भगवत्प्रेम ही विश्वप्रेम है

यह प्रत्यक्ष दिखलायी पड़ रहा है कि जितनी-जितनी वर्तमान भोग-सुख-लिप्सापूर्ण सभ्यताकी वृद्धि हो रही है, सुधार या उन्नतिके नामपर जातियाँ जितनी-जितनी इस माया-मोहिनी सभ्यताकी ओर अग्रसर हो रही हैं, उतना-उतना ही छल-कपट, दु:ख, दम्भ और द्रोह अधिक बढ़ रहा है। अशान्तिकी प्रज्वलित अग्निमें घृताहुतियाँ पड़ रही हैं। रक्तपानकी हिंस्र लालसा बढ़ रही है। आजका जगत् मानो भस्म होनेके लिये पतंगकी भाँति मोहवश अग्निशिखाकी ओर प्रबल वेगसे दौड़ रहा है। इसीसे आज मानव-रक्तसे अपनी सुख-पिपासा शान्त करने मानवीय अस्थिचूर्णसे धरणीके पवित्र क्षेत्रको उपजाऊ बनाने और भाँति-भाँतिके वैज्ञानिक आविष्कारोंकी सहायतासे गरीब पड़ोसियोंके सर्वस्व-विनाशमें आत्मगौरव समझनेकी घृणित धारणा बद्धमूल होती जा रही है। जबतक इसका यथार्थ प्रतीकार नहीं होगा तबतक बड़े-बड़े शान्तिकामी राष्ट्रविधायकोंके प्रयत्नोंसे कोई भी सुफल होनेकी आशा नहीं करनी चाहिये। ऊपरसे शस्त्र-संन्यास, शान्तिस्थापन और विश्वप्रेमकी बातें होती रहेंगी तथा अंदर-ही-अंदर परस्वापहरण-लोलुपता और पर-सुख-कातरताके कारण विद्वेषाग्नि भस्माच्छादित अग्निकी तरह सुलगती रहेगी जो अवसर पाते ही ज्वालामुखीकी तरह फटकर सारे विश्वके सुखनाशका प्रधान कारण बन जायगी।

विश्वप्रेम जबानकी चीज नहीं है, इसमें बड़ा भारी त्याग चाहिये। त्याग ही प्रेमका बीज है। त्यागकी सुधाधाराके सिंचनसे ही प्रेमबेलि अंकुरित और पल्लवित होती है। जबतक हमारा हृदय तुच्छ स्वार्थोंसे भरा है तबतक प्रेमकी बातें करना हास्यास्पद व्यापारके सिवा और कुछ भी नहीं है। ममताके हेतुसे त्याग होता है, माताकी अपने बच्चेमें ममता है इसलिये वह उसको सुखी बनानेके हेतु अपने सुखका त्याग कर देती है और उसीमें अपनेको सुखी समझती है। जिसकी जिसमें जितनी अधिक ममता होती है, उतना ही उसमें अधिक राग होता है, जिसमें अधिक राग होता है, उसीमें मुख्यबुद्धि रहती है। मुख्यबुद्धिके सामने दूसरी सब वस्तुएँ गौण हो जाती हैं।

इसी मुख्यबुद्धिका दूसरा नाम अनन्यानुराग है। जिसकी मुख्यवृत्ति स्त्रीमें होती है वह स्त्रीके लिये अन्य समस्त विषयोंका त्याग कर सकता है—सारे विषय उस स्त्रीके चरणोंमें सुखपूर्वक अर्पण कर सकता है। पतिव्रता स्त्री पतिमें मुख्यबुद्धि रहनेके कारण ही अपना सर्वस्व पतिके चरणोंमें समर्पण कर उसके सुखमें ही अपनेको सुखी मानती है। इसी प्रकार माता, पिता, पुत्र, स्वामी, गुरु, सेवक, कीर्ति, परोपकार, सेवा आदि जिस वस्तुमें जिसकी मुख्यबुद्धि होती है, उसीके लिये वह दूसरी सब वस्तुओंका, जो दूसरोंकी दृष्टिमें बड़ी प्रिय हैं, अनायास त्याग कर देता है।

