बुद्धिवाद और भक्ति

इस स्थूल बुद्धिवादके अतिशय विस्तारकालमें बुद्धिवादके विरुद्ध कुछ कहना अवश्य ही बुद्धिकी मन्दता समझी जायगी, परंतु अपने विचार—अपनी मन्दातिमन्द बुद्धिके अनुभूत विचार, जिनका भक्तिमार्गसे घनिष्ठ सम्बन्ध है, केवल भक्ति प्रेमी पाठक-पाठिकाओंके सम्मुख उपस्थित कर देना कर्तव्य समझकर ही यह साहस किया गया है। बुद्धिवादके विरोधका अर्थ बुद्धिका सर्वथा विरोध नहीं समझना चाहिये। भगवद्भक्तिमें जिस बुद्धिकी आवश्यकता है, उस बुद्धिका व्यवहार करना ही बुद्धिमानी है, परंतु जहाँ बुद्धिके अनर्थक विस्तारसे अन्त:करणमें विपरीत भाव प्रादुर्भूत होकर सत्त्वमुखी श्रद्धाके स्रोतको सुखाने लगें, वहाँ बुद्धिमान् भक्तोंके लिये वैसी बुद्धिको नतमस्तक होकर नमस्कार करके श्रद्धादेवीका आश्रय ग्रहण करना ही सर्वथा श्रेयस्कर होता है। स्थूल बुद्धिवादसे मेरा मतलब यहाँ तर्कसे है। भक्तिमें तर्क एक बहुत बड़ी बाधा है। जितना अन्ध श्रद्धासे गिरनेका भय है, परमार्थके मार्गमें उससे कहीं अधिक भय अतिरिक्त तर्कशीलतासे है। तार्किक मनुष्य बालकी खाल खींचनेमें ही जीवनका अमूल्य समय पूरा कर देते हैं, वह परमार्थके किसी भी पथपर आरूढ़ नहीं रह सकते। परंतु श्रद्धालु यात्री उतने ही समयमें अपने लक्ष्यस्थानका बहुत-सा रास्ता तय कर लेते हैं।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि एक आमके बगीचेमें दो मनुष्य गये, वहाँ पहुँचनेपर एक तो बगीचेकी जमीन नापकर और पेड़ गिनकर उसके मूल्यका अनुमान लगाने लगा और दूसरा मालीकी आज्ञासे एक जगह बैठकर चुपचाप चुने हुए आम खाने लगा। बतलाइये, इन दोनोंमें बुद्धिमान् कौन है, पेड़ गिननेवाला या आम खानेवाला? उत्तर मिलता है कि आम खानेवाला ही बुद्धिमान् है; क्योंकि वही सारग्राही है और तृप्ति भी उसीकी होती है। इसी प्रकार श्रद्धापूर्वक भगवान‍्का भजन करनेसे ही मनुष्यको यथार्थ आनन्द-लाभ होता है। शास्त्रोंके अनवरत अध्ययन करनेसे, शास्त्रोंकी शाब्दिक परीक्षाओंमें स्थूल बुद्धिबलके द्वारा उत्तीर्ण होनेसे या तर्कजालमें फँसाकर सीधे-सादे भले आदमियोंको बादमें परास्त करनेसे यथार्थ सत्यकी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। सत्यका अनुसन्धान जिस सूक्ष्मबुद्धिसे होता है, वह तर्कसे कदापि नहीं मिलती, उसकी प्राप्ति तो निर्मल हृदयकी सात्त्विकी श्रद्धा और भगवत्-शरणागतिसे ही होती है; क्योंकि वह ईश्वरीय बुद्धि ईश्वर-कृपासे ही मिलती है। भगवान‍्के द्वारा यह बुद्धि किसीको मिलती है, सो भगवान‍्के ही शब्दोंमें सुनिये—

मच्चित्ता मद‍्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

(गीता १०। ९-१०)

‘जो लोग मुझमें ही अपना चित्त लगाये रखते हैं, मुझको ही अपना जीवन अर्पण कर देते हैं, नित्य परस्पर समझते और समझाते हुए मेरी ही चर्चा करते हैं, उसीमें संतुष्ट रहते हैं और मेरे ही प्रेममें रमते हैं, उन निरन्तर मुझमें लगे हुए प्रेमपूर्ण हृदयसे मुझे भजनेवाले भक्तोंको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ, जिसके बलसे वे मुझे अनायास ही प्राप्त होते हैं।’

