भगवत्-शरणागति
इहलौकिक और पारलौकिक दु:खोंसे छुटकारा पाकर नित्य अखण्ड परमानन्दकी प्राप्तिके लिये भगवान्की शरणागति ही मुख्य उपाय है! जिसने एक बार सर्वभावसे अपनेको परमात्माके चरणोंमें अर्पण कर दिया, वह सदाके लिये निर्भय, निश्चिन्त और परमसुखी हो जाता है। उसके योगक्षेमका समस्त भार भगवान् वहन करते हैं। स्वयं केवट बनकर उनकी जीवन-तरणीको भीषण संसार-सागरकी उत्ताल तरंगोंसे बचाकर सुरक्षितरूपसे परमानन्दमय धाममें पहुँचा देते हैं, उसे किसी प्रकारकी चिन्ता या चाह करनेकी आवश्यकता नहीं रह जाती, परन्तु यह शरणागति क्या वस्तु है और कैसे होती है इसपर विचार करना है। शरणागति केवल शब्दोंसे नहीं होती अथवा यों समझकर चुपचाप निकम्मा ही बैठनेका नाम भी शरणागति नहीं है कि ‘मैं तो उसकी शरण हो गया, मुझे अब किसी कामके लिये हाथ-पैर हिलाने या समझने-सोचनेसे क्या प्रयोजन है। वह आप ही सब ठीक कर देगा, मेरा तो कोई कर्तव्य नहीं है, यदि यही शरणागति होती तो प्रत्येक आलसी और तमोऽभिभूत प्रमादी मनुष्य ऐसा कह सकता था, शरणागतिमें क्रियाके त्याग करनेका तो प्रश्न ही नहीं है। शरणागत भक्त तो अपने ‘अहम्’ को और उस ‘अहम्’ से सम्बन्ध रखनेवाले प्रत्येक सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भावको परमात्माके अर्पण कर देता है, फिर उसका जीवन परमात्माकी रुचिका जीवन, उसका मन परमात्माकी रुचिका मन, उसकी बुद्धि परमात्माकी बुद्धि बन जाती है और उसकी सारी क्रियाएँ परमात्माके मनोऽनुकूल होने लगती हैं। अबतक तो वह समझता था कि यह संसार मेरा है और इसमें काम करनेवाला मैं हूँ, शरणागत होनेके बाद वह समझने लगता है, सारा संसार परमात्माका है, स्थूल-से-स्थूल, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पदार्थ सभी उसके हैं और उसमें जो कुछ क्रिया होती हुई दृष्टिगोचर होती है सो सभी परमात्माकी दिव्य लीला है, मैं तो निमित्तमात्र हूँ—जो वास्तवमें उन्हींका हूँ और वह परमात्मा अपने ही एक पदार्थको निमित्त बनाकर अपने इच्छानुसार अपने-आपमें ही अपने विनोदके लिये अपने-आप ही अपनी लीला कर रहे हैं। प्रत्येक पदार्थ उन्हींकी सामग्री है। उनकी सामग्री भी कोई उनसे भिन्न वस्तु नहीं है; वह इन सामग्रियोंके रूपमें अपने-आपको प्रकाशित कर रहे हैं। खेल, खिलाड़ी और खिलौने—तीनों ही मूलमें और क्रियामें भी एक ही हैं, व्यावहारिक स्थूलदृष्टिसे भेद प्रतीत हो रहा है। इस प्रकार ‘अहम्’ और ‘मम’ का मन, बुद्धि, इन्द्रिय, शरीर तथा समस्त प्रपंचसहित सर्वभावसे समर्पण ही यथार्थ शरणागतिका स्वरूप है।
इस शरणागतिकी स्थिति प्राप्त करनेके लिये क्रमश: शरीर, वाणी, मन और बुद्धिमें अपनेको परमात्माके अर्पण करना पड़ता है। शरणागतिकी पहचान यही है कि साधक ज्यों-ज्यों शरणागतिके सुख-शान्तिमय, सर्वतापहर, शीतल प्रदेशमें प्रवेश करता, त्यों-ही-त्यों उसमें निर्भयता और निश्चिन्तताकी वृद्धि होती है। स्नेहमयी जननीकी गोदमें आकर शिशु निर्भय और निश्चिन्त हो जाता है, इसी तरह सर्व सच्चिदानन्दरूपा इस स्नेह-सुधा-समुद्रमयी जगज्जननीकी महिमामयी क्रोडमें आश्रय पाकर साधक निर्भय और निश्चिन्त हो जाता है। उसे फिर कहीं कोई भय नहीं रहता और किसी भी वस्तुकी या किसी भी गतिविशेषकी चाह नहीं रहती। प्रभुके हाथोंमें अपनेको सौंप देनेके बाद भय, चिन्ता और चाह कैसी?
इस शरणागतिके साधनमें साधकको चार बातोंपर विशेष ध्यान रखना पड़ता है, आगे चलकर तो ये चारों उसके स्वाभाविक ही हो जाती हैं।
१—जिस परमात्माकी शरण ग्रहण की है उस परमात्माका निरन्तर स्मरण रखना।
२—उसके इच्छा या आज्ञानुसार जीवन बना लेना।
३—वह जो कुछ भी विधान करे उसीमें परम संतुष्ट रहना यानी उसकी कृपासे प्राप्त होनेवाली प्रतिकूल-से-प्रतिकूल स्थितिमें भी उसकी मंगलमयी इच्छा समझते ही अनुकूलताका प्रतीत होना।
४—किसी भी पदार्थकी चाह न रखना।
ये भाव जितने-जितने बढ़ें, साधक उतना ही परमात्माकी शरणमें अग्रसर हो रहा है, ऐसा समझना चाहिये।