मोक्ष-संन्यासिनी गोपियाँ

काम्योपासनयार्थयन्त्यनुदिनं

किंचित्फलं स्वेप्सितं

केचित् स्वर्गमथापवर्गमपरे

योगादियज्ञादिभि:।

अस्माकं यदुनन्दनाङ्घ्रियुगल-

ध्यानावधानार्थिनां

किं लोकेन दमेन किं नृपतिना

स्वर्गापवर्गैश्च किम्॥

—श्रीशंकराचार्य

‘कुछ लोग प्रतिदिन सकामोपासना कर मनोवांछित फल चाहते हैं, दूसरे कुछ लोग यज्ञादिके द्वारा स्वर्गकी तथा (कर्म और ज्ञान) योग आदिके द्वारा मुक्तिके लिये प्रार्थना करते हैं, परंतु हमें तो यदुनन्दन श्रीकृष्णके चरणयुगलोंके ध्यानमें ही सावधानीके साथ लगे रहनेकी इच्छा है। हमें उत्तम लोकसे, दमसे, राजासे, स्वर्गसे और मोक्षसे क्या प्रयोजन है?’

सच्चिदानन्दघन परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णकी वृन्दावनलीला अति मधुर है, आकर्षक है, अद‍्भुत है और अनिर्वचनीय है। वहाँ सभी कुछ विचित्र है, चराचर सभी प्राणी श्रीकृष्णप्रेममें निमग्न हैं, इनमें भी गोपी-प्रेम तो सर्वथा अलौकिक और अचिन्त्य है। वहाँ वाणीकी गति ही नहीं है, मन भी उस प्रेमकी कल्पना नहीं कर सकता। करे भी कैसे, उसकी वहाँतक पहुँच ही नहीं है। मनुष्य प्रेमकी कितनी ही ऊँची-से-ऊँची कल्पना क्यों न करे, वह उस कल्पनातीत भगवत्-प्रेमके एक कणके बराबर भी नहीं है। उस गुणातीत अप्राकृत ‘केवल प्रेमकी’ कल्पना गुणोंसे निर्मित प्राकृत मन कर ही कैसे सकता है? इस अवस्थामें सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रीकृष्णका सच्चिदानन्दमयी गोपिका-नाम-धारिणी अपनी ही छाया मूर्तियोंसे जो दिव्य अप्राकृत प्रेम था, उसका वर्णन कौन कर सकता है? अबतक जितना वर्णन हुआ है, वह प्राय: अपनी-अपनी विभिन्न भावनाओंके अनुसार ही हुआ है। इस प्रेमका असली स्वरूप तो यत्किंचित् उसीकी समझमें आ सकता है जिसको प्रेमधन श्रीकृष्ण समझाना चाहते हैं पर जो उसे समझ लेता है, वह तत्क्षण गोपी बन जाता है, इसलिये वह फिर उसका वर्णन कर नहीं सकता। वास्तवमें वह वर्णनकी वस्तु भी नहीं है। वे दोनों एक-दूसरेका रहस्य समझते हैं और मनमानी लीला करते हैं। गोपियोंके प्राण और श्रीकृष्णमें तथा श्रीकृष्णके प्राण और गोपियोंमें कोई अन्तर नहीं रह जाता—वे परस्पर अपने-आप ही अपनी छायाको देखकर विमुग्ध होते हैं और सबको मोहित करते हैं। श्रीकृष्ण और गोपी दो स्वरूपोंमें वस्तुत: एक ही तत्त्व हैं। कवि कहता है—

कान्ह भये प्रानमय प्रान भये कान्हमय,

हियमें न जानि परै कान्ह है कि प्रान है।

भगवान् अपने इस तरहके भक्तके लिये कहते हैं कि वह तो मेरा आत्मा ही है ‘आत्मैव मे मतम्।’ आत्मा क्या है, वह उससे भी अधिक प्यारा है—

न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्कर:।

न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥

(श्रीमद्भा० ११। १४। १५)

