विभागयोग

गीतामें आया है—

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्‍‍ध्यनादी उभावपि।

(१३।१९)

‘प्रकृति और पुरुष—दोनोंको ही तुम अनादि समझो।’

तात्पर्य है कि एक प्रकृति-विभाग है और एक पुरुष-विभाग है। शरीर तथा संसार प्रकृति-विभागमें हैं और आत्मा तथा परमात्मा पुरुष-विभागमें हैं। जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं, ऐसे ही इन दोनोंके भेदका ज्ञान अर्थात् विवेक भी अनादि है; अत: विवेकदृष्टिसे देखें तो ये दोनों विभाग एक-दूसरेसे बिलकुल असम्बद्ध हैं अर्थात् दोनोंमें किंचिन्मात्र भी कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रकृति तो असत्, जड़ तथा दु:खरूप है और पुरुष सत्, चित् तथा आनन्दरूप है। प्रकृति नाशवान्, विकारी तथा क्रियाशील है और पुरुष अविनाशी, निर्विकार तथा अक्रिय है। प्रकृतिकी नित्यनिवृत्ति है और पुरुषकी नित्यप्राप्ति है। गीताके आरम्भमें भी भगवान‍्ने इसी विभागका वर्णन शरीर और शरीरी, देह और देही आदि नामोंसे किया है*।

अत: इस विभागको ठीक-ठीक समझना प्रत्येक साधकके लिये बहुत आवश्यक तथा शीघ्र बोध करानेवाला है। कारण कि शरीर और शरीरीको एक मानना ही बन्धन है और इन दोनोंको बिलकुल अलग-अलग अनुभव करना ही मुक्ति है। भगवान‍् कहते हैं—

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।

भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥

(गीता१३।३४)

‘जो ज्ञानचक्षु (विवेकदृष्टि)-से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागको तथा कार्य-कारणसहित प्रकृतिसे स्वयंको अलग जानते हैं, वे परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं।’

जितनी भी क्रियाएँ होती हैं, वे सब-की-सब प्रकृति-विभागमें ही होती हैं। इसलिये गीतामें आया है कि सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं—

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वश:।

(१३।२९)

प्रकृतिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको ही, कहीं ‘गुणोंसे होनेवाली क्रियाएँ और कहीं इन्द्रियोंसे होनेवाली क्रियाएँ कहा गया है; जैसे—सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं—‘प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:’ (३। २७); गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (३। २८); गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं—‘नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति’(१४।१९); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं—‘इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते’ (५।९) आदि। तात्पर्य है कि क्रियाका विभाग प्रकृतिमें ही है, पुरुषमें नहीं। अत: प्रकृति कभी किंचिन्मात्र भी अक्रिय नहीं होती और पुरुषमें कभी किंचिन्मात्र भी क्रिया नहीं होती। इसलिये गीतामें आया है कि तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी ‘मैं (स्वयं) लेशमात्र भी कुछ नहीं करता हूँ’—ऐसा अनुभव करता है—‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ (५। ८); स्वयं न करता है, न करवाता है—‘नैव कुर्वन्न कारयन्’ (५। १३); यह पुरुष शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (१३।३१); जो स्वरूपको अकर्ता देखता (अनुभव करता) है, वही यथार्थ देखता है—‘य: पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति’ (१३।२९); जो आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है—‘तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य:। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति:॥’ (१८। १६) आदि।

