सहजनिवृत्ति और स्वत:प्राप्ति

जिसको साधक करना चाहता है, वह स्वत: ही हो रहा है! जैसे, वह संसारकी निवृत्ति करना चाहता है तो संसारकी सहजनिवृत्ति निरन्तर हो रही है और वह परमात्माको प्राप्त करना चाहता है तो परमात्मा स्वत:प्राप्त हैं।

एक विभाग जड़ प्रकृति (शरीर तथा संसार)-का है और एक विभाग चेतन तत्त्व (जीवात्मा तथा परमात्मा)-का है। प्रकृतिकी सहजनिवृत्ति है और तत्त्वकी स्वत:प्राप्ति है।

प्रकृतिमें निरन्तर परिवर्तनरूप क्रिया हो रही है। वह किसी भी अवस्थामें अक्रिय नहीं रहती। प्रवृत्ति और निवृत्ति अथवा सर्ग-महासर्ग और प्रलय-महाप्रलय—दोनों ही अवस्थाओंमें प्रकृतिकी क्रियाशीलता (सहजनिवृत्ति) ज्यों-की-त्यों रहती है। अत: उसकी प्रतीति तो होती है, पर प्राप्ति नहीं होती। तात्पर्य है कि अपना शरीर तथा स्त्री, पुत्र, धन, जमीन, मकान आदि पहले भी हमारे साथ नहीं थे, बादमें भी हमारे साथ नहीं रहेंगे तथा अभी भी निरन्तर हमारेसे बिछुड़ रहे हैं। परंतु तत्त्वकी स्वत:प्राप्ति है; क्योंकि वह कभी भी हमारेसे बिछुड़ता नहीं। जैसे यह सबका अनुभव है कि बचपनमें हमारा शरीर जैसा था, वैसा अब नहीं है, सर्वथा बिछुड़ गया और अब भी निरन्तर बिछुड़ रहा है; परंतु हम स्वयं वही हैं, जो कि बचपनमें थे। अत: जो निरन्तर बिछुड़ रहा है, वह असत् है तथा उसकी सहजनिवृत्ति है और जो वही है, कभी बिछुड़ता नहीं, वह सत् है तथा उसकी स्वत:प्राप्ति है।

असत् की सहज निवृत्ति है अर्थात् उसकी निवृत्ति करनी नहीं पड़ती, प्रत्युत वह स्वत: निरन्तर निवृत्त हो रहा है। यह सहजनिवृत्ति स्वत:सिद्ध है। इस सहजनिवृत्तिका कभी अभाव होता ही नहीं, इसमें कभी बाधा पड़ती ही नहीं, इसमें कभी विश्राम होता ही नहीं।

जैसे पृथ्वी अपनी धुरीपर निरन्तर घूम रही है, ऐसे ही देखने-सुनने-समझनेमें जो संसार आता है, उसकी निरन्तर निवृत्ति हो रही है। संसारमात्र निरन्तर अभावमें जा रहा है। चाहे उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय हो, चाहे जन्म, जीवन और मरण हो, चाहे बालक, जवान और वृद्धावस्था हो, सहजनिवृत्ति ज्यों-की-त्यों है। घोर-से-घोर प्रवृत्तिमें भी सहजनिवृत्ति ज्यों-की-त्यों है, उसका भान चाहे न हो।

सत् की स्वत:प्राप्ति है। सत् कभी अप्राप्त हुआ ही नहीं, अप्राप्त है ही नहीं, अप्राप्त होगा ही नहीं, अप्राप्त होना सम्भव ही नहीं। वह सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदिमें ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। सत् की प्राप्ति स्वत:सिद्ध है, करनी नहीं पड़ती। पापी-से-पापी, अज्ञानी-से-अज्ञानी मनुष्य हो अथवा पुण्यात्मा, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त, भगवत्प्रेमी महापुरुष हो, सत् (स्वत:प्राप्त तत्त्व) किसीको भी अप्राप्त नहीं है। फर्क केवल इतना है कि अज्ञानी उसका अनुभव नहीं करता और ज्ञानी उसका अनुभव करता है। प्राप्तको अप्राप्त और अप्राप्तको प्राप्त मान लिया—इस भूलके कारण ही स्वत:प्राप्तका अनुभव नहीं होता।