हरिश्चन्द्रने सत्यके लिये राज्य त्याग दिया, कर्णने दानके लिये कवच-कुण्डल देकर मृत्युको आलिंगन करनेमें भी आनाकानी नहीं की, प्रह्लादने रामके नामके लिये हँसते हुए अग्नि-प्रवेश किया। भरतने भ्रातृप्रेमके लिये राज्य त्यागकर माताकी आज्ञा नहीं मानी, युधिष्ठिरने भक्त कुत्तेके लिये स्वर्ग जाना अस्वीकार किया, शिबिने कबूतरके लिये अपना मांस दे डाला, रन्तिदेवने गरीबोंके लिये भूखों मरना स्वीकार किया, दधीचिने परोपकारके लिये अपनी हड्डियाँ दे दीं, परशुरामने पिताके लिये माताका वध कर डाला, भीष्मने पिताके लिये कामिनी-कंचनका त्याग कर दिया। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। सारांश यह कि जिस विषयमें मनुष्यकी मुख्यबुद्धि होती है, उसके लिये वह अन्य सब पदार्थोंका त्याग सुखपूर्वक कर सकता है। उस एककी रक्षाके लिये वह उन सबके नाशमें भी अपनी कोई हानि नहीं समझता, वरं आवश्यकता पड़नेपर उस एकके लिये स्वयं सबका प्रसन्नतापूर्वक त्याग कर देता है।

भक्त इसीलिये भगवान‍्को अधिक प्यारा होता है कि वह अपनी ममता सब जगहसे हटाकर केवल भगवान‍्में कर लेता है, इसीसे उसका अनन्यानुराग और मुख्यबुद्धि भी भगवान‍्में ही हो जाती है। वह भगवान‍्के लिये सब कुछ त्याग देता है। तुलसीदासजीने इस सम्बन्धमें भगवान् श्रीरामके शब्द इस प्रकार गाये हैं—

जननी जनक बंधु सुत दारा।

तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥

सब कै ममता ताग बटोरी।

मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥

अस सज्जन मम उर बस कैसें।

लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥

देवर्षि नारद भी भक्तिका लक्षण बतलाते हुए कहते हैं—

तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति।

(नारदभक्तिसूत्र १९)

‘अपना सर्वस्व उसके चरणोंमें अर्पण करके निरन्तर उसे स्मरण करता रहे, कदाचित् किसी कारणसे स्मरणमें भूल हो जाय, उस समय हृदयमें ऐसी व्याकुलता हो जैसे मछलीको जलसे निकालनेपर होती है।’ यही भक्ति है जिसमें मुख्यवृत्ति रहती है, उसका निरन्तर चिन्तन होना और चिन्तनकी विस्मृतिमें व्याकुलताका होना अनिवार्य है। ऐसे भक्तोंको भगवान् अपने हृदयमें कैसे रखते हैं, जैसे लोभी धनको रखता है; क्योंकि उसकी मुख्यवृत्ति धनमें ही रहती है। इस प्रकारके भक्तका भगवान् कभी त्याग नहीं करते। भगवान‍्के वचन हैं—

ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परम्।

हित्वा मां शरणं याता: कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे॥

(श्रीमद्भा० ९। ४। ६५)

‘जो भक्त स्त्री, घर, पुत्र, परिवार, प्राण, धन, लोक और परलोक सबको त्यागकर मेरा आश्रय ले लेते हैं, उनको भला मैं कैसे त्याग सकता हूँ?’

जिसने इतना त्याग किया हो, उसका अत्यन्त प्रिय लगना स्वाभाविक ही है। भक्तोंका भगवान् पर अनन्य ममत्व है, इसीलिये तो भक्तोंपर भगवान‍्की ममता अधिक है। भगवान् कहते हैं—

साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।

मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥

(श्रीमद्भा० ९। ४। ६८)

‘वे साधु मेरा हृदय हैं, मैं उनका हृदय हूँ, वे मेरे सिवा किसीको नहीं जानते तो मैं उनके सिवा किसीको नहीं जानता।’ यह भगवान‍्में मुख्यबुद्धि होनेका ही परिणाम है।

