भगवान् कहाँ रहते हैं?

एक समय बहुत-से ब्राह्मणोंने भगवान् व्यासजीसे किसी ऐसे यज्ञकी विधि पूछी, जिसका अनुष्ठान सभी वर्णोंके छोटे-बड़े सब लोग कर सकते हों और जिसके करनेसे मनुष्य देवताओंका भी पूज्य बन सकता हो। व्यासजीने जवाब देते हुए कहा—मैं आपलोगोंको पाँच आख्यान सुनाता हूँ। इन आख्यानोंके अनुसार व्यवहार करनेसे स्वर्ग, यश और मोक्षकी प्राप्ति सहज ही हो सकती है। (१) माता-पिताकी सेवा (२) पतिसेवा, (३) सर्वभूतोंमें समदृष्टि, (४) मित्र-द्रोह न करना और (५) भगवान् विष्णुकी भक्ति करना—ये पाँच महायज्ञ हैं।

हे ब्राह्मणो! मनुष्य माता-पिताकी सेवासे जिस पुण्यको प्राप्त होता है वह पुण्य सैकड़ों यज्ञ और तीर्थयात्रादिसे भी नहीं मिलता।

पिता धर्म: पिता स्वर्ग: पिता हि परमं तप:।

पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवता:॥

‘पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है, पिता ही परम तप है, पिताके प्रसन्न होनेसे सारे देवता प्रसन्न होते हैं। जिस मनुष्यकी सेवासे और गुणोंसे माता-पिता प्रसन्न होते हैं, वह गंगास्नानका फल पाता है। माता सर्वतीर्थमयी और पिता सर्वदेवमय है। ऐसे माता-पिताकी जो पुत्र प्रदक्षिणा करता है, वह पृथ्वीभरकी प्रदक्षिणा कर चुका। माता-पिताको प्रणाम करते समय जिसके दोनों घुटने, दोनों हाथ और मस्तक पृथ्वीपर टिकते हैं वह अक्षय स्वर्ग प्राप्त करता है। जो पुत्र माता-पिताके चरण धोकर चरणामृत लेता है उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो नीच मनुष्य कड़ी जबानसे माता-पिताका अपमान करता है वह अनेक कालतक नरकमें रहता है। जो अधम मनुष्य माता-पिताकी सेवा किये बिना ही भोजन करता है वह मरनेपर कृमिकूप नामक नरकमें जाता है। जो मनुष्य रोगी, वृद्ध, वृत्तिहीन, अन्धे या बहरे पिताका त्याग कर देता है वह रौरव-नरकमें जाता है। माता-पिताका पालन न करनेसे मनुष्यके समस्त पुण्य नष्ट हो जाते हैं और उसे म्लेच्छ-चाण्डालादि योनिमें जन्म लेना पड़ता है। माता-पिताकी सेवा न करके तीर्थसेवा या देवाराधना करनेसे उनका फल नहीं मिलता। हे ब्राह्मणो! इस सम्बन्धमें एक पुराना इतिहास कहता हूँ, मन लगाकर सुनो।

प्राचीन कालमें नरोत्तम नामक एक ब्राह्मण था, वह माता-पिताकी सेवा छोड़कर तीर्थयात्राके लिये घरसे निकला। तीर्थसेवाके बलसे उसकी नहाकर धोयी हुई धोती प्रतिदिन बिना ही आधार आकाशमें उड़कर सूखने लगी। इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर उस ब्राह्मणको अहंकार हो गया और वह कहने लगा कि मेरे समान पुण्यवान् और यशस्वी मनुष्य संसारमें दूसरा नहीं है। उसी समय एक बगुलेने उसके मुँहपर बीट कर दी। इससे उसको बड़ा क्रोध हुआ और उसने बगुलेको शाप दे डाला। शाप देते ही बगुला पृथ्वीपर पड़कर भस्म हो गया। इस जीवहिंसाके फलसे ब्राह्मणके मनमें मोह हो गया। उसकी गीली धोती जो अबतक बिना ही आधार आकाशमें सूखती हुई उसके साथ चलती थी, अब नहीं चली। जीवहिंसाके पापसे उसकी यह सिद्धि जाती रही। इस घटनासे ब्राह्मणको बड़ा दु:ख हुआ। तब यह आकाशवाणी हुई कि ‘हे ब्राह्मण! तुम परम धार्मिक मूक चाण्डालके पास जाओ। वहाँ जानेपर तुम्हें धर्मके असली मर्मका पता लगेगा और उसके उपदेशसे तुम्हारा मंगल होगा।’

