भक्ति-सुधा-सागर-तरंग
भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर नाम बपु एक।
इनके पद बन्दन कियें नासत बिघन अनेक॥
१—प्राणी-मात्र पूर्ण और नित्य सुख चाहते हैं।
२—पूर्ण और नित्य सुख अपूर्ण और अनित्य वस्तुसे कभी नहीं मिल सकता।
३—ब्रह्मलोकतकके समस्त भोग अपूर्ण और अनित्य हैं, उनकी प्राप्तिसे नित्य तृप्ति नहीं होती; वहाँसे भी वापस लौटना पड़ता है, पूर्ण और नित्य तो केवल एक परमात्मा है, जिसके मिल जानेपर फिर कभी लौटना नहीं पड़ता (गीता ८। १६)। इसीलिये मनुष्य किसी भी स्थितिमें तृप्त और संतुष्ट नहीं है, इसीसे ऋषिकुमार नचिकेताने भोगोंका सर्वथा तिरस्कार कर कल्याणकी इच्छा की थी
(कठोपनिषद्)।
४—उस परम कल्याणकी प्राप्तिके कर्म, ज्ञान, योग और भक्ति आदि अनेक उपाय हैं, परंतु उन सबमें भक्ति मुख्य है
(शाण्डिल्य-सूत्र २२; नारद-सूत्र २५)।
५—भक्तिमें साधकको भगवान्का बड़ा सहारा रहता है, अपनेमें चित्त लगानेवाले भक्तको भगवान् ऐसी निश्चयात्मिका विमल बुद्धि दे देते हैं जिससे वह अनायास ही परम सिद्धि प्राप्त कर सकता है
(गीता १०। १०)।
भगवान् बहुत शीघ्र उसका संसार-सागरसे उद्धार कर देते हैं
(गीता १२। ७)।
६—भक्तिरहित योग, सांख्य, स्वाध्याय, तप या त्यागसे भगवान् उतने प्रसन्न नहीं होते जितने भक्तिसे होते हैं
(भागवत ११। १४। २०)
क्योंकि भक्तिमें इन सबका स्वाभाविक समावेश है और भगवान्के परम तत्त्वको जाननेके साथ ही भगवान्के दर्शन करना तथा भगवान्में मिल जाना तो केवल अनन्य भक्तिसे ही सम्भव है
(गीता ११। ५४)।
७—अखिल विश्वके आत्मारूप एक परमात्माको सर्वतोभावसे आत्मसमर्पण कर देना—उस भूमाकी असीम सत्तामें अपनी आत्मसत्ताको सर्वथा विलीन कर देना ही वास्तविक भक्ति है। इसी भक्तिका तत्त्वज्ञ और रसज्ञ भक्तोंने ‘परमप्रेमरूपा’ और ‘परानुरागरूपा’ के नामसे वर्णन किया है।
(शाण्डिल्य-सूत्र २, नारद-सूत्र २)
असलमें तत्त्वज्ञान और पराभक्ति एक ही स्थितिके दो नाम हैं।
८—जगत्के वन्दनीय जनों तथा देवताओंकी भी भक्ति की जाती है, परंतु मनुष्यके अनादिकालीन ध्येय नित्य और पूर्ण सुखरूप परमात्माको प्राप्त करानेवाली तो ईश्वरभक्ति ही है। अतएव भक्तिशब्दसे ‘ईश्वरभक्ति’ ही समझना चाहिये।
९—साकार-निराकार दोनों ही ईश्वरके रूप हैं, परमात्मा अव्यक्तरूपसे सबमें व्याप्त हैं, (गीता ९। ४) और वही भक्तके भावनानुसार व्यक्त साकार अग्निकी तरह चाहे जब चाहे जहाँ प्रकट हो सकता है। असलमें जल तथा बर्फकी तरह निराकार और साकार एक ही है।
१०—भगवान्के किसी भी साकार स्वरूपकी या निराकारकी भक्ति की जा सकती है। यह भक्तकी प्रकृति, रुचि, अधिकार और अवस्थापर निर्भर है।
११—मुख्यके अतिरिक्त उसीके साधनस्वरूप गौणी भक्ति तीन प्रकारकी है, साधकके स्वभावभेदसे ही भक्तिमें इस भेदकी कल्पना है।
(भागवत ३। २९। ७)।
१२—जो भक्ति हिंसा, दम्भ, मत्सरता, क्रोध और अहंकारसे कामनापूर्तिके लिये की जाती है वह तामस है।
(भागवत ३। २९। ८)।
१३—जो भक्ति विषय, यश या ऐश्वर्यकी कामनासे भेददृष्टिपूर्वक केवल प्रतिमा आदिकी पूजाके रूपमें की जाती है, वह राजस है।
(भागवत ३। २९। ९)।
१४—जो भक्ति पापनाशकी इच्छासे समस्त कर्मफल परमात्मामें अर्पण करके, परमात्माकी प्रीतिके लिये यज्ञ करना कर्तव्य है यह समझकर भेददृष्टिसे की जाती है, वह सात्त्विक है।
(भागवत ३। २९। १०)।
१५—इन तीनोंमें कामना और भेददृष्टि रहनेसे इनको गौणी भक्ति कहते हैं। इनमें तामससे राजस और राजससे सात्त्विक श्रेष्ठ है (नारद-सूत्र ५७)। इनके साधनसे साक्षात् मुक्ति नहीं मिलती, परंतु सर्वथा न करनेकी अपेक्षा इनको करना भी उत्तम है। मनुष्यको चाहिये कि यदि सात्त्विक न हो सके तो कम-से-कम राजससे ही भक्तिका साधन अवश्य आरम्भ कर दे।
१६—गीतामें आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी—ये चार प्रकारके पुण्यात्मा और उदार भक्त बतलाये गये हैं, इनमेंसे पहले तीन गौण और चौथा मुख्य भगवान्का आत्मा ही है।
(गीता ७। १६-१७; नारद-सूत्र ५६-५७)।
१७—रोग-शोक-भयसे पीड़ित होकर उससे छूटनेकी इच्छासे जो पुरुष भक्ति करता है वह आर्त भक्त है, जैसे गजराज, द्रौपदी आदि।
१८—इस लोक या परलोकके किसी भोगके लिये जो भक्ति करता है, वह अर्थार्थी भक्त है, जैसे ध्रुव, विभीषण आदि।
१९—ये दोनों प्रकारकी भक्ति राजसीके अन्तर्गत आ जाती हैं। वास्तवमें भगवान्की भक्तिमें किसी प्रकारकी कामना नहीं करनी चाहिये (नारद-सूत्र ७)। पर किसी तरहसे भी की हुई भगवान्की भक्ति अन्तमें साधकके हृदयमें प्रेम पैदा करके उसका परम कल्याण कर देती है (गीता ७। २३)। ध्रुव, विभीषण, गजराज, द्रौपदी आदिके उदाहरण प्रत्यक्ष हैं।
२०—विषयोंकी कामना भगवान्का यथार्थ महत्त्व न जाननेके कारणसे ही होती है, इससे जो पुरुष भगवान्के रहस्यको यथार्थरूपसे जाननेके लिये भक्ति करता है वह जिज्ञासु कहलाता है, उसे अन्य कोई कामना नहीं रहती, इसीलिये वह पूर्वोक्त दोनोंसे उत्तम माना गया है। वास्तवमें स्वरूप जाने बिना भक्ति किसकी और कैसे हो?