शरीर-वाणी-मनके द्वारा जितनी क्रियाएँ होती हैं, वे सब-की-सब प्रकृतिमें ही होती हैं। पुरुष (स्वयं)-में कभी किंचिन्मात्र भी कोई क्रिया नहीं होती। जंगलमें वृक्ष पैदा होते हैं, बढ़ते हैं और नष्ट हो जाते हैं तो प्रकृतिकी जो समष्टि शक्ति वहाँ काम कर रही है, वही समष्टि शक्ति इस व्यष्टि शरीरमें भी काम कर रही है। खाना-पीना, सोना-जगना आदि सब-का-सब व्यवहार प्रकृतिमें स्वत: हो रहा है। जैसे, भोजन पचाते नहीं हैं, प्रत्युत स्वत: पचता है। बालक माँकी गोदीमें स्वत: बड़ा होता है। शरीरकी अवस्थाएँ स्वत: बदलती हैं। मकान स्वत: पुराना होता है। वर्षा स्वत: होती है। नदी स्वत: बहती है। ऐसे ही अपने कहलानेवाले शरीरके द्वारा खाना-पीना आदि क्रियाएँ भी स्वत: होती हैं। अत: साधकका भाव हर समय यही रहना चाहिये कि क्रियाएँ हो रही हैं, मैं लेशमात्र भी कुछ नहीं करता हूँ—‘नैव किञ्चित्करोमि’। कारण कि क्रियाका विभाग ही अलग है।

सृष्टिमात्रमें स्वत: क्रिया हो रही है। उस क्रियाका लेशमात्र भी कोई कर्ता नहीं है। न परमात्मा कर्ता है, न जीव कर्ता है। स्वत: होनेवाली क्रियाके लिये कर्तृत्वकी जरूरत ही क्या है? प्रकृतिमें स्वाभाविक क्रियता है और पुरुषमें स्वाभाविक अक्रियता है। परंतु जब पुरुष प्रकृतिके अंश अहम‍्के साथ तादात्म्य मान लेता है, तब वह प्रकृतिमें होनेवाली क्रियाको अपनेमें स्वीकार करके ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मानने लगता है—‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’(गीता३।२७)। तात्पर्य है कि वह कर्ता बनता नहीं, केवल कर्तापनकी मान्यता कर लेता है। अपनेको कर्ता मानते ही उसपर शास्त्रीय विधिनिषेध लागू हो जाते हैं और उसको कर्मफलका भोक्ता बनना पड़ता है। वस्तुत: स्वरूपमें लेशमात्र भी कर्तृत्व नहीं है। कर्तृत्वका विभाग ही अलग है। आजतक देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, यक्ष, राक्षस आदि अनेक योनियोंमें जो भी कर्म किये गये हैं, उनमेंसे कोई भी कर्म स्वरूपतक नहीं पहुँचा तथा कोई भी शरीर स्वरूपतक नहीं पहुँचा; क्योंकि कर्म और शरीर (पदार्थ)-का विभाग ही अलग है और स्वरूपका विभाग ही अलग है।

जैसे चार कोनोंवाले किसी लोहेके टुकड़ेको अग्निसे तपा दिया जाय तो लोहेसे तादात्म्य होनेके कारण अग्नि भी चार कोनोंवाली दीखने लगती है। ऐसे ही प्रकृतिसे तादात्म्य (प्रकृतिस्थ) होनेपर सर्वथा निर्विकार पुरुषमें भी प्रकृतिका विकार दीखने लगता है। जैसे चुम्बककी तरफ लोहा ही खिंचता है, अग्नि नहीं खिंचती; परंतु लोहेसे तादात्म्य होनेके कारण अग्नि भी चुम्बककी तरफ खिंचती हुई दीखने लगती है। ऐसे ही प्रकृतिसे तादात्म्य होनेपर सर्वथा अक्रिय पुरुषमें भी प्रकृतिकी क्रिया दीखने लगती है। तात्पर्य है कि वास्तवमें प्रकृतिके साथ मिले बिना पुरुष किंचिन्मात्र भी कर्ता और भोक्ता नहीं बन सकता। गीतामें आया है—

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते।

पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥

पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।

(१३।२०-२१)

‘कार्य तथा करणकी उत्पत्तिमें एवं पुरुषके कर्तृत्वमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दु:खके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। परंतु प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है।’