हमलोगोंको वास्तवमें इसी बुद्धियोगकी प्राप्ति करनी चाहिये। यही सर्वोच्च कला और सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है; क्योंकि इसके बिना हम यथार्थ सत्यको कभी उपलब्ध नहीं कर सकते। यथार्थ सत्यकी उपलब्धिके बिना परम सुख कदापि नहीं मिल सकता। संसारके कला-कौशल और जड-वैज्ञानिक आविष्कारोंके विस्तारसे हम अपनी इहलौकिक सुख-समृद्धिकी कितनी ही वृद्धि क्यों न समझ लें, परंतु मरणशील जीवनमें उस सुखका मूल्य ही क्या है? मृत्यु निश्चित है और मृत्युके साथ ही यहाँकी सारी सुख-समृद्धि तत्काल स्वप्नवत् विलीन हो जाती है। उस समय जो भयानक मर्मवेदना होती है, उस मृत्युयन्त्रणासे हमें यहाँका कोई भी कला-कौशल या विज्ञान कभी नहीं बचा सकता। एक महात्माने एक दृष्टान्त कहा था कि—

एक समय कई कलाओंमें कुशल एक नवशिक्षित बाबू नावमें बैठकर नदी पार कर रहे थे। उन्होंने सुनील आकाशकी ओर देखकर केवटसे कहा, ‘भाई! तुम ज्योतिष पढ़े हो?’ उसने कहा, ‘नहीं, मैंने तो कभी नाम भी नहीं सुना।’ बाबूने कहा, ‘तब तो तुम्हारे जीवनका एक चौथाई भाग यों ही गया।’ कुछ देर बाद नदीतटके सुन्दर सुहावने हरे-भरे खेतों और वृक्षोंको देखकर प्रफुल्लित मनसे बाबूने फिर पूछा, ‘क्यों भाई केवट! तुमने वनस्पति-विद्या पढ़ी या नहीं?’ उसने कहा, ‘नहीं!’ बाबूने कहा, ‘तब तो तुम्हारा आधा जीवन व्यर्थ गया।’ कुछ समय पश्चात् नदीकी वेगवती धाराओंको देखकर बाबू फिर कहने लगे, ‘अच्छा, तुम गणितशास्त्र तो पढ़े ही होगे?’ केवटने कहा, ‘बाबूजी! मैं तो कोई शास्त्र नहीं पढ़ा, नदीमें नाव चलाकर अपना पेट भरता हूँ।’ बाबूने उसे नितान्त मूर्ख समझकर घृणासे कहा, ‘तुम मूर्खोंको इन विद्याओंका क्या पता? तुम्हारे जीवनके तीन भाग यों ही नष्ट हो चुके।’ इस तरह बातचीत हो रही थी कि अकस्मात् तूफान आ गया, नदीकी तरंगें उछल-उछलकर आसमानसे बातें करने लगीं, नैया डगमगाने लगी, देखते-देखते नावमें पानी भर आया, केवट तुरंत जलमें कूद पड़ा और तैरने लगा। बाबू घबड़ाये, इच्छा न होनेपर भी उनके मुखसे ‘भगवान्! बचाओ’ ये शब्द निकल ही गये! केवटने तैरते हुए पूछा, ‘बाबूजी! क्या आप तैरना नहीं जानते?’ बाबूने कहा, ‘नहीं!’ केवटने सहानुभूतिके साथ कहा, ‘बाबू! तब तो गजब हो गया, आपका सारा ही जीवन नष्ट हुआ, भगवान‍्को याद कीजिये।’

सारांश यह कि सब विद्याओंमें निपुण होनेपर भी जैसे तैरना न जाननेसे मनुष्यको नदीगर्भमें डूबना पड़ता है वैसे ही संसारकी कोई भी कला या शिक्षा हमें इस दु:खसागरसे यथार्थमें कभी नहीं बचा सकती। अतएव उनका अभिमान करना व्यर्थ और मूर्खतामात्र है। जिस कलाके अभ्याससे हम इस अगाध भवसागरसे तरकर पाप-ताप, शोक-सन्देह और रोग-मृत्युके प्रबल बन्धनसे सदाके लिये छुटकारा पा सकते हैं, उसी कलाको सीखना मनुष्य-जीवनका ध्येय है और वह कला तर्कसे कभी मिल नहीं सकती। इसी कलाका नाम सात्त्विकी बुद्धि या श्रद्धा-भक्ति है। इसीसे मनुष्य सत्यके यथार्थ स्वरूपको या परमात्माके तत्त्वको भलीभाँति जानकर दु:खोंसे छूट सकता है।

