भगवद्दर्शन

एक गुजराती सज्जन निम्नलिखित प्रश्नोंका उत्तर बड़ी उत्कण्ठाके साथ चाहते हैं। नाम प्रकाश न करनेके लिये उन्होंने लिख दिया है, इसलिये उनका नाम प्रकाशित नहीं किया गया है, प्रश्नोंके भावोंकी रक्षा करते हुए कुछ शब्द बदले गये हैं।

१—कई महात्मा पुरुष कहते हैं कि इस समय ईश्वरका दर्शन नहीं हो सकता। क्या यह बात माननेयोग्य है? यदि थोड़ी देरके लिये मान लें तो फिर भक्त तुलसीदास और नरसी मेहता आदिको इस कलियुगमें उस श्यामसुन्दरकी मनमोहिनी मूर्तिका दर्शन हुआ था, यह बात क्या असत्य है?

२—जैसे आप मेरे सामने बैठे हों और मैं आपसे बातें कर रहा हूँ। क्या प्यारे कृष्णचन्द्रका इस प्रकार दर्शन होना सम्भव है? यदि सम्भव है तो हमें क्या करना चाहिये कि जिससे हम उस मोहिनी मूर्तिको शीघ्र देख सकें?

३—जहाँतक ये चर्म-चक्षु उस प्यारेको तृप्त होनेतक नहीं देख सकेंगे वहाँतक ये किसी कामके नहीं हैं। नेत्रोंको सार्थक करनेका ‘सिद्ध-मार्ग’ कौन-सा है? सो बतलाइये।

४—कृष्णदर्शनकी तीव्रतम विरहाग्नि हृदयमें जल रही है, न मालूम वह बाहर क्यों नहीं निकलती! इसीसे मैं और भी घबरा रहा हूँ।

इन प्रश्नोंके साथ उक्त सज्जनने और भी बहुत-सी बातें लिखी हैं, जिनसे विदित होता है कि उनके हृदयमें भगवद्दर्शनकी अभिलाषा जाग्रत् हुई है। इन प्रश्नोंका यथार्थ उत्तर तो उन पूज्य महापुरुषसे मिलना सम्भव है, जो उस श्यामसुन्दरकी मनोहर और दिव्य रूप-माधुरीका दर्शन कर धन्य हो चुके हैं। परंतु महापुरुषोंकी अनुभवयुक्त वाणीसे जो कुछ सुननेमें आया है, उसीके आधारपर इन प्रश्नोंका उत्तर देनेकी कुछ चेष्टा की जाती है। प्रश्नकर्ता सज्जनने ये प्रश्न करके मुझको जो भगवत्-चर्चाका शुभ अवसर प्रदान किया है, इसके लिये मैं उनका कृतज्ञ हूँ। चारों प्रश्नोंका उत्तर पृथक्-पृथक् न लिखकर एक ही साथ लिखा जाता है।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस युगमें भगवान‍्के दर्शन अवश्य हो सकते हैं, बल्कि अन्यान्य युगोंकी अपेक्षा थोड़े समयमें और थोड़े प्रयाससे ही हो सकते हैं। भक्त-शिरोमणि तुलसीदासजी और नरसी मेहता आदि प्रेमियोंको भगवान‍्के प्रत्यक्ष दर्शन हुए हैं, इस बातको मैं सर्वथा सत्य मानता हूँ। यदि भक्त चाहे तो वह दो मित्रोंकी भाँति एक स्थानपर मिलकर भगवान‍्से परस्पर वार्तालाप कर सकता है। अवश्य ही भक्तमें वैसी योग्यता होनी चाहिये। भक्तोंके ऐसे अनेक पुनीत चरित इस बातके प्रमाण हैं। भगवान‍्के शीघ्र दर्शनका सबसे उत्तम उपाय दर्शनकी तीव्र और उत्कट अभिलाषा ही है। जिस प्रकार जलमें डूबता हुआ मनुष्य ऊपर आनेके लिये परम व्याकुल होता है, उसी प्रकारकी परम व्याकुलता यदि भगवद्दर्शनके लिये हो तो भगवान‍्के दर्शन होना कोई बड़ी बात नहीं। व्याकुलता बनावटी न होकर असली होनी चाहिये। किसीका इकलौता पुत्र मर रहा हो या किसीकी सैकड़ों वर्षोंसे बनी हुई इज्जत जाती हो उस समय मनमें जैसी स्वाभाविक और निष्कपट व्याकुलता होती है वैसी ही व्याकुलता परमात्माके दर्शनके लिये जिस परम भाग्यवान् भक्तके अन्तरमें उत्पन्न होती है, उसको दर्शन दिये बिना भगवान् कभी नहीं रह सकते। ऐसी व्याकुलता तभी होती है, जब कि वह भक्त संसारके समस्त पदार्थोंसे परमात्माको बड़ा समझता है; इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको अत्यन्त तुच्छ और नगण्य समझकर केवल एक परम प्यारे श्यामसुन्दरके लिये अपने जीवन, धन, ऐश्वर्य, मान, लोकलज्जा, लोकधर्म और वेदधर्म सबको समर्पण कर चुकता है। देवर्षि नारदजीने भक्तिका स्वरूप वर्णन करते हुए कहा है—

तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति।

(नारदभक्तिसूत्र १९)

‘अपने समस्त कर्म भगवान‍्को अर्पण कर देना और उन्हें भूलते ही परम व्याकुल होना भक्ति है।’ जबतक जगत‍्के भोगोंकी इच्छा है, जबतक जगत‍्के अनित्य पदार्थ सुन्दर, सुखरूप और तृप्तिकर मालूम होते हैं और जबतक उनमें रस आता है, तबतक हमारे हृदयका पूरा स्थान भगवान‍्के लिये खाली नहीं। गोसाईं तुलसीदासजीने कहा है—

जो मोहि राम लागते मीठे।

तौ नवरस षटरस-रस अनरस

ह्वै जाते सब सीठे॥

यदि मुझे भगवान् राम प्यारे लगते तो शृंगारादि नवों रस और अम्ल आदि छओं रस नीरस होकर सीठे (सारहीन—फीके) हो जाते। हम अपने अन्तरमें भगवान‍्को जितना-सा स्थान देते हैं उतना-सा उसका फल भी हमें प्राप्त होता है, परन्तु जबतक हम अपने हृदयका पूरा आसन उस हृदयेश्वरके लिये सजाकर तैयार नहीं करते, जबतक हमारे अन्त:करणमें अनवरत और निरन्तर अटूट तैल-धाराकी भाँति भगवद्भावका स्रोत नहीं बहता तबतक उसके लिये व्याकुलता नहीं हो सकती और जबतक हम व्याकुल नहीं होते तबतक भगवान् भी हमारे लिये व्याकुल नहीं होते; क्योंकि भगवान‍्की यह एक शर्त है—

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्॥

(गीता ४। ११)

‘जो मुझको जैसे भजते हैं मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ।’ जब भक्त प्रेममें तन्मय होकर मतवालेकी तरह घर-बार, स्त्री-पुत्र, लोक-परलोक, हर्ष-शोक, मान-अपमान आदि सबका विसर्जन कर उस परमात्माके लिये परम व्याकुल होता है, एक क्षणभरके विछोहसे भी जो जलसे अलग की हुई मछलीके समान छटपटाने लगता है, भक्तिमती गोपियोंकी भाँति जिसके प्राण विरह-वेदनासे व्याकुल हो उठते हैं, उसको भगवान‍्के दर्शन अत्यन्त शीघ्र हो सकते हैं, परन्तु हमलोगोंमें वैसी अनन्य व्याकुलता प्राय: नहीं है। इसीलिये दर्शनमें भी विलम्ब हो रहा है। हमलोग धन-सन्तान और मान-कीर्तिके लिये जितना जी-तोड़ परिश्रम और सच्चे मनसे प्रयत्न करते हैं, जितना छटपटाते हैं, उतना परमात्माके लिये क्या अपने जीवनभरमें कभी किसी दिन भी हमने प्रयत्न किया है या हम छटपटाते हैं? तुच्छ धन-मानके लिये भटकते और रोते फिरते हैं। क्या परमात्माके लिये व्याकुल होकर सच्चे मनसे हमने कभी एक भी आँसू गिराया है? इस अवस्थामें हम कैसे कह सकते हैं कि परमात्माके दर्शन नहीं होते। हमारे मनमें परमात्माके दर्शनकी लालसा ही कहाँ है? हमने तो अपना सारा समय इन अनित्य सांसारिक विषयोंके कूड़े-कर्कटसे भर रखा है। जोरकी भूख या प्यास लगनेपर क्या कभी कोई स्थिर रह सकता है? परन्तु हमारी भोग-लिप्सा और भगवान‍्के प्रति उदासीनता इस बातको सिद्ध करती है कि हमलोगोंको भगवान‍्के लिये जोरकी भूख या प्यास नहीं लगी। जिस दिन वह भूख लगेगी उस दिन भगवान‍्को छोड़कर दूसरी कोई वस्तु हमें नहीं सुहावेगी। उस दिन हमारा चित्त सब ओरसे हटकर केवल उसीके चिन्तनमें तल्लीन हो जायगा। जिस प्रकार विशाल साम्राज्यके प्राप्त हो जानेपर साधारण कौड़ियोंके तुच्छ व्यापारसे स्वाभाविक ही मन हट जाता है, उसी प्रकार जगत‍्के बड़े-से-बड़े भोग हमें तुच्छ और नीरस मालूम होने लगेंगे। उस समय हम अनायास ही कहने लगेंगे—