जिसकी निरन्तर सहजनिवृत्ति है, उसका सुख लोलुपतापूर्वक आकर्षण ही स्वत:प्राप्तके अनुभवमें खास बाधक है। आकर्षणका कारण है—असत् की सत्ता और महत्ता, जो कि हमारी ही दी हुई है। अगर हम असत् को सत्ता और महत्ता न दें तो उसकी ताकत नहीं है कि वह हमारेको अपनी तरफ आकर्षित कर सके। जैसे, पहले भोगे हुए भोगकी याद आती है तो एक सुखका अनुभव होता है और दु:खकी याद आती है तो दु:खका अनुभव होता है। सुख-दु:खका वह भोग अभी नहीं है, उसका वर्तमानमें सर्वथा अभाव है, फिर भी उसके चिन्तनमात्रसे सुख अथवा दु:ख मिलता है। इससे सिद्ध हुआ कि हमने उसको सत्ता और महत्ता दी है, जो कि अभावरूप है! अगर सत्ता और महत्ता न देते तो जिसका वर्तमानमें अभाव है, उस भूतकालके चिन्तनसे सुख अथवा दु:ख नहीं होता।

जैसे भूतकालकी वस्तु वर्तमानमें अप्राप्त है, ऐसे ही वर्तमानमें मिली हुई वस्तु भी अप्राप्त है! मिली हुई वस्तु निरन्तर बिछुड़ रही है। जैसे भूतकालकी वस्तु याद आयी और भूल गयी, ऐसे ही वर्तमानकी वस्तु मिल गयी और बिछुड़ गयी—दोनोंमें क्या फर्क हुआ? उसकी प्राप्ति सिद्ध नहीं होती, प्रत्युत निवृत्ति ही सिद्ध होती है।

यह नियम है कि जो किसी भी जगह अप्राप्त है, वह सभी जगह अप्राप्त है। जो किसी भी समय अप्राप्त है, वह सदा ही अप्राप्त है। जो किसी भी वस्तुमें अप्राप्त है, वह सभी वस्तुओंमें अप्राप्त है। जो किसी भी मनुष्यको अप्राप्त है, वह सभी मनुष्योंको अप्राप्त है। जो किसी भी अवस्थामें अप्राप्त है, वह सभी अवस्थाओंमें अप्राप्त है। जो किसी भी परिस्थितिमें अप्राप्त है, वह सभी परिस्थितियोंमें अप्राप्त है। तात्पर्य है कि जो किसी भी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति आदिमें अप्राप्त है, वह कहीं भी प्राप्त नहीं है; क्योंकि मिला हुआ निरन्तर बिछुड़ रहा है। अत: वास्तवमें संसार कभी प्राप्त हुआ नहीं, प्राप्त है नहीं, प्राप्त होगा नहीं, प्राप्त होना सम्भव ही नहीं। जिसकी निरन्तर सहजनिवृत्ति है, उसकी प्राप्ति हो ही कैसे सकती है?

संसारमें राग होनेके कारण ही सहजनिवृत्तिमें भी प्रवृत्ति दीखती है, अप्राप्त भी प्राप्त दीखता है। जैसे हमारी उम्र प्रतिक्षण नष्ट हो रही है, शरीर प्रतिक्षण मर रहा है; परंतु असत् में रागके कारण हमें दीखता है कि हम (शरीरसे) जी रहे हैं।

असत् के रागके कारण ही यह कहना पड़ता है कि सहजनिवृत्ति निरन्तर हो रही है। वास्तवमें तो संसार सहजनिवृत्त, स्वत:निवृत्त, नित्यनिवृत्त ही है। भगवान‍्ने कहा है—

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:॥

(गीता२।१६)

‘असत् का भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है। तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त (तत्त्व) देखा है।’

जो निवृत्त है, वह ‘असत्’ है और वह कभी प्राप्त नहीं होता। जो प्राप्त है, वह ‘सत्’ है और वह कभी निवृत्त नहीं होता। निवृत्तका नित्यवियोग है और प्राप्तका नित्ययोग है। असत् का केवल अभाव-ही-अभाव है और इस अभावका कभी अभाव (नाश) नहीं होता। सत् का केवल भाव-ही-भाव है और इस भावका कभी अभाव नहीं होता। असत् असत् ही है और सत् सत् ही है। असत् है ही नहीं और सत् है ही! तत्त्वज्ञ महापुरुषोंने सत् और असत्—दोनोंका ही तत्त्व देखा है। तात्पर्य है कि सत‍्का तत्त्व भी सत् है और असत् का तत्त्व भी सत् है अर्थात् दोनोंका तत्त्व सत् (सत्तामात्र) ही है।