२१—भगवान्को यथार्थ जानकर जो अभेदभावसे निष्काम और अनन्यचित्त होकर भक्ति करता है, वह ज्ञानी भक्त है। ऐसे तन्मय एकान्त भक्तको ही श्रीनारदने ‘मुख्य’ बतलाया है (नारद-सूत्र ६७, ७०)। वास्तवमें जो अपनेमें भगवान्की भावना करके सब प्राणियोंमें अपनेको और भगवत्स्वरूप आत्मामें सबको देखता है, वही श्रेष्ठ भागवत है (भागवत १२। २। ४५)। परन्तु इस प्रकारके सर्वत्र वासुदेवको देखनेवाले भक्त जगत्में अत्यन्त दुर्लभ हैं
(गीता ७। १९)।
२२—भगवान्के सम्यक् ज्ञान बिना भजनका परम आनन्द स्थायी और एक-सा नहीं होता। भजनकी एकतानतामें श्रीनारदजीने गोपियोंका दृष्टान्त देकर (नारद-सूत्र २१) यह बतलाया है कि गोपियोंकी भक्ति अन्धी नहीं थी, वे भगवान्को यथार्थ रूपसे जानती थीं (नारद-सूत्र २२, भागवत १०। २९। ३२; १०। ३१। ४)। गोपियोंकी परमोच्च भक्तिमें व्यभिचार देखनेवालोंकी आँखें और बुद्धि दूषित हैं।
२३—ज्ञानी भक्त भगवान्को आत्मवत् प्रिय होते हैं (गीता ७। १८), यह नहीं समझना चाहिये कि आत्माराम ज्ञानी पुरुष नित्य बोधरूपमें अभिन्न स्थित होनेके कारण भक्ति नहीं करते, सच्ची अहैतुकी भक्ति तो वे ही करते हैं। भगवान्के गुण ही ऐसे विलक्षण हैं कि शुकदेव-सरीखे आत्माराम मुनियोंको भी उनकी अहैतुकी भक्ति करनी पड़ती है
(भागवत)।
२४—भगवान् ही सब भूतोंके भीतर-बाहर और सर्वभूतरूपसे स्थित हैं (गीता १३। १५), यह जानकर भक्तगण उस सर्वव्यापी भगवान्के गुण सुनते ही सब प्रकारकी फलाकांक्षासे रहित होकर गंगाका जल जैसे स्वाभाविक ही बहकर समुद्रके जलमें अभिन्नभावसे मिल जाता है वैसे ही अपनी कर्मगतिको अविच्छिन्नभावसे भगवान्में समर्पण कर देते हैं, इसीका नाम निर्गुण या निष्काम भक्ति है। इसीको अहैतुकी भक्ति कहते हैं
(भागवत ३। २९। ११-१२)।
२५—ऐसे अहैतुक भक्त आप्तकाम, पूर्णकाम और अकाम होनेके कारण भगवत्सेवाके स्वाभाविक आचरणको छोड़कर अन्य किसी भी वस्तुकी इच्छा नहीं करते। संसारके भोग और स्वर्गसुखकी तो गिनती ही क्या है, वे मुक्ति भी नहीं ग्रहण करते।‘मुक्ति निरादर भगति लुभाने’ भगवान् स्वयं उन्हें सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य—यह पाँच प्रकारकी मुक्ति देना चाहते हैं, पर वे नहीं लेते, यही आत्यन्तिक एकान्तभक्ति है
(भागवत ३। २९। १३-१४)।
२६—ऐसे भक्त श्रद्धायुक्त होकर, अनिमित्त माया-भोगको त्यागकर, हिंसा-द्वेषसे रहित हो विधिवत् कर्मयोगका निष्काम आचरण करते हैं। भगवान्का दर्शन, सेवन, अर्चन, स्तवन और भजन करते हैं। धैर्य और वैराग्यसे युक्त होकर प्राणी-मात्रमें भगवान्को देखते हैं। महात्माओंका मान, दीनोंपर दया और समान अवस्थाके लोगोंसे मैत्री करते हैं। यम-नियमका पालन, भगवत्-कथाओंका श्रवण, भगवन्नामकीर्तन और अहंकार तथा कपट छोड़कर विनीतभावसे सदा-सर्वदा सत्संग करते हैं।
(भागवत ३। २९। १५—१८)।
२७—इसी भक्तिको पराभक्ति कहते हैं, पराभक्तिको प्राप्त करनेका क्रम यह है—विशुद्धबुद्धि, एकान्तसेवी और मिताहारी होकर मन-वाणी-शरीरको वशमें कर, दृढ़-वैराग्य धारणकर, नित्य ध्यानपरायण रहकर, सात्त्विकी धारणासे चित्तको वशमें कर, विषयोंका त्यागकर, राग-द्वेषको छोड़कर, अहंकार-बल-दर्प-काम-क्रोध-परिग्रहसे रहित होकर, ममता-मोहको त्यागकर जब साधक शान्तचित्त हो जाता है तब वह ब्रह्मज्ञानके योग्य होता है, तदनन्तर ब्रह्मीभूत होकर, किसी वस्तुके जानेमें शोक एवं किसी वस्तुके प्राप्त करनेकी आकांक्षाका सर्वथा त्यागकर जब प्रसन्नचित्तसे समस्त प्राणियोंमें समभावसे परमात्माको देखता है तब उसे पराभक्ति मिलती है। इस पराभक्तिसे वह भगवान्को यथार्थ जानकर उसी क्षण भगवान्में मिल जाता है।
(गीता १८। ५१—५५)।
२८—इसी भक्तिका एक नाम ‘प्रेमाभक्ति’ है। इसमें भी भक्त सब प्रकारके परिग्रहको त्यागकर, सब कुछ परमात्मामें अर्पण कर उसके प्रेममें मतवाला हो जाता है, एक क्षणकी भगवान्की विस्मृति उसे परम व्याकुल कर डालती है (नारद-सूत्र १९)। ‘प्रेमाभक्ति’ का साधक इतना उच्च वैराग्यसम्पन्न होता है कि जिसकी किसीसे तुलना नहीं की जा सकती। वह अपने प्रेमास्पद भगवान्के लिये इहलोक और परलोकके समस्त भोगोंको सदाके लिये तिलांजलि देकर अपने आचरणोंसे केवल हरिको ही प्रसन्न करना चाहता है, वह उसी कर्मका अनुष्ठान करता है जिससे हरिभगवान्को आनन्द हो ‘तत्सुखे सुखित्वम्’ ही उसके जीवनका लक्ष्य रहता है (नारद-सूत्र २४)। वह अपना सिर तो हथेलीपर रखे घूमता है। तदनन्तर प्रेमकी बाढ़से उस भक्तिकी गुणरहित मादकतासे वह उन्मत्त, स्तब्ध और आत्माराम हो (नारद-सूत्र ६) कभी द्रवितचित्त होकर गद्गदवाणीसे गुणगान करता है, कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी चुप हो रहता है, कभी निर्लज्ज होकर गाता और कभी प्रेमविह्वल होकर नाचता है। ऐसे भक्तिसम्पन्न सच्चे प्रेमी पुरुषके संसर्गसे त्रिभुवन पवित्र होता है (भागवत ११। १४। २४)। ऐसे प्रेमियोंके कण्ठ रुक जाते हैं, वे आँसुओंकी धारा बहाते हुए कुल और पृथ्वीको पवित्र करते हैं। तीर्थोंको सुतीर्थ, कर्मको सत्कर्म और शास्त्रको सत्-शास्त्र बनाते हैं, क्योंकि वे भगवान्में तन्मय हैं, उनको देखकर पितृगण आनन्दमें भर जाते हैं, देवता नाच उठते हैं और पृथ्वी सनाथा होती है