‘हे उद्धव! मुझे ब्रह्मा, संकर्षण, लक्ष्मी एवं अपना आत्मा भी उतने प्रिय नहीं हैं, जितने तुम-जैसे भक्त प्रिय हैं। क्योंकि मेरा ऐसा भक्त मुझमें ही संतुष्ट है। उसे मेरे सिवा और कुछ भी नहीं चाहिये—

न पारमेष्ठॺं न महेन्द्रधिष्ण्यं

न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।

न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा

मय्यर्पितात्मेच्छति मद्विनान्यत् ॥

निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।

अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभि:॥

(श्रीमद्भा० ११। १४। १४, १६)

इस प्रकारका मेरा प्रिय भक्त अपने आत्माको मुझमें अर्पित कर देता है, वह मुझको छोड़कर ब्रह्माका पद, इन्द्रका पद, चक्रवर्तीका पद, पाताल आदिका राज्य और योगकी सिद्धियाँ आदिकी तो बात ही क्या है, मोक्ष भी नहीं चाहता। ऐसे मोक्ष-संन्यासी भक्तोंको जो सुख मिलता है, उसे वही जानते हैं। ऐसे इच्छारहित, मद‍्गतचित्त, शान्त, निर्वैर और समदर्शी भक्तोंकी चरण-रजसे अपनेको पवित्र करनेके लिये मैं सदा उनके पीछे-पीछे घूमा करता हूँ।

यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि उद्धवजीको यह दुर्लभ पद गोपियोंका शिष्यत्व ग्रहण करनेके बाद ही मिला था। जब उद्धवको भगवान् ऐसा कहते हैं फिर गोपियोंका तो कहना ही क्या? श्रीकृष्ण और गोपियोंके सम्बन्धमें जो कुछ भी ऊँची-से-ऊँची स्थिति अनुभवमें आती है, वही आगे चलकर बहुत नीची मालूम होने लगती है।

जो भगवद‍्गीता आज संसारका सर्वमान्य ग्रन्थ है, भगवान‍्की दिव्य वाणीमें परमोपयोगी उपदेश होनेके कारण जो सबका पूज्य है, उसमें जो कुछ करनेके लिये कहा गया है, गोपियोंके जीवनमें वे सब बातें स्वाभाविक वर्तमान थीं।

भगवान‍्ने श्रीमद्भगवद‍्गीतामें प्रिय सखा भक्त अर्जुनको जो परम रहस्यमय सार उपदेश दिया है कि—

‘जो सर्वत्र मुझको व्यापक देखता है और सबको मुझमें देखता है, उससे मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मुझसे कभी अदृश्य नहीं होता।’ (गीता ६। ३०) ‘[ मेरे ] दृढ़निश्चयी भक्त निरन्तर मेरे नाम-गुणका कीर्तन करते हुए, मेरे ही लिये चेष्टा करते हुए तथा बारम्बार मुझको ही प्रणाम करते हुए, नित्य मुझमें मन लगाकर अनन्य भक्तिसे मेरी उपासना करते हैं।’ (गीता ९। १४) ‘वे निरन्तर मुझमें मन लगानेवाले, मुझमें प्राणोंको अर्पण करनेवाले मेरे भक्त परस्पर मेरी ही चर्चा करते हैं, मेरी ही लीला गा-गाकर संतुष्ट होते हैं और मुझमें ही रमण करते हैं। इस प्रकार प्रेमपूर्वक नित्ययुक्त होकर मुझे भजनेवाले भक्तोंको अपनी ईश्वरीय बुद्धिका योग मैं करा देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।’ (गीता १०। ९-१०)

इसके बाद गीताका परम तत्त्व परम गोप्य रहस्य बतलाते हुए भगवान‍्ने अर्जुनसे कहा है—

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

(१८। ६५-६६)