तात्पर्य है कि क्रियामात्र प्रकृतिमें ही होती है, पर क्रियाका फल अर्थात् सुख-दु:खकी मान्यता पुरुषमें ही होती है। कारण कि सुख-दु:खका भोग चेतनमें ही हो सकता है, जड़में नहीं। परंतु वास्तवमें प्रकृतिस्थ पुरुष ही सुख-दु:खका भोक्ता बनता है। प्रकृतिमें स्थिति पुरुषने मानी है, वास्तवमें है नहीं। इसलिये पुरुष किसी भी लोकमें अथवा योनिमें चला जाय, वह वास्तवमें प्रकृतिस्थ होता ही नहीं। वह तो नित्य-निरन्तर स्वस्थ (‘स्व’ में स्थित) ही रहता है—‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’ (गीता १४। २४)। जब वह शरीरस्थ ही नहीं है, तो फिर वह प्रकृतिस्थ कैसे हो सकता है? परंतु जैसे एक स्त्रीके साथ पति-पत्नीका सम्बन्ध मान लेनेसे उसके पूरे कुटुम्बके साथ सम्बन्ध हो जाता है, ऐसे ही एक शरीरमें अपनी स्थिति मान लेनेसे उसका मात्र प्रकृतिके साथ सम्बन्ध हो जाता है। तात्पर्य है कि शरीरस्थ होते ही पुरुष प्रकृतिस्थ हो जाता है। अगर वह शरीरस्थ न हो तो प्रकृतिस्थ भी नहीं होता। वास्तवमें स्वयं न शरीरस्थ है, न प्रकृतिस्थ, प्रत्युत वह सर्वत्र स्थित है—‘सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते’ (गीता १३।३२)। सम्पूर्ण क्रियाएँ उसके अन्तर्गत होती हैं। वह सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंका प्रकाशक और आधार है। क्रियाओंका तो आरम्भ होकर अन्त हो जाता है और पदार्थ उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, पर उनका प्रकाशक और आधार ज्यों-का-त्यों रहता है। क्रिया और पदार्थ प्रकृतिमें हैं। स्वयंमें न क्रिया है, न पदार्थ है।

करनेकी जिम्मेवारी उसीपर होती है, जो कुछ कर सकता है। जैसे, कितना ही चतुर चित्रकार हो, बिना सामग्री (रंग, ब्रश आदि)-के वह चित्र नहीं बना सकता, ऐसे ही पुरुष बिना प्रकृतिकी सहायताके कुछ नहीं कर सकता। अत: पुरुषपर कुछ करनेकी जिम्मेवारी हो ही नहीं सकती। चिन्मय सत्तामात्रमें कोई कमी नहीं आती, वह सर्वथा पूर्ण है; अत: पुरुषको अपने लिये कुछ नहीं चाहिये। चिन्मय सत्ताके सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं; अत: पुरुषको किसी साथीकी जरूरत नहीं है। इस प्रकार ‘मुझे (स्वयंको) कुछ करना है ही नहीं, मुझे कुछ चाहिये ही नहीं और मेरा कुछ है ही नहीं’—ये तीन बातें ठीक समझमें आ जायँ तो प्रकृतिके साथ तादात्म्य नहीं रहेगा। प्रकृतिसे तादात्म्य न रहनेपर प्रकृतिमें क्रिया तो रहेगी, पर भोग करनेवाला कोई नहीं रहेगा।

गीतामें आया है—

यथा प्रकाशयत्येक: कृत्स्नं लोकमिमं रवि:।

क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥

(१३।३३)

‘हे भारत! जैसे एक ही सूर्य सम्पूर्ण संसारको प्रकाशित करता है, ऐसे ही क्षेत्रज्ञ (पुरुष) सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है।’