(नारद-सूत्र ६८—७१)।
२९—प्रेमी भक्त सब प्रकारके विधि-निषेधोंसे स्वाभाविक ही परे रहते हैं (नारद-सूत्र ८)। आगे चलकर वे भक्त तद्रूप हो जाते हैं और समस्त जड-चेतन जगत्में केवल हरिका स्वरूप ही देखते हैं। उनका ‘मैं’ पन भगवान्में सर्वथा विलीन हो जाता है। यही प्रेमाभक्तिका परिणाम है।
३०—इसीका एक नाम अनन्य भक्ति है। जो साधक अनन्यभावसे भगवान्के लिये ही सब कर्म करता है, भगवान्के ही परायण रहता है, भगवान्का ही भक्त है, स्त्री-पुत्र-स्वर्ग-मोक्षादिमें आसक्तिसे रहित है और सम्पूर्ण प्राणियोंमें सर्वथा निर्वैर होता है, वह भगवान्को ही पाता है (गीता ११। ५५), ऐसे भक्तके पूर्वकृत समस्त पाप बहुत शीघ्र नाश हो जाते हैं (गीता ९। ३०-३१) और उसके योगक्षेमका वहन स्वयं भगवान् करते हैं
(गीता ९। २२)।
३१—इस प्रकार अहैतुकी, परा, एकान्त, विशुद्ध, निष्काम, प्रेमा, अनन्य आदि सब एक ही उच्चतम भक्तिके कुछ रूपान्तर-भेद हैं। इस परम भक्तिको प्राप्त करना ही भगवत्-प्राप्तिका प्रधान उपाय है। गौणी भक्ति भी इसी फलको देती है। इस परम भक्तिका परिणाम या इसीका दूसरा नाम ‘भगवत्-प्राप्ति’ है। भावुक भक्त तो इसे मोक्षसे भी बढ़कर समझते हैं।
३२—प्रसिद्ध महाराष्ट्र-भक्त एकनाथ महाराजने आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानीकी व्याख्या दूसरी तरहसे की है। उनका भाव है कि मूल श्लोकमें जब भक्तोंका आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी यह क्रम है तब हमें अर्थ करनेमें यह क्रम क्यों बदलना चाहिये? ज्ञानी तो भगवद्रूप है ही। बाकी तीनोंके लौकिक और पारमार्थिक दोनों अर्थ करके वे पारमार्थिक अर्थ ग्रहण करनेको कहते हैं—
आर्त—रोगी (लौकिक अर्थ), भगवत्-प्राप्तिके लिये व्यथित (पारमार्थिक अर्थ)।
जिज्ञासु—वेद-शास्त्रके जाननेका इच्छुक (लौकिक अर्थ), भगवत्-तत्त्व जाननेके लिये उद्योग करनेवाला (पारमार्थिक अर्थ)।
अर्थार्थी—धनकी कामनावाला (लौकिक अर्थ), सब अर्थोंमें एक भगवान् ही परम अर्थ है ऐसी दृढ़ भावनावाला भगवान्का अर्थी (पारमार्थिक अर्थ)।
इस अर्थका क्रम देखनेसे उत्तरोत्तर उत्तमता समझमें आती है। भगवान्के लिये जिसके हृदयमें व्यथा उत्पन्न होती है वह आर्त, तदनन्तर जो वेद, शास्त्र, पुराणादि और साधु-महात्माओंके सेवनद्वारा भगवान्का अनुसन्धान करता है, वह जिज्ञासु और भगवान्के सिवा अन्यान्य सभी अर्थ अनर्थरूप है, यों जानकर सभी अर्थोंमें उस एक अर्थको देखनेवाला अर्थार्थी एवं उस अर्थके प्राप्त कर लेनेपर ‘सब कुछ हरिमय है’ इस निश्चयपर सदा आरूढ़ रहनेवाला ज्ञानी भक्त है।
३३—इस भक्तिसाधनकी नौ सीढ़ियाँ हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, पूजन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन
(भागवत ७। ५। २३)।
इस नौके तीन विभाग हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरणसे भगवान्के नामकी सेवा; पादसेवन, पूजन और वन्दनसे रूपकी सेवा और दास्य, सख्य तथा आत्मनिवेदनसे भावद्वारा होनेवाली सेवा है। इन नौ साधनोंको इस तरह समझना चाहिये—
श्रवण—भगवान्की महिमा, कीर्ति, शक्ति, लीला-कथा और उनके चरित्र, नाम, गुण, ज्ञान, महत्त्व आदिको श्रद्धापूर्वक अतृप्त मनसे सदा सुनते रहना और अपनेको तदनुसार बनानेकी चेष्टा करना। राजा परीक्षित् , पृथु, उद्धव आदि इसी श्रेणीके भक्त हैं।
कीर्तन—भगवान्के यश, पराक्रम, गुण, माहात्म्य, चरित और नामोंका प्रेमपूर्वक कीर्तन करना।
(क) कीर्तन स्वाभाविक होना चाहिये, उसमें कृत्रिमता न हो।
(ख) कीर्तन केवल भगवान्को रिझानेकी शुभ भावनासे हो, लोगोंको दिखलानेके लिये न हो।
(ग) कीर्तन नियमितरूपसे हो।
(घ) यथासम्भव कीर्तनमें बाजे और करतालका भी प्रबन्ध रहे।
(ङ) कीर्तनके साथ स्वाभाविक नृत्य भी हो।
(च) समय-समयपर मण्डली बनाकर नगर-कीर्तन भी किया जाय। स्वाभाविक कीर्तन वह है जो अपने मनकी मौजसे अपने सुखके लिये बिना प्रयास होता है, उसमें एक अनोखी मस्ती रहती है जिसका अनुभव उस साधकको ही होता है, दूसरे लोग उसका अनुमान भी नहीं कर सकते।
मानवीय, गुणज्ञ, सारग्राही सत्पुरुष इसीलिये कलियुगकी प्रशंसा करते हैं कि इसमें कीर्तनसे ही साधक संसारके संगका त्यागी होकर परम धामको पाता है (भागवत ११। ५। ३६)। महाप्रभु चैतन्य, भक्त तुकाराम और नरसीजी आदि इसके उदाहरण हैं। इस दोषपूर्ण कलियुगमें यही एक भारी गुण है कि इसमें भगवान्के कीर्तनसे ही मनुष्य समस्त बन्धनोंसे छूटकर परम धामको प्राप्त करता है। सत्ययुगमें भगवान्के ध्यानसे, त्रेतामें यज्ञसे, द्वापरमें सेवासे जो फल होता था, वही कलियुगमें केवल श्रीहरि-कीर्तनसे होता है (भागवत)। अतएव जो अहर्निश प्रेमपूर्वक हरिकीर्तन करते हुए घरका सारा काम करते हैं वे भक्तजन धन्य हैं (भागवत)।
भगवान्के नामके समान मंगलकारी और कुछ भी नहीं है, भक्तिरूपी इमारतकी नींव श्रीभगवन्नाम ही है। पूर्वकृत महान् पापोंका नाश करनेमें भगवान्का नाम प्रचण्ड दावानल है, भक्त अजामिल और जीवन्ती वेश्याका इतिहास प्रसिद्ध है। परंतु जो लोग दम्भसे या पाप करनेके लिये भगवान्का नाम लेते हैं, वे पातकी हैं। जो लोग नामकी आड़में पाप करते हैं उनके वे पाप वज्रलेप हो जाते हैं, उन पापोंकी शुद्धि करनेमें यमराज भी समर्थ नहीं हैं (पद्मपुराण, ब्रह्मखण्ड)। नारद, व्यास, वाल्मीकि, शुकदेव, चैतन्य, सूर, तुलसी, नानक, तुकाराम आदि कीर्तनश्रेणीके भक्त समझे जाते हैं।