केवल तर्क या कोरे बुद्धिबलसे परमात्माकी भक्तिमें मन नहीं लग सकता। वास्तवमें तर्ककी कसौटीपर कसी जानेलायक यह वस्तु भी नहीं है। पूज्यवर महात्मा गाँधीजीने ‘कल्याण’ में श्रीराम-नामके प्रभावपर लिखते समय लिखा था कि.......‘नाम-महिमा बुद्धिवादसे सिद्ध नहीं हो सकती, श्रद्धासे अनुभवसाध्य है।’ बात भी यही है। विचार करना चाहिये कि जब नाम-महिमा भी बुद्धिके द्वारा अतर्क्य है, तब उस परमात्माको, जिसकी मायासे सारा जगत् कुछ-का-कुछ दीखता है, बुद्धि या तर्कके बलपर जान लेनेकी इच्छा करना या ऐसा सम्भव समझना केवल हास्यास्पद ही है। किसीके तर्कसे ईश्वरकी सिद्धि न होनेपर ईश्वरके अस्तित्वमें कोई बाधा नहीं आ सकती। विलास-विभ्रमरत, मोह-आवृत जीव चाहे जितना ही परमात्माका खण्डन किया करे, अपने बुद्धिबलका अभिमान कर कितना ही बकवाद किया करे, परमात्माकी सत्ता और स्थितिमें कभी कोई अन्तर नहीं आता—अवश्य ही वह बुद्धिबलका अभिमानी माया-विलास-मोहित मनुष्य परम सत्यकी प्राप्तिसे बहुत दूर चला जाता है। परमात्माकी सिद्धि करने जाना तो एक प्रकारका पागलपन है। परंतु पद-पदपर प्रत्यक्ष सिद्ध परमात्माको असिद्ध समझनेवाले मनुष्यको समझानेकी चेष्टा करनेसे भी कोई लाभ नहीं होता। ऐसे मनुष्यके सामने यदि परमात्मा स्वयं व्यक्तरूपसे भी प्रकट हो जायँ तो भी वह विश्वास नहीं करेगा। धृतराष्ट्रकी राजसभामें भगवान् श्रीकृष्णने जब आश्चर्यमय विराट्स्वरूप दिखलाकर सबको मन्त्रमुग्धकी भाँति चकित कर दिया था, तब भी दुर्योधनने असूयावश उनपर अविश्वास ही किया। इसके सिवा परमात्माको तार्किकोंके सामने प्रकट होकर उनसे अपनी सिद्धि करानेकी आवश्यकता भी नहीं है। जो श्रद्धापूर्वक सरल विश्वासके साथ परमात्माके भजनमें संलग्न रहता है, उसीको परमात्माकी कृपासे उनके तत्त्वका साक्षात्कार होता है—‘सो जानइ जेहि देहु जनाई।’

आजकलके तार्किक और अविश्वासी पुरुष भक्तराज प्रह्लाद, ध्रुव आदिसे लेकर गोस्वामी तुलसीदासजी, सूरदासजी, मीरा आदि भक्तोंके भगवत् -साक्षात्कार होनेकी घटनाओंको कल्पित बतलाते हैं। उन लोगोंकी दृष्टिमें यह सब कवियोंकी अस्वाभाविक कल्पना या भक्तोंके अनुगामी पुरुषोंकी रचनामात्र है। उन लोगोंके लिये है भी ऐसी ही बात। ईश्वरकी सत्ता बड़े-बड़े संत-महात्माओंकी दीर्घकाल तपस्याके बलसे सर्वथा अनुभूत और सिद्ध है, पर ईश्वर अविश्वासी पुरुषोंके सम्मुख अपनी सिद्धिके लिये नहीं आते। इसलिये जो लोग उन्हें नहीं मानते, उनके लिये उनको प्राप्त करना भी असम्भव ही है। परंतु इससे यह नहीं मानना चाहिये कि ईश्वरके अविश्वासी लोग ईश्वरीय नियमोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। ईश्वरकी आज्ञासे प्रकृति उन्हें कर्मोंका अच्छा-बुरा फल अवश्य भुगताती है, जो उन्हें हजार अनिच्छा होनेपर भी बाध्य होकर भोगना पड़ता है। हाँ, ईश्वरकी सत्ता न माननेसे ईश्वरका भय अवश्य ही जाता रहता है, जो मनुष्यको पापमें लगानेके लिये प्रधान हेतु होता है। जिनको ईश्वरके दण्डका भय नहीं होता, वे किसी प्रकारके पापकर्मसे भी नहीं हिचकते।

मनुष्य प्रधानत: पाँच भयके हेतुओंसे पापसे बचता है—(१) ईश्वरका भय, (२) धर्मका भय, (३) समाजका भय, (४) शासनका भय और (५) शरीरका भय। व्यभिचार करनेसे ईश्वर नाराज होंगे, धर्मका नाश होगा, समाजमें बदनामी होगी या समाज च्युत कर देगा, राजदण्ड मिलेगा और स्वास्थ्य नष्ट हो जायगा। इसीसे मनुष्य व्यभिचारसे बचता है। इन पाँचोंमेंसे प्रथमोक्त दो हेतु सर्वप्रधान हैं; क्योंकि मानसिक घोर पापोंसे बचना इन्हींके कारणसे होता है। किसी कार्यके करनेमें जब मनुष्य यह समझता है कि मेरे इस कार्यको सर्वव्यापी अन्तर्यामी ईश्वर देखता है या इस कार्यसे मेरे धर्मका नाश हो जायगा, तो वह उससे अवश्य बचता है। परंतु जब ये दोनों हेतु मनसे हट जाते हैं, तब उसे मानसिक पापके लिये तो कोई रुकावट रह ही नहीं जाती। शारीरिक या वाणीके पाप करनेमें भी, उपर्युक्त दोनों हेतुओंके मिट जानेसे सहायता मिलती है। ईश्वर और धर्मका भय करनेवाला मनुष्य शासकोंके और समाजके सामने निर्दोष सिद्ध होनेपर भी मनमें अपनेको अपराधी ही मानता है। ऐसी बहुत घटनाएँ होती हैं, जिनका यथार्थ स्वरूप राज्य या समाजके सामने नहीं आता, यदि राज्य या समाजको किसीपर सन्देह भी हो जाता है तो भी वह पूरे प्रत्यक्ष प्रमाण न मिलनेके कारण दण्डका पात्र नहीं समझा जाता, इसीसे ईश्वर और धर्मसे न डरनेवाले पापात्मा मनुष्य अपनेको कानूनसे बचाकर या प्रमाणोंके आधारको नष्ट कर पापकर्म किया करते हैं। राज्य या समाजका भय उनके पापोंको पूर्णरूपसे रोकनेमें समर्थ नहीं होता। यही कारण है कि वर्तमान संसारमें—जहाँ अपराधोंको रोकनेके लिये नित्य नये-नये कानून बनाये जाते हैं, कानूनोंसे बचकर अपराध करनेकी प्रवृत्ति और अपराधोंकी संख्या भी बड़े वेगसे बढ़ती जा रही है। इसका प्रधान कारण यही है कि ईश्वर और धर्मका भय बहुत कुछ नष्ट हो गया, इसीसे हमारा जीवन उच्छृंखल, स्वेच्छाचारी और पातकमय बन गया है। कानूनोंके नये-नये विधानोंसे आज सिद्धहस्त अपराधी तो अपने कौशलसे बच जाते हैं और अपना पक्ष समर्थन करनेमें असमर्थ, निर्दोषता प्रमाणित करनेमें अशक्य, दाँव-पेचको न जाननेवाले सीधे-सादे निरपराध नर-नारी कष्ट भोगते हैं। जिससे आगे चलकर परिस्थितिकी परवशतासे उन्हें भी अपराध-प्रवृत्तिका शिकार होना पड़ता है। खेद है कि वर्तमान संसारकी गति इसी ओर हो रही है। ईश्वर और धर्मका भय न रहनेसे ही आज अपनेको आस्तिक और ईश्वरको माननेवाला प्रसिद्ध करनेवाले लोग भी मन्दिरोंमें भगवान‍्की मूर्तिके सामने स्त्रियोंकी ओर बुरी दृष्टिसे देखकर पापवृत्तिका पोषण करते हैं। आचार्य, उपदेशक और धर्मनेताका स्वाँग धारणकर पाखंडी लोग ईश्वरके नामपर लोगोंको ठगते हैं, देश या समाज-सेवकका बाना धारणकर व्यक्तिगत लाभके लिये छिपकर देश या समाजके हितपर कुठार चलाते हैं। यह सारा व्यापार ईश्वर और धर्मका भय क्रमश: नष्ट होते रहनेसे विस्तारको प्राप्त हो रहा है। स्वास्थ्यके भयसे अलबत्ता कुछ लोग पापोंसे बचते हैं। परंतु प्रथम तो सभी पाप ऐसे नहीं होते, जिनमें स्वास्थ्यनाशका पूरा भय हो, दूसरे मनुष्य इस भयसे अपनेको किसी अंशमें बचानेका प्रयास भी कर सकता है।