‘तू केवल मुझमें ही मन अर्पण कर दे, मेरा ही भक्त हो, मेरी ही पूजा कर, मुझको ही नमस्कार कर, फिर तू मुझको ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझे सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, क्योंकि तू मेरा अति प्रिय सखा है। सब धर्मोंको छोड़कर तू केवल एक मेरे ही शरण हो जा, मैं तुझे सब पापोंसे छुड़ा दूँगा, तू चिन्ता न कर।’

गोपियोंके आचरणोंसे ये सारी बातें ओत-प्रोत ही नहीं बल्कि बढ़ी हुई थीं। कारण, उपदेशोंमें उतनी बातें आ ही नहीं सकतीं, जितनी आचरणमें आती हैं। फिर अर्जुनको तो ऐसा बननेके लिये उपदेश दिया जा रहा था, परंतु गोपियाँ भगवान‍्की बनी-बनायी भक्त थीं। भगवान‍्ने स्वयं अपने श्रीमुखसे उनकी बड़ाई करते हुए कहा है—

निजाङ्गमपि या गोप्यो ममेति समुपासते।

ताभ्य: परं न मे पार्थ निगूढप्रेमभाजनम्॥

सहाया गुरव: शिष्या भुजिष्या बान्धवा: स्त्रिय:।

सत्यं वदामि ते पार्थ गोप्य: किं मे भवन्ति न॥

मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्रद्धां मन्मनोगतम्।

जानन्ति गोपिका: पार्थ नान्ये जानन्ति तत्त्वत:॥

‘हे अर्जुन! गोपियाँ अपने अंगोंकी सँभाल इसलिये करती हैं कि उनसे मेरी सेवा होती है, गोपियोंको छोड़कर मेरा निगूढ़ प्रेमपात्र और कोई नहीं है। वे मेरी सहायिका हैं, गुरु हैं, शिष्या हैं, दासी हैं, बन्धु हैं, प्रेयसी हैं, कुछ भी कहो, सभी हैं। मैं सच कहता हूँ कि गोपियाँ मेरी क्या नहीं हैं। हे पार्थ! मेरा माहात्म्य, मेरी पूजा, मेरी श्रद्धा और मेरे मनोरथको तत्त्वसे केवल गोपियाँ ही जानती हैं और कोई नहीं जानता।’

गोपियोंके मनमें इहलोक और परलोकके किसी भी भोगकी कामना नहीं थी, इन्द्रियका कोई विषय उनके मनको आकर्षित नहीं कर सकता था; उन्होंने अपने मनोंको श्रीकृष्णके मनमें और अपने प्राणोंको श्रीकृष्णके प्राणोंमें विलीन कर दिया था। वे इसीलिये जीवन धारण करती थीं कि श्रीकृष्ण वैसा चाहते थे। उनका जीवन-मरण, लोक-परलोक सब श्रीकृष्णकी इच्छाके अधीन था, उन्होंने अपनी सारी इच्छाओंको श्रीकृष्णकी इच्छामें मिला दिया था। भगवान् श्रीकृष्णने एक दिन एकान्तमें प्यारे उद्धवजीसे कहा—

ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिका:।

ये त्यक्तलोकधर्माश्च मदर्थे तान् बिभर्म्यहम्॥

मयि ता: प्रेयसां प्रेष्ठे दूरस्थे गोकुलस्त्रिय:।

स्मरन्त्योऽङ्ग विमुह्यन्ति विरहौत्कण्ठ्यविह्वला:॥

धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण प्राय: प्राणान् कथञ्चन।

प्रत्यागमनसन्देशैर्बल्लव्यो मे मदात्मिका:॥

(श्रीमद्भा० १०। ४६। ४—६)