असत् को सत्ता देनेसे ही निवृत्त (सहजनिवृत्त) और प्राप्त (स्वत:प्राप्त)—ये दो विभाग कहे जाते हैं। असत् को सत्ता न दें तो न निवृत्त है, न प्राप्त है, प्रत्युत सत्तामात्र ज्यों-की-त्यों है! दूसरे शब्दोंमें जबतक असत् की सत्ता है, तबतक विवेक है। असत् की सत्ता मिटनेपर विवेक ही तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है; क्योंकि जब असत् की सत्ता है ही नहीं, तो फिर सत् ही शेष रहेगा। इसीको गीताने ‘वासुदेव: सर्वम्’ कहा है।

जैसा है, वैसा जान लेनेका नाम ‘ज्ञान’ है। है और तरहका, जाने और तरहसे—इसका नाम ‘अज्ञान’ है। जैसे, संसारकी निरन्तर सहजनिवृत्ति हो रही है—ऐसा जानना ज्ञान है और संसार प्राप्त है—ऐसा जानना अज्ञान है। परमात्मतत्त्व स्वत:प्राप्त है—ऐसा जानना ज्ञान है और परमात्मतत्त्व अप्राप्त है—ऐसा जानना अज्ञान है। अत: साधकके लिये खास बात यह है कि वह ‘संसारकी निरन्तर सहजनिवृत्ति हो रही है और तत्त्व सभीको स्वत: प्राप्त है’—इस ज्ञान (विवेक)-को महत्त्व दे। महत्त्व देनेसे यह ज्ञान ही तत्त्वज्ञानतक पहुँच जायगा और अज्ञान सर्वथा मिट जायगा।

प्रश्न—संसारकी निरन्तर सहजनिवृत्ति हो रही है—यह तो प्रत्यक्ष दीखता है, पर तत्त्व स्वत:प्राप्त है—यह कैसे दीखे?

उत्तर—जिस ज्ञानके अन्तर्गत सहजनिवृत्ति दीखती है, वह ज्ञान निरन्तर स्वत:प्राप्त है। कारण कि निरन्तर मिटनेवालेको मिटनेवाला नहीं देख सकता, प्रत्युत रहनेवाला ही देख सकता है। जानेवालेका अनुभव जानेवालेको नहीं हो सकता, प्रत्युत रहनेवालेको ही हो सकता है। विनाशीका अनुभव विनाशीको नहीं हो सकता, प्रत्युत अविनाशीको ही हो सकता है। बदलनेवालेको बदलनेवाला नहीं जान सकता, प्रत्युत न बदलनेवाला ही जान सकता है। सीमितका ज्ञान सीमितको नहीं हो सकता, प्रत्युत असीमको ही हो सकता है।

जाननेवालेका विभाग अलग है और जाननेमें आनेवालेका विभाग अलग है। जाननेवाला ‘सत्’ है और जाननेमें आनेवाला ‘असत्’ है। न बदलनेवाला ‘सत्’ है और बदलनेवाला ‘असत्’ है। अत: जिससे सहजनिवृत्ति दीखती है, वही स्वत:प्राप्त है और वही हमारा स्वरूप है।

देखनेवाला ‘है’ है और दीखनेवाला ‘नहीं’ है। इसीलिये कहा है—

है सो सुन्दर है सदा, नहिं सो सुन्दर नाहिं।

नहिं सो परगट देखिये, है सो दीखे नाहिं॥

‘नहीं’ को ‘है’ माननेसे दृष्टि ‘नहीं’ में ही अटक जाती है, ‘है’ तक पहुँचती ही नहीं, फिर ‘है’ कैसे दीखे? अत: साधकको चाहिये कि वह जिस ज्ञानके अन्तर्गत ‘नहीं’ दीख रहा है, उस ज्ञानमें स्थिर अर्थात् चुप हो जाय। फिर जो अभी नहीं दीखता है, वह दीखने लग जायगा!

