चार प्रश्न

मेरे एक मित्रने चार प्रश्न किये हैं। प्रश्न बड़े मार्मिक हैं। ऐसे प्रश्नोंका उत्तर वास्तवमें अनुभवी पुरुष ही दे सकते हैं, मुझ-जैसा प्राणी क्या कह सकता है; परंतु मित्र महोदयने मुझसे ही उत्तर चाहा है, इसलिये बड़ी ही नम्रताके साथ मैं संक्षेपमें इन विषयोंपर कुछ लिख रहा हूँ। अनुभवी और विद्वान् महानुभाव इस धृष्टताके लिये क्षमा करें और भूल-चूक सुधारकर अनुगृहीत करें। प्रश्न ये हैं—

१—भगवान‍्की शरण प्राप्त होनेके लिये प्रतिदिन जो नियमित प्रार्थना की जानी चाहिये, उस प्रार्थनाका स्वरूप क्या है तथा वह किस विधिसे करनी चाहिये?

२—भगवान‍्की अपरिमित शक्ति और प्रभावका स्पष्ट सुविस्तृत वर्णन कीजिये?

३—भगवान‍्का सर्वव्यापी भाव किस प्रकार हृद‍्गत हो सकता है? मनुष्य चराचर विश्वमें विश्वात्माकी भावना कैसे करे? नयनाभिराम प्यारे रामको आरामके प्रत्येक पत्र, पुष्प और कलियोंमें किस साधनसे देखने लगे?

४—ऐसा एक भी क्षण न बीतना चाहिये, जिसमें प्रियतमका स्मरण न हो, इस प्रकारकी स्थितिका साधन क्या है?

क्रमसे इनके उत्तर निम्नलिखित हैं—

(१) शरण-प्राप्तिके लिये प्रार्थना

भक्तोंके लिये भगवान‍्की शरण प्राप्त कर लेना ही परम ध्येय है, प्रभुके चरणोंमें सब प्रकारसे अपनेको समर्पण कर भक्त नित्य निर्भय और सर्वथा निश्चिन्त हो जाते हैं; इससे परे वे अपना कोई भी कर्तव्य नहीं समझते। वे भगवान‍्के हाथका यन्त्र बनकर संसारमें नि:स्पृह और निर्द्वन्द्व होकर विचरा करते हैं; उन्हें गति-अगति, स्वर्ग-नरक, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु, लोक-परलोक, त्याग-भोग आदिकी कुछ भी परवा नहीं होती; वे किसी बातकी चिन्ता और किसी अन्य विषयका मुख्यरूपसे कभी चिन्तन नहीं करते; उनका चित्त परमात्माके चिन्तनमें संलग्न रहता है, वे परमात्माके प्रत्येक विधानमें संतुष्ट रहते हैं, उनकी प्रत्येक चेष्टा परमात्माके इच्छानुकूल होती है, वे कामनाशून्य हो जाते हैं, उनका मन परमात्माके मनमें और उनकी बुद्धि परमात्माकी बुद्धिमें विलीन हो जाती है। इस स्थितिको मनुष्य अपने पुरुषार्थ या साधनके बलसे कभी नहीं पा सकता। मन-वाणीकी समस्त क्रियाएँ परमात्माकी इच्छासे अनुकूल करनेकी चेष्टा प्राणपणसे करते रहनेपर भी शरणागतिका साधक उन क्रियाओंका आश्रय नहीं लेता। कारण, किसी भी क्रिया या साधनसे भगवत् -शरणकी प्राप्ति नहीं होती, भगवान‍्की शरण तो केवल भगवत्कृपासे ही प्राप्त होती है। यद्यपि भगवत्कृपा सब जीवोंपर सदा-सर्वदा समानरूपसे है, उसमें विषमता नहीं है, परंतु उससे पूरा लाभ उठानेके लिये उसको पहचाननेकी आवश्यकता होती है। भगवत्कृपाकी पहचान—सच्ची पहचान—भगवान‍्की आर्त प्रार्थनासे होती है। इसलिये प्रार्थना मनुष्यके जीवनका एक परम आवश्यक कर्तव्य होना चाहिये। प्रार्थनासे बड़े-बड़े असाध्य कार्य साध्य बन जाते हैं, सारी कठिनाइयाँ आसानीसे दूर हो जाती हैं। भगवान‍्ने स्वयं घोषणा की है—

मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

(गीता १८। ५८)

‘मुझमें चित्त लगानेपर मेरी कृपासे सारी कठिनाइयोंसे तू आप ही तर जायगा, अतएव प्रार्थनाका अर्थ है भगवान‍्में चित्त जोड़ना, प्रतिदिन नियत समयपर भगवान‍्के गुणगान करना, अपने दिलको खोलकर भगवान‍्के सामने रखना, अपनी टूटी-फूटी भाषामें या केवल मूक रहकर ही उनकी कृपा-भिक्षा चाहना। प्रार्थनामें सबसे अधिक आवश्यकता है सच्चे और साफ दिलकी, इसमें दम्भको बिलकुल ही स्थान नहीं है, दम्भहीन चित्तसे की हुई आर्त प्रार्थनाका उत्तर बहुत ही शीघ्र मिलता है। जिन्हें सुन्दर श्लोक या पद न आते हों उन्हें प्रार्थनाके लिये उनकी आवश्यकता नहीं है। परमात्माके सामने मनुष्यमात्र अपनी भाषामें अपना भाव प्रकट कर सकते हैं। संत-भक्तोंके या सत्-शास्त्रोंके करुणोत्पादक श्लोक और भजन याद हों तथा सुरीले स्वरोंसे तच्चित्त होकर गाये जायँ तो उनसे भी बहुत लाभ होता है। एक घंटेकी प्रार्थनामें साधारणत: चार भाग किये जा सकते हैं—

१५ मिनट—स्तुति-गान (श्लोक-पद आदि)।

१५ मिनट—ध्यान।

१५ मिनट—अपनी भाषामें अपने मनकी बात भगवान‍्के प्रति कहना और उनकी कृपाभिक्षा चाहना या केवल मूक रहकर मन-ही-मन प्रार्थना करना।

१५ मिनट—नामकीर्तन करना या गीता, भागवत, रामायण आदिके किसी करुणोत्पादक प्रसंगको पढ़ना।

प्रार्थनाका समय और स्थान जहाँतक हो, एक नियत होना चाहिये। स्थान एकान्त हो और समय भी ऐसा हो जिसमें दूसरे कामके लिये कुछ भी सोचने या बीचमें उठनेका प्रयोजन न रहे। सुभीता हो तो एकान्तमें आधी रातके बादका समय अच्छा रहता है। प्रार्थनाके समय चित्तमें सरलता और आर्तता अवश्य रहनी चाहिये। ऊपर लिखी चारों बातोंका क्रम ठीक-ठीक न रहे तो भी कोई आपत्ति नहीं; प्रार्थनाके समय ऐसा निश्चय अवश्य होना चाहिये कि ‘भगवान् साक्षात् यहाँपर मौजूद हैं और मैं अपनी प्रत्येक क्रिया उनके सामने कर रहा हूँ। उन परम दयालुकी मुझपर बड़ी भारी दया है। वे शीघ्र ही मुझे अपनी शरणमें अवश्य ले लेंगे। उनकी शरण प्राप्त होते ही मैं सदाके लिये पूर्ण निर्भय और निश्चिन्त होऊँगा।’ मेरे विश्वासके अनुसार ऐसी नियमित प्रार्थनासे बहुत ही थोड़े कालमें भगवत्-शरण प्राप्त करके मनुष्य कृतार्थ हो सकता है।

(२) भगवान‍्की अपरिमित शक्ति और प्रभाव

भगवान‍्के स्वरूप, उनकी अपरिमित शक्ति और उनके प्रभावका यथार्थ वर्णन न कोई आजतक कर सका है, न कर सकता है और न कर सकेगा। भगवान‍्के स्वरूप, प्रभाव और उनकी शक्तिको वे आप ही जानते हैं। जगत‍्में वेद, शास्त्र और संतोंद्वारा अबतक भगवान‍्का जितना वर्णन हुआ है, वह सारा-का-सारा एक जगह मिला लिया जाय तो भी उससे भगवान‍्के स्वरूपका यथार्थ और पूरा वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि उनका पूरा ज्ञान बुद्धिके बलपर किसीको हो ही नहीं सकता, जो संत-महात्मा भगवान‍्की कृपासे, श्रद्धाबलसे भगवान‍्के रहस्यको कुछ जानते हैं, वे भी वाणीसे उसका वर्णन नहीं कर सकते। जब वेद ‘नेति-नेति’ कहकर हार मान जाते हैं, तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? पुष्पदन्ताचार्यने क्या ही सुन्दर कहा है—

असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे

सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी।

लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं

तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥

‘समुद्रकी दावात हो, उसमें कज्जलगिरिकी स्याही बनाकर भरी जाय, कल्पवृक्षकी शाखा कलम बने, पृथ्वीका कागज बनाया जाय और सरस्वती निरन्तर लिखती रहें, तो भी हे प्रभो! आपके गुणोंका पार नहीं आता।’

समुद्रके जलकण गिने जा सकते हैं, आकाशका विस्तार नापा जा सकता है; परंतु परमात्माके प्रभाव, रहस्य और स्वरूपका वर्णन नहीं किया जा सकता। यह समस्त जगत् परमात्माकी मायाके एक अंशमें स्थित है—‘एकांशेन स्थितो जगत् ।’ फिर इस जगत‍्में उत्पन्न एक साधारण प्राणी जगत‍्के अधिष्ठान परमात्माका पूरा और यथार्थ वर्णन कैसे कर सकता है? तथापि अपने-अपने जीवन और अपनी-अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये संत-महात्मा भगवान‍्का गुणगान गाते ही जीवन बिताया करते हैं, क्योंकि उनके गुण ऐसे ही हैं। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, आकाश, वायु, समुद्र, अग्नि, जल आदि निरन्तर परमात्माकी महिमाका ही तो गान कर रहे हैं। यह सृष्टि-वैचित्र्य उन्हींका तो प्रभाव बतला रहा है। यह भीषण संहारलीला परमात्माकी शक्तिका ही तो परिचय दे रही है। चराचर प्राणियोंकी प्रत्येक चेष्टा सतत उस परमात्माका ही तो गुण गा रही है। सारे ब्रह्माण्डमें उन्हींका तो स्वरूप प्रस्फुटित हो रहा है। अनादिकालसे अबतकका इतिहास उन्हींकी शक्तिके एक परमाणुका ही तो इतिहास है। फिर उनकी महिमा कौन बतावे? उनके प्रभावका वर्णन कैसे हो? स्वयं अपना प्रभाव बतलाते हुए गीतामें अर्जुनके प्रति श्रीभगवान् कहते हैं—

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित:॥ ९॥ ४॥

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।

भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:॥ ९॥ ५॥

यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान्।

तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥ ९॥ ६॥

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन:।

भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ९॥ ८॥

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय।

उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥ ९॥ ९॥

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह:।

वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च॥ ९॥ १७॥

गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुहृत् ।

प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥ ९॥ १८॥

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।

तस्य कर्तारमपि मां विद्धॺकर्तारमव्ययम्॥ ४॥ १३॥

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु:।

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥ ५॥ १४॥

मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनंजय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥ ७॥ ७॥