‘हे उद्धव! गोपियोंने अपने मन और प्राण मेरे अर्पण कर दिये हैं, मेरे लिये अपने सारे शारीरिक सम्बन्धोंको और लोकसुखके साधनोंको त्यागकर वे मुझमें ही अनुरक्त हो रही हैं, मैं ही उनके सुख और जीवनका कारण हूँ; गोकुलकी उन स्त्रियोंको मैं प्रिय-से-प्रिय हूँ, मेरे दूर रहनेके कारण वे मेरा स्मरण करती हुई मेरे विरहमें अत्यन्त ही विह्वल और विमोहित हो रही हैं। मेरे शीघ्र गोकुल लौटनेके सन्देशके भरोसे ही अपने आत्माको मुझमें समर्पण कर देनेवाली वे गोपियाँ बड़ी कठिनतासे किसी प्रकार जीवन धारण कर रही हैं।’

गोपियोंका हृदय श्रीकृष्णमय हो गया, वे खाते-पीते, सोते-जागते, चलते-फिरते, घरका काम-काज करते, सब समय एक श्रीकृष्णको ही देखतीं और उन्हींके गुणोंका स्मरण कर-करके आँसू बहाया करती थीं। भागवतमें कहा है—

या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप-

प्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ ।

गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठॺो

धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयाना:॥

(१०। ४४। १५)

‘जो गोपियाँ गौओंका दूध दुहते समय, धान आदि कूटते समय, दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको झुलाते समय, रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, घरोंमें झाड़ू देते समय प्रेमपूर्ण चित्तसे आँखोंमें आँसू भरकर गद‍्गद वाणीसे श्रीकृष्णका गान किया करती हैं, उन श्रीकृष्णमें चित्त निवेशित करनेवाली वे गोपरमणियाँ धन्य हैं।’

यह गोपी-प्रेम बड़ा ही पवित्र है, इसमें अपना सर्वस्व प्रियतमके चरणोंमें न्योछावर कर देना पड़ता है। मोक्षकी इच्छा और नरकका भय—दोनोंसे ही मुख मोड़ लेना पड़ता है। प्रियतम श्रीकृष्णका प्रिय कार्य करना ही जीवनका एकमात्र उद्देश्य बन जाता है। दूसरेके द्वारा मुझे सुख मिले, मेरी इन्द्रियोंकी और मनकी तृप्ति हो, इसका नाम ‘काम’ है चाहे वह भाव भगवान‍्के प्रति ही क्यों न हो और ‘मेरे द्वारा मेरा प्रियतम सुखी हो, इसीमें मैं सुखी होऊँ’ इसका नाम ‘प्रेम’ है; काम भोगके लिये और प्रेम परमात्माके लिये हुआ करता है। विषयानुराग ही काम है और भगवत्-अनुराग ही प्रेम है। यह प्रेम बढ़ते-बढ़ते जब प्रेमीको प्रेमास्पद भगवान‍्का प्रतिबिम्ब बना देता है तभी प्रेम पूर्णताके समीप पहुँचता है। श्रीचैतन्य-चरितामृतमें ‘काम’ और ‘प्रेम’ का भेद बतलाते हुए कहा है—

कामेर तात्पर्य निज संभोग केवल।

कृष्ण-सुख तात्पर्य प्रेम तो प्रबल॥

लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म कर्म।

लज्जा, धैर्य, देह-सुख, आत्म-सुख मर्म॥

सर्वत्याग करये, करे कृष्णेर भजन।

कृष्ण-सुख हेतु करे प्रेमेर सेवन॥

अतएव काम प्रेमें बहुत अन्तर।

काम अन्धतम, प्रेम निर्मल भास्कर॥

प्रेमीको तो प्रेमास्पद भगवान‍्के इंगितानुसार लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म और सारे कर्म तथा लज्जा, धैर्य, शरीर-सुख, आत्म-सुख आदि सबका त्याग कर देना पड़ता है। जो लोग कहते हैं कि श्रीकृष्णप्रेममें त्याग और वैराग्यकी आवश्यकता नहीं, वे बहुत ही भूलते हैं। श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्तिका आधार तो श्रीकृष्णार्थ सर्वस्व-त्याग ही है—तभी श्रीकृष्णरूप परमशान्ति प्राप्त होती है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।’