इस आकाशवाणीको सुनकर ब्राह्मण मूक चाण्डालके घर गया। वहाँ जाकर ब्राह्मणने देखा कि वह चाण्डाल सबेरेसे माता-पिताकी सेवामें लगा हुआ है। जाड़ेके दिनोंमें वह गर्म जल, तेल, अग्निताप, ताम्बूल और बहुत-सी रूईके बिछौने आदिसे उनकी सेवा करता। वह चाण्डाल रोज उनको खानेके लिये मधुर अन्न और दूध देता। वसन्त-ऋतुमें मधु, सुगन्धित माला और अन्यान्य रुचिकर पदार्थोंसे तथा गर्मीके दिनोंमें पंखेसे हवा करके उनकी सेवा करता। नित्य उनकी सेवा करनेके बाद वह भोजन करता। इस प्रकार वह चाण्डाल सर्वदा माता-पिताकी थकावट मिटाने और उनको सुख पहुँचानेके काममें लगा रहता। उसके इस पुण्यबलसे विष्णुभगवान् उसके घरमें बहुत दिनोंसे निवास करने लगे थे। ब्राह्मणने उस चाण्डालके घरमें एक ऐसे कमरेमें, जो बिना ही खम्भोंके खड़ा था, त्रिभुवनेश्वर परमपुरुष अन्य प्राणियोंसे अतुलनीय तेजोमय महासत्त्व विष्णुभगवान‍्को सुन्दर ब्राह्मण-शरीरसे चाण्डालके घरकी शोभा बढ़ाते हुए देखा। तदनन्तर उसने आश्चर्यमें भरकर मूक चाण्डालसे कहा कि ‘चाण्डाल! तू मेरे पास आ। मैं तेरी सहायतासे परमपद पानेकी इच्छा करता हूँ। सब लोगोंके लिये खासकर मेरे लिये जो हितकर हो, मुझको तू वही उपदेश कर।’ मूकने कहा, ‘मैं इस समय अपने माता-पिताकी सेवामें लगा हूँ, आपके पास कैसे आऊँ? इनकी सेवा कर चुकनेपर आपका काम करूँगा। आप दरवाजेपर ठहरिये, मैं आपका आतिथ्य करूँगा।’

चाण्डालकी यह बात सुनकर ब्राह्मणने क्रोधित होकर कहा—‘मैं ब्राह्मण हूँ, मुझको छोड़कर ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ कार्य है जिसे तू करना चाहता है?’ मूकने कहा—‘हे ब्राह्मण! आप व्यर्थ ही क्यों क्रोध करते हैं? मैं बगुला नहीं हूँ जो आपके क्रोधसे जल जाऊँ। आकाशमें अब आपकी धोती नहीं सूखती, आप आकाशवाणी सुनकर यहाँ आये हैं, इस बातको मैं जानता हूँ। आप जरा ठहरिये मैं उपदेश दूँगा। जल्दी हो तो आप पतिव्रताके पास जाइये, वहाँ जानेसे आपका कार्य सफल होगा।’