स्मरण—जैसे लोभी धनको और कामी कामिनीको स्मरण करता है, उसी प्रकार नित्य-निरन्तर अनन्यभावसे भगवान्का स्मरण करना चाहिये। भगवान्के गुण और माहात्म्यको बार-बार स्मरणकर उसपर मुग्ध होना और उस गुणावलीके अनुकरण करनेका प्रयत्न करना चाहिये।
जो मनुष्य अनन्यचित्तसे नित्य-निरन्तर भगवान्का स्मरण करता है, उसके लिये भगवान् बड़े सुलभ हैं (गीता ८। १४)। जो मृत्यु-समय भगवान्का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, वह निस्सन्देह भगवान्को प्राप्त होता है; परंतु अन्तकालमें स्मरण वही कर सकता है जिसने जीवनभर भगवत्-स्मरणका अभ्यास किया हो (गीता ८। ५—७)। स्मरणके अन्तर्गत ही ध्यान समझना चाहिये। स्मरणभक्तिमें प्रह्लाद, भीष्म, हनुमान्, व्रजबालाएँ, विदुर, अर्जुन आदि समझने चाहिये।
पादसेवन—श्रवण, कीर्तन और स्मरण तो निराकार और निर्गुण भगवान्का भी हो सकता है; परंतु पादसेवनसे लेकर आत्मनिवेदनतकमें साकारकी आवश्यकता रहती है। भक्त श्रीभगवान्के जिस रूपका उपासक हो उसीका चरणसेवन करना चाहिये। भगवत्पदारविन्द-सेवन भक्तिमें प्रधान साधन है। महादेवी श्रीलक्ष्मीजी सदा भगवान्के पादसेवनमें प्रवृत्त रहती हैं। जबतक यह जीव श्रीभगवान्के चरणोंका आश्रय नहीं लेता तभीतक वह धन, घर और परिवारके लिये शोक, भय, इच्छा, तिरस्कार और अतिलोभ आदिके द्वारा सताया जाता है (भागवत ३। ९। ६)। ज्ञान-वैराग्ययुक्त होकर योगीलोग भक्तियोगसे भगवान्के चरणोंका आश्रय लेकर निर्भय हो जाते हैं (भागवत ३। २५। ४३)। श्रीलक्ष्मीजी, रुक्मिणीजी आदि इसमें प्रधान हैं।
जगत्में प्राणी-मात्रको भगवद्रूप समझकर आवश्यकतानुसार सबकी चरण-सेवा करनी चाहिये। स्त्री पतिको, पुत्र माता-पिताको और शिष्य गुरुको परमात्मा मानकर उनकी चरण-सेवा करे।
पूजन—अपनी रुचिके अनुसार मनसा-वाचा-कर्मणा भगवान्की पूजा करना अर्चन या पूजन कहलाता है। पूजनके लिये आकारकी आवश्यकता होती है, इसीलिये सुविज्ञ शास्त्रकारोंने मूर्तिकी व्यवस्था की है।
(क) पत्थरकी, काठकी, धातुकी, मिट्टीकी, चित्रकी, बालूकी, मणियोंकी और मनकी यह आठ प्रकारकी प्रतिमाएँ होती हैं (भागवत ११। २७। १२)। बाह्य पूजा करनेवाले साधकको मनकी मूर्ति छोड़कर बाकी सात प्रकारमेंसे अपनी रुचि और अवस्थाके अनुसार कोई-सी मूर्ति निर्माण करनी या करानी चाहिये।
(ख) पूजामें सोलह उपचार होते हैं।
(ग) पूजाकी सामग्री सर्वथा पवित्र होनी चाहिये।
(घ) केवल बाहरी पवित्रता ही नहीं, परंतु भगवान्की पूजा-सामग्री न्यायोपार्जित द्रव्यकी होनी चाहिये, अन्याय या चोरीसे उपार्जित द्रव्यद्वारा भगवान्की पूजा करनेसे वह पूजा कल्याण देनेवाली नहीं हो सकती (पद्मपुराण, पातालखण्ड)। शुद्ध वृत्तिद्वारा उपार्जित द्रव्यसे ही नारायणभगवान्का यज्ञ करना चाहिये (भागवत १०)। भगवान्की पूजा करनेवालेको द्रव्य-शुद्धिके लिये धन कमानेमें अन्याय-असत्यका त्याग करना चाहिये।
(ङ) इसके सिवा भगवान्को वही वस्तु अर्पण करनी चाहिये जो अपनेको अत्यन्त प्रिय और अभिलषित हो (भागवत ११। ११। ४१)। जो लोग निकम्मी चीजें भगवान्के अर्पण कर अभिलषित वस्तुकी रक्षा करते हैं वे यथार्थमें भक्त नहीं हैं।
(च) इसलिये पूजाके साथ-साथ हृदयमें भक्ति भी चाहिये। भक्तिरहित पुरुष पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अनेक सामग्रियोंद्वारा भगवान्की बड़ी पूजा करता है तब भी भगवान् उसपर प्रसन्न नहीं होते।
भगवान् प्रेम या भावके भूखे हैं, उन्हें पूजा करवानेकी अभिलाषा नहीं है, केवल भक्तोंका मान बढ़ाने और उन्हें आनन्द देनेके लिये ही भगवान् पूजा स्वीकार करते हैं, असलमें जो लोग भगवान्का सम्मान करते हैं वह उन्हींको मिलता है, जैसे दर्पणमें अपने ही मुखकी शोभा दीख पड़ती है (भागवत ७। ९। ११)।
भगवान्के किसी रूपविशेषकी मानसिक पूजा भी होती है, भगवान्के एक-एक अवयवकी कल्पना करते हुए दृढ़तासे सम्पूर्ण मूर्तिको मनमें स्थिर करके उसकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर मूर्तिको चित्तसे हटाकर, चित्तको सर्वथा चिन्तनशून्य—निर्विषय करके अचिन्त्य परमात्मामें स्थित हो रहना चाहिये। यह अचिन्त्य ही विष्णुका परमपद है।
भगवान्के अवतारोंके दिव्य शरीरोंका वर्णन पुराणोंमें पढ़कर तदनुसार मूर्तिनिर्माण या मनमें कल्पना की जा सकती है। इस रूपमय जगत्की उत्पत्ति अरूपसे ही हुई है, इसलिये रूपसे ही वापस अरूपमें पहुँचा जा सकता है। जब चतुर चित्रकार अपने मनोमय रूपको चित्रांकित करके दिखला देता है, तब यह भी मानना चाहिये कि भक्तके हृदयपटपर भगवान्के जिस असाधारण सौन्दर्यकी छाया पड़ती है, भक्त भी उसे बाहर अंकित करके उसकी पूजा कर सकता है। बाहर-भीतर दोनों जगह पूजा होनेसे ही तो पूजाकी पूर्णता है।
मूर्तिपूजासे भक्तिकी वृद्धिमें बड़ा लाभ हुआ है और उसकी बड़ी भारी आवश्यकता है। अतएव भक्तोंको मूर्तिपूजाका विरोध करनेवाले लोगोंके फेरमें भूलकर भी नहीं पड़ना चाहिये।