संसारमें तरह-तरहकी क्रियाएँ हो रही हैं, व्यवहार हो रहा है, परिवर्तन हो रहा है, पर वह सब जिसके अन्तर्गत हो रहा है, उस ‘है’ में क्रिया, व्यवहार, परिवर्तन आदि कुछ नहीं है। वह नित्य सत्ता (‘है’) ज्यों-की-त्यों है। कोई जन्म रहा है, कोई मर रहा है; कोई आ रहा है, कोई जा रहा है; कोई हँस रहा है, कोई रो रहा है; कोई सुखी है, कोई दु:खी है; कोई क्रुद्ध है, कोई शान्त है; कोई भोगमें लगा है, कोई योगमें लगा है; कोई बोल रहा है, कोई चुप बैठा है; कोई जाग रहा है, कोई सो रहा है; परन्तु इन सबमें एक ही सत्ता समानरूपसे ज्यों-की-त्यों परिपूर्ण है। उस सत्तामें कभी किंचित् भी कोई फर्क नहीं पड़ता। अत: मर्यादापूर्वक सब व्यवहार करते हुए भी साधककी दृष्टि उस समरूप सत्तापर ही रहनी चाहिये। गीतामें आया है—

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥

(५।१८)

‘ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्मतत्त्वको देखनेवाले होते हैं।’

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति॥

(१३।२७)

‘जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित तथा समरूपसे स्थित देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है।’

यह नित्य सत्ता ही कर्मयोगकी दृष्टिसे ‘अकर्म’ है, ज्ञानयोगकी दृष्टिसे ‘आत्मा’ है और भक्तियोगकी दृष्टिसे ‘भगवान‍्’ है। इसलिये कर्मयोगी कर्ममें अकर्मको तथा अकर्ममें कर्मको देखता है—

कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।

(गीता ४।१८)

ज्ञानयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्माको तथा आत्मामें सम्पूर्ण प्राणियोंको देखता है—

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

(गीता ६।२९)

भक्तियोगी सबमें भगवान‍्को तथा भगवान‍्में सबको देखता है—

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

(गीता ६।३०)

तात्पर्य है कि कर्मयोगी सम्पूर्ण कर्मोंमें एक अकर्म (कर्मोंके साथ सम्बन्धका अभाव अर्थात् निर्लिप्तता)-को ही देखता (अनुभव करता) है, ज्ञानयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक आत्माको ही देखता है और भक्तियोगी सबमें एक भगवान‍्को ही देखता है। कर्मयोगी कर्म और कर्मफलके साथ सम्बन्ध न रखकर केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करता है। अत: उसको कर्मोंके साथ सम्बन्धके अभावका अर्थात् निर्लिप्तताका अनुभव हो जाता है। जैसे मनमें कभी हरिद्वारका चिन्तन होता है, कभी कलकत्तेका चिन्तन होता है और मनमें वहाँकी अलग-अलग वस्तुएँ, प्राणी आदि दीखने लगते हैं तो वह सब कुछ मन ही बना हुआ है। मनोराज्यमें एक मनके सिवाय किसी भी प्राणी-पदार्थकी सत्ता नहीं है। ऐसे ही ज्ञानयोगीकी दृष्टिमें एक आत्माके सिवाय और किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। जैसे ब्रह्माजीने ग्वालबालोंको और बछड़ोंको चुरा लिया तो भगवान‍् श्रीकृष्ण ही ग्वालबाल, बछड़े आदि अनेक रूपोंमें हो गये। भगवान‍्की इस लीलाका पता किसीको भी नहीं लगा। एक दिन गायोंका अपने बछड़ोंके प्रति और गोपोंका अपने बालकोंके प्रति अपूर्व स्नेह देखकर बलदेवजीको शंका हुई तो उन्होंने देखा कि एक भगवान‍् श्रीकृष्ण ही बछड़ों और ग्वालबालोंके रूपमें बने हुए हैं। ऐसे ही भक्तियोगी सब रूपोंमें भगवान‍्को ही देखता है अर्थात् उसकी दृष्टिमें एक भगवान‍्के सिवाय और किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती।