तात्पर्य है कि जैसे सूर्य सम्पूर्ण जगत् (दृश्यमात्र)-को प्रकाशित करता है और उसके प्रकाशमें सम्पूर्ण शुभ-अशुभ क्रियाएँ होती हैं, पर सूर्य उन क्रियाओंका न तो कर्ता बनता है और न भोक्ता ही बनता है। ऐसे ही स्वयं सम्पूर्ण लोकोंके सब शरीरोंको प्रकाशित करता है अर्थात् उनको सत्ता-स्फूर्ति देता है, पर वास्तवमें स्वयं न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है अर्थात् उसमें न कर्तृत्व आता है, न भोक्तृत्व। तात्पर्य है कि स्वयंमें प्रकाशकत्वका अभिमान नहीं है। इसलिये सिद्ध महापुरुषके लिये स्पष्ट कहा गया है—

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति स:॥

(गीता ४।२०)

‘वह कर्मोंमें अच्छी तरहसे लगा हुआ भी वास्तवमें किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं करता।’

स्वरूपमें लेशमात्र भी कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है—यह स्वत:सिद्ध बात है। इसमें कोई पुरुषार्थ नहीं है अर्थात् इसके लिये कुछ करना नहीं है, केवल इधर विवेकदृष्टि करनी है। तात्पर्य है कि कर्तृत्व-भोक्तृत्वको मिटाना नहीं है, प्रत्युत इनको अपनेमें स्वीकार नहीं करना है, इनके अभावका अनुभव करना है; क्योंकि वास्तवमें ये अपनेमें हैं ही नहीं! इसलिये साधकको अपनेमें निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्वका अनुभव करना चाहिये। अपनेमें निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्वका अनुभव होना ही जीवन्मुक्ति है।

स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है और उसमें किंचिन्मात्र भी कोई क्रिया नहीं होती—

अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्मायमव्यय:।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥

(गीता१३।३१)

‘हे कौन्तेय! यह पुरुष स्वयं अनादि और निर्गुण होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है, न लिप्त होता है।’

जैसे बाहरसे अनेक तरंगें उठती हुई दीखनेपर भी गहराईमें समुद्र शान्त रहता है, ऐसे ही बाहरसे (व्यवहारमें) सब क्रियाएँ होते हुए भी साधकके भीतर स्थिरता रहनी चाहिये। तात्पर्य है कि बाहरसे ‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ होते हुए भी भीतरसे ‘न करोति न लिप्यते’ रहना चाहिये अर्थात् चिन्मय सत्तामात्रमें स्थित रहना चाहिये।

साधकसे प्राय: यह भूल होती है कि वह खाना-पीना, सोना-जगना आदि लौकिक क्रियाओंको तो प्रकृतिमें होनेवाली मान लेता है—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’, पर जप, ध्यान, समाधि आदि पारमार्थिक क्रियाओंको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये मानता है। वास्तवमें यह साधकके लिये बाधक है! कारण कि ज्ञानयोगकी दृष्टिसे नीची-से-नीची क्रिया हो अथवा ऊँची-से-ऊँची क्रिया हो, है वह प्रकृतिकी ही! लाठी घुमाना और माला फेरना—दोनों क्रियाएँ अलग-अलग होनेपर भी प्रकृतिमें ही हैं। इसलिये भगवान‍्ने कहा है—

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नर:।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतव:॥

(गीता१८।१५)

‘मनुष्य शरीर, वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रनिषिद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव) पाँचों हेतु होते हैं।’

तात्पर्य है कि खाना-पीना, सोना-जगना आदिसे लेकर जप, ध्यान, समाधितक सम्पूर्ण लौकिक-पारमार्थिक क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं। अत: साधकको चाहिये कि वह पारमार्थिक क्रियाओंका त्याग तो न करे, पर उनमें अपना कर्तृत्व न माने अर्थात् उनको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये न माने। क्रिया चाहे लौकिक हो, चाहे पारमार्थिक हो, उसका महत्त्व वास्तवमें जड़ताका ही महत्त्व है। शास्त्रविहित होनेके कारण पारमार्थिक क्रियाओंका अन्त:करणमें जो विशेष महत्त्व रहता है, वह भी जड़ताका ही महत्त्व होनेसे साधकके लिये बाधक है*।