भगवान्के पूजनमें इन सात पुष्पोंकी बड़ी आवश्यकता है— (१) अहिंसा, (२) इन्द्रियसंयम, (३) दया, (४) क्षमा, (५) मनोनिग्रह, (६) ध्यान, (७) सत्य। इन पुष्पोंद्वारा की जानेवाली पूजासे भगवान् जितने प्रसन्न होते हैं, उतने प्राकृत पुष्पोंसे नहीं होते; क्योंकि उन्हें उपकरणोंकी अपेक्षा भक्ति विशेष प्यारी है। भक्तके सिवा और किसीमें इन फूलोंसे भगवान्को पूजनेकी सामर्थ्य नहीं है (पद्मपुराण, पातालखण्ड)।
भगवान्की प्रतिमाओंके अतिरिक्त सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, वैष्णव, अनन्त आकाश, वायु, जल, पृथ्वी, आत्मा और सम्पूर्ण प्राणी—इन ग्यारहको भगवान् मानकर इनकी पूजा करनी चाहिये (भागवत ११। ११। ४२)।
जो लोग सब प्राणियोंमें सदा निवास करनेवाले, सबके आत्मा और ईश्वर परमात्माको भुलाकर प्राणियोंसे तो हिंसा और द्वेष करते हैं पर भेदभावसहित प्रतिमापूजन बड़ी विधिसे किया करते हैं, उनकी वह पूजा विफल होती है। वे भगवान्की अवज्ञा करते हैं, उनपर भगवान् सन्तुष्ट नहीं होते। सब प्राणियोंके अन्दर रहनेवाले, भगवान्से वैर रखनेवाले और उसका अनादर करनेवाले लोगोंको कभी शान्ति-सुख नहीं मिल सकता (भागवत ३। २९। २१—२४)। परंतु कोई किसी भी तरह भगवान्की पूजा करे, उसकी निन्दा नहीं करनी चाहिये।
अतएव प्राणी-मात्रमें भगवान्की भावना कर तन, मन, धनसे उनकी पूजा करना प्रत्येक भक्तका कर्तव्य है। भगवान् सर्वत्र हैं इससे भजनका अच्छे-से-अच्छा और समझमें आनेयोग्य स्थल प्राणी-मात्र हैं। प्राणियोंमें जो दु:खी हैं, अपंग हैं, निराधार हैं उनकी सेवा ही भगवत्सेवा है। भूखेको अन्न, प्यासेको पानी, रोगीको सेवा, गृहहीनको आश्रय, भयातुरको अभय और वस्त्रहीनको वस्त्र—श्रद्धा और सत्कारपूर्वक कर्तव्य समझकर देना सर्वभूतस्थित भगवान्की पूजा करना है। आवश्यकतानुसार मन्दिर, धर्मशाला, पाठशाला, अनाथाश्रम, विधवाश्रम, औषधालय, कुआँ, तालाब आदिका भगवत्प्रीत्यर्थ निर्माण, स्थापन और सत्यतापूर्वक संचालन करना भी भगवत्-पूजन ही है।
पूजन-भक्तिमें राजा पृथु, अम्बरीष, अक्रूर, शबरी, मीरा और धन्ना आदि माने जाते हैं।
वन्दन—भगवान्की मूर्ति, संत-महात्मा, भगवद्भक्त, माता-पिता, आचार्य, पति, ब्राह्मण, गुरुजन और प्राणी-मात्रके प्रति भगवान्की भावनासे नमस्कार करना, नम्रतापूर्वक बर्ताव करना वन्दन-भक्ति है। भक्तकी बुद्धिमें जगत् हरिमय हो जाता है। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, जीव-जन्तु, वृक्षादि, नदी, समुद्र—इन सबको भगवान्का शरीर समझकर अनन्यभावसे प्रणाम करना चाहिये (भागवत १२। २। ४१)।
श्रीअक्रूर, अर्जुन आदि वन्दन-भक्त गिने जाते हैं।
दास्य—भगवान्को एकमात्र स्वामी और अपनेको नित्य सेवक मानकर भक्ति करना। केवल सेवक मानना ही नहीं, परन्तु प्रतिक्षण बड़ी सावधानी, नित्य नये उत्साह और बढ़ती हुई प्रसन्नतामें मन, बुद्धि, शरीरद्वारा निष्कामभावसे बाह्याभ्यन्तर सेवा करते रहना कर्तव्य है। जितनी अधिक सेवा हो उतना ही हर्ष बढ़ना दास्य-भक्तिका लक्षण है। सच्चा भगवत्-सेवक सदा सेवा मिलती रहनेके अतिरिक्त और कोई फल नहीं चाहता। जिन भाग्यवानोंका चित्त भगवान्की सेवामें संलग्न है, उनको मोक्ष भी तुच्छ प्रतीत होता है (भागवत)। जो सेवाके बदलेमें भगवान्से कुछ चाहता है वह भृत्य नहीं, व्यापारी है। निष्काम सेवकको किसी भी फलकी अभिसन्धि नहीं होती (भागवत ७। १०। ४)।
निष्काम सेवकका धर्म स्वामीके इशारेपर चलना ही होता है। कोई कैसा ही मनके प्रतिकूल कार्य हो, प्रभुका इशारा मिलते ही वह उसके अनुकूल बन जाता है, जैसे आदर्श सेवक श्रीभरतजीका श्रीरामके संकेतानुसार वनसे पुन: अयोध्यामें लौट आना।
सेवक कभी मन मारकर या बेगार समझकर सेवा नहीं करता। सेवामें प्रतिक्षण उसकी प्रसन्नता बढ़ती रहती है और वह किसी तरहका शुल्क लेकर सेवा नहीं करना चाहता। इसीसे गोपियोंने अपनेको ‘नि:शुल्क सेविका’ और प्रह्लादजीने ‘निष्काम दास’ बतलाया था। अपूर्व दासभक्त हनुमान्जी महाराजने कभी कुछ नहीं माँगा, बिना माँगे उन्हें अमूल्य हार दिया गया तो उसको भी रामसे रहित जानकर नष्ट कर दिया। कभी माँगा तो केवल नित्य-सेवाका सुअवसर माँगा और कहा कि ‘हे नाथ! मुझे वह भव-बन्धनको काटनेवाली मुक्ति मत दीजिये, जिससे आपका और मेरा स्वामी-सेवकका सम्बन्ध छूटता है, मैं ऐसी मुक्ति नहीं चाहता।’ भक्तको चाहिये कि वह सारे विश्वको परमात्माका स्वरूप मानकर उसकी निष्काम सेवा करे। विश्वका सेवक ही परमात्माका सेवक है, विष्णुसहस्रनाममें ‘विश्व’ नामसे ही परमात्माका निर्देश किया गया है। श्रीहनुमान्जी, प्रह्लादजी और गोपियाँ इस श्रेणीके भक्तोंमें माने जाते हैं।
