भगवत्प्रेम
जो लोग भगवान्की खोजमें निकलते हैं, जिन्हें भगवान्से मिलनेकी अत्यन्त उत्कण्ठा होती है, वे राहमें बड़े भारी इन्द्रिय-सुखोंको देखकर रुकते नहीं और महान् दु:खोंको देखकर घबड़ाते नहीं। वे तो अटल धैर्यके साथ बिना दूसरी ओर ताके चुपचाप अपनी राह चले ही जाते हैं।
जो सुख पाकर उनमें रम जाते हैं और दु:खोंसे घबड़ाकर आगे बढ़ना छोड़ देते हैं, वे भगवान्के लिये वास्तवमें आतुर नहीं हैं। सच्ची बात यह है कि सांसारिक दु:खोंसे बचने और सांसारिक सुखोंकी खोजके लिये ही वे निकले हैं, भगवान्के लिये नहीं।
जिनको भगवान्की लगन लग जाती है, वे तो उसीके लिये मतवाले हो जाते हैं, उन्हें दूसरी चर्चा सुहाती ही नहीं, दूसरी बात मन भाती ही नहीं, विषय-सुखकी तो बात ही क्या है, वे ब्रह्माके पदको भी नहीं चाहते।
जिनको भगवान्से प्रेम हो गया है और जो अपने उस परम प्रेमीके चिन्तनमें ही सदा चित्तको लगाये रखते हैं वे सारे त्रैलोक्यका वैभव मिलनेपर भी आधे क्षणके लिये भी चित्तको प्रियतमके चिन्तनसे नहीं हटाते। ऐसा भागवतकार कहते हैं।
जो भगवान्के प्रेमी हैं, उन्हें यदि भगवत्प्रेमके लिये नरकयन्त्रणा भी भोगनी पड़े तो उसमें भी उन्हें भगवत् -इच्छा जानकर आनन्द ही होता है। उन्हें नरक-स्वर्ग या दु:ख-सुखके साथ कोई सरोकार नहीं। वे तो जहाँ, जिस अवस्थामें अपने प्रियतम भगवान्की स्मृति रहती है, उसीमें परम सुखी रहते हैं, इसीसे देवी कुन्तीने दु:खका वरदान माँगा था।
भगवान्के प्रेमियोंकी दृष्टिमें यह दुनिया इस रूपमें नहीं रहती। उनके लिये सारी दुनिया ही बदल जाती है, उन्हें दीखता है सब कुछ भगवान्का, सब कुछ भगवान् और सब कुछ भगवान्की लीला। फिर वे किसमें, कहाँ और क्योंकर सुख-दु:ख समझें?
गीतामें भगवान् कहते हैं ‘जो सर्वत्र मुझको देखता है और सबको मुझमें देखता है, उससे मैं अलग नहीं होता और वह मुझसे अलग नहीं होता।’