जैसे सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिकी हैं, ऐसे ही सम्पूर्ण पदार्थ भी प्रकृतिके ही हैं—

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन:।

सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै:॥

(गीता१८।४०)

‘पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो।’

अत: क्रिया और पदार्थ—दोनों ही प्रकृति-विभागमें हैं। पुरुष-विभागमें किंचिन्मात्र भी न क्रिया है, न पदार्थ। क्रियाका आदि और अन्त होता है तथा पदार्थकी उत्पत्ति और विनाश तथा संयोग और वियोग होते हैं; परंतु पुरुष आदि-अन्त, उत्पत्ति-विनाश तथा संयोग-वियोगसे सर्वथा रहित है—

न जायते म्रियते वा कदाचि-

न्नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।

अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

(गीता २।२०)

‘यह शरीरी न कभी जन्मता है और न कभी मरता है। यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।’

करना, होना और है—ये तीन विभाग हैं। ‘करना’ होनेमें और ‘होना’ ‘है’ में बदल जाय तो अहंकार सर्वथा नष्ट हो जाता है। जिसके अन्त:करणमें क्रिया और पदार्थका महत्त्व है, ऐसा असाधक (संसारी मनुष्य) मानता है कि ‘मैं क्रिया कर रहा हूँ’—‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता३।२७)। जो कर्ता बनता है, उसको भोक्ता बनना ही पड़ता है। जिसमें विवेककी प्रधानता है, ऐसा साधक अनुभव करता है कि ‘क्रिया हो रही है’—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (गीता ३।२८) अर्थात् ‘मैं कुछ भी नहीं करता हूँ’—‘नैव किञ्चित्करोमीति’ (गीता ५।८)। परंतु जिसको तत्त्वज्ञान हो गया है, ऐसा सिद्ध महापुरुष केवल सत्ता तथा ज्ञप्तिमात्र (‘है’)-का ही अनुभव करता है—‘योऽवतिष्ठति नेङ्गते’ (गीता१४।२३)। वह चिन्मय सत्ता सम्पूर्ण क्रियाओंमें ज्यों-की-त्यों परिपूर्ण है। क्रियाओंका तो अन्त हो जाता है, पर चिन्मय सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है। महापुरुषकी दृष्टि क्रियाओंपर न रहकर स्वत: एकमात्र चिन्मय सत्ता (‘है’)-पर ही रहती है।

जबतक ‘करना’ है, तबतक अहंकारके साथ सम्बन्ध है; क्योंकि अहंकार (कर्तापन)-के बिना ‘करना’ सिद्ध नहीं होता। करनेका भाव होनेपर कर्तृत्वाभिमान हो ही जाता है। कर्तृत्वाभिमान होनेसे ‘करना’ होता है और करनेसे कर्तृत्वाभिमान पुष्ट होता है। इसलिये किये हुए साधनसे साधक कभी अहंकाररहित हो ही नहीं सकता। अहंकारपूर्वक किया गया कर्म कभी कल्याण नहीं कर सकता; क्योंकि सब अनर्थोंका, जन्म-मरणका मूल अहंकार ही है। अपने लिये कुछ न करनेसे अहंकारके साथ सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् प्रकृतिमात्रसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह क्रियाको महत्त्व न देकर अपने विवेकको महत्त्व दे। विवेकको महत्त्व देनेसे विवेक स्वत: स्पष्ट होता रहता है और साधकका मार्गदर्शन करता रहता है। आगे चलकर यह विवेक ही तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है। तत्त्वज्ञान होनेपर चिन्मय सत्तामात्र शेष रहती है। वह सत्ता सर्वथा असंग है—‘असंगो ह्ययं पुरुष:’ (बृहदा० ४। ३। १५)। उस सत्तामें स्वत:सिद्ध स्थिति ही मुक्ति है और उसके सिवाय अन्य (प्रकृति तथा उसके कार्य)-का संग ही बन्धन है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता१३।२१)।

