ईश्वरभक्त
ईश्वरभक्त निर्भय होता है, क्योंकि वह सम्पूर्ण जगत्में अपने सच्चे प्रेमी सखाकी मनोहर मूर्तिका दर्शन करता हुआ सर्वदा उसे गले लगानेको तैयार रहता है!
ईश्वरभक्त अदम्भी होता है, क्योंकि वह ईश्वरको घट-घटव्यापी देखता है। इससे उसके अंदर-बाहर भेद नहीं रह सकता!
ईश्वरभक्त अक्रोधी होता है, क्योंकि वह सारे जगत्में अपने एक प्राणारामको देखता है, फिर किसपर कैसे क्रोध करे?
ईश्वरभक्त निरभिमानी होता है, क्योंकि वह अपना सारा अभिमान अपने प्रभुके चरणोंमें समर्पण कर चुकता है; उसके पास अभिमान बचता ही नहीं।
ईश्वरभक्त अकामी होता है, क्योंकि पूर्णकाम परमेश्वरकी प्राप्तिसे उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं!
ईश्वरभक्त निर्लोभी होता है, क्योंकि उसकी दृष्टिमें अपने एक श्यामसुन्दर सलोने साँवरेके अतिरिक्त अन्य कोई लोभनीय वस्तु रहती ही नहीं!
ईश्वरभक्त सदा परम सुखी रहता है, क्योंकि वह परमसुखरूप परमात्मामें अपना अस्तित्व मिलाकर वैसा ही बन जाता है!
ईश्वरभक्त निर्मोही होता है; क्योंकि परम मायावीकी शरणागतिसे उसकी विद्याका मर्म समझनेके कारण मायाका कोई कार्य उसे मोहित नहीं कर सकता।
ईश्वरभक्त निरहंकारी होता है, क्योंकि वह अपने ईश्वरके ‘अहम्’ में अपने ‘अहम्’ को सर्वथा मिटा देता है!
ईश्वरभक्त परम प्रेमी होता है, क्योंकि वह परमात्माके परम प्रेमी स्वभावको पा चुकता है!