(गीता १२। १२)

जबतक विषयोंमें मन रहता है तबतक तो भगवान‍्का प्रेमपूर्वक निरन्तर चिन्तन ही नहीं हो सकता, फिर समर्पणकी तो बात ही कहाँ है? यह भ्रम है कि लोग विषयासक्त चित्तसे विषयोंका सेवन करते हुए अपनेको भगवान‍्का प्रेमी और गोपीप्रेमके कहने-सुनने और तदनुसार आचरण करनेका अधिकारी मान बैठते हैं इसीसे उनका पतन होता है। परमवैराग्यवती श्रीकृष्णगतप्राणा श्रीगोपियोंके सम्बन्धमें श्रीचैतन्यचरितामृतमें कहा है—

निजेन्द्रिय-सुख-हेतु कामेर तात्पर्य।

कृष्ण-सुखेर तात्पर्य गोपीभाव वर्य॥

निजेन्द्रिय-सुखवाञ्छा नहे गोपीकार।

कृष्ण-सुख-हेतु करे संगम विहार॥

आत्म-सुख-दु:ख गोपी ना करे विचार।

कृष्ण-सुख-हेतु करे सब व्यवहार॥

कृष्ण बिना आर सब करि परित्याग।

कृष्ण-सुख-हेतु करे शुद्ध अनुराग॥

श्रीकृष्ण-सुखके लिये शुद्ध अनुराग करना ही पवित्र गोपीभाव है। ऊपर कहा गया है कि श्रीकृष्णप्रेमी नरकके भयकी भी परवा न कर प्रियतम भगवान‍्का प्रिय कार्य करता है। इससे कोई यह न समझे कि ‘वह ऐसा दुष्कर्म भी करता है जिससे उसको नरकका भागी होना पड़े।’ बात यह है कि वह मोक्ष-भोग या स्वर्ग-नरककी बातको स्मरण ही नहीं करता, वह तो श्रीकृष्णगतचित्त रहता है। उसके मन, प्राण और बुद्धि तो श्रीकृष्णमें तल्लीन हो जाते हैं। ऐसे भक्तसे किसी भी दुष्कर्मकी सम्भावना ही कैसे हो सकती है? श्रीभगवान‍्से पाप या दुष्कर्म हो तो उससे भी हो; क्योंकि उसने तो सारी विषयासक्तिको छोड़कर अपने मनको भगवान‍्का मन बना दिया है। इस दशामें भगवान‍्के मनमें आसक्तिवश पापका भाव आवे तो उसके भी आवे। भगवान‍्के द्वारा पाप-पुण्य होते नहीं, इसलिये भक्त भी पाप-पुण्यसे अलग ही रहता है।

अमृत चाहे विषका काम कर दे, शीतल जल चाहे जगत‍्को भस्म कर दे, परंतु श्रीकृष्णप्रेमी भक्तसे दुष्ट कर्म कदापि नहीं हो सकता। अतएव गोपियोंके कार्योंमें पाप देखना हमारे चित्तकी पापमयी वृत्तिका ही फल है। थोड़ी दूरपर बातें करते हुए जवान बहिन-भाईकी निर्दोष हँसी और बातचीतमें भी कामीको कामके दर्शन होते हैं। इसी प्रकार हम भी गोपीप्रेममें काम देखते हैं। वास्तवमें वहाँ तो काम था नहीं; गोपीप्रेमके सच्चे अनुयायियोंमें भी काम-गन्धका नाश हो जाता है। श्रीचैतन्य महाप्रभु इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। वहाँ तो केवल कृष्ण-ही-कृष्ण रह जाते हैं। उनके मन या नेत्रोंके सामने दूसरी चीज न तो ठहरती है और न आती ही है। कविने क्या सुन्दर कहा है—

