ग्वालिनीका प्रेम
ग्वालिनी प्रगटॺो पूरन नेहु।
दधि भाजन सिर पै धरॺो री,
कहत गोपालहिं लेहु॥
कौन सुनै कासौं कहूँ री,
काकें सुरत सँकोच।
काकों डर पथ अपथ को री,
को उत्तम, को पोच॥
बाट घाट निज पुर गली,
जहाँ तहाँ हरि नाम।
समझायें समझै नहीं,
वाहि सिख दै बिथक्यो गाम॥
दीपक ज्यों मंदिर बरै
बाहिर लखै न कोय।
तृन परसत प्रज्वलित भयो,
गुप्त कौन बिधि होय॥
पान कियें जस बारुनी
मुख भलकत, तन न सँभार।
पग डगमग जित-तित धरै,
बिथुरी अलक लिलार॥
सरिता निकट तड़ाग कें,
दीनों फूल बिदारि।
नाम मिटॺो, सरिता भई,
कौन निबेरै बारि॥
लज्जा तरल तरंगिनी,
गुरुजन गहरी धार।
दोउ कुल कूल, परमित नहीं
ताहि तरत न लागी बार॥
बिधि भाजन ओछो रच्यो,
लीला सिंधु अपार।
उलटि मगन तामें भयो,
कौन निकासनहार॥
चित आकरष्यो नंद कें,
मुरली मधुर बजाय।
जिहिं लज्जा जग लाजयो,
सो लज्जा गई लजाय॥
प्रेम मगन ग्वालिन भई
सूरदास प्रभु संग।
नयन श्रवन मुख नासिका
ज्यों कंचुकि तजत भुजंग॥