एक सम्मिलित कुटुम्बका तभीतक प्रेमपूर्वक निर्वाह हो सकता है, जबतक सबमें परस्पर ममता (मेरापन) बनी रहे। जहाँ ‘पर’ (पराया) भाव आया वहीं कलह आरम्भ हो जाता है। एक कुटुम्बमें कुल मिलाकर दस मनुष्य हैं। जिनमें कमानेवाले दो भाई हैं। वे दोनों जबतक यह समझते हैं कि घरके सब लोग हमारे अपने हैं; तबतक रात-दिन कठिन परिश्रम करके भी उन सबका भरण-पोषण करनेमें उन्हें सुख मिलता है। पर जब किसी कारणसे एकके मनमें यह भाव उत्पन्न हो जाता है कि मैं अपने स्त्री-पुत्रोंके सिवा दूसरे लोगोंके लिये क्यों इतने बखेड़ेमें पड़ूँ, तब फिर एक दिनके लिये भी उनका भरण-पोषण करना उसके लिये भारी और दु:खद होने लगता है। कारण यही कि उसका ममत्व उन सबमेंसे निकलकर केवल स्त्री-पुत्रोंमें ही रह जाता है। ममताके साथ ही राग और मुख्यबुद्धि भी चली जाती है। ऐसी अवस्थामें यदि माता-पिता जीवित होते हैं तो उन बेचारोंपर बड़ी विपत्ति आ पड़ती है।

एक मनुष्य स्वयं कष्ट सहकर देशकी सेवा क्यों करता है? इसीलिये कि देशमें उसका ममत्व है, देशके हानि-लाभमें वह सचमुच अपना हानि-लाभ समझता है। इसीका नाम देशात्मबोध है और यही यथार्थ देशभक्ति है। एक-दूसरे मनुष्यको देशजातिका नाम भी नहीं सुहाता, वह अपने परिवारपालनमें ही मस्त है। उसे देशकी कुछ भी परवा नहीं, यह इसीलिये कि देशमें उसकी ममता नहीं है।

ममता ही आगे चलकर ‘मेरा-मेरा’ करते-करते ‘अहंता’ में परिणत हो जाती है। अनन्तकालसे इस नश्वर शरीरको हम मेरा-मेरा करते आये हैं, इसीलिये इसमें ‘मैं’ बुद्धि हो गयी है। शरीरमें रोग होता है, हम कहते हैं, ‘मैं बीमार हूँ’ जन्म-मृत्यु, क्षय-वृद्धि रूपान्तर आदि शरीरके होते हैं। ‘मैं’ (आत्मा) जो सदा निर्विकार, शुद्ध, एकरस है, वह ज्यों-का-त्यों रहता है। वह पहले लड़कपन और खेल-कूदका द्रष्टा था, फिर युवावस्था और काम-मदादिका द्रष्टा हुआ, अब वही वृद्धावस्था और इन्द्रियोंकी शिथिलताका द्रष्टा है, तीनों अवस्थाओंमें वह नित्य एकरूप है; परन्तु भ्रमवश शरीरसे अहंभाव हो जानेके कारण कहता है, ‘पहले बालक था तब तो मैंने सारी उम्र खेल-कूदमें खो दी, जवानीमें काम-मदमें समय बिता दिया, अब मैं बूढ़ा हो गया, कमजोर हो गया, भजन कैसे करूँ? मैं तो व्यर्थ ही मर जाऊँगा।’ अजन्मा और अविनाशी होनेपर भी वह इस प्रकार क्यों समझता है? इसलिये कि उसने शरीरको ‘मैं’ (आत्मा) समझ लिया है। इसीका नाम ‘देहात्मबोध’ है। यही मायाका बन्धन है। एक बालक दर्पणमें मुख देख रहा था, दर्पण था लाल, उसे अपना शरीर भी लाल दिखायी दिया, ‘मेरा शरीर लाल हो गया’, ‘मेरा शरीर लाल हो गया’, ‘मैं लाल हो गया’ इस प्रकार कहते-कहते वह अपने मूल सत्य स्वरूपको भूलकर दर्पणकी उपाधिसे दीखनेवाले प्रतिबिम्बको अपना रूप मानकर दर्पणके विकार ललाईका अपनेमें आरोप कर व्यर्थ ही अपनेको लाल मानकर दु:खी हो गया। यही अनात्मवादियोंका ‘देहात्मबोध’ है।

