकी प्राप्ति अहम्का अभाव होनेपर ही होती है। अहम्के रहते हुए यह अभिमान तो हो सकता है कि ‘मेरेको बोध हो गया, मैं ज्ञानी हो गया, मैं जीवन्मुक्त हो गया’, पर वास्तविक बोध, तत्त्वज्ञान, जीवन्मुक्ति अहम्का अभाव होनेपर ही होती है। तात्पर्य है कि सत्तामात्रका ज्ञान सत्ताको ही होता है, ‘मेरेको’ नहीं होता। सत्ता तो ज्ञानस्वरूप ही है और उस ज्ञानका ज्ञाता कोई नहीं है; क्योंकि जब ज्ञेयकी सत्ता ही नहीं, तो फिर ज्ञाता संज्ञा कैसे?
जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थामें अहम्का भाव दीखता है और सुषुप्ति-अवस्थामें अहम्का अभाव दीखता है। अहम्का भाव और अभाव—दोनोंको चेतन-तत्त्व प्रकाशित करता है। जो भाव और अभावको प्रकाशित करता है, वह ‘सत्’ है तथा जिसका भाव और अभाव होता है, वह ‘असत्’ है। जैसे नेत्र प्रकाश और अंधकार—दोनोंको प्रकाशित करता है, ऐसे ही विवेक अहम्के भाव और अभाव—दोनोंको प्रकाशित करता है। अहम्का भाव मिटकर अभाव रह जाय, जड़ता मिटकर चेतन रह जाय तो विवेक बोधमें परिणत हो जाता है।
परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति भी सुगम है और अहम्की निवृत्ति भी सुगम है। कारण कि परमात्मतत्त्वकी नित्यप्राप्ति है और अहम्की नित्यनिवृत्ति है। अहम्को मिटानेका प्रयत्न करनेसे अहम्का विवेचन तो होता है, पर अहम् मिटता नहीं। परंतु सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मसत्ताका अनुभव होनेसे अहम् मिट जाता है। इसलिये गीतामें भगवान्ने कहा है—
‘मया ततमिदं सर्वम्’
(९। ४)
‘यह सब संसार मेरेसे व्याप्त है।’
तात्पर्य है कि संसारमें सत्ता (‘है’)-रूपसे एक सम, शान्त, सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है*।
जिसका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है, उस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। अज्ञानके कारण संसारमें जो सत्ता प्रतीत हो रही है, वह भी परमात्मतत्त्वकी सत्ताके कारण ही है—
जासु सत्यता तें जड़ माया।
भास सत्य इव मोह सहाया॥
(मानस १।११७।४)
भगवान् कहते हैं—
मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियै:।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा॥
(श्रीमद्भा०११।१३।२४)
‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अत: मेरे सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार कर लें।’
तात्पर्य है कि चिन्मय सत्तारूपसे केवल परमात्मतत्त्व ही ग्रहणमें आ रहा है। कारण कि ग्रहण सत्ताका ही होता है। जिसकी सत्ता ही नहीं, उसका ग्रहण कैसे होगा?
जब सबमें एक अविभक्त सत्ता (‘है’) ही परिपूर्ण है, तो फिर उसमें मैं, तू, यह और वह—ये चार विभाग कैसे हो सकते हैं? अहंता और ममता कैसे हो सकती है? राग-द्वेष कैसे हो सकते हैं? जिसकी सत्ता ही नहीं है, उसको मिटानेका अभ्यास भी कैसे हो सकता है?
भगवान् कहते हैं—
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।
(गीता २। १६)
‘असत्का भाव विद्यमान नहीं है और सत्का अभाव विद्यमान नहीं है।’
तात्पर्य है कि असत्की नित्यनिवृत्ति है और सत्की नित्यप्राप्ति है। नित्यनिवृत्तकी निवृत्ति और नित्यप्राप्तकी प्राप्तिमें क्या कठिनता और क्या सुगमता? क्या करना और क्या न करना? क्या पाना और क्या खोना?
खोया कहे सो बावरा, पाया कहे सो कूर।
पाया खोया कुछ नहीं, ज्यों-का-त्यों भरपूर॥
सर्वत्र परिपूर्ण चिन्मय सत्तामें न देश है, न काल है, न वस्तु है, न व्यक्ति है, न अवस्था है, न परिस्थिति है, न घटना है। उस सत्तामें न आना है, न जाना है; न जीना है, न मरना है; न लेना है, न देना है; न करना है, न नहीं करना है; न समाधि है, न व्युत्थान है; न बन्धन है, न मोक्ष है; न भोगेच्छा है, न मुमुक्षुता है; न बोलना है, न सुनना है; न पढ़ना है, न लिखना है; न प्रश्न है, न उत्तर है। उसमें न कोई लाभ है, न हानि है; न कोई बड़ा है, न छोटा है; न कुछ बढ़िया है, न घटिया है—
किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुन: कियत्।
(श्रीमद्भा०११।२८।४)
‘जब द्वैत नामकी कोई वस्तु ही नहीं है, तो फिर उसमें क्या अच्छा और क्या बुरा?’