इसके बाद ब्राह्मणरूपी भगवान् विष्णुने मूकके घरसे निकलकर नरोत्तमसे कहा कि ‘चलो, मुझे भी उसी पतिव्रताके घर जाना है।’ नरोत्तम कुछ सोचता हुआ उनके साथ हो लिया। रास्तेमें आश्चर्य प्रकट करते हुए नरोत्तमने ब्राह्मण-वेषधारी विष्णुसे पूछा कि ‘विप्रवर! आप स्त्रियोंसे युक्त चाण्डालके घरमें सदा क्यों रहते हैं?’ हरिने कहा, ‘अभी तुम्हारा चित्त शुद्ध नहीं हुआ है। पतिव्रता आदिसे मिलनेके बाद तुम मुझे पहचान सकोगे।’ नरोत्तमने कहा, ‘हे द्विज! वह पतिव्रता कौन है? उसमें ऐसी कौन-सी महान् बात है जिसके लिये मैं वहाँ जा रहा हूँ?’ हरिने कहा, ‘जैसे नदियोंमें गंगा, मनुष्योंमें राजा और देवताओंमें जनार्दन श्रेष्ठ हैं, वैसे ही स्त्रियोंमें पतिव्रता प्रधान है। जो पतिव्रता स्त्री नित्य पतिके प्रिय हित-कार्यमें रत है वह दोनों कुलोंका उद्धार करती है और प्रलयकालपर्यन्त स्वर्गमें रहती है। उसका पति अगर स्वर्गसे गिरता है तो वह सार्वभौम राजा होकर पृथ्वीपर जन्म लेता है और पतिव्रता उसकी रानी होकर सुख भोग करती है। इस प्रकार बारम्बार स्वर्ग-राज्यका उपभोग करनेके अनन्तर वे दोनों मुक्त हो जाते हैं।’ नरोत्तमने फिर पूछा कि ‘वह पतिव्रता कौन है? उसके क्या लक्षण हैं? मुझे यथार्थरूपसे समझाइये!’ हरिने कहा, ‘जो स्त्री पुत्रकी अपेक्षा सौ गुने स्नेहसे पतिकी सेवा करती है और शासनमें उसे राजाके समान मानती है, वही स्त्री पतिव्रता है’—

कार्ये दासी रतौ रम्भा भोजने जननीसमा।

विपत्सु मन्त्रिणी भर्तु: सा तु भार्या पतिव्रता॥

‘जो स्त्री काम-काजमें दासी, रतिकालमें रम्भा, भोजन करानेमें जननी और विपत्तिकालमें सत् परामर्श देनेवाली होती है वही पतिव्रता है। जो स्त्री मन, वाणी, शरीर या कर्मसे कभी पतिके विरुद्ध आचरण नहीं करती, वही पतिव्रता है, जो केवल अपने पतिकी सेजपर ही सोती है, नित्य पतिकी सेवा करती है, कभी मत्सरता, कृपणता या अभिमान नहीं करती, मान-अपमानमें पतिको समानभावसे ही देखती है, वही साक्षात् पतिव्रता है। जो सती स्त्री सुन्दर वस्त्राभूषणधारी, भ्राता और पुत्रको देखकर भी उन्हें परपुरुष समझती है वही यथार्थ पतिव्रता है। हे द्विजवर! तुम उस पतिव्रताके पास जाकर अपनी मनोकामना उससे कहो। तुम जिसके घर जा रहे हो, उस ब्राह्मणके आठ स्त्रियाँ हैं, उनमें जो रूप-यौवनसम्पन्ना, यशस्विनी और दयावती है उसीका नाम शुभा है, वह प्रसिद्ध पतिव्रता है। तुम उसके पास जाकर अपने हितकी बातें उससे पूछो।’ इतना कहकर भगवान् हरि अन्तर्धान हो गये। नरोत्तमको उनके अन्तर्धान होते देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। नरोत्तमने उस पतिव्रताके घर पहुँचकर उससे अपने हितकी बात पूछी। पतिव्रता सती अतिथिकी बात सुनकर घरके बाहर आयी और ब्राह्मणको देखकर दरवाजेपर खड़ी रह गयी। ब्राह्मणने पतिव्रताको देखकर हर्षके साथ कहा—‘साध्वी! आपको जो कुछ मालूम है सो मेरे हितके लिये कहिये।’ पतिव्रताने कहा, ‘इस समय तो मुझे पतिकी सेवा करनी है, मुझे अभी फुरसत नहीं है, पीछे आपका काम करूँगी, आज आप यहीं आतिथ्य ग्रहण करें।’ ब्राह्मणने कहा, ‘कल्याणी! मुझे आज भूख, प्यास या थकावट कुछ भी नहीं है। मैं जिस विषयको जानना चाहता हूँ वह मुझे बतला दो, नहीं तो तुम्हें शाप दूँगा।’ इसपर पतिव्रताने कहा कि ‘हे द्विजोत्तम! मुझे आप वह बगुला न समझें। आप धर्म तुलाधारके पास जाकर उससे अपने हितकी बात पूछें, वे आपको हितोपदेश करेंगे।’