देहात्मबोध जब जोर पकड़ता है तभी भेदको ठहरनेके लिये जगह मिल जाती है। ‘एक ही परमात्मा अनेक प्रकारसे विभक्त हुआ-सा जान पड़ता है। मैं अमुक हूँ, दूसरा अमुक है, मुझे सुख मिलना चाहिये, मुझे सुखी होनेके लिये प्रयत्न करना चाहिये। इस अवस्थामें मनुष्य कभी-कभी तो सोचता है कि सभी मेरे सरीखे ही मनुष्य हैं। उनको भी सुख मिले, मुझको भी मिले।’ कभी-कभी वह स्वयं दु:ख सहन करके भी दूसरोंको सुख पहुँचाता है; परंतु भेद-बुद्धिकी जड़ जमने और भोग-सुख-स्पृहा बढ़नेके साथ ही उसका प्रेम संकुचित होने लगता है। तब वह सोचता है; ‘दूसरेको सुख मिले तो अच्छी बात है; परंतु उसके लिये मैं दु:ख क्यों भोगूँ? मैं अपने प्राप्त सुखका परित्याग क्यों करूँ?’ फिर सोचता है, ‘मुझे सुख मिलना चाहिये, दूसरोंको मिले या न मिले, इससे मुझको क्या।’ फिर सोचता है, ‘मेरे सुखमें यदि दूसरोंका सुख बाधक है तो उसका नाश क्यों न कर दिया जाय।’ इस स्थितिमें वह अपने सुखके लिये दूसरोंके सुखका नाश करने लगता है। फिर सोचता है, ‘बस, मुझे सुख मिले, दूसरे चाहे दु:खसागरमें डूब जायँ।’ इस अवस्थामें उसकी बुद्धि सर्वथा तमसाच्छन्न हो जाती है, उसके मनसे दया, करुणा, प्रेम, सहानुभूति आदि गुण लुप्त हो जाते हैं और वह अपनेको सुखी बनानेके लिये क्रूरताके साथ दूसरोंको दु:ख पहुँचाने लगता है। अन्तमें उसका स्वभाव ही ऐसा बन जाता है कि वह दूसरोंके दु:खमें ही अपनेको सुखी मानता है, दूसरोंकी विपत्तिके आँसुओंको देखकर ही उसका चित्त प्रफुल्लित होता है; यहाँतक कि वह अपनी हानि करके भी दूसरोंको दु:खी करता है। ऐसा मनुष्य राक्षससे भी अधम बताया गया है। कहना नहीं होगा कि दूसरोंके साथ-ही-साथ उसके भी दु:खोंकी मात्रा बढ़ती जाती है।

एक मनुष्यने भगवान् शिवकी आराधना की, शिवजी प्रसन्न हुए, उसका पड़ोसी भी बड़े भक्तिभावसे शिवजीके लिये तप कर रहा था। शिवजीने दोनोंके भक्तिका विचार कर आकाशवाणीमें उससे कहा कि ‘मैं तुझपर प्रसन्न हूँ, इच्छित वर माँग, पर तुझे जो मिलेगा उससे दूना तेरे पड़ोसीको मिलेगा, क्योंकि उसके तपका महत्त्व तेरे तपसे दूना है।’ यह सुनते ही वह बड़ा दु:खी हो गया। उसने सोचा ‘क्या माँगूँ? पुत्र, धन और कीर्तिकी बड़ी इच्छा थी; परंतु अब यह सब कैसे माँगूँ? जो एक पुत्र माँगता हूँ तो उसके दो होते हैं, लाख रुपये माँगता हूँ तो उस नालायकको दो लाख मिलते हैं, कीर्ति चाहता हूँ तो उसकी मुझसे दूनी होती है।’ अन्तमें उसने खूब सोच-विचारकर शिवजीसे कहा, ‘प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरी एक आँख फोड़ डालिये।’ उसने सोचा, ‘मेरा तो काम एक आँखसे भी चल जायगा, परंतु वह तो दोनों फूटनेसे बिलकुल निकम्मा हो जायगा। इससे अधिक सुखकी बात मेरे लिये और क्या होगी? मित्रो! इस दृष्टान्तको पढ़कर हँसियेगा नहीं, हमें चाहिये कि हम अपने हृदयको टटोलें। क्या कभी उसमें इस प्रकारके भाव नहीं पैदा होते? चाहे पचास हजार रुपये मेरे लग जायँ पर तुझको तो नीचा दिखाकर छोड़ूँगा, मेरा चाहे जितना नुकसान हो जाय पर उसको तो सुखसे नहीं रहने दूँगा, ‘इस मामलेमें चाहे मेरा घर तबाह हो जाय लेकिन उसको तो भिखमंगा बनाकर छोड़ूँगा।’ इस प्रकारके विचार और उद‍्गार हमलोगोंके हृदयमें ही तो पैदा होते और निकलते हैं। इसका कारण यही है कि हमलोगोंने देहात्मबोधके कारण अपनी ममताकी सीमा बहुत ही संकुचित कर ली है, छोटे गड़हेका पानी गँदला हुआ ही करता है। इसी प्रकार संकुचित ममता भी बड़ी गंदी हो जाती है। हमारे प्रेमका संकोच हो गया है, तभी यह दशा है! इसीसे आज लौकिक और पारलौकिक सभी क्षेत्रोंमें हमारा पतन हो रहा है!