अच्छा-बुरा, ठीक-बेठीक, विधि-निषेध—यह सब मनुष्यलोककी मर्यादा है। मर्यादापर ठीक चलना मनुष्यका कर्तव्य है। मर्यादापर ठीक चलनेसे विवेकका आदर होता है और विवेकके आदरसे वह विवेक बोधमें परिणत हो जाता है। बोध होनेपर कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता अर्थात् मनुष्य कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है।
आजतक देव, राक्षस, पशु, पक्षी, मनुष्य आदि अनेक योनियोंमें जो भी कर्म किये हैं और उनका फल भोगा है, उनमेंसे कोई भी कर्म और फलभोग सत्तातक नहीं पहुँचा! आकाशमें कभी सूर्यका प्रकाश फैल जाता है, कभी अँधेरा छा जाता है, कभी धुआँ छा जाता है, कभी काले-काले बादल छा जाते हैं, कभी बिजली चमकती है, कभी वर्षा होती है, कभी ओले गिरते हैं, कभी तरह-तरहके शब्द होते हैं, गर्जना होती है; परंतु आकाशमें कोई फर्क नहीं पड़ता। वह ज्यों-का-त्यों निर्लिप्त-निर्विकार रहता है। ऐसे ही सर्वत्र परिपूर्ण सत्तामें कभी महासर्ग और महाप्रलय होता है, कभी सर्ग और प्रलय होता है, कभी जन्म और मृत्यु होती है, कभी अकाल पड़ता है, कभी बाढ़ आती है, कभी भूचाल आता है, कभी घमासान युद्ध होता है; परंतु सत्तामें कोई फर्क नहीं पड़ता। कितनी ही उथल-पुथल हो जाय, पर सत्ता ज्यों-की-त्यों निर्लिप्त-निर्विकार रहती है। इसलिये गीतामें आया है—
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति॥
(१३।२७)
‘जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है।’
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वश:।
य: पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥
(१३।२९)
‘जो सम्पूर्ण क्रियाओंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपने-आपको अकर्ता देखता अर्थात् अनुभव करता है, वही वास्तवमें सही देखता है।’
इस प्रकार सत्तामात्रमें स्थितिका अनुभव करके चुप हो जाना चाहिये। चुप होनेके लिये साधक तीन बातोंपर विचार करे—
(१) ‘मैं’ और ‘मेरा’ कुछ नहीं है; क्योंकि स्वरूप सत्तामात्र है और सत्तामात्रके सिवाय दूसरा कुछ नहीं है, फिर मैं और मेरा कौन हुआ?
(२) मेरेको कुछ नहीं चाहिये; क्योंकि सत्तामें किंचिन्मात्र भी कोई कमी नहीं है, फिर वस्तुकी इच्छा कैसे की जाय?
(३) अपने लिये कुछ नहीं करना है; क्योंकि जिन करणोंसे कर्म होते हैं, वे करण भी प्रकृतिमें हैं और जो कर्म करनेवाला है, वह अहंकार (कर्तापन) भी प्रकृतिमें है। अत: स्वरूपमें करनेकी योग्यता भी नहीं है और करनेका दायित्व भी नहीं है।
इस प्रकार विचार करके चुप हो जाय, सब ओरसे विमुख होकर सत्तामात्रमें स्थिर हो जाय। यह ‘चुप साधन’ है। न तो स्थूलशरीरकी क्रिया हो, न सूक्ष्मशरीरका चिन्तन हो और न कारणशरीरकी सुषुप्ति हो, तब चुप साधन होता है। इसमें कोई क्रिया नहीं है, प्रत्युत जिससे क्रिया प्रकाशित होती है, उस अक्रिय तत्त्वमें स्वत:सिद्ध स्थिति है। इसमें वृत्तिको लगाना या हटाना भी नहीं है, प्रत्युत जिस ज्ञानके अन्तर्गत वृत्ति दीखती है, उस ज्ञानमें स्वत:सिद्ध स्थिति है। यह चुप साधन समाधिसे भी ऊँची चीज है; क्योंकि इसमें बुद्धि और अहम्से सम्बन्ध-विच्छेद है। इसलिये समाधिमें तो लय, विक्षेप, कषाय और रसास्वाद—ये चार दोष (विघ्न) रहते हैं, पर चुप साधनमें ये दोष नहीं रहते।