सख्य—भगवान्को ही अपना परम मित्र मानकर उसपर सब कुछ न्योछावर कर देना। मित्रके दु:खमें दु:खी होना, मित्रके संकटको बहुत बड़ा और उसके सामने अपने बहुत बड़े संकटको तुच्छ समझना, मित्रको बुरे पथसे हटाकर अच्छेमें लगाना, उसके दोषोंको न देखकर गुण प्रकट करना, देन-लेनमें शंका न करना, शक्तिभर सदा हित करना, विपत्तिमें सौगुना प्रेम करना—ये मित्रके लक्षण गोसाईं तुलसीदासजी महाराजने बतलाये हैं। अकारण सुहृद् भगवान् इन गुणोंसे स्वाभाविक ही विभूषित हैं। मनुष्योंमें इन गुणोंकी पूर्णता नहीं मिल सकती, इसीलिये सख्य करनेयोग्य केवल परमात्मा ही हैं। भक्तको चाहिये कि वह इन गुणोंको अपने अंदर उत्पन्न करनेका प्रयत्न करे। सच्चे भक्तमें तो इन गुणोंका विकास होता ही है। वह समस्त चराचर जगत्को भगवान्का रूप समझकर सबसे प्रेम और मित्रताका व्यवहार करता है। इसीसे भगवान्ने भक्तको जगत्का मित्र बतलाया है (गीता १२। १३)।
भगवान्का सखा-भक्त अपना हृदय खोलकर भगवान्के सामने रख देता है यानी छल-कपटका वह सर्वथा त्यागी होता है, सुख-दु:खमें वह भगवान्की ही सत्-सम्मति चाहता है, भगवान्को ही अपना समझता है और अपने घर-द्वार, धन-दौलत सबपर उस सखारूप भगवान्का ही निरंकुश अधिकार समझता है। उससे उसका प्रेम स्वाभाविक ही होता है, उसमें स्वार्थ या कामनाका कलंक नहीं रहता। ऐसे मित्रोंमें अर्जुन, उद्धव, सुदामा, श्रीदाम आदिके नाम लिये जाते हैं।
आत्मनिवेदन—यह नवधा भक्तिका अन्तिम सोपान है। भक्त अपने-आपको अहंकारसहित सर्वथा सदाके लिये परमात्माके समर्पण कर देता है। ऐसा भक्त ही निष्किंचन कहलाता है। यह अवस्था बहुत ही ऊँची होती है। राजा बलिने साकार भगवान्के चरणोंमें अपनेको अर्पण करके और याज्ञवल्क्य, शुकदेव, जनकादिने नित्य निर्विकार निर्गुण निराकार भगवान्में अपना अहंकार सर्वतोभावेन विलीन करके आत्मनिवेदन-भक्तिको सिद्ध किया था।
यही भागवतोक्त नवधा भक्तिके भेद हैं।
३४—रामचरितमानसमें गोसाईंजी महाराजने नवधा भक्तिका क्रम यों बतलाया है—(१) सत्संग, (२) भगवत्-कथामें अनुराग, (३) मानरहित होकर गुरुसेवा करना, (४) कपट छोड़कर भगवान्के गुण गाना, (५) दृढ़ विश्वाससे रामनाम-जप करना, (६) इन्द्रियदमन, शील, वैराग्य आदि सत्पुरुषोंद्वारा सेवनीय धर्मका आचरण करना, (७) जगत्को हरिमय और संतको हरिसे भी अधिक समझना, (८) सबसे छल छोड़कर सरल बर्ताव करना, (९) भगवान् पर दृढ़ भरोसा रखकर हर्ष-विषाद न करना। श्रीअध्यात्मरामायणमें भी कुछ रूपान्तरसे नवधा भक्तिका ऐसा ही वर्णन है, सम्भव है गोसाईंजीने यह प्रसंग वहींसे लिया हो।
३५—देवर्षि नारदजीने भक्तिके ग्यारह भेद बतलाये हैं। गुण-माहात्म्यासक्ति, रूपासक्ति, पूजासक्ति, स्मरणासक्ति, दास्यासक्ति, सख्यासक्ति, कान्तासक्ति, वात्सल्यासक्ति, आत्मनिवेदनासक्ति, तन्मयतासक्ति और परम विरहासक्ति (नारद-सूत्र ८२)।
३६—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य—ये पाँच रस भक्तिके माने जाते हैं। वेदान्ती भक्तोंने शान्त, सख्य, श्रीगोसाईंजी महाराजने दास्य, श्रीपुष्टिमार्गीय वैष्णव आचार्योंने वात्सल्य और श्रीचैतन्य महाप्रभुने माधुर्यको प्रधान माना है।
३७—कतिपय भक्ताग्रगण्य महानुभावोंने शरणागतको ही प्रधान माना है। बात भी ऐसी ही है।
अवश्य ही शरण सच्ची होनी चाहिये, फिर भगवान् उसका सारा जिम्मा ले लेते हैं। भगवान्ने कहा है—सब धर्मोंको छोड़कर तू मुझ एककी शरण हो जा, मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता न कर (गीता १८। ६६)। इससे अधिक आश्वासन और कैसे दिलाया जा सकता है? शरणागत भक्त सर्वथा भगवान्के अनुकूल होता है। शरणागति त्रिविध है, ‘मैं भगवान्का’, ‘भगवान् मेरे’ और ‘मैं-वे एक ही हैं’ इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है। बस, शरणागतिमें ही भक्तिसाधनका उपसंहार है। शरणागत भक्त भगवान्का अनन्य चिन्तन करनेवाला, भगवान्के आज्ञानुसार चलनेवाला, भगवान्के प्रत्येक कठोर-से-कठोर विधानमें सन्तुष्ट तथा भगवान्का ही अनुसरण करनेवाला होता है।
३८—जो मनुष्य भक्त बनना चाहता है, परंतु भगवान्के सद्गुणोंका अनुकरण नहीं करना चाहता, उसकी भक्तिमें सन्देह है। भक्तको चाहिये कि भगवान् श्रीरामजीकी पितृ-मातृभक्ति, भ्रातृस्नेह, एकपत्नीव्रत, मर्यादापालन, शूरवीरता, नम्रता, प्रजावत्सलता, राग-द्वेष-शून्यता, समता, तेज, क्षमा, मैत्री और भगवान् श्रीकृष्णके सखा-प्रेम, गीताज्ञान, सेवा, दुष्टदलन, शिष्टसंरक्षण, निष्काम कर्म, न्याययुक्त मर्यादा-रक्षण, अनासक्ति, समता, शौर्य, प्रेम आदि गुणोंका अनुकरण करे।
३९—भक्तिका साधन केवल प्रभुकी प्रसन्नताके लिये ही किया जाता है, लोगोंको दिखलानेके लिये नहीं; अतएव भक्त बनना चाहिये, भक्ति दिखलानेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये। भक्ति हृदयका परम गुह्य धन है, तमाशा या खिलौना नहीं।
४०—भक्त किसी प्रकारकी भी कामनाके वश नहीं होता, जो किसी कामनाके लिये भक्ति करते हैं, वे असलमें भगवान् और भक्तिका मूल्य घटाते हैं। स्वार्थ और प्रेममें बड़ा विरोध है।
जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिं राम।
तुलसी कबहुँ कि रहि सकै, रबि रजनी इक ठाम॥
४१—इन्द्रियसुखके लिये भक्ति करनेवालोंकी बुद्धिमें भगवान् या भक्ति साधन है और विषयसुख साध्य वस्तु है, वे विषयको भगवान्से बड़ा समझते हैं। जो लोग विषयसुखके साथ-ही-साथ भगवत्-प्राप्तिका सुख चाहते हैं, वे या तो मूर्ख हैं, नहीं तो पाखंडी। एक म्यानमें दो तलवारें नहीं रह सकतीं। भगवान्की चाह हो तो विषयोंकी प्रीति छोड़ो!