प्रश्न—जो क्रिया हम संकल्पपूर्वक करते हैं, उसमें स्पष्ट ही ऐसा दीखता है कि ‘मैं कर रहा हूँ’। जैसे भूख लगनेपर हम भोजन करनेका संकल्प करते हैं तो यह स्पष्ट दीखता है कि ‘मैं भोजन करता हूँ’। अत: क्रियामात्र प्रकृतिमें ही होती है, मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूँ—यह कैसे मानें?

उत्तर—वास्तवमें संकल्प भी प्रकृति (मन)-में ही होता है। परंतु विवेक स्पष्ट न होनेके कारण अर्थात् मनसे तादात्म्य माननेके कारण संकल्प अपनेमें दीखता है। भूख लगना स्वयंका धर्म नहीं है, प्रत्युत प्राणोंका धर्म है*।

भोजन प्राणोंके पोषणके लिये होता है, अपने पोषणके लिये नहीं। परंतु प्राणोंके साथ तादात्म्य होनेसे ऐसा मालूम होता है कि ‘मेरेको भूख लगी है’ और यह संकल्प होता है कि मैं भोजन करूँ। यदि प्राणोंके साथ एकता न मानें तो भूख लगनेपर भोजन करनेका संकल्प नहीं होगा, प्रत्युत स्फुरणा होगी। स्फुरणा और संकल्पका भेद समझना बहुत आवश्यक है। स्फुरणा तो पैदा होकर मिट जाती है, पर संकल्प पैदा होनेके बाद मिटता नहीं, प्रत्युत उससे फिर कामना पैदा हो जाती है—‘संकल्पप्रभवान् कामान्’ (गीता६।२४)। स्फुरणा दर्पणकी तरह है। दर्पणपर दृश्य बहुत स्पष्ट दीखता है, पर दर्पण उस दृश्यको पकड़ता नहीं। परंतु संकल्प कैमरेकी फिल्मकी तरह है। कैमरेकी फिल्मपर पड़ा दृश्य पकड़ा जाता है। अत: स्फुरणामें निर्लिप्तता रहती है और संकल्पमें लिप्तता होती है।

सिद्ध महापुरुषमें स्फुरणा होती है और साधारण मनुष्य तथा साधकमें संकल्प होता है। जड़तासे तादात्म्य होनेके कारण साधकको जड़ताकी कमी अपनेमें दीखती है। परंतु जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर सिद्धको जड़ताकी कमी अपनेमें कभी नहीं दीखती; क्योंकि उसकी स्थिति स्वत:सिद्ध चिन्मयतामें होती है। सिद्धका यह स्वाभाविक अनुभव होता है कि क्रियामात्र प्रकृतिमें ही है, स्वयंमें किंचिन्मात्र भी नहीं। सिद्धका जो अनुभव होता है, उसीका साधक आदरपूर्वक अनुकरण करता है।

प्रश्न—अनुकरण करनेका तात्पर्य क्या है?

उत्तर—क्रियामात्रका अपने साथ सम्बन्ध कभी था नहीं, है नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव ही नहीं—इस बातको दृढ़तासे मान लेना ही सिद्धके अनुभवका अनुकरण करना है।

प्रश्न—दृढ़तासे माननेके लिये जो बुद्धि लगानी पड़ेगी अर्थात् बुद्धिका सम्बन्ध रहेगा, जिससे यह करण-सापेक्ष हो जायगा?