चिन्मय सत्तामात्र अक्रिय है और उसमें अनन्त सामर्थ्य है। भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, लययोग, हठयोग आदि जितने भी योग हैं, वे सब इस अक्रिय तत्त्वसे ही प्रकट होते हैं। यह अक्रिय तत्त्व सम्पूर्ण साधनोंकी भूमि है अर्थात् सभी साधन इसीसे प्रकट होते हैं और इसीमें लीन होते हैं। चुप साधनसे अक्रिय तत्त्व (सत्तामात्र)-में अपनी स्वत:स्वाभाविक तथा सहज स्थितिका अनुभव हो जाता है अर्थात् अहम् मिट जाता है और सम, शान्त, सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन परमात्मतत्त्व शेष रह जाता है—
ढूँढ़ा सब जहाँ में, पाया पता तेरा नहीं।
जब पता तेरा लगा तो अब पता मेरा नहीं॥
संतोंने इस अवस्थातीत सहजावस्थाका वर्णन इस प्रकार किया है—
अपन पौ आपहि में पायो।
शब्द-हि-शब्द भयो उजियारा,
सतगुरु भेद बतायो॥
जैसे सुन्दरी सुत लै सूती,
स्वप्ने गयो हिराई।
जाग परी पलंग पर पायो,
न कछु गयो न आई॥
जैसे कुँवरी कंठ मणि हीरा,
आभूषण बिसरायो।
संग सखी मिलि भेद बतायो,
जीव को भरम मिटायो॥
जैसे मृग नाभी कस्तूरी,
ढूँढत बन बन धायो।
नासा स्वाद भयो जब वाके,
उलटि निरन्तर आयो॥
कहा कहूँ वा सुख की महिमा,
ज्यों गूंगे गुड़ खायो।
कहै कबीर सुनो भाई साधो,
ज्यों-का-त्यों ठहरायो॥
तात्पर्य है कि जो साधक अपनेमें ‘मैं हूँ’—इस प्रकार परिच्छिन्न (एकदेशीय) सत्ताका अनुभव करता था, वही ‘मैं’ (अहम्)-के मिटनेपर अपरिच्छिन्न सत्ताका अनुभव कर लेता है अर्थात् ‘हूँ’ में ही ‘है’ को पा लेता है। फिर ‘हूँ’ नहीं रहता, प्रत्युत एकमात्र ‘है’ ही रहता है।
राग-द्वेष, हर्ष-शोक, कर्तृत्व-भोक्तृत्व, जड़ता, परिच्छिन्नता आदि सब विकार अहम्में रहते हैं। उस अहम्को साधकने अपनेमें स्वीकार किया है, इसलिये अहम्को मिटानेके लिये अपनेमें परमात्मतत्त्वको स्वीकार करना अर्थात् ‘हूँ’ में ‘है’ को स्वीकार करना आवश्यक है।
एक मार्मिक बात है कि ‘हूँ’ में ‘है’ को मिलानेकी अपेक्षा ‘हूँ’ को ‘है’ में मिलाना बढ़िया है। ‘मैं’ भगवान्का ही हूँ, अन्य किसीका नहीं हूँ—इस प्रकार अपने-आपको भगवान्के अर्पित कर देना, भगवान्की शरणमें चले जाना ही ‘हूँ’ को ‘है’ में मिलाना है। ‘हूँ’ में ‘है’ को मिलानेसे सूक्ष्म परिच्छिन्नता रह सकती है; क्योंकि ‘हूँ’ में अनादिकालसे परिच्छिन्नताके संस्कार पड़े हुए हैं, जो कि ‘है’ में नहीं हैं। इसलिये ‘हूँ’ को ‘है’ के अर्पित करनेसे परिच्छिन्नताका, अहम्का सुगमतापूर्वक सर्वथा अभाव हो जाता है।
चाहे ‘हूँ’ को ‘है’ में मिलायें, चाहे ‘है’ में ‘हूँ’ को मिलायें, दोनोंका परिणाम एक ही होगा अर्थात् ‘हूँ’ नहीं रहेगा, ‘है’ रह जायगा। जैसे—कर्मयोगी कर्ममें अकर्मको तथा अकर्ममें कर्मको देखता है—‘कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:’ (गीता ४। १८); अत: परिणाममें कर्म नहीं रहता, अकर्म रह जाता है। ज्ञानयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्माको तथा आत्मामें सम्पूर्ण प्राणियोंको देखता है—‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि’ (गीता ६।२९); अत: परिणाममें प्राणी नहीं रहते, आत्मा रह जाती है। भक्तियोगी सबमें भगवान्को और भगवान्में सबको देखता है—‘यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति’ (गीता ६।३०); अत: परिणाममें सब नहीं रहते, भगवान् रह जाते हैं। अकर्म, आत्मा और भगवान्—तीनों तत्त्वसे एक ही हैं।