४२—भक्त अकिंचन कहलाता है, क्योंकि वह अपना सर्वस्व ‘मैं’, ‘मेरे’ सहित शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार सब कुछ भगवान्के अर्पण कर देता है, उसके पास अपनी कहलानेवाली कोई वस्तु रह ही नहीं जाती। जिसके पास कुछ न हो वही तो अकिंचन है। ऐसे अकिंचन भक्त भगवान्को बड़े प्यारे होते हैं। भगवान् उनकी चरणरज पानेके लिये उनके पीछे-पीछे घूमा करते हैं (भागवत ११। १४। १६)। क्योंकि वे भक्त ब्रह्मा, इन्द्रका पद, चक्रवर्ती राज्य, पातालका राज्य, योगकी आठों सिद्धियाँ और मोक्षको भी नहीं चाहते (मुक्ति तो उनके पीछे-पीछे डोला करती है)। भगवान्को ऐसे भक्त ब्रह्मा, शिव, लक्ष्मी और अपने आत्मासे भी बढ़कर प्रिय होते हैं। वास्तवमें ऐसे ही अकिंचन, शान्त, दान्त, ईश्वरार्पितचित्त, अखिल-जीव-वत्सल, विषयवांछारहित भक्त उस परमानन्दरूप परमात्माके आनन्दका रस जानते हैं (भागवत ११। १४। १७)।
४३—ऐसे भक्तोंके ममत्वकी चीज अगर कोई रहती है तो वह केवल भगवान्के चरणकमल रहते हैं, इसीसे वे भगवान्के हृदयमें निरन्तर बसते हैं।
४४—भक्त शरीर, वाणी और मनसे तीन प्रकारके व्रतोंका आचरण किया करते हैं। शरीरसे हिंसा, व्यभिचार, स्तेयका सर्वथा त्यागकर सबकी सेवा किया करते हैं। वाणीसे किसीकी चुगली-निन्दा न कर सत्य, मधुर और हितकर भाषण तथा वेदाध्ययन और नाम-संकीर्तन किया करते हैं और मनसे अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अकपटता, निरभिमानता, निर्वैरताका पालन करते हुए सबका कल्याण चाहा करते हैं। जो मनुष्य मन, वाणी, शरीरसे छिपकर पाप करता है, वह सर्वान्तर्यामी भगवान्को वास्तवमें मानता ही नहीं, वह तो एक प्रकारका नास्तिक है।
४५—भक्तिमें श्रद्धा मुख्य है। भगवान्को कोई व्यक्ति श्रद्धासे एक बूँद जल अर्पण करता है तो भगवान् उससे भी तृप्त होते हैं (वाराहपुराण)। श्रद्धावान् ही ज्ञान पाते हैं (गीता ४। ३९)। भगवान्को श्रद्धावान् अत्यन्त प्रिय हैं (गीता १२। २०)। भगवान्के मतके अनुसार बर्तनेवाले श्रद्धायुक्त पुरुष कर्मोंसे छूट जाते हैं (गीता ३। ३१)। जो श्रद्धावान् योगी भगवान्में मन लगाकर उन्हें भजता है वह सबसे श्रेष्ठ है (गीता ६। ४७)।
४६—कुछ लोगोंका कहना है कि वर्णाश्रम-धर्म भक्तिमें बाधक है, इसको छोड़ देना चाहिये। बस केवल भक्ति करो, सन्ध्या-तर्पण, बलिवैश्वदेव आदि किसी कर्मकी कोई आवश्यकता नहीं, ये सब वर्ण-धर्मके झंझट त्याग देने चाहिये। परंतु यह कथन ठीक नहीं। जो लोग हरि-रसपानमें मत्त होकर वर्णाश्रमकी सीमाको लाँघ गये हैं अथवा जिनका वर्णाश्रममें अधिकार ही नहीं है, उनकी बात दूसरी है, परंतु वर्णाश्रमके माननेवाले साधकोंको यह धर्म-व्यवस्था अवश्य माननी चाहिये। वर्णाश्रम भक्तिमें बाधक नहीं, पर पूरा साधक है। नारद कहते हैं जबतक परमात्मामें ऐकान्तिक निष्ठा न हो जाय तबतक शास्त्रका रक्षण करना चाहिये, नहीं तो गिरनेका भय है (नारदभक्ति-सूत्र १२-१३)। जो वर्णाश्रम-धर्मके विरुद्ध कार्य करते हैं वे नरकोंमें पड़ते हैं (विष्णुपुराण २। ६। २८)। अतएव वर्णाश्रम-धर्मी सज्जनोंको वर्णाश्रमके कर्म भगवदर्थ निष्कामभावसे अवश्य करने चाहिये, इससे उन्हें भक्तिमें सहायता मिल सकेगी।
४७—पर इस बातको अवश्य याद रखना चाहिये कि मायाके बन्धनसे मुक्त होनेके लिये तो केवल भक्ति ही सर्वोत्तम उपाय है (गीता ७। १४, भागवत १०। ८७। ३२)।
४८—जो मनुष्य भक्त कहलाकर धन, मान, बड़ाई, स्त्री, पुत्र आदिकी प्राप्तिमें प्रसन्न और दरिद्रता, अपमान, निन्दा, स्त्री-पुत्रादिके नाशमें दु:खी होता है और भगवान्को कोसता है वह वास्तवमें भक्त नहीं है। सच्चा भक्त इन आने-जानेवाले विषयोंकी कभी कोई परवा नहीं करता। उसके लिये जीवन-मरण समान है। अमावस्याकी कालरात्रि और पूर्णिमाकी निर्मल ज्योत्स्ना दोनोंमें ही वह अपने प्रियतम भगवान्का मनोहर वदन निरखकर निरतिशय आनन्द लाभ करता है। उसे न सुखकी स्पृहा होती है, न दु:खमें उद्विग्नता।
४९—भक्तकी तो अग्नि-परीक्षाएँ हुआ करती हैं। प्रह्लादका अग्निमें पड़ना, हरिश्चन्द्रका रानीको बेचकर डोमका दासत्व करना, शिबिका अपना मांस काटकर देना, दधीचिका अपनी हड्डियाँ देना, मयूरध्वजका पुत्रको चीरना, पाण्डवोंका वन-वन भटकना, हरिदासका कोड़ोंकी मारसे व्याकुल न होकर भी हरिनाम पुकारना, ईसाका शूलीपर चढ़ जाना आदि। जो इन सब परीक्षाओंमें उत्तीर्ण होता है वही यथार्थ भक्त है।
५०—पीड़न-प्रहार, निर्यातन-निष्कासन, अत्याचार-अपमान आदि तो भक्तके अंग-आभूषण होते हैं। भक्तको अपने जीवनमें इनका सदा ही स्वागत करना पड़ता है। संसारके लोग उसके जीवनकालमें प्राय: इन्हीं पुरस्कारोंसे उसकी पूजा किया करते हैं। श्रीहरिदास, नित्यानन्द, कबीर, नरसी, ज्ञानेश्वर, तुकाराम, मीरा आदि सब इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं।
५१—हजार अत्याचार सहन करनेपर भी सर्वत्र भगवान्का दर्शन करनेवाला क्षमास्वरूप प्रेमी भक्त किसीका भूलकर भी बुरा नहीं चाहता, बल्कि प्रह्लाद और हरिदासकी तरह वह उन सबके कल्याणके लिये ही परमात्मासे प्रार्थना करता है।
५२—भक्त नित्य निर्भय होता है। जो सबमें सब समय अपने प्राणाराम प्रभुको देखता है, वह किससे और कैसे डरे। बात-बातमें डरनेवाले भक्त नहीं हैं। हाँ, पाप करनेमें ईश्वरसे अवश्य डरना चाहिये।