महाभागा शुभा इतना कहकर घरके अंदर चली गयी, इसके बाद नरोत्तमने उसके घरमें जाकर देखा कि वही ब्राह्मण जो मूक चाण्डालके घरमें था और बहुत दूरतक साथ-साथ आया था, यहाँ भी बैठा हुआ है। नरोत्तमको इससे बड़ा अचम्भा हुआ, उसने ब्राह्मणरूपी विष्णुके पास जाकर कहा कि ‘देशान्तरमें मेरे सम्बन्धमें जो घटना हुई थी, मालूम होता है आपने ही इन लोगोंसे उसे कह दिया है, नहीं तो चाण्डाल और इस पतिव्रताको मेरी उस घटनाका हाल कैसे मालूम होता?’ हरिने कहा, ‘भूतभावन महात्मागण अपने पुण्य और सदाचारके बलसे सभी बातें जान सकते हैं। पतिव्रताने तुमसे क्या कहा है सो मुझे बतलाओ।’ नरोत्तमने कहा, ‘मुझे पतिव्रताने धर्म तुलाधारके पास जाकर प्रश्न करनेका आदेश किया है।’ हरिने कहा, ‘अच्छी बात है, तुम मेरे साथ चलो, मैं भी वहीं जाऊँगा।’ इतना कहकर हरि चलनेको तैयार हो गये। नरोत्तमने पूछा, ‘उस धर्म तुलाधारका मकान कहाँ है?’ हरि बोले, ‘जहाँपर लोग बहुत-सी चीजें खरीदते-बेचते हैं उसी बाजारमें तुलाधार रहते हैं। लोग धान, रस, तैल, अन्न आदि वस्तुएँ उसके धर्मकाँटेपर तौलाकर देते-लेते हैं। वह नरश्रेष्ठ प्राण जानेपर भी कभी झूठ नहीं बोलता। उसके इसी कामसे उसका नाम धर्म तुलाधार पड़ गया है। हरिके इतना कहते-कहते ही नरोत्तम तुलाधारके पास पहुँच गया। देखा तुलाधार बहुत-सा रस बेच रहा है। उसका शरीर मैला-कुचैला हो रहा है। वह लेन-देन-सम्बन्धी अनेक प्रकारकी बातें कर रहा है। अनेक प्रकारके नर-नारियोंने उसे चारों ओरसे घेर रखा है। तुलाधारने ब्राह्मणको देखते ही कहा, क्यों-क्यों? क्या काम है?’ यों उसकी बात सुनकर ब्राह्मणने मधुर वाणीसे कहा, ‘भाई! मैं तुम्हारे पास धर्मोपदेश ग्रहण करने आया हूँ, तुम मुझे उपदेश करो।’ तुलाधारने कहा, ‘महाराज! अभी तो मेरे ग्राहकोंकी भीड़ लग रही है, एक पहर राततक मुझे फुरसत नहीं मिलेगी। आप मेरे कहनेसे धर्माकरके पास जाइये। बगुलेकी हिंसाका दोष और आकाशमें धोती न सूखनेका कारण आदि सभी बातें वे आपको बतला सकते हैं। उनका नाम अद्रोहक है, वे बड़े ही सज्जन हैं, उनके उपदेशसे आपके सम्पूर्ण काम सफल हो सकेंगे।’ तुलाधार ब्राह्मणसे इतना कहकर फिर अपने लेन-देनमें लग गया। तब नरोत्तमने ब्राह्मण-वेषधारी हरिसे कहा, ‘महाराज! मैं तुलाधारके उपदेशसे अद्रोहकके पास जाऊँगा, परंतु मैं उनका घर नहीं जानता, क्या आप बतला देंगे?’ हरिने कहा, ‘आओ-आओ! मैं अभी तुम्हारे साथ उनके घर चलूँगा।’ रास्तेमें नरोत्तमने हरिसे पूछा, ‘महाराज! यह तुलाधार समयपर स्नान या देव-पितृ-तर्पण कुछ भी नहीं करता। इसका सारा शरीर मैला हो रहा है, कपड़ोंमें गन्ध आ रही है, यह मेरी देशान्तरमें होनेवाली घटनाओंको कैसे जान गया? यह सब देखकर मुझे बड़ा ही ताज्जुब हो रहा है, आप इसका कारण बतलाइये।’ हरिने कहा, ‘सत्य और समदर्शनके प्रतापसे तुलाधारने तीनों लोकोंको जीत लिया है, इसीसे देव-पितर और मुनिगण भी इससे तृप्त हो गये हैं और इसी कारणसे यह भूत, भविष्यत् और वर्तमानकी सब कुछ जानता है—

नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातक: परम्।

विशेषे समभावस्य पुरुषस्यानघस्य च॥

अरौ मित्रेऽप्युदासीने मनो यस्य समं व्रजेत् ।

सर्वपापक्षयस्तस्य विष्णुसायुज्यतां व्रजेत् ॥

‘सत्यसे बढ़कर परम धर्म नहीं है और झूठसे बढ़कर बड़ा पाप नहीं है। जो निष्पाप समदर्शी पुरुष हैं, शत्रु, मित्र और उदासीन सभी जिनके मन समान हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वे विष्णुभगवान‍्के सायुज्य (मोक्ष)-को प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य सदा ही ऐसा व्यवहार करते हैं, वे अपने कुलोंका उद्धार करनेवाले होते हैं। सत्य, दम, शम, धैर्य, स्थिरता, अलोभ और अनालस्य सभी उनमें रहते हैं। वह धर्मज्ञ देव और नरलोकके सभी विषयोंको जानते हैं, उनके देहमें साक्षात् श्रीहरि निवास करते हैं, जगत‍्में उनके समान कोई नहीं होता। जो सत्य, सरल और समदर्शी हैं वह साक्षात् धर्ममय हैं। वास्तवमें इस जगत‍्को वही धारण करते हैं। इसपर नरोत्तमने कहा, ‘आपकी कृपासे मैंने तुलाधारका रहस्य तो जाना, अब यदि आप उचित समझें तो अद्रोहकका भी इतिहास बतला दें।’ हरिने कहा, ‘किसी एक राजकुमारके सुन्दरी नामकी एक परम सुन्दरी नवयुवती भार्या थी। वह अपने पतिको बड़ी ही प्यारी थी। राजकुमारको किसी खास कामसे अकस्मात् बाहर जानेकी आवश्यकता पड़ी, वह अपने मनमें चिन्ता करने लगा कि ‘इस प्राणोंकी पुतली प्रियाको किसके पास छोड़कर जाऊँ, कहाँ इसकी रक्षा हो सकेगी? अन्तमें उसने अद्रोहकके पास जाकर कहा कि ‘मैं बाहर जाता हूँ, जबतक लौटकर न आऊँ तबतक मेरी इस नवयुवती सुन्दरी स्त्रीकी रक्षाका भार तुम ग्रहण करो।’ राजकुमारके इस प्रस्तावसे अद्रोहकने आश्चर्यमें पड़कर कहा कि ‘मैं तो आपका पिता, भाई या मित्र नहीं हूँ, न आपके माता-पिताके कुलसे ही मेरा सम्बन्ध है। आपकी पत्नीसे भी मेरा कोई कौटुम्बिक सम्बन्ध नहीं है, इस अवस्थामें मेरे घर अपनी स्त्रीको रखकर आप कैसे स्वस्थ रह सकेंगे?’ राजकुमारने कहा, ‘संसारमें आपके समान धर्मज्ञ और जितेन्द्रिय पुरुष दूसरा कोई नहीं है।’ अद्रोहकने कहा, आप बुरा न मानें, देखिये, त्रैलोक्यमोहिनी भार्याकी कौन पुरुष रक्षा कर सकता है?’ राजकुमार बोले, ‘मैं अच्छी तरह सोच-समझकर ही आपके पास आया हूँ। मेरी स्त्रीको आप ही रखिये, मैं अपने घर जाता हूँ।’ राजपुत्रके ऐसा कहनेपर अद्रोहकने फिर कहा, ‘इस शोभायुक्त नगरीमें कामी पुरुषोंकी भरमार है, मैं कैसे तुम्हारी स्त्रीकी रक्षा कर सकूँगा?’ राजकुमारने कहा, ‘आप जैसे ठीक समझें वैसे ही रक्षा करें, मैं चलता हूँ।’ गृहस्थ अद्रोहकने धर्म-संकटमें पड़कर राजकुमारसे कहा, ‘हे पिता! मैं इस अरक्षिता स्त्रीकी रक्षा-निमित्त जो देखनेमें अनुचित होगा, ऐसा कर्म भी उचित और हितकर समझकर करूँगा। मैं इसे रातको अकेली नहीं रख सकता, अतएव मैं अपनी भार्याके साथ जिस शय्यापर सोता हूँ उसीपर इसे भी सोना पड़ेगा। आपको इसमें आपत्ति हो तो अपनी स्त्रीको वापस ले जाइये, नहीं तो छोड़ जाइये।’ राजकुमारने कुछ देरतक सोचकर कहा, ‘अच्छी बात है, आप जैसा उचित समझें वैसा ही करें।’ तदनन्तर राजकुमारने अपनी पत्नीसे कहा, ‘सुन्दरि! इनके आज्ञानुसार सब काम करना, इसमें तुम्हें कोई दोष नहीं लगेगा।’ राजपुत्र इतना कहकर अपने पिता नरेशके आज्ञानुसार वहाँसे चला गया। अद्रोहकने रातको वही किया। वह धार्मिक पुरुष रातको अपनी स्त्री और राजपुत्र-पत्नीके बीचमें एक शय्यापर सोने लगा, परंतु धर्मपथसे कभी नहीं डिगा। राजकुमार-पत्नीका नींदमें कभी अंग-स्पर्श होता तो उसे अपनी जननीके अंगके समान प्रतीत होता। वह इस प्रकार मन-इन्द्रियोंको जीतकर रहा कि उसकी स्त्री-संग-प्रवृत्ति ही जाती रही! इस प्रकार छ: महीने बीतनेपर राजकुमार विदेशसे लौटकर घर आया। बराबरीवालोंने पूछा, तुम्हारी स्त्री पीछेसे कहाँ रही?’ उसने कहा, ‘अद्रोहकके घर।’ कुछ युवकोंने व्यंग्यसे कहा, ‘अच्छा किया जो अपनी स्त्री अद्रोहकको दान कर गये, वह रातको उसके साथ सोता था। स्त्री-पुरुषके एक साथ सोनेपर भी क्या कभी संयम रह सकता है?’ इस तरह लोग तरह-तरहके दोष लगाने लगे। अद्रोहकको इस बातका पता लगा, तब उसने इस जनापवादकी निवृत्तिके लिये काठकी एक चिता बनाकर उसमें आग लगा दी। इतनेमें ही राजपुत्र वहाँ आ पहुँचा, राजकुमारने अपनी स्त्रीको प्रसन्नमुख और अद्रोहकको विषादयुक्त देखकर अद्रोहकसे कहा, ‘भाई! मैं आपका मित्र बहुत दिनों बाद विदेशसे लौटकर आया हूँ, आप मुझसे बोलते क्यों नहीं हैं?’