चाहे अकर्म कहें, चाहे आत्मा कहें और चाहे भगवान‍् कहें, तत्त्वसे तीनों एक (बोधस्वरूप सत्तामात्र) ही हैं। उस चिन्मय सत्ता (‘है’)-की तरफ दृष्टि, लक्ष्य चला जाय—यही उसकी प्राप्ति है! फिर भी कोई दोष, विकार दीखे तो साधकको घबराना नहीं चाहिये। जैसे साँपको देखकर हम डर गये, पर उसी समय पता लगा कि यह तो रस्सी है। रस्सीका पता लगनेपर भी कुछ देरतक भयका असर रहता है, हाथोंमें कँपकँपी रहती है, हृदय धड़कता रहता है। परंतु यह कँपकँपी, धड़कन अपने-आप शान्त हो जाती है। ऐसे ही साधककी दृष्टि एक ‘है’ पर ही रहे तो सब विकार अपने-आप शान्त हो जायँगे। वह ‘है’ इतना ठोस है कि उसमें कोई दूसरी चीज प्रवेश कर सकती ही नहीं। उसमें किसी शंका आदिके लिये स्थान ही नहीं है। जब हमारी दृष्टि वहाँ नहीं थी, तब भी वह ‘है’ ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण था और अब वहाँ दृष्टि जानेपर भी वह ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है—

दौड़ सके तो दौड़ ले, जब लगि तेरी दौड़।

दौड़ थक्या धोखा मिट्या, वस्तु ठौड़-की-ठौड़॥

इसी बातको अर्जुनने कहा है—‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’(गीता १८। ७३) ‘मेरा मोह नष्ट हो गया है तथा स्मृति प्राप्त हो गयी है।’

भूल मिटनेका नाम ‘स्मृति’ है। भूल जाने हुएकी ही होती है और जाननेके अन्तर्गत ही प्रकाशित होती है। जिसकी सत्ता विद्यमान नहीं है, उसको विद्यमान मान लिया—यह भूल है। भूलको भूलरूपसे जानते ही भूल मिट जाती है और स्मृति प्राप्त हो जाती है। इस स्मृतिकी फिर कभी विस्मृति नहीं होती ‘यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव’ (गीता ४। ३५)। कारण कि स्मृति अर्थात् बोध एक ही बार होता है और सदाके लिये होता है। तात्पर्य है कि बोधकी आवृत्ति नहीं होती। बोध एक बार अनुभवमें, दृष्टिमें आ गया तो सदाके लिये आ ही गया! वास्तवमें बोधका अभाव विद्यमान है ही नहीं अर्थात् बोध स्वत:प्राप्त है और उसको जाननेवाला अन्य कोई नहीं है। जबतक बोधको जाननेवाला अन्य कोई है, तबतक वास्तवमें बोध हुआ ही नहीं। स्वयं बोधस्वरूप है और उसको जाननेवाला भी स्वयं ही है, जैसा कि अर्जुनने भगवान‍्के लिये कहा है—‘स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम’ (गीता १०।१५) ‘हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं।’

प्रश्न—बोध स्वत:प्राप्त कैसे है?

उत्तर—यह प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है कि नाशवान् हमारे जाननेमें आता है और हम उसको जाननेवाले हैं। अहम‍् हमारे जाननेमें आता है और हम उसको जाननेवाले हैं। विकार हमारे जाननेमें आते हैं और हम उनको जाननेवाले हैं। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदि सबका अभाव हमारे जाननेमें आता है, पर अपना (स्वयंका) अभाव कभी हमारे जाननेमें नहीं आता। जो जाननेमें आता है, वह हमारेसे अलग है और जो जानता है, वह हमारा स्वरूप है। जो जाननेमें आता है, वह असत् है तथा उसकी सत्ता विद्यमान नहीं है और जो जाननेवाला है, वह सत् है तथा उसका अभाव विद्यमान नहीं है। अत: जाननेमें आनेवाला और जाननेवाला—दोनोंका विभाग बिलकुल अलग-अलग है—यह वास्तविक बात हमारे जाननेमें आ गयी, अनुभवमें आ गयी, दृष्टिमें आ गयी, तो फिर इसमें क्या अभ्यास है? हम एक नदीको देख रहे हैं और किसी जानकार आदमीने बताया कि यह गंगाजी है, तो अब इसमें क्या अभ्यास है? यह गंगाजी है—यह ज्ञान एक ही बार होगा, बार-बार नहीं होगा और सदाके लिये होगा। कारण कि सच्ची बात कभी कच्ची नहीं हो सकती और कच्ची बात कभी सच्ची नहीं हो सकती। सच्ची बातको स्वीकार करनेमें क्या परिश्रम है? अभ्यास तो दृढ़-अदृढ़ होता है, पर सच्ची बातकी स्वीकृति कभी अदृढ़ होती ही नहीं! तात्पर्य यह हुआ कि बोध तो स्वत:प्राप्त है, पर हमारे पुराने संस्कार, पुरानी मान्यताएँ उसमें बाधक हो रही हैं, जो कि असत्-रूप हैं और सत्तारूपसे मानी हुई हैं; जैसे—सब काम धीरे-धीरे समय पाकर होते हैं, फिर बोध तत्काल कैसे हो जायगा? अनादिकालका अज्ञान इतनी जल्दी कैसे मिट जायगा? आदि-आदि। यह सब हमारा वहम है। एक गुफामें लाखों वर्षोंसे अँधेरा हो और उसमें दीपक जला दिया जाय तो क्या अँधेरा दूर होनेमें भी लाखों वर्ष लगेंगे?

