क्या दूसरे भी देख-सुन सकते हैं?

एक सज्जन लिखते हैं—‘कल्याण’ में ‘क्या भगवान‍्के प्रत्यक्ष दर्शन हो सकते हैं?’ शीर्षक लेख पढ़कर चित्त अति आनन्दित हुआ और विश्वास होता है कि दयामय प्रभुका दर्शन इस चर्मचक्षुसे महानुभाव भक्तोंको निश्चय हो सकता है, पर अब यह जाननेकी इच्छा होती है कि यदि कोई भगवद्भक्त इस चर्मचक्षुसे स्थूल शरीरमें प्रभुका एकान्तमें दर्शन करता हो और कुछ वार्तालाप भी करता हो, जैसे स्त्री अपने पतिसे या पिता अपने पुत्रसे, तो उस समय यदि दूसरा भक्त वहाँ चला जाय या छिपकर देखे तो उस भक्तको भी प्रभुके दर्शन चर्मचक्षुसे वैसे ही हो सकते हैं और वह उनका वार्तालाप सुन सकता है या नहीं? कहनेका तात्पर्य यह है कि यदि किसी कोठरीमें किवाड़ बंद करके स्त्री अपने पतिसे वार्तालाप करती हो, उस समय कोई तीसरा व्यक्ति उनके वार्तालाप सुननेकी इच्छासे दरवाजेपर जाकर किवाड़की सूराखसे सुनना चाहता है, तो वह देख या सुन सकता है। उसी तरह एक भक्तको प्रभुसे वार्तालाप करते दूसरा भक्त चर्मचक्षुसे प्रभुको उसी स्वरूपमें देख सकता है या नहीं? यदि इसके उत्तरमें यह कहा जाय कि उस भक्तको भी ईश्वरमें उतना ही प्रेम होना चाहिये तो हम कहेंगे कि पूर्व उदाहरणमें तीसरे व्यक्तिको स्त्री-पतिके समान प्रेम नहीं होते हुए भी वह वार्तालाप सुन सकता है; तो यहाँ भी वैसा ही क्यों नहीं होना चाहिये?

इस प्रश्नका उत्तर यह है कि वास्तवमें इस विषयमें कोई खास नियम नहीं देखनेमें आता। भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं, वे चाहें तो पात्रापात्रका भेद छोड़कर सबके सामने प्रकट हो सकते हैं। वे चाहें तो बहुत-से लोगोंके सामने अपने भक्तसे चुपचाप बातचीत करके चले जा सकते हैं, दूसरोंको पता भी नहीं लगता। वे चाहें तो दूसरोंको पता लगनेपर भी उनको अपना दर्शन नहीं देते या अपनी वाणी नहीं सुनाते। वे चाहते हैं तो उस एक भक्तके अतिरिक्त अन्यान्य अनेकमें किसी एक या दोको अथवा अधिकको दर्शन देकर बातें कर-कर या केवल बातें सुनाकर अन्तर्धान हो सकते हैं। तात्पर्य यह है कि वे सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। अघटनघटनापटीयसी माया देवी जिनकी चेरी है, उनके लिये कौन-सा कार्य असम्भव है? उनकी इच्छापर और किसीकी भी इच्छा नहीं चलती! हाँ, यदि कोई प्यारा भक्त माता-पिताके अड़ियल बच्चेकी तरह किसी बातका जिद्द कर बैठता है तो वह भगवान‍्को अपनी इच्छाके अनुकूल कार्य करनेमें भी बाध्य कर सकता है। क्योंकि भगवान् सर्वशक्तिमान् होते हुए भी भक्तोंकी प्रेमडोरीमें बँधे हुए उनके इशारेपर नाचनेको तैयार रहते हैं, वे भक्तोंकी उपासना किया करते हैं। त्रिभुवनको नचानेवाले ब्रह्म श्यामरूपसे यशोदाकी डोरीमें ऊखलसे बँध जाते हैं, समस्त विश्वका भरण-पोषण करनेवाले विश्वम्भर छछियाभर छाछके लिये व्रजकी ग्वालिनोंके इशारेपर नाचने लगते हैं। भक्त रसखानने क्या ही सुन्दर कहा है—