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ ७॥ १४॥

न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय:।

अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश:॥ १०॥ २॥

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥१०॥४२॥

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।

शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ १४॥ २७॥

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो

मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो

वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥ १५॥ १५॥

यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।

स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥ १५॥ १९॥

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ १८॥ ६५॥

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥ १८॥ ६६॥

‘हे अर्जुन! मेरे अव्यक्तस्वरूपसे यह सारा जगत् (जलसे बर्फकी भाँति) परिपूर्ण है, समस्त भूत मेरे अंदर (मेरे संकल्पके आधारपर) स्थित हैं, (अतएव वस्तुत:) मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ और (असलमें) वे सब भूत भी मेरे अंदर स्थित नहीं हैं, (यह तो मेरा प्रभाव है) तू मेरे इस योगके प्रभावको देख कि भूतोंका धारण-पोषण करनेवाला और भूतोंको उत्पन्न करनेवाला मेरा आत्मा (वस्तुत:) भूतोंमें स्थित नहीं है। जैसे (आकाशसे उत्पन्न) सर्वत्र विचरण करनेवाला महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित है, वैसे ही (मेरे संकल्पसे उत्पन्न होनेके कारण ये) समस्त भूत भी मुझमें स्थित हैं, ऐसा जानना चाहिये। (मैं ही) अपनी त्रिगुणमयी मायाको लेकर बलात् प्रकृतिके अधीन हुए इन समस्त भूतोंको पुन:-पुन: (इनके कर्मानुसार) रचता हूँ। (यह सारा रचना-कार्य करनेपर भी) हे अर्जुन! कर्मोंमें आसक्तिरहित और उदासीनवत् स्थित मुझ परमात्माको कर्म बाँध नहीं सकते। इस सम्पूर्ण जगत‍्का अधिष्ठाता और कर्म-फल-दाता एवं पिता-माता-पितामह (सब कुछ) तथा जाननेयोग्य पवित्र ओंकार, ऋक्, साम और यजुर्वेद, सबकी गति, सबका भरण-पोषण करनेवाला, सबका प्रभु, सबका (नित्य) साक्षी, सबका निवासस्थान, सबका शरण्य, सबका सुहृद्, सबका उत्पादक, सबका संहारक, सबको अपने अंदर समा लेनेवाला खजाना और सबका अविनाशी बीज मैं ही हूँ। गुण-कर्मोंके विभागसे चारों वर्ण मैंने ही रचे हैं, तो भी उनके रचयिता मुझ अव्यय परमात्माको तू अकर्ता ही समझ, (क्योंकि वास्तवमें मैं) प्रभु न तो लोगोंको रचता हूँ और न कर्तापन, कर्म और उनके फल-संयोगको ही रचता हूँ, (मुझ परमात्माकी सत्तासे) प्रकृति ही प्रवृत्त होती है, यानी गुण ही गुणोंमें प्रवृत्त हो रहे हैं। (वास्तवमें तो) हे धनंजय! मेरे अतिरिक्त दूसरी चीज कुछ है ही नहीं, यह सारा जगत् सूतमें (सूतके) मणियोंकी भाँति (एक) मुझमें ही गुँथा हुआ है। (मेरी मायाके वशमें होनेके कारण लोग इस तत्त्वको जानते नहीं) क्योंकि मेरी यह त्रिगुणमयी अलौकिक माया बड़ी ही दुस्तर है, जो पुरुष (केवल) मुझको ही भजते हैं, वे ही इस मायासे पार जाते हैं। मेरे प्राकटॺको न तो देवता जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं; क्योंकि मैं सम्पूर्ण देवों और महर्षियोंका आदिकारण हूँ। (कारणको कार्य कैसे जान सकता है?) अथवा हे अर्जुन! तुझे अधिक जाननेसे प्रयोजन ही क्या है? (तू इतनेहीमें समझ ले कि) मैं ही इस सारे जगत‍्को (अपनी मायाके) एक अंशमात्रसे धारण करके स्थित हूँ, मतलब यह कि जगत् मेरी मायाके एक अंशमें स्थित है। अविनाशी ब्रह्म, अमृत, शाश्वत धर्म और केवल अखण्ड आनन्दका आश्रय मैं ही हूँ। सब प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्यामी और संचालकरूपसे मैं ही स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन होता है, समस्त वेदोंद्वारा जाननेयोग्य (परम तत्त्व) मैं ही हूँ और मैं ही वेदान्तका कर्ता तथा वेदोंका जाननेवाला भी हूँ। हे भारत! इस प्रकार जो मुझको विद्वान् पुरुषोत्तम जानता है, वही समस्त रहस्यका यथार्थ जाननेवाला पुरुष सर्वभावसे मुझे भजता है। (अतएव) तू मुझमें ही दृढ़ताके साथ मनको लगा ले, केवल मेरा ही भक्त हो जा, मेरी ही पूजा करनेवाला हो, मुझको ही नमस्कार कर, फिर तू मुझको ही प्राप्त होगा। यह मैं सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ; क्योंकि तू मुझे (अत्यन्त) प्रिय है। (बस) सब धर्मोंको छोड़कर केवल एक मेरी ही शरण हो जा, मैं तुझे समस्त पापोंसे—बन्धनोंसे आप ही छुड़ा दूँगा। तू शोक न कर।’