कानन दूसरो नाम सुनै नहिं

एकहि रंग रँगो यह डोरो।

धोखेहु दूसरो नाम कढै

रसना मुख बाँधि हलाहल बोरो॥

ठाकुर चित्तकी वृत्ति यही

हम कैसेहु टेक तजें नहिं भोरो।

बावरी वे अँखियाँ जरि जायँ

जो साँवरो छाड़ि निहारति गोरो॥

उन्हें त्रिभुवन श्याममय दीखता है। उनकी सारी इन्द्रियाँ केवल श्रीकृष्णको ही विषय करती हैं।

भगवान‍्के आदेशसे उद्धवजी व्रजमें आकर गोपियोंको समझाने लगे। उन्होंने अनेक उपदेश दिये, परंतु गोपिकाओंके प्रेमको देखकर उनकी सारी ज्ञानगरिमा गल गयी। वे प्रेमके निर्मल प्रवाहमें बह गये।

गोपियोंने कहा—

स्याम तन, स्याम मन, स्याम है हमारो धन,

आठों जाम ऊधो हमें स्यामहीसों काम है।

स्याम हिये, स्याम जिये, स्याम बिनु नाहिं तिये,

आँधेकी-सी लाकरी अधार स्यामनाम है॥

स्याम गति, स्याम मति, स्याम ही है प्रानपति,

स्याम सुखदाई सों भलाई सोभाधाम है।

ऊधो तुम भये बौरे, पाती लैके आये दौरे,

जोग कहाँ राखें, यहाँ रोम-रोम स्याम है॥

अरे, यहाँ तो श्यामके सिवा और कुछ है ही नहीं, सारा हृदय तो उससे भरा है, रोम-रोममें तो वह छाया है। सोते-बैठते कभी साथ तो छोड़ता ही नहीं, फिर बताओ तुम्हारे ज्ञान और योगको रखें कहाँ?—

नाहिन रह्यो हियमें ठौर।

नंदनंदन अछत कैसे आनिये उर और॥

चलत चितवत दिवस जागत सुपन सोवत रात।

हृदयते वह स्याम मूरति छिन न इत-उत जात॥

कहत कथा अनेक ऊधो लोक-लाज दिखात।

कहा करौं तन प्रेम-पूरन घट न सिंधु समात॥

तुम्हीं बताओ, क्या किया जाय! वह तो हृदयमें गड़ गया है और रोम-रोममें ऐसा अड़ गया है कि किसी तरह निकल ही नहीं सकता; भीतर भी वही और बाहर भी सर्वत्र वही।

उरमें माखनचोर गड़े।

अब कैसे निकसें वे ऊधो तिरछे आन अड़े॥

उद्धव चकित हो गये। सबसे अधिक आश्चर्य तो उन्हें तब हुआ जब गोपी-कृपासे उन्होंने श्रीगोपीनाथको गोपियोंके बीच सर्वत्र अपनी आँखोंके सामने देखा।

महात्मा सूरदासजी कहते हैं—

लखि गोपिनको प्रेम नेम ऊधोको भूल्यो।

गावत गुन गोपाल फिरत कुंजनमें फूल्यो॥

खिन गोपिनके पग परै धन्य तुम्हारी नेम।

धाइ-धाइ द्रुम भेंटहीं ऊधो छाके प्रेम॥

उद्धवजीकी विचित्र दशा हो गयी, आये थे ज्ञान देकर उनका विरहानल बुझाने—गुरु बनकर उन्हें योगकी दीक्षा देने, पर अब तो चेले बनकर पुकार उठे—

उपदेसन आयो हुतो, मोहिं भयो उपदेस।

चेला बनते ही उन्होंने मथुराका राजवेष त्यागकर गोपी-पद-पंकज-पराग गोपका वेष धारण कर लिया और उसी वेषमें वे भगवान‍्के पास पहुँचे, इस समय उन्हें यह होश नहीं था कि मैं यदुवंशी उद्धव हूँ; वे अपनेको गोपियोंके चरणोंका चाकर समझते