अद्रोहकने कहा, ‘मैंने आपकी स्त्रीको घर रखकर बदनामी मोल ले ली, उसे दूर करनेके लिये मैं आज अग्निमें प्रवेश करूँगा, सम्पूर्ण देवता मेरे कृत्यको देखें।’ इतना कहकर अद्रोहक धधकती हुई अग्निमें कूद पड़ा, परंतु आश्चर्य कि उसका एक बाल भी नहीं जला। देवतागण आकाशसे साधु-साधु कहने लगे। चारों ओरसे पुष्पवृष्टि होने लगी। जिन लोगोंने अद्रोहकपर दोष लगाया था, उनके मुखोंपर कुष्ठ रोग हो गया। देवताओंने आकर उसको अग्निसे निकाला। मुनियोंने विस्मित होकर सुन्दर पुष्पोंसे उसकी पूजा की। फिर महातेजस्वी अद्रोहकने भी उन सबकी पूजा की। सुर-असुर और मनुष्योंने मिलकर अद्रोहकका नाम सज्जनाद्रोहक रखा। उसकी चरण-रजसे पृथ्वी हरी-भरी हो गयी। तब देवताओंने राजकुमारसे कहा कि ‘तुम अपनी स्त्रीको ग्रहण करो, अद्रोहकके समान जगत‍्में दूसरा कोई नहीं है। जगत‍्में सभी लोग कामके वश हैं। काम, क्रोध, लोभ सभी प्राणियोंमें हैं, कामसे संसारमें बन्धन होता है, यह जानकर भी लोग अकामी नहीं होते। इस अद्रोहकने कर्तव्य-पालनके लिये कामको जीतकर मानो चौदह भुवनोंको जीत लिया है, इसके हृदयमें नित्य वासुदेव विराजमान हैं।’ यों कहकर सब लोग और राजपुत्र अपनी पत्नीसहित अपने-अपने घर चले गये। उस समय अद्रोहकको कामजयके प्रतापसे दिव्यदृष्टि प्राप्त हो गयी, वह तीनों लोकोंकी सभी बातोंको अनायास देखने और जाननेमें समर्थ हो गया।

