हे राम!
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥
हे शरणागतवत्सल राम! हे दीनों और पतितोंके आश्रयदाता लोकाभिराम! हे अपने आचरणोंसे लोकमर्यादाकी स्थापना करनेवाले सर्वाधार राम! हम तुम्हारी शरण हैं! प्रभो! रक्षा करो, रक्षा करो! हम अज्ञानी हैं, तुम्हारी ‘शिव-विरंचि-मोहिनी’ मायामें फँस रहे हैं, हमें कर्तव्य-अकर्तव्यका पता नहीं है, इसीसे तुम्हें छोड़कर विषयोंके अनुरागी बन रहे हैं। नाथ! अपनी सहज दयासे हमारी रक्षा करो। एक बार जो शरण होकर यह कह देता है कि मैं तुम्हारी शरण हूँ, तुम उसको अभय कर देते हो यह तुम्हारा प्रण है, सच है प्रभो! हम तुम्हारी शरण नहीं हुए! नहीं तो तुम्हारे प्रणके अनुसार अबतक अभय पद पा चुके होते। परंतु नाथ! यह भी तो तुम्हारे ही हाथ है। अब हम दीन, पतित, मार्गभ्रष्ट और निर्बल हैं और तुम दीनबन्धु, पतित-पावन, पथप्रदर्शक और निर्बलके बल हो! अब हम कहाँ जायँ, तुम्हारे सिवा हम-सरीखे पामर गरीब दीनोंको कौन आश्रय देगा? अपनी ओर देखकर ही अब तो हमें खींचकर अपने चारु चरणोंमें डाल दो। प्रभो! हमें मोक्ष नहीं चाहिये, तुम्हारा कोई धाम नहीं चाहिये, स्वर्ग या मर्त्यलोकमें कोई नाम नहीं चाहिये। हमें तो बस, तुम अपनी चरण-रजमें लोट-लोटकर बेसुध होनेवाले पागल बना दो, अपने प्रेममें ऐसे मतवाले कर दो कि लोक-परलोककी कोई सुधि ही न रहे, आँखोंपर सदा ‘पावस-ऋतु’ ही छायी रहे और तुम उस जल-धारासे सदा अपने चरण-कमल पखरवाते रहो। प्रभो! वह दिन कब होगा जब—
नयनं गलदश्रुधारया
वदनं गद्गदरुद्धया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपु: कदा
तव नामग्रहणे भविष्यति॥
(श्रीश्रीचैतन्य)
‘तुम्हारा नाम लेते ही नेत्रोंसे आनन्दके आँसुओंकी धारा बहने लगेगी, गद्गद होकर वाणी रुक जायगी और समस्त शरीर रोमांचित हो जायगा।’