सेस गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावैं।

जाहि अनादि अनन्त अखण्ड अछेद अभेद सुवेद बतावैं॥

जाहि हिये लखि आनँद ह्वै जड़ मूढ़ हिये रसखान कहावैं।

ताहि अहीरकी छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

भक्तिके बलसे भक्त सब कुछ करनेमें समर्थ रहता है। भगवान् कहते हैं—

न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।

न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥

भक्त्याहमेकया ग्राह्य: श्रद्धयाऽऽत्मा प्रिय: सताम्।

भक्ति: पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात् ॥

धर्म: सत्यदयोपेतो विद्या वा तपसान्विता।

मद्भक्त्यापेतमात्मानं न सम्यक् प्रपुनाति हि॥

कथं विना रोमहर्षं द्रवता चेतसा विना।

विनाऽऽनन्दाश्रुकलया शुध्येद् भक्त्या विनाऽऽशय:॥

वाग् गद‍्गदा द्रवते यस्य चित्तं

रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।

विलज्ज उद‍्गायति नृत्यते च

मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥

यथाग्निना हेम मलं जहाति

ध्मातं पुन: स्वं भजते च रूपम्।

आत्मा च कर्मानुशयं विधूय

मद्भक्तियोगेन भजत्यथो माम्॥

(श्रीमद्भा० ११। १४। २०—२५)

‘हे उद्धव! मेरी दृढ़ भक्तिके समान योग, विज्ञान, वेदाध्ययन, तप और दान आदि साधनोंसे मैं नहीं मिल सकता। साधुजनोंका प्यारा आत्मा मैं श्रद्धासम्पन्न भक्तिसे ही सुलभतासे मिलता हूँ। मेरी भक्ति चाण्डाल आदिको भी पवित्र बना देती है, यह निश्चय समझो कि सत्य और दयासे युक्त धर्म तथा तपयुक्त ज्ञान मेरी भक्तिसे रहित जीवको पूर्णरूपसे पवित्र नहीं कर सकते। बिना रोमांच हुए, बिना आनन्दके आँसू बहाये भक्तिका ज्ञान क्योंकर हो सकता है? बिना भक्तिके हृदय शुद्ध कैसे हो सकता है? मेरी भक्तिसे जिसकी वाणी गद‍्गद हो जाती है, हृदय पिघल जाता है, जो बारम्बार उच्चस्वरसे नाम लेकर मुझे पुकारता है, कभी रोता है, कभी हँसता है, कभी लाज छोड़कर नाचता है, ऊँचे स्वरसे मेरे गुण गाता है वह मेरा पूर्ण भक्त तीनों लोकोंको पवित्र करता है। जैसे अग्निमें तपनेसे सुवर्ण मैल छोड़कर अपने रूपको प्राप्त होता है, वैसे ही मेरे भक्तियोगसे आत्मा भी कर्मवासना त्यागकर मुझ (परमात्मा)-को प्राप्त होता है।’ भगवान‍्ने श्रीगीतामें भी कहा है—

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।

ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥

(११। ५४)

‘हे परंतप अर्जुन! अनन्यभक्तिसे ही मैं इस (चतुर्भुज) रूपमें प्रत्यक्ष देखा, तत्त्वसे जाना और ऐक्यभावसे प्राप्त किया जा सकता हूँ।’

ऐसे परमात्मामें अभिन्नरूपसे स्थित पूर्ण भक्त यदि चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, परंतु वे ऐसा करते नहीं। वे अपनी कोई स्वतन्त्र इच्छा ही नहीं रखते, वे तो अपने मनको और अपनी इच्छाओंको भगवान‍्के मन और उसकी इच्छामें एकमेक कर देते हैं, अतएव भगवान् और भक्तकी इच्छाओंमें परस्पर विरोध होना बड़ा ही कठिन है। वे तो दोनों एक-दूसरेके हृदयमें अभिन्नरूपमें स्थित रहते हैं। भगवान‍्ने कहा है—

साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।

मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥

(श्रीमद्भा० ९। ४। ६८)

‘साधुजन मेरा हृदय हैं और मैं साधुजनोंका हृदय हूँ, वे लोग मेरे सिवा और किसीको नहीं जानते और मैं उनके सिवा अन्य किसीको नहीं जानता।’

इससे अब सारी बातें भगवान‍्की इच्छापर रह जाती हैं। इसमें स्त्री- पुरुषका उदाहरण नहीं दिया जा सकता। वे साधारण मनुष्य होते हैं, उनके गुप्त रहस्यको छिपकर कोई भी देख या सुन सकता है, परंतु सर्वतश्चक्षु सर्वान्तर्यामी सर्वसमर्थ भगवान‍्के लिये ऐसी बात नहीं है और न इसमें कोई आश्चर्यकी या अप्राकृत बात ही है। योगी अपने योगबलसे सबके सामने अदृश्य रह सकता है, अपनी वाणीका उपयोग अपने इच्छानुसार जनसमूहमें किसी एकके साथ ही कर सकता है। पूर्वकालके ऐसे अनेक सिद्धि-प्राप्त राक्षसोंके भी इतिहास मिलते हैं जो एकसे अदृश्य रहकर सबके सामने प्रकट हो सकते थे या सबसे अदृश्य रहकर एकके सामने प्रकट होते थे। मयदानवकी कारीगरीमें जलका स्थल और स्थलका जल दीखता था। न दीखना, एकको दीखना, छोटा-बड़ा या भिन्न-भिन्न आकारमें दीखना—ये सब सिद्धियोंके कार्य हैं। जब आसुरी सम्पत्तिवाले लोग भी सिद्धि प्राप्तकर ऐसा आचरण कर सकते हैं तब पूर्ण-योगेश्वर, समस्त सिद्धियोंके आधार, करने, न करने और अन्यथा करनेमें सर्वथा समर्थ भगवान् जो चाहें सो करें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? भगवान् श्रीकृष्ण कंसराजकी सभामें प्रवेश करते समय एक ही अनेक रूपोंमें दीख पड़े थे—

मल्लानामशनिर्नृणां नरवर:

स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्

गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां

शास्ता स्वपित्रो: शिशु:।

मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां

तत्त्वं परं योगिनां

वृष्णीनां परदेवतेति विदितो

रङ्गं गत: साग्रज:॥

(श्रीमद्भा० १०। ४३। १७)

‘रंगभूमिमें बलदेवजीसहित भगवान् श्रीकृष्ण मल्लोंको वज्रके रूपमें, मनुष्योंको मनुष्य श्रेष्ठरूपमें, स्त्रियोंको मूर्तिमान् कामदेवके रूपमें, सुदामा, श्रीदामा आदि गोपोंको स्वजनरूपमें, दुष्ट राजाओंको शासकके रूपमें, माता और पिताको बालकरूपमें, कंसको साक्षात् मृत्युरूपमें, अज्ञानियोंको जडरूपमें, योगियोंको परमतत्त्व परब्रह्मरूपमें और यादवोंको परमदेवताके रूपमें दीख पड़े।’ अतएव यह कोई नियम नहीं है कि भगवान् एकको एक ही रूपमें दीखें या सभीको दीखें अथवा उनकी बातें एकको ही सुनें या सबको सुनें। वे चाहे सो कर सकते हैं। भक्तको दर्शन देने और उससे बातें करनेमें प्रेम तो प्रधान है ही परंतु, वे कब, कैसा, क्यों और क्या कार्य करना चाहते हैं, इस बातको वही जानते हैं, हमलोग अपनी संसारी बुद्धिसे उसका निर्णय करनेमें असमर्थ हैं।

हमें तो इसी बातपर विश्वास करना चाहिये कि भगवान‍्के प्रत्यक्ष दर्शन हो सकते हैं, एकान्तमें हो सकते हैं और जनसमूहमें भी। भगवान‍्की अनूप रूप-माधुरी और उनकी अमृतको लजानेवाली मधुर वाणी उनके इच्छानुसार एक या दो भक्तोंके दृष्टि और श्रुतिगोचर हो सकती है और सबके भी!

इस विश्वासके साथ अपने माने हुए समस्त भोग्यपदार्थोंको उस परम प्रियतमके चरणकमलोंमें समर्पण कर उसीके परायण हो उसके विश्व-मोहन-दर्शन करनेके लिये उसीकी भक्तिका आश्रय ग्रहण करना चाहिये, इसीमें कल्याण है।