इस जगकी कोई बस्तु न हमें सुहाती।

पल-पलमें श्यामल मूर्ति स्मरण है आती॥

भगवान् परम मधुर और परम आनन्दस्वरूप होनेपर भी हमें उनकी ओर पूरा आकर्षण नहीं है, इसका कारण यही है कि हमने उनके महत्त्वको भलीभाँति समझा नहीं, इसीलिये अमृतको छोड़कर हम रमणीय विषयोंके विषभरे लड्डुओंके लिये दिन-रात भटकते हैं और उन्हें खा-खाकर बारम्बार मृत्युको प्राप्त होते हैं! भगवान‍्के दर्शन दुर्लभ नहीं, दुर्लभ है उनके दर्शनकी दम्भशून्य और एकान्तमें लालसा। वे भगवान् जो नित्य और सत्य हैं, हर समय हर स्थानमें व्यापक हैं; किसी एक युगविशेषमें उनके दर्शन न हों यह बात कैसे मानी जा सकती है? ऐसा कहनेवाले लोग या तो श्रद्धासे रहित हैं या भगवान‍्की महिमाका भाव समझनेके लिये उन्हें कभी अवसर नहीं मिला।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि इन नेत्रोंकी सफलता नित्य अतृप्तरूपसे उस नवीननीलनीरज श्यामसुन्दरकी विश्व-विमोहिनी रूपमाधुरीका दर्शन करनेमें ही है। परन्तु जहाँतक भगवत्-कृपासे इन नेत्रोंको दिव्यभाव नहीं प्राप्त होता वहाँतक ये नेत्र उस रूपछटाके दर्शनसे वंचित ही रहते हैं। नेत्रोंको दिव्य बनाकर उन्हें सार्थक करनेका ‘सिद्धमार्ग’ उपर्युक्त ‘परम व्याकुलता’ ही है। जिस महानुभावके हृदयमें श्रीकृष्णदर्शनकी तीव्रतम विरहाग्नि जल रही है वह तो सर्वथा स्तुतिका पात्र है। विरहाग्नि प्राय: बाहर नहीं निकला करती और जब कभी वियोग-वेदना सर्वथा असह्य होकर बाहर फूट निकलती है, तब वह उसके सारे पाप-तापोंको तुरंत जलाकर उसे प्रेममें पागल बना देती है। उस समय वह भक्त अनन्य प्रेममें मतवाला भक्त-व्रजगोपियोंकी भाँति सब कुछ भूलकर उस प्राणाधिक मनमोहनके दर्शनके लिये दौड़ता है और अपनी सारी शक्ति और सारा उत्साह लगाकर उसको पुकारता है। बस, इसी अवस्थामें उसे भगवान‍्के दर्शन प्राप्त होते हैं। दर्शन उसी रूपमें होते हैं कि जिस रूपमें वह दर्शन करना चाहता है एवं व्यवहार, बर्ताव या वार्तालाप भी प्राय: उसी प्रकारका होता है कि जिस प्रकार उसने पहले चाहा है।

ऐसी स्थितिको प्राप्त होनेके लिये साधकको चाहिये कि पहले वह सत्संगके द्वारा भगवान‍्के अतुलनीय महत्त्वको कुछ समझे और उसके निरन्तर नामजप तथा ध्यानके द्वारा अपने अन्तरमें उसके प्रति कुछ प्रेम उत्पन्न करे। ज्यों-ज्यों भगवत्-प्रेमसे हृदय भरता जायगा त्यों-ही-त्यों वहाँसे विषय हटते चले जायँगे। यों करते-करते जिस दिन वह अपना हृदयासन केवल परमात्माके लिये सजा सकेगा, उसी दिन और उसी क्षणमें उसके हृदयमें परम व्याकुलता उत्पन्न होगी और वह व्याकुलता अत्यन्त तीव्र होकर भगवान‍्के हृदयमें भी भक्तको दर्शन देनेके लिये वैसी ही व्याकुलता उत्पन्न कर देगी। इसके बाद तत्काल ही वह शुभ समय प्राप्त होगा, जिसमें कि भक्त और भगवान‍्का परस्पर प्रत्यक्ष मिलन होगा और उससे भूमि पावन हो जायगी।