उपसंहार
यह जगत् भगवान्का आदि अवतार है—‘आद्योऽवतार: पुरुष: परस्य’ (श्रीमद्भा० २। ६। ४१)। एक परमात्मा ही अनेकरूप बन जाते हैं और फिर अनेकरूपका त्याग करके एकरूप हो जाते हैं। अनेकरूपसे होनेपर भी वे एक ही रहते हैं। वे एक रहें या अनेक हो जायँ, यह उनकी मरजी है, उनकी लीला है। एक सोनेके सैकड़ों गहने बन जायँ और फिर गहने पुन: सोना हो जायँ अथवा एक खाँड़के सैकड़ों खिलौने बन जायँ और फिर खिलौने पुन: खाँड़ हो जायँ, फर्क क्या पड़ा? ऐसे ही भगवान् कुछ भी बन जायँ, फर्क क्या पड़ा? तत्त्व एक ही है और एक ही रहेगा। उस एक तत्त्वके सिवाय कभी कुछ हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं, हो सकता ही नहीं। एकमात्र भगवान् ही थे, भगवान् ही हैं और भगवान् ही रहेंगे। वे एक ही भगवान् प्रेमी और प्रेमास्पदका रूप धारण करके प्रेमकी लीला करते हैं। उस प्रतिक्षण वर्धमान परमप्रेमकी प्राप्तिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता है।