इसके विपरीत भगवत्कृपासे ज्यों-ज्यों ममताका क्षेत्र बढ़ता है त्यों-ही-त्यों उसमें पवित्रता और सात्त्विकता आती है, हृदय विशाल होने लगता है, प्रेमका विकास होता है। इस अवस्थामें स्वार्थकी सीमा बढ़ने लगती है, वह व्यक्तिसे कुटुम्बमें, कुटुम्बसे जातिमें, जातिसे देशमें और फिर सारे विश्वमें फैल जाता है। तभी मनुष्य वास्तविक उदार होता है। ‘उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ से ऐसे ही महानुभावोंका निर्देश किया गया है। उपर्युक्त भावोंमें जो जितना-जितना अग्रसर होता है उतना-उतना ही उसके प्रेमका विस्तार और सीमाबद्ध-स्वार्थका नाश हो जाता है। फिर वह भगवान् बुद्धकी भाँति प्राणिमात्रका दु:ख दूर करनेके लिये अपना जीवन अर्पण कर देता है। इस अवस्थामें उसे जिस सुखका अनुभव होता है, उसे वही जानता है।

जब समस्त विश्वमें मेरापन छा जाता है तब उसका प्रेम भी विश्वव्यापी हो जाता है। फिर उसके द्वारा किसी भी हालतमें किसीकी बुराई नहीं हो सकती। अमृतसे किसीकी मृत्यु चाहे सम्भव हो पर उसके द्वारा किसीका बुरा होना सम्भव नहीं। वह विश्वके हितमें ही अपना हित समझता है, सारे विश्वका स्वार्थ ही उसका स्वार्थ बन जाता है। यही ममताका व्यापक और विशाल रूप है और यही वांछनीय है। यथार्थ विश्वप्रेम इसीसे सम्भव है।

यही ममता जब मेरा-मेरा करते-करते शुद्ध ‘मैं’ बन जाती है तब सारा विश्व ही उसका अपना स्वरूप बन जाता है, विश्वकी व्यापक सत्तामें उसकी भिन्न सत्ता सर्वथा मिल जाती है। तब केवल एक ‘मैं’ ही रह जाता है। यही सच्चा ‘मैं’ है। इस ‘मैं’ की उपलब्धि कर लेनेपर कौन किससे वैर करे, अपने-आपसे कोई वैर नहीं करता है, अपने-आपको कोई नहीं मारता।

यह विश्वव्यापक ‘मैं’ ही परमात्माका स्वरूप है, इस व्यापक रूपका नाम ही विष्णु है, इसीको विश्व कहते हैं। हमारे विष्णुसहस्रनाममें भगवान‍्को ‘विश्व’ नामसे ही बतलाया गया है। इन्हींका नाम श्रीकृष्ण है, जो व्रजमण्डलमें अपनी प्रेम-माधुरीका विस्तार कर मधुर वंशी-ध्वनिसे विश्वको निरन्तर प्रेमका मोहन सुर सुना रहे हैं। ममता, आसक्ति या स्वार्थ, जो संसारके पदार्थोंमें रहनेपर बन्धनका कारण होते हैं, वही जब श्रीकृष्णके प्रति हो जाते हैं तब सारे बन्धनोंकी गाँठें आप-से-आप खुल जाती हैं। इसीसे भक्त कहते हैं कि ‘भगवन्! हमारी आसक्तिका नाश न करो, परंतु उसको जगत‍्से हटाकर अपनी ओर खींच लो।’ इस अवस्थामें भक्तको समस्त संसार वासुदेवमय दिखायी पड़ता है, तब वह मस्त होकर प्रेममें झूमता हुआ मुरलीके मोहन सुरमें सुर मिलाकर मीठे स्वरसे गाता है—