इस प्रकार बातें होते-होते ही नरोत्तम ब्राह्मण अद्रोहकके घर आ पहुँचा। नरोत्तमने अद्रोहकसे धर्मका तत्त्व पूछा। अद्रोहकने कहा, ‘हे धर्मज्ञ विप्र! आप पुरुषोत्तम वैष्णवके घर जाइये, उनके दर्शनसे ही आपकी मनोकामना पूर्ण हो जायगी। बगुलेकी मृत्यु और धोती सूखने आदिके सभी भेद वे आपको बता सकते हैं।’ नरोत्तम यह सुनकर ब्राह्मण-वेषधारी विष्णुके साथ पुरुषोत्तम वैष्णवके घर आया। नरोत्तमने देखा कि वैष्णव परम शुद्ध, शान्त, समस्त उत्तम लक्षणोंसे युक्त और अपने तेजसे देदीप्यमान हो रहे हैं। धर्मात्मा नरोत्तमने उस ध्यानस्थ भगवद्भक्तसे कहा, ‘मैं बहुत दूरसे आपके पास आया हूँ, आप मुझे उपदेश कीजिये।’ पुरुषोत्तम बोले, ‘देवश्रेष्ठ! भगवान् हरि सदा ही तुमपर प्रसन्न हैं, हे ब्राह्मण! आज तुम्हें देखकर मेरे मनमें बड़ा आह्लाद हो रहा है, मेरे घरमें भगवान‍्के दर्शनसे तुम्हारा अतुलनीय कल्याण होगा। तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।’ नरोत्तमने कहा, ‘आपके घरमें विष्णुभगवान् कहाँ विराजमान हैं, कृपाकर मुझे दिखला दें।’ वैष्णवने कहा, ‘इस रमणीय देवमन्दिरमें प्रवेश करते ही तुम भगवान‍्के दर्शन कर घोर पाप और जन्म-कर्मके बन्धनोंसे छूट जाओगे।’ वैष्णवके इन वचनोंको सुनकर नरोत्तमने मन्दिरमें प्रवेश करके देखा कि भगवान‍्की मूर्तिकी जगह वही ब्राह्मण-वेषधारी विष्णु उसी रूपमें पद्मासनसे बैठे हुए हैं। नरोत्तमने उनको देखते ही मस्तकद्वारा प्रणामकर उनके चरण पकड़ लिये और कहा, ‘हे देवेश! मैं आपको पहले पहचान न सका। अब आप मुझपर प्रसन्न होइये, हे प्रभो! मैं इस लोक और परलोकमें आपका दास बना रहूँ। हे मधुसूदन! मुझपर कृपादृष्टि कीजिये। यदि वास्तवमें आपकी मुझपर कृपा है तो अपने स्वरूपका मुझे दर्शन कराइये।’ भगवान‍्ने कहा, ‘हे भूदेव! तुम्हारे प्रति सर्वदा ही मेरा स्नेह है। स्नेहके वश होकर ही मैं भक्तोंको दर्शन दिया करता हूँ। पुण्यात्मा पुरुषोंके एक बारके दर्शन, स्पर्श, ध्यान, कीर्तन और सम्भाषणसे ही पुण्य-लोककी प्राप्ति होती है। उनके नित्य-संगसे तो सारे पाप छूट जाते हैं और अन्तमें वह उनका संग करनेवाला मुझमें मिल जाता है। तुम मेरे भक्त हो, वक-वधसे तुम्हें जो पाप हुआ है उसकी निवृत्तिके लिये तुम फिर उसी मूकके पास जाओ। मूक चाण्डाल पुण्यात्माओंमें प्रधान तीर्थरूप है। उसके दर्शन और मेरे साथ सम्भाषण होनेके कारण ही तुम मेरे मन्दिरमें आ सके हो। जो करोड़ों जन्मोंतक निष्पाप रहते हैं, वही धर्मात्मा पुरुष मेरा दर्शन करनेमें समर्थ हो सकते हैं, अतएव अब तुम अपना इच्छित वर माँगो।’