साधकको आज ही यह बात समझकर दृढ़ कर लेनी चाहिये कि असत् का विभाग ही अलग है। स्वयंका असत् से सम्बन्ध कभी हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, है ही नहीं और होना सम्भव ही नहीं। असत् से तादात्म्य (मैं-मेरापन)-के कारण ही असत् का आकर्षण स्वयंमें दीखता है। वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो असत् में ही असत् का आकर्षण है, असत् में ही असत् की सत्ता और महत्ता है, असत् में ही सब दोष हैं, असत् में ही सब विकार हैं, असत् में ही कर्ता और भोक्ता है, असत् में ही उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय है, असत् में ही भूत, भविष्य और वर्तमान है, असत् में ही क्रिया और पदार्थ हैं, असत् में ही जन्म-मरण है, असत् में ही बन्धन है! स्वयं (सत्) तो इन सबको जाननेवाला तथा इनसे अलग है। ये जन्म-मरण आदि सब बातें तो भूतकालकी हैं, उनकी सत्ता ही नहीं है। परंतु स्वयं सदा वर्तमान है। गीतामें आया है—

सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥

(१३।२३)

अर्थात् जो सर्वथा वर्तमान है, उसका फिर जन्म नहीं होता। कारण कि जो सदा वर्तमान ही रहता है, वह कैसे मरेगा? और बिना मरे फिर जन्म भी कैसे होगा? वर्तमान तो सदा निर्दोष ही होता है।

प्रश्न—मनुष्य जो भी दोष करता है, वह वर्तमानमें ही करता है, फिर वर्तमान निर्दोष कैसे?

उत्तर—वर्तमानका अर्थ है—स्वयं; क्योंकि स्वयं निरन्तर वर्तमान (विद्यमान) रहता है—‘नाभावो विद्यते सत:’। स्वयंका वर्तमान होना कालके अधीन नहीं है अर्थात् इसमें भूत, भविष्य और वर्तमानका भेद नहीं है। अत: स्वयंका स्वरूप है—सत्तामात्र। यह सत्ता निरन्तर रहनेवाली और सर्वथा निर्दोष है—‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ (गीता५।१९)। इसलिये किसीका भी वर्तमान दोषी नहीं है।

अगर कालकी दृष्टिसे विचार करें तो भी वर्तमानकाल सबका निर्दोष है। कारण कि मनुष्य भूतकालमें किये दोषसे ही अपनेको दोषी मानता है। दोषके समय मनुष्य अपनेको दोषी नहीं मानता; क्योंकि उस समय उसमें बेहोशी, असावधानी रहती है। अत: वर्तमानमें वह है तो निर्दोष ही!

दोषोंकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। गुणोंकी कमीको ही दोष कह देते हैं। निर्दोषता स्वत:सिद्ध है और कमी अपनी ही बनायी हुई है। असत् को सत्ता और महत्ता देनेसे ही अपनेमें कमी प्रतीत होती है। अत: सम्पूर्ण दोषोंकी प्रतीति असत् को सत्ता और महत्ता देनेसे ही है। अगर असत् को सत्ता और महत्ता न दें तो दोषोंकी प्रतीति है ही कहाँ?

दोषोंका भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और निर्दोषताका अभाव विद्यमान नहीं है। दोषोंका आदि और अन्त होता है, पर निर्दोषताका आदि और अन्त नहीं होता। इसलिये दोषोंके आदि-अन्तका, आने-जानेका तथा अभावका अनुभव तो सबको होता है, पर अपने (स्वयंके) आदि-अन्तका, आने-जानेका तथा अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता; क्योंकि स्वयं निरन्तर निर्दोष, निर्विकार रहता है। तात्पर्य है कि दोषोंकी सहजनिवृत्ति है और निर्दोषता स्वत:प्राप्त है।