मधुर स्वर सुना दो!

प्यारे व्रजेन्द्रनन्दन! तुम्हारी विश्व-जन-मन-मोहिनी मुरलीके मधुरस्वरमें कितनी मादकता है, जिसके कर्णरन्ध्रमें एक बार भी वह स्वर प्रवेश कर जाता है, उसीको तुरंत पागल बना देता है। वह फिर संसारके विषयजन्य मन्द रसोंको विस्मृत कर एक दिव्य रसका आस्वाद पाता है। लज्जा-संकोच, धैर्य-गाम्भीर्य, कुल-मान, लोक-परलोक सभी कुछ भूल जाता है। उसके लिये तुच्छ पार्थिव विलास-रस सम्पूर्णरूपसे विनष्ट होकर एक अपूर्व स्वर्गीय अलौकिक रसका प्रादुर्भाव हो उठता है, उसकी चित्तवृत्तियोंकी सारी विभिन्न गतियाँ मिट जाती हैं और वे सब-की-सब एक भावसे, एक ही लक्ष्यकी ओर एक ही गतिसे प्रवाहित होने लगती हैं। एक ऐसा नशा शरीर-मनपर छा जाता है कि फिर जीवनभर वह कभी उतरता ही नहीं, जब कभी उतरता है तो ‘अहम्’ को लेकर ही उतरता है। ऐसे ही नशेमें चूर भाग्यवती व्रज-बालाओंने कहा था—

दूध दुह्यो सीरो परॺो तातो न जमायो बीर,

जामन दयो सो धरॺो धरॺोई खटायगो।

आन हाथ आन पाय सबहीके तबहीते,

जबहीते ‘रसखानि’ ताननि सुनायगो॥

ज्यों ही नर त्यों ही नारी तैसी ये तरुनि बारी,

कहिये कहा री सब ब्रज बिललायगो।

जानिये आली! यह छोहरा जसोमतिको,

बाँसुरी बजायगो कि बिष बगरायगो॥

—रसखान

जिस शुभ क्षणमें व्रजमण्डलमें तुम्हारी वंशी बजी, उस क्षण व्रजके प्रेमी जीवोंकी क्या दशा हुई थी, इस बातका मधुरातिमधुर अनुभव उन्हीं सौभाग्यशाली भक्तोंको होता है। हमलोग तो उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। पर सुनते हैं कि तुम्हारी उस वंशीध्वनिने जडको चैतन्य और चैतन्यको जड बना दिया था। सारे कामियोंको विशुद्ध प्रेमी बना दिया था। तुम्हारे मुरली-निनादको सुनकर सांसारिक भोगोंकी सबकी सारी कामनाएँ क्षणभरमें नष्ट हो गयी थीं और संसारके प्रिय-से-प्रिय पदार्थोंको तृणवत् त्यागकर सबका चित्त केवल एक तुम्हारी ओर ही लग गया था। यही तो सच्चा प्रेम है। जब तुम्हारे लिये—तुम्हारे प्रेमके लिये अपने सारे सुख, सारे भोग, सारे आनन्द—यहाँतक कि मुक्तितकका त्याग करनेकी तैयारी होती है, तभी तो तुम्हारा प्रेम प्रस्फुटित होता है। फिर संसारमें रहने या उसे त्याग करनेसे कोई मतलब नहीं रह जाता, फिर तो तुम जहाँ जिस तरह रखना और जो कुछ करवाना भी चाहते हो, उसीमें परम सुख मिलता है; क्योंकि फिर जीवनका ध्येय केवल तुम्हारी रुचि और इच्छाका अनुसरण करनामात्र ही रह जाता है। यही तो दशा प्रेमकी है। भोगमें रहकर भोगोंको अपना भोग्य न समझना, संसारमें रहकर संसारको भूल जाना, जगत‍्में रहकर अपने-आपको सारे जगत्-सहित तुम्हारे चरणोंमें अर्पण कर देना, केवल तुम्हारा होकर तुम्हारे लिये ही जीवन धारण करना और सँपेरेकी पूँगी-ध्वनिपर नाचनेवाले साँपके समान निरन्तर प्रमत्त होकर वंशी-ध्वनिके पीछे-पीछे अप्रमत्तरूपसे नाचना जिसके जीवनका स्वभाव बन जाता है, वही तो तुम्हारा प्रेमी है। कहते हैं फिर उसको तुम्हारी वंशी-ध्वनि नित्य सुनायी देती है, क्षण-क्षणमें तुम्हारा मनमोहन मुरली-स्वर उसे पथ-प्रदर्शककी मसालके समान मार्ग दिखलाया करता है। वे प्रेमी महात्मा धन्य हैं, जो तुम्हारे इस प्रकारके प्रेमको प्राप्तकर त्रैलोक्यपावन पदवीपर पहुँच चुके हैं।