ये भगवान‍्के प्रभावको बतलानेवाले श्रीमद्भगवद‍्गीताके कुछ श्लोक हैं। इनके सिवा अन्यान्य असंख्य ग्रन्थोंमें ऐसे अनेक वचन हैं। परन्तु केवल इन भगवद्वाक्योंसे भी उनके यथार्थ स्वरूपका और प्रभावका पता नहीं लगता। गीता बहुत लोग पढ़ते हैं, परन्तु ऐसे कितने हैं जो उनका यथार्थ मर्म समझते हैं, यदि सभी समानभावसे उनका रहस्य समझ जाते तो इतने भाष्य और टीकाएँ लिखी ही नहीं जातीं। भगवान‍्के प्रभावका यत्किंचित् पता उन्हींको लग सकता है जो भगवत्कृपाका आश्रय ग्रहण कर चुके हैं। जिनकी मायिक सृष्टिके एक-एक पदार्थके चमत्कारका तथा जिनकी सृष्टिमें उत्पन्न एक-एक मनुष्यके अद‍्भुत कर्मोंके रहस्यका भी जब पूरा पता सबको नहीं लगता और कोई उनका यथार्थ वर्णन नहीं कर सकता तब मायानटीके अधीश्वर मायातीत सच्चिदानन्दघन परमात्माका प्रभाव और रहस्य कौन जान सकता है? जो वस्तु हमारी बुद्धिद्वारा जाननेमें ही नहीं आती, उसका वर्णन वाणी कैसे करे? अचिन्त्य परमात्माकी अपरिमित शक्ति और प्रभावका वर्णन इतनेसे ही समझ लेना चाहिये कि उनका वर्णन कोई कर नहीं सकता। उन्हींकी कृपासे कभी किसीके कुछ समझमें आता है और जिसकी समझमें आता है, वह फिर कुछ भी कह नहीं सकता। उसका कहना-सुनना सदाके लिये बंद हो जाता है—

(३) भगवान‍्की सर्वव्यापकता

भगवत्कृपासे भगवान‍्के प्रभावका किंचित् पता लगनेपर उनका सर्वव्यापी भाव आप ही हृद‍्गत हो सकता है। भगवान‍्का सर्वव्यापक भाव वाणीसे नहीं कहा जाता, उसके लिये जितने दृष्टान्त दिये जाते हैं उनमें कोई भी ऐसा नहीं है जो पूर्णरूपसे समानता रखता हो। रखे भी कैसे? उस सर्वव्यापी सत्-चित्-आनन्दघन ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’की तुलनाका कोई पदार्थ है ही नहीं। पाँच भूतोंमें चारका आधार आकाश है, अत: व्यापकताके लिये उसीका दृष्टान्त दिया जाता है, कहा जाता है कि जैसे जगत‍्के सब नगर-घर-मकान आकाशमें हैं और सबके ही अंदर आकाश है, इसी प्रकार परमात्मा सर्वव्यापक हैं, परंतु यह दृष्टान्त सर्वथा अपर्याप्त है, क्योंकि आकाश अनित्य है, शून्य है, विनाशी है, इसके विपरीत परमात्मा नित्य हैं, घन हैं और अव्यय हैं। आकाश समष्टि-अहंकारके एक अंशमें है, परंतु परमात्मा उस मायाके भी आधार हैं, जिस मायाके एक अंशमें महत्तत्त्व है और उस महत्तत्त्वके एक अंशमें समष्टि-अहंकार है। स्वप्नके दृष्टान्तसे भी परमात्माका सर्वव्यापक भाव पूरा नहीं घटता। कहा जाता है कि जैसे स्वप्नमें द्रष्टा पुरुष ही अपने संकल्पसे अनेक दृश्य उत्पन्न कर उनके दर्शन करता है; द्रष्टा, दृश्य, दर्शन—तीनोंमें वह एक ही व्याप्त रहता है, इसी प्रकार परमात्मा भी सर्वव्यापक हैं, परंतु यह दृष्टान्त भी अधूरा है। कारण, स्वप्नद्रष्टा पुरुष स्वप्नमें स्वप्नकी सृष्टिको कल्पित नहीं जानता, वह चेतन होनेपर भी वहाँ अज्ञानी है, वह उसे देखकर मोहित होता है, डरता है, हर्षित होता है, नाना प्रकारके भाव-विकारोंमें ग्रस्त होता है; परंतु इसके विपरीत परमात्मा किसी कालमें विकारी नहीं होते; वास्तवमें परमात्मामें कालकी कल्पना भी नहीं है, वे शुद्ध और कालातीत हैं। काल तो मायामें है।