उत्तर—हाँ, पहले बुद्धि लगानी पड़ेगी, कहने और सुननेके लिये वाणी और श्रोत्र भी लगाने पड़ेंगे; परंतु उद्देश्य तत्त्वको जाननेका (अनुभव करनेका) होनेसे परिणाममें बुद्धि आदि करणोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा।

प्रश्न—गीतामें आया है कि कोई भी मनुष्य (कश्चित्), किसी भी अवस्थामें (जातु), क्षणमात्र भी (क्षणमपि) कर्म किये बिना नहीं रह सकता (३। ५), फिर कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद कैसे होगा?

उत्तर—क्रियामात्र केवल प्रकृतिमें ही होती है। परंतु प्रकृतिके साथ अपना तादात्म्य स्वीकार करनेसे मनुष्य प्रकृतिजन्य गुणोंके अधीन हो जाता है—‘अवश:’ तथा उसका क्रियाके साथ सम्बन्ध हो जाता है। इसलिये प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध माननेवाला कोई भी मनुष्य जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा, समाधि तथा सर्ग-महासर्ग, प्रलय-महाप्रलय आदि किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता—

न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै:॥

(गीता३।५)

प्रश्न—सुषुप्ति, मूर्च्छा तथा समाधि-अवस्थामें क्रिया कैसे होती है?

उत्तर—मनुष्य सोता हो और कोई उसको बीचमें ही जगा दे तो वह कहता है कि मेरेको कच्ची नींदमें जगा दिया! इससे सिद्ध होता है कि सुषुप्तिके समय भी नींदके पकनेकी क्रिया हो रही थी। ऐसे ही मूर्च्छा और समाधिके समय भी क्रिया होती है। पातंजलयोगदर्शनमें इस क्रियाको ‘परिणाम’ नामसे कहा है१।

‘परिणाम’ का अर्थ है—परिवर्तनकी धारा अर्थात् बदलनेका प्रवाह२।

तात्पर्य है कि समाधिके आरम्भसे लेकर व्युत्थान होनेतक क्रिया होती रहती है। अगर क्रिया न हो तो व्युत्थान हो ही नहीं सकता। समाधिके समय परिणाम होता है और समाधिके अन्तमें व्युत्थान होता है। प्रकृतिकी सम्पूर्ण अवस्थाओंसे अतीत है—सहजावस्था। सहजावस्था स्वरूपकी होती है, जिसमें किंचिन्मात्र भी कोई क्रिया नहीं है। अत: सहजावस्थामें परिणाम तथा व्युत्थान कभी होता ही नहीं।

प्रश्न—सहजावस्थाकी प्राप्तिका उपाय क्या है?

उत्तर—उपाय है—अपने लिये कुछ न करना अर्थात् खाना-पीना आदि साधारण क्रियाओंसे लेकर जप, ध्यान, समाधितक सम्पूर्ण क्रियाएँ दूसरेके लिये करना। कारण कि क्रियाएँ दूसरे (प्रकृतिके) विभागमें ही हैं, स्वरूप-विभागमें नहीं। मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और शरीर भी दूसरे अर्थात् प्रकृतिके ही हैं। नि:स्वार्थभावसे दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करना ‘कर्मयोग’ है। मैं कुछ भी नहीं करता हूँ, गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—ऐसा देखना ‘ज्ञानयोग’ है। केवल भगवान‍्की प्रसन्नताके लिये ही सम्पूर्ण कर्म करना ‘भक्तियोग’ है। अपने लिये सब कर्म करना ‘जन्ममरणयोग’ है।

कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग—तीनों दृष्टियोंसे अपने लिये लेशमात्र भी कुछ न करनेसे क्रिया और पदार्थसे अर्थात् प्रकृति-विभागसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और एक चिन्मय सत्तामात्रमें अपनी स्वत:सिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। यही सहजावस्था है। यह सहजावस्था स्वत:सिद्ध है, की नहीं जाती। जो की जाती है, वह सहजावस्था नहीं होती, प्रत्युत कृत्रिम अवस्था होती है। इस सहजावस्थाका अनुभव होनेपर फिर कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता।