(७)

सब कुछ भगवान‍् ही हैं—इसका अनुभव करनेके तीन चरण हैं, जो क्रमश: इस प्रकार हैं—

१.सब कुछ भगवान‍्का ही है।

२.सब कुछ भगवान‍् ही हैं।

३.भगवान‍्के सिवाय कभी कुछ हुआ ही नहीं।

देखने-सुननेमें जो कुछ आता है, वह सब मिलने और बिछुड़नेवाला है। जो मिला है, वह बिछुड़ जायगा—इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें तिल-जितनी कोई वस्तु भी हमारी नहीं है। जो कुछ देखने-सुननेमें आता है, वह सब अपरा प्रकृति है, जो भगवान‍्की है। भगवान‍्ने अपरा प्रकृतिको भी ‘मेरी प्रकृति’ कहा है—‘अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा’ (गीता७।४) और परा प्रकृतिको भी ‘मेरी प्रकृति’ कहा है—‘प्रकृतिं विद्धि मे पराम्’ (गीता ७। ५)। फिर हमारी क्या वस्तु हुई? सब कुछ भगवान‍्का ही हुआ! अत: जो कुछ दीखता है, वह हमारा नहीं है, प्रत्युत भगवान‍्का है—यह दृढ़तासे स्वीकार कर लें तो हमारा साधन शुरू हो जायगा। जबतक हम मिले हुएको अपना मानते रहेंगे, तबतक साधन शुरू नहीं होगा। मिले हुएको अपना मानते रहनेसे न तो विवेक दृढ़ होता है और न विश्वास ही दृढ़ होता है। इसलिये सन्तोंने, भक्तोंने कभी संसारको अपना नहीं माना, प्रत्युत केवल भगवान‍्को ही अपना माना—‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’। ‘मैं’ भी हमारा नहीं है, प्रत्युत भगवान‍्का ही है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदि सब भगवान‍्के ही हैं।

मेरा कुछ नहीं है, सब कुछ भगवान‍्का ही है—इस सत्यकी स्वीकृति होते ही ‘सब कुछ भगवान‍् ही हैं’—यह सत्य प्रकट हो जायगा। कारण कि यह जगत् केवल जीवकी कल्पना है। जगत् न तो महात्माकी दृष्टिमें है और न परमात्माकी दृष्टिमें है, प्रत्युत जीवात्माकी दृष्टिमें है। महात्माकी दृष्टिमें सब कुछ भगवान‍् ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’(गीता ७।१९)। भगवान‍्की दृष्टिमें सत्-असत् सब कुछ वे ही हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। परन्तु जीवने अपने राग-द्वेषके कारण जगत‍्को अपनी बुद्धिमें धारण कर रखा है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता७।५)। वास्तवमें जगत‍्का नामोनिशान भी नहीं है। सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, घटना, परिस्थिति आदिमें केवल भगवान‍्-ही-भगवान‍् परिपूर्ण हैं। अगर यह बात हमारी समझमें नहीं आती तो हमारी समझमें कमी है, तत्त्वमें कमी नहीं है। भले ही हमारी समझमें न आये, पर सच्ची बात सच्ची ही रहेगी, झूठी कैसे हो जायगी? साधक कुछ भी करे, अन्तमें उसे सच्ची बातको स्वीकार करना ही पड़ेगा।

‘वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव होनेके बाद फिर ‘सर्वम्’ भी नहीं रहता, प्रत्युत केवल ‘वासुदेव:’ रह जाता है। इसीको श्रीमद्भागवतमें ‘आत्यन्तिक प्रलय’ कहा गया है (१२। ४। २३—३४) और इसीको गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने ‘परम विश्राम’ कहा है—‘पायो परम बिश्रामु’(मानस, उत्तर० १३०। छं०३)। जैसे, जबतक गेहूँकी खेती रहती है, तबतक पत्ती-डंठल दीखते हैं। अन्तमें पत्ती-डंठल नहीं रहते, केवल गेहूँ रह जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि केवल वासुदेव-ही-वासुदेव विद्यमान है। अन्य कुछ है ही नहीं, कभी हुआ ही नहीं, कभी होगा ही नहीं, कभी हो सकता ही नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि एक परमात्माके सिवाय कोई चीज कभी पैदा हुई ही नहीं! इस स्थितिका वर्णन नहीं हो सकता; क्योंकि वर्णन करनेवाला कोई (व्यक्ति) रहता ही नहीं!

भगवान‍् कहते हैं—

सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया।

परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशय:॥

(श्रीमद्भा० ११। २९। १८)

‘जब सबमें परमात्मबुद्धि की जाती है, तब सब कुछ परमात्मा ही हैं—ऐसा दीखने लगता है। फिर इस परमात्मदृष्टिसे भी उपराम होनेपर सम्पूर्ण संशय स्वत: निवृत्त हो जाते हैं।’

‘उपरमेत्’ पदका तात्पर्य है कि साधक ‘सब कुछ भगवान‍् ही हैं’—इस वृत्तिसे भी उपराम हो जाता है, इस वृत्तिको भी छोड़ देता है; क्योंकि उसकी दृष्टिमें ‘सब कुछ’ रहता ही नहीं। इसलिये वृत्ति छूटनेपर एक भगवान‍् ही रह जाते हैं। तात्पर्य है कि भक्त सर्वत्र परिपूर्ण भगवान‍्के शरणागत होकर अपने-आपको भी भगवान‍्में ही लीन कर देता है। फिर शरणागत नहीं रहता, केवल शरण्य रह जाते हैं। ‘मैं’ नहीं रहता, केवल भगवान‍् रह जाते हैं। यही असली शरणागति है। ऐसी शरणागतिके बाद फिर परमप्रेमकी प्राप्ति होती है—‘मद्भक्तिं लभते पराम्’ (गीता १८। ५४)। भगवान‍् अपनी इच्छासे प्रेमलीलाके लिये एकसे दो हो जाते हैं—

द्वैतं मोहाय बोधात्प्राग्जाते बोधे मनीषया।

भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥

(बोधसार, भक्ति० ४२)

‘तत्त्वबोधसे पहलेका द्वैत तो मोहमें डालता है, पर बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर होता है।’

भगवान‍्की इच्छासे होनेवाला यह प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होता है। इसलिये कभी भक्त और भगवान‍् एक हो जाते हैं और कभी दो हो जाते हैं। प्रेममें यह मिलना और अलग होना (मिलन और विरह) भगवान‍्की इच्छासे ही होता है, भक्तकी इच्छासे नहीं। इस प्रेमकी माँग मुक्त महापुरुषोंमें भी देखी जाती है। कारण कि योग और बोधकी प्राप्ति होनेपर तो सूक्ष्म अहम‍् रहता है*, पर प्रेमकी प्राप्ति होनेपर इस सूक्ष्म अहम‍्का भी सर्वथा अभाव हो जाता है।

तभी कहा है—

प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।

अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥

(मानस, उत्तर० ४९। ३)