इसी प्रकार अन्यान्य जितने दृष्टान्त हैं वे सभी केवल परमात्माका लक्ष्य करानेवाले हैं। वास्तवमें तो परमात्माको छोड़कर जब अन्य वस्तु ही नहीं, तब उनका सर्वव्यापक भाव भी कहनेको ही है। ‘सर्व’ कोई पृथक् वस्तु हों तो वे ‘सर्व’ में व्यापक हों। वह तो एक ज्ञानस्वरूप, सत्स्वरूप, परम आनन्दस्वरूप पूर्ण ब्रह्म परमात्मा-ही-परमात्मा है। इन परमात्माका ज्ञान भी परमात्मामें ही है। इन परमात्माके आनन्दका बोध भी आनन्दस्वरूपमें ही है। वे परम सत्य, परम नित्य, सनातन, एक, असीम, अनन्त, अपार, अखण्ड और केवल हैं। बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ, द्रष्टा, दर्शन, दृश्य आदि समस्त उनमें आरोपित हैं, एक चेतन ब्रह्म-ही-ब्रह्म है। जिसे संसार कहा जाता है, वह भी वस्तुत: चिन्मय—आनन्दमय परमात्मा ही हैं। सत्-असत् वही परमात्मा हैं। देश, काल भी वही चेतन हैं। ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान भी वही विज्ञानानन्दघन चेतन ही हैं। इस स्थितिमें तो कुछ कहना-सुनना बनता ही नहीं, यह तो अनुभव है। अनुभव भी नहीं कहा जा सकता। कारण, अनुभव भी तो किसी वस्तुका किसीको होता है, यहाँ तो एकके अतिरिक्त दूसरा है ही नहीं,तब किसीका अनुभव किसको हो; इसीसे कहा जाता है, ब्रह्म अनिर्वचनीय और अनिर्देश्य है! जहाँ ब्रह्म हैं, वहाँ वचन और निर्देश नहीं है एवं जिसके लिये वचन और निर्देश हैं, वह ब्रह्म नहीं है। वहाँ नाम-रूपकी कोई भी उपाधि नहीं है। सर्वव्यापक भावका निर्देश वहीं है, जहाँ परमात्मा और विश्वकी अलग-अलग कल्पना है, फिर चाहे वह विश्व परमात्माकी ही अभिव्यक्ति हो और वास्तवमें है भी ऐसा ही। हम विश्वमें जिन सब वस्तुओंको देखते-सुनते हैं, वे सभी भिन्न-भिन्न रूपोंमें एक ही परमात्माका दर्शन कराती हैं। एक ही अविनाशी परमात्मा अनेक रूपोंसे अपना दर्शन देते हैं। हमारी आँखोंपर अज्ञानका पर्दा पड़ा हुआ है, इसीलिये हम उन्हें देखते हुए भी नहीं देखते। सोनेके भाँति-भाँतिके हजारों गहनोंमें एक ही सोना है। गहना सामने आते ही सोना पहले दीखता है, गहना पीछे, परंतु हमें सोना याद नहीं रहता, हम उसे गहना ही समझते हैं, इसी प्रकार जगत‍्की प्रत्येक वस्तुमें परमात्मा ही अधिष्ठानरूपसे विराजित हैं, परमात्माकी सत्तासे ही जगत‍्की सत्ता है, परमात्माके सर्वप्रथम दर्शनसे ही जगत‍्के पदार्थोंके दर्शन होते हैं। परमात्माके सदृश प्रत्यक्ष वस्तु तो और कोई वास्तवमें है ही नहीं। आँखोंमें वे हैं, देखते वे हैं, देखनेकी वस्तु वे हैं। उनका सर्वव्यापक भाव तो अत्यन्त सुस्पष्ट है। हम उपाधिको देखते हैं, नाम-रूपको टटोलते हैं। आधारस्वरूप परमात्माकी सत्ताको नहीं देखते, जिनकी सत्तासे नाम-रूपकी सत्ता है। यथार्थमें तो नाम-रूप भी परमात्मासे भिन्न कोई वस्तु नहीं है। परंतु जबतक उनकी पृथक् कल्पना है तबतक उन्हें उपाधि मानकर ऐसा ही कहा जाता है। भागवतमें कहा है—