५३—भक्तिके मार्गमें निम्नलिखित प्रतिबन्धक हैं—इनसे बचनेका उपाय करना चाहिये। दम्भ, काम, क्रोध, लोभ, असत्य, अहंकार, द्वेष, द्रोह, हिंसा, सिद्धियाँ, भक्तिका अभिमान, अपवित्रता, मान-बड़ाईकी इच्छा, निन्दा-अपमानकी परवा, ब्रह्मचर्यकी हानि, स्त्री और स्त्रीसंगियोंका संग, विलासिता, घृणा, नेतागिरी, आचार्य बनना, उपदेशक बनना, धनकी आसक्ति, ममता, कुसंगति, लोकसमूहमें नित्य निवास, तर्क-वितर्क, माननाशकी चिन्ता, सभासमितियोंका अधिक संसर्ग, समाचारपत्र तथा गंदे शृंगारके और व्यर्थ ग्रन्थ पढ़ना और स्त्री-धन-नास्तिक-वैरीका चरित्र याद करना आदि।
५४—भक्ति-मार्गमें निम्नलिखित सहायक हैं—इनका संग्रह करना चाहिये। सत्संग, श्रद्धा, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, भगवत्-शरणागति, शास्त्र-श्रवण, पठन, नामजप, नामकीर्तन, दया, क्षमा, वैराग्य, सादगी, प्रेम, साधुसेवा, मैत्री, उपेक्षा, तर्क न करना, एकान्तसेवन, योगक्षेमकी वासनाका त्याग, कर्मफलका त्याग, दीनता, सहनशीलता, निरभिमान, निष्कामभाव, इन्द्रियनिग्रह, मनका वशमें करना, मूर्तिपूजा, मन्दिरसेवा, लोकसेवा, रोगीकी शुश्रूषा और पात्रको दान आदि।
५५—चैतन्य महाप्रभुके मतसे भक्तके लक्षण—अपनेको एक तिनकेसे भी नीचा समझना, वृक्षसे अधिक सहनशील होना, अमानी होकर दूसरोंको मान देना और सदा हरिकीर्तन करना।
५६—गीतोक्त भक्तके सच्चे लक्षण—सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, नि:स्वार्थी मित्र, अकारण दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुख-दु:खको समान समझनेवाला, अपराधीपर भी क्षमा करनेवाला, सर्वदा सन्तुष्ट, निरन्तर भक्तियोगमें रत, संयतात्मा, दृढ़निश्चयी, भगवान्में अर्पित मन-बुद्धिवाला, किसीको उद्वेग न पहुँचानेवाला, किसीसे उद्वेग न पानेवाला, हर्ष-विषाद-भय-उद्वेगसे रहित, इच्छारहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, चतुर, पक्षपातहीन, निन्दा-तिरस्कार आदिमें व्यथारहित, कामनामुक्त, सर्वारम्भका परित्यागी, प्रिय वस्तुकी प्राप्तिमें हर्ष, अप्रियकी प्राप्तिमें द्वेष, प्रियके वियोगमें शोक और इच्छित वस्तुकी आकांक्षासे रहित, शुभाशुभ फलकी परवा न करनेवाला, शत्रु-मित्रमें समान, मान-अपमानमें समान, शीत-उष्णादि सुख-दु:खोंमें समान, ईश्वरके सिवा अन्य किसी भी सांसारिक वस्तुकी रमणीयतापर आसक्त न होनेवाला, निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, किसी प्रकारसे भी जीवन-निर्वाहमें सन्तुष्ट, घर-द्वारकी ममतासे रहित, स्थिरबुद्धि, भगवत्परायण और श्रद्धाशील (गीता १२। १३—२०)।
५७—भागवतके मतके अनुसार भक्तके लक्षण—भगवान्में मन लगाकर (राग-द्वेषरहित हो) इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका भोग करता हुआ भी सारे विश्वको भगवान्की माया समझकर किसी भी वस्तुसे द्वेष या किसीकी आकांक्षा नहीं करनेवाला, हरिस्मरणमें संलग्न रहकर शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, इन्द्रियके सांसारिक धर्म, जन्म-मरण, भूख-प्यास, भय, तृष्णा, कामना आदिसे मोहित न होनेवाला, कर्मके बीजरूप कामनासे रहित चित्तवाला, एकमात्र वासुदेवपर निर्भर करनेवाला, जन्म-कर्म-वर्ण-आश्रम और जातिसे शरीरमें अहंभाव न करनेवाला, धन और शरीरके लिये अपने-परायेका भेदभाव न रखनेवाला, सब प्राणियोंमें एक आत्मदृष्टिवाला, शान्त, त्रिभुवनका राज्य मिलनेपर भी आधे पलके लिये हरि-चरण-सेवाका त्याग न करनेवाला और जिस हरिका नाम विवश-अवस्थामें अचानक मुखसे निकल जानेके कारण सब पाप नष्ट हो जाते हैं, उस हरिको प्रेमपाशमें बाँधकर निरन्तर अपने हृदयमें रखनेवाला (भागवत ११। २। ४८—५५)।
५८—सनत्कुमार, व्यास, शुकदेव, शाण्डिल्य, गर्ग, विष्णु, कौण्डिन्य, शेष, उद्धव, आरुणि, बलि, हनुमान् और विभीषणादि भक्तिके आचार्य माने गये हैं (नारद-भक्ति-सूत्र ८३)।
५९—इस भक्तिसाधनमें सबका अधिकार है, ब्राह्मण-चाण्डाल, स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध सभीको भक्तिके द्वारा भगवान्के परमधामकी प्राप्ति सम्भव है। भगवान्का आश्रय देनेवाले अन्त्यज, स्त्री, वैश्य, शूद्र—सभी उत्तम गतिके अधिकारी हैं (गीता ९। ३२)। भक्तिमें जाति, विद्या, रूप, कुल, धन और क्रियाका भेद नहीं है (नारद-सूत्र ७२)। निन्दित योनितक सबका भक्तिमें अधिकार है (शाण्डिल्य-सूत्र ७८)। सभी देश और सभी जातिके मनुष्य भक्ति कर सकते हैं, क्योंकि भगवान् सबके हैं। चाण्डाल, पुक्कस आदि यदि हरि-चरण-सेवी हैं तो वे भी पूजनीय हैं (पद्मपुराण, स्वर्ग० २४। १०)।
६०—भक्तिसे ही जीवन सफल हो सकता है, जो भगवान्से विमुख हैं वे लोहारकी धौंकनीके समान व्यर्थ साँस लेकर जीते हैं (भागवत १०। ८७। १७)। ऐसे लोगोंको घर-सन्तान, धन और सम्बन्धियोंको अनिच्छासे त्यागकर नीच योनियोंमें जाना पड़ता है (भागवत ११। ५। १८)।
६१—भक्तका कभी नाश नहीं होता (गीता ९। ३१)। सब प्राणियोंका निवासस्थान समझकर भगवान्की भक्ति करनेवाला भक्त मृत्युको तुच्छातितुच्छ समझकर उसके सिरपर पैर रखकर (वैकुण्ठमें) चला जाता है (भागवत १०। ८७। २७)।
६२—भक्ति परमशान्ति और परमानन्दरूपा है। इसके साधनमें भी आनन्द है। परमात्माका सहारा होनेसे गिरनेका भी भय नहीं है। सच्चे सुखको पानेके लिये आजतक भक्तिके समान कोई भी साधन दुनियामें और नहीं मिला। अतएव भक्ति ही करनी चाहिये। यही एकमात्र अवलम्बन है।
भक्त ही संसारसे तरता है और सब लोगोंको तारता है
(नारद-भक्ति-सूत्र ५०)।