ब्राह्मणने कहा, ‘हे सर्वलोकेश्वर! मैं यही चाहता हूँ कि मेरा मन सर्वथा आपमें लगा रहे, आपके सिवा और किन्हीं भी पदार्थोंमें मेरा प्रेम न हो। भगवान‍्ने कहा, ‘जब तुम्हारी बुद्धिका ऐसा विकास हो गया है, तब तुम्हारी इच्छा जरूर पूर्ण होगी; परंतु तुम्हारे माता-पिता अबतक तुम्हारी सेवासे वंचित हैं। तुम अपने माता-पिताकी सेवा कर चुकनेके बाद मुझमें विलीन हो सकोगे। तुम्हारे माता-पिताके दु:खभरे लम्बे-लम्बे श्वासोंकी वायुसे तुम्हारा तप नष्ट होता रहता है। अतएव तुम पहले उनकी पूजा करो। जिस पुत्रपर माता-पिताका कोप पड़ता है उसको नरकगामी होनेसे मैं, शिव या ब्रह्मा—कोई नहीं बचा सकते। इसलिये तुम अपने माँ-बापके पास जाकर बड़े यत्नसे उनकी पूजा करो, तदनन्तर उनके प्रसादसे तुम मुझे प्राप्त कर सकोगे।’ भगवान‍्के ये वचन सुनकर ब्राह्मणने फिर हाथ जोड़कर कहा, ‘हे नाथ! हे अच्युत! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो एक बार अपने दिव्यरूपका दर्शन कराइये।’ तदनन्तर प्रसन्नहृदय भगवान‍्ने प्रेमवश ब्राह्मणको अपने स्वरूपका दर्शन कराया। ब्राह्मणने देखा, ‘पुरुषोत्तम हरि शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुए हैं। उनके तेजसे समस्त जगत् परिपूर्ण हो रहा है; वे ही सम्पूर्ण लोकोंके कारण हैं।’ उसने दण्डवत् -प्रणाम करके गद‍्गदवाणीसे कहा, ‘हे अच्युत! आज मेरा जन्म सफल हो गया। मेरे नेत्र प्रसन्न और दोनों हाथ श्लाघ्य हो गये। मैं आज धन्य हो गया। आज मेरे कुलके लोग सनातन ब्रह्मलोकको चले गये। मेरा समस्त मनोरथ आज पूर्ण हो गया। परंतु नाथ! मेरा एक आश्चर्य अभी दूर नहीं हुआ है, मूकादि सज्जनोंने मेरा पूर्व वृत्तान्त क्योंकर जाना और आप सुन्दर विप्ररूप धरकर मूक, पतिव्रता, तुलाधार, अद्रोहक और इस वैष्णवके घरमें क्यों नित्य निवास करते हैं?’

भगवान‍्ने कहा, ‘हे ब्राह्मण! मूक चाण्डाल सर्वदा अपने माता-पिताकी सेवामें रत है, शुभा नामकी स्त्री अनन्य पतिव्रता है, तुलाधार सत्यवादी और सर्वत्र समदर्शी है, अद्रोहक काम, लोभको जय कर चुका है तथा यह वैष्णव मेरा अनन्य भक्त है। इनके इन गुणोंसे प्रसन्न होकर ही मैं आनन्दपूर्वक इनके घर सदा लक्ष्मी और सरस्वतीसहित निवास करता हूँ और इन्हीं गुणोंके प्रतापसे यह लोग सब बातें जाननेमें समर्थ हैं।’ यदि हमलोग भगवान‍्का अपने घरमें निवास चाहते हैं तो हमें भी ऐसा बनना चाहिये।

(यह आख्यायिका पद्मपुराणके आधारपर लिखी गयी है)।