खं वायुमग्निं सलिलं महीं च

ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।

सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं

यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्य:॥

(११। २। ४१)

‘आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी (सूर्य-चन्द्र आदि) नक्षत्रगण, पशु-पक्षी आदि प्राणी, दिशाएँ, लता-वृक्षादि, नदियाँ तथा समुद्र आदि जो कुछ (स्थावर-जंगम) जगत् है, वह सब श्रीहरिका ही शरीर है, इस प्रकार सबमें परमात्मा समझकर अनन्यभावसे सबको प्रणाम करे।’

इस प्रकारका निश्चय दृढ़ हो जानेपर हम सारे चराचर विश्वमें विश्वात्माके दर्शन कर सकते हैं। यह भावना नहीं, सत्य तत्त्व है। जब मायाके कारण परमात्मासे भिन्न भासनेवाले जगत‍्की आरोपित वस्तुओंमें सत्यता प्रतीत होती है, तब सत्यमें सत्यका आरोप तो सत्य दीखना ही चाहिये। अवश्य ही इसके लिये शुद्ध अन्त:करणसे अभ्यास करनेकी आवश्यकता है। अभ्यास दृढ़ हो जानेपर सबमें रमण करनेवाले रामकी सर्वव्यापक एकरस दिव्य छबि आरामके प्रत्येक पत्र, पुष्प और कलिकाओंमें प्रत्यक्ष दीखने लगेगी। पत्र, पुष्प और कलियोंमें ही नहीं, वाटिकाकी सुहावनी भूमिके प्रत्येक कणमें, चन्द्रकी निर्मल ज्योत्स्नाके प्रत्येक परमाणुमें, सूर्यकिरणोंके एक-एक अणुमें, वायुके प्रत्येक हिलोरेमें, सभी जगह, सभी समय, सर्वथा एक रामकी ही आराम देनेवाली रम्य झाँकी होगी। उपाय यही है कि पहले रामको देखो, फिर आरामको; पहले कारणको देखो, फिर कार्यको; पहले भगवान‍्को देखो, फिर जगत‍्को। ऐसा करते-करते आराम राम बन जायगा, कार्य कारण बन जायगा और जगत् भगवान् बन जायगा। बन नहीं जायगा, यथार्थमें ऐसा ही है। भ्रमका पर्दा फट जायगा, जिससे यथार्थ दर्शन सुलभ हो जायँगे।

(४) प्रियतमका नित्य-स्मरण

परमात्माको ‘प्रियतम’ जान लेनेपर वास्तवमें एक भी क्षण ऐसा नहीं बीतेगा, जिसमें उनका स्मरण न हो। भूल इसीलिये होती है कि हम उन्हें प्रियतम नहीं मानते। उन्हें प्रियतम माना था गोप-रमणियोंने, जो आधे क्षणके लिये भी श्यामसुन्दरको हृदय-मन्दिरसे दूर नहीं कर सकती थीं। श्यामसुन्दरको बाध्य होकर गोपियोंकी नजरोंके सामने ही सदा थिरक-थिरककर नाचना पड़ता था; इसी सत्य तथ्यके आधारपर यह कहा गया है कि—‘वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति’ श्यामसुन्दर वृन्दावनको छोड़कर एक पग भी कहीं नहीं जाते। जाते हों, गये हों, परंतु गोपियोंकी दृष्टिमें तो नहीं गये, उनके श्यामसुन्दर तो नित्य उनके साथ हैं, चौबीसों घंटोंके उनके सहचर हैं। इसका कारण क्या था, यही कि गोपियोंने उन्हें ‘परम प्रियतम’ मान लिया था, उनके लिये वे इहलोक-परलोक सबका सारा सम्बन्ध त्याग कर चुकी थीं। अपनी प्यारी-से-प्यारी सभी वस्तुएँ वे श्रीकृष्णके चरणोंमें सदाके लिये समर्पण कर चुकी थीं, फिर वे उन्हें कैसे भुलातीं? ‘प्रियतम’ अहा! कितना प्रिय शब्द है! प्रियतम तो कभी चित्तसे बिसारा ही नहीं जा सकता। कहा है कि तीनों लोकोंके वैभवकी प्राप्तिका लालच मिलनेपर भी प्रभुको ‘प्रियतम’ माननेवाले उनके प्रियजन आधे निमेषके लिये प्रभुके चरणकमलोंको नहीं भूल सकते।