अब हौं कासों बैर करौं।

कहत पुकारत प्रभु निज मुखते

घट घट हौं बिहरौं॥

इसलिये यदि हम सुख-शान्ति चाहते हैं तो हमें सबसे पहले उसका असली उपाय ढूँढ़ना चाहिये, हमें उस स्थानका पता लगाना चाहिये जहाँ सुख-शान्तिके स्रोतका उद‍्गम है। यदि हम प्रमादसे उसे भुलाकर—उसका सर्वथा तिरस्कार कर—मृगमरीचिकाके जलसे अपनी सुख-तृष्णा शान्त करना चाहेंगे तो वह कभी नहीं होगी।

जो सारे संसारमें व्याप्त है, जो सबमें ओत-प्रोत है, जो सबका सृष्टिकर्ता और नियामक है, उसे हृदयसे निकालकर कृत्रिम उपायोंसे सुख-शान्तिकी स्थापना कभी नहीं हो सकती। यदि सुख-शान्ति और विश्वप्रेमकी आकांक्षा है तो हमें इस सिद्धान्तका संसारमें प्रचार करना चाहिये कि ‘समस्त जगत् परमात्माका रूप है, हम उसीके अंश हैं अतएव सब एक हैं, एक ही जगहसे हमारी उत्पत्ति हुई है, एक ही जगह जा रहे हैं और इस समय भी उस एकहीमें स्थित हैं, पराया कोई नहीं है, सब अपने हैं, सब आत्मरूप हैं, सब अभिन्न हैं। जो मेरा आत्मा है वही जगदात्मा है; जो परमात्मा तुममें है वही मुझमें है और वही अखिल विश्व-चराचरमें है।’ जब लोग इस बातको समझेंगे तभी वास्तविक विश्वप्रेम और शान्तिकी स्थापना होगी। जबतक हमारे हृदयमें तुच्छ स्वार्थ भरा है, जबतक हम एक-दूसरेको अलग समझते हैं, जबतक सबके साथ आत्माका एक संयोग नहीं मानते, तबतक वास्तविक प्रेम और शान्ति असम्भव है। अल्प तामस ज्ञानसे कभी सुख नहीं मिल सकता ‘नाल्पे सुखमस्ति।’ सुखका उपाय सात्त्विक ज्ञान है। सात्त्विक ज्ञानका रूप है—

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।

अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥

(गीता १८। २०)

‘जिस ज्ञानसे मनुष्य भिन्न-भिन्न समस्त प्राणियोंमें एक अविनाशी परमात्मभावको विभागरहित समानभावसे एकरस स्थित देखता है, उसी ज्ञानका नाम सात्त्विक ज्ञान है।’

इस ज्ञानकी उपलब्धि करना ही ‘विश्वप्रेम’ को प्राप्त करनेकी यथार्थ साधना है।

अतएव कृत्रिम बाह्य साधनोंका भरोसा छोड़कर इसीके लिये सबको प्रयत्नशील होना चाहिये। जब यह ज्ञान प्राप्त होगा, तब हृदयमें ईश्वरकी विमल छटा दिखायी देगी, फिर सारे जगत् में—अखिल विश्वमें उसी छटाका विस्तार दीख पड़ेगा। तब भक्ति-प्रणत चित्तसे विश्वरूप भगवान‍्के सामने हमारा मस्तक आप-से-आप झुक जायगा। सुख-शान्तिकी बंद सरिताका बाँध टूट जायगा। प्रेम-मन्दाकिनीकी त्रिधारा वेगसे बहकर स्वर्ग, भूमि और पाताल—तीनोंको प्रेमके मधुर सुखद प्रवाहमें बहा देगी। फिर सब तरफ देखेंगे केवल प्रेम, आनन्द और शान्ति। यही भगवत्-प्रेम है और इसीका नाम ‘विश्वप्रेम’ है।