हम तो नाथ! इस प्रेम-पाठके अधिकारी नहीं हैं। सुना है कि परम वैराग्यवान् पुरुष ही इस प्रेम-पाठशालामें प्रवेश कर सकते हैं। नहीं तो, यह प्रेमका पारा फूट निकलता है और सारे शरीर-मनको क्षत-विक्षत कर डालता है। प्रेमका पारा वैराग्यसे ही शुद्ध होता है। वैराग्यके अभावमें तो नीच काम प्रेमके सिंहासनपर बैठकर सारी साधनाओंको नष्ट-भ्रष्ट कर डालता है। अतएव प्रभो! भोगोंमें फँसे हुए हम संसारी जीव इस दिव्य-प्रेम-लीलाकी बात करनेका दु:साहस कैसे कर सकते हैं। हम तो दीन-हीन-पतित-पामर प्राणी हैं। तुम्हारे पतित-पावन स्वरूपपर भरोसा किये दरवाजेपर पड़े हैं; परंतु नाथ! हममें न प्रेम है, न भक्ति है और न श्रद्धा है। फिर किस मुँहसे तुमसे कहें कि प्रभो! तुम हमारी रक्षा करो। तुम भक्तोंके परम सखा हो, जो जगत‍्का सारा भरोसा छोड़कर केवल तुम्हारी दयापर ही निर्भर करते हैं, उनकी तुम रक्षा करते हो। हम तो संसारासक्त भक्तिविहीन दीन प्राणी हैं। किस साहससे तुमसे उद्धारके लिये प्रार्थना करें? परंतु नाथ! तुम दीनबन्धु हो, तुम अनाथ-नाथ हो, तुम अकारण ही कृपा करते हो। सुना है कि तुम केवल दु:खियों और दुराचारियोंका दया या दमनके द्वारा परित्राण करनेके लिये ही जगत‍्में बार-बार अवतार लेते हो। प्रभो! हम-सा दु:खी और दुराचारी और कौन होगा? दु:खियोंके दु:ख और पतितोंके पातक तुम्हारे सिवा कौन नाश करेगा? तुम्हीं तो अशरणके शरण और अनाथके नाथ हो। तुम्हीं तो अगतिके गति और निर्बलके बल हो। तुम्हीं तो स्नेहमयी जननीकी भाँति अपनी दुर्गुण संतानसे प्यार करनेवाले हो। प्रभो! बताओ, तुम्हें छोड़कर इस विपत्तिपंकसे निकलनेके लिये किसको पुकारें? ऐसा कौन है जो तुम्हारी तरह बिना ही हेतु दया करता है। प्रभो! हमें इस दु:ख-सागरसे पार करो, बचाओ! नाथ! तुम्हींने पापानलसे संतप्त पतित अजामिलको एक ही नामसे प्रसन्न होकर पावन कर दिया था, तुम्हींने जलमें अनाथकी भाँति डूबते हुए गजेन्द्रकी दौड़कर रक्षा की थी और तुम्हींने भरी सभामें विपद‍्ग्रस्त द्रौपदीकी लाजको बचाया था। इसीसे तो गोसाईंजी कातर-स्वरसे पुकार उठे—

जो पै दूसरो कोउ होइ।

तौ हौं बारहि बार प्रभु कत दु:ख सुनावौं रोइ॥

काहि ममता दीनपर, काको पतितपावन नाम।

पापमूल अजामिलहि केहि दियो अपनो धाम॥

रहे संभु बिरंचि सुरपति लोकपाल अनेक।

सोक-सरि बूड़त करीसहि दई काहु न टेक॥

बिपुल भूपति सदसि महँ नर-नारि कह्यो ‘प्रभु पाहि’।

सकल समरथ रहे, काहु न बसन दीन्हों ताहि॥

एक मुख क्यों कहौं करुनासिंधुके गुन-गाथ।

भक्तहित धरि देह काह न कियो कोसलनाथ॥

आपसे कहुँ सौंपिये मोहि जो पै अतिहि घिनात।

दास तुलसी और बिधि क्यों चरन परिहरि जात॥

इसलिये हे दीनबन्धु! अब तुम अपनी ओर देखकर ही हमें अपनाओ और हे नाथ! दयाकर एक बार तुम्हारी उस मोहिनी मुरलीका वह उन्मादकारी मधुर स्वर सुना दो जिसने व्रजवनिताओंको श्रीकृष्ण-गत-प्राणा बना दिया था।