प्रियतम प्यारे जन सब जगह उसीकी झाँकी देखते हैं, उसीके शब्द सुनते हैं, उसीसे बातें करते हैं और उसीका चिन्तन करते हैं। उसके सामने जगत‍्की या जगत‍्के किसी पदार्थकी याद उन्हें कभी भूलकर भी नहीं आती।

भगवान‍्को ‘प्रियतम’ बनानेभरकी देर है, फिर तो जगत‍्की कीमत कुछ रह ही नहीं जायगी। राज-पाट, धन-दौलत, स्त्री-पुत्र, मान-इज्जत, जीवन-मरण, लोक-परलोक, स्वर्ग-मोक्ष सभी कुछ उस प्रियतमके प्रेम-प्रवाहमें बह जायँगे। फिर वह श्रीश्रीचैतन्यके शब्दोंमें गा उठेगा—

न धनं न जनं न सुन्दरीं

कवितां वा जगदीश कामये।

मम जन्मनि जन्मनीश्वरे

भवताद्भक्तिरहैतुकी त्वयि॥

जिसमें प्रेम होता है, उसमें चाहे एक भी सद‍्गुण न हो, चाहे वह दुर्गुणोंकी खानि हो, प्रेमीका हृदय उसके गुणोंको नहीं देखता, वहाँ माप-तौल नहीं होता, वहाँ तो हृदय सदाके लिये निछावर किया हुआ रहता है। जब सद‍्गुणहीन और दुर्गुणीके प्रति भी सच्चे प्रेमीका प्रेम अटूट और सतत वर्धमान ही रहता है, तब परमात्माको, जो सर्वसद‍्गुणोंके आधार हैं; ऐश्वर्य, सौन्दर्य, माधुर्य, प्रेम आदिकी अशेष खानि हैं, प्रेमास्पद बना लेनेपर उनका निरन्तर चिन्तन हुए बिना कैसे रह सकता है। बुरे विचारसे पर-पुरुषका पर-स्त्रीमें या पर-स्त्रीका पर-पुरुषमें प्रेम हो जाता है, (जो वास्तवमें प्रेम नहीं है) तो उसमें भी एक-दूसरेका स्मरण कभी नहीं छूटता; उठते-बैठते, सोते-जागते स्मृति बनी ही रहती है; जब लोभी आदमी भगवान‍्के मन्दिरमें बैठकर गीता सुनता हुआ भी मन-ही-मन धनकी टोहमें रहता है, तब भला, परम प्रेमार्णव, परम लोभनीय परमात्माको प्रियतम बना लेनेपर वे कैसे भुलाये जा सकते हैं?

परमात्माके स्मरणका तार कभी न टूटे, इसके लिये हमें परमात्माको प्रियतम बनाना चाहिये। जबतक जगत‍्की वस्तु प्यारी लगती है, जगत‍्के पदार्थोंके लिये हम परमात्माको भूलते हैं, तबतक हमारे मन परमात्मा ‘प्रियतम’ नहीं हैं। उन्हें प्रियतम बनानेके साधन हैं—उनके प्रभावको सुनना-जानना, उनकी दिव्य सगुण लीलाओंका निरन्तर श्रवण, मनन और गान करना, उनके परम पावन नामका जप करना, उनके सर्वोपरि सर्वाधार दिव्य स्वरूप, गुण, धाम, ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, कारुण्य, सख्य, वात्सल्य, स्वामित्व, प्रेम आदि महान् गुणोंका बारंबार चिन्तन करना और उनकी कृपापर परम और अटल विश्वास रखना!