भगवत्-कृपा

पुत्र-शोक संतप्त कभी कर दारुण दुख है देती।

कभी अयश अपमान दानकर मान सभी हर लेती॥

कभी जगतके सुन्दर सुख सब छीन, दीन-मन करती।

पथभ्रांत कर कभी, कठिन व्यवहार विषम आचरती॥

पुत्र, कलत्र, राज, वैभव, बहु मान कभी है देती।

दारुण दुख, दारिद्रॺ, दीनता क्षणभरमें हर लेती॥

पल-पलमें प्रत्येक दिशामें सतत कार्य है करती।

कड़वी-मीठी औषध देकर व्यथा हृदयकी हरती॥

पर वह नहीं कदापि सहज ही परिचय अपना देती।

चमक तुरत चंचल चपला-सी दृग-अंचल ढक लेती॥

जबतक इस घूँघटवालीका वदन न देखा जाता।

नाना भाँति जीव तबतक अकुलाता, कष्ट उठाता॥

जिस दिन वह आवरण दूर कर दिव्य-द्युति दिखलाती।

परिचय दे, पहचान बताकर शीतल करती छाती॥

उस दिनसे फिर सभी वस्तु परिपूर्ण दीखतीं उससे।

संसृति-हारिणी सुधावृष्टि हो रही निरंतर जिससे॥

सहज दयाकी मूर्ति देवि! तूने जबसे अपनाया।

महिमान्वित मुख-मंडल अपनेकी दिखला दी छाया॥

तबसे अभय हुआ, आकुलता मिटी प्रेमरस छलका।

मनका उतरा भार सभी, अब हृदय हो गया हलका॥

जिन विभीषिकाओंसे डरकर पहले था थर्राता।

उनमें भव्य दिव्य दर्शन कर अब प्रमुदित मुसुकाता॥

भगवत्कृपा! अकिंचन, तेरे ज्यों-ज्यों दर्शन पाता।

त्यों-ही-त्यों आनंद-सिन्धुमें गहरा डूबा जाता॥