यह सच्ची बात है कि ईश्वर और धर्मके नामपर पाखंड बहुत बढ़ जाने तथा यथार्थ ईश्वरप्रेमी और धर्मात्माओंकी संख्या घट जानेसे भी ईश्वरविहीन शुष्क बुद्धिवादकी उत्पत्ति और उसके विस्तारमें बड़ा सहारा मिला है, तथापि यह अवश्य मानना चाहिये कि इस बुद्धिवादसे संसार यथार्थ सत्यको कभी नहीं पा सकता। इससे सच्चे मनुष्योंके मनसे रहा-सहा श्रद्धाका भाव भी क्रमश: नष्ट होता जायगा, जिससे चारों ओर उच्छृंखलता और भी बढ़ जायगी।

यह भी सच्ची बात है कि केवल अन्धश्रद्धाके बलपर स्थित रहनेवाला धर्म सदा स्थायी नहीं होता, परंतु यहाँ यह बात नहीं है, भारतीय ऋषियोंका यह अनादि ईश्वरीय धर्म जिसमें जगत‍्के समस्त धर्मोंका बड़े सहजमें समन्वय हो सकता है—वैसा खोखला या निराधार नहीं है। परमशुद्ध बुद्धिसे ही इस धर्मका परम तत्त्व पहचाननेमें आता है; परंतु वह परम शुद्ध बुद्धि केवल तर्कसे नहीं मिल सकती। वह मिलती है दीर्घकालीन ईश्वरोपासनासे। यथार्थ ईश्वरोपासना श्रद्धाके अभावमें कभी सम्भव नहीं होती। शास्त्रोंका अध्ययन न हो, शास्त्रज्ञान न हो, केवल सात्त्विकी श्रद्धासे ही ईश्वरकी पूजा हो सकती है। इसीलिये ईश्वरकी भक्तिके वे सभी स्त्री-पुरुष अधिकारी माने गये हैं, जो जाति, वर्ण, विद्या, धन, बल, रूप, यश और पुण्य आदिमें नितान्त नीच होनेपर भी परम श्रद्धासे केवल परमात्माको ही अपना हृदय-सर्वस्व समझकर उसकी एकान्त भक्ति करते हों। इसीलिये प्रह्लादने कहा है—

विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-

पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम्।

मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ-

प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमान:॥

(श्रीमद्भा० ७। ९। १०)

‘बारह प्रकारके गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी भगवान् पद्मनाभके चरणकमलसे विमुख है तो उसकी अपेक्षा वह चाण्डाल श्रेष्ठ है जिसके मन, धन, वचन, कर्म और प्राण परमात्माको अर्पित हैं, क्योंकि वह भक्त चाण्डाल अपनी भक्तिके प्रतापसे अपने सारे कुलको पवित्र कर सकता है, परंतु वह बहुत मानवाला भक्तिहीन ब्राह्मण ऐसा नहीं कर सकता।’

जो ऊँची श्रद्धासे भगवान‍्को भजता है, उसीको भगवान् मिलते हैं—भगवद्वाक्योंसे भी यही प्रमाणित होता है—

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता:॥

(गीता १२। २)

‘जो भक्तजन मुझ (भगवान्)-में मनको एकाग्र करके नित्य भजनमें लगे रहकर, परम श्रद्धाके साथ मुझे भजते हैं, मैं उन्हें सर्वोत्तम योगी मानता हूँ’ भक्तियोगके इसी अध्यायका अन्तिम मन्त्र है। भगवान् कहते हैं—

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।

श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रिया:॥

(गीता १२। २०)

‘जो श्रद्धासम्पन्न पुरुष मुझ (भगवान्)-में परायण होकर इस उपर्युक्त धर्म्यामृतका भलीभाँति सेवन करते हैं अर्थात् भक्तिके बतलाये हुए लक्षणोंद्वारा श्रद्धासे मेरी उपासना करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।’

उपर्युक्त विवेचनसे यह सिद्ध होता है कि श्रद्धाके बिना उपासना नहीं होती, उपासना बिना भगवत् -कृपाका अनुभव नहीं होता, भगवत्कृपा बिना यथार्थ सत्य या परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती और परमात्माकी प्राप्ति बिना दु:खोंसे सदाके लिये छुटकारा नहीं मिलता।

अतएव हम सबको चाहिये कि तर्क-जालसे सर्वथा बचकर भक्ति-शास्त्रके अनुसार आचरणोंसे श्रद्धा अर्जन करें और उस श्रद्धाको बढ़ाते हुए परमोच्च श्रद्धाके रूपमें परिणत कर उसके द्वारा परमात्माकी सच्ची उपासना करें, जिससे हमलोगोंको मनुष्य-जीवनके परम ध्येय परमात्माकी शीघ्र प्राप्ति हो।

जीवन बहुत थोड़ा है, गया हुआ समय फिर नहीं आता, अत: शीघ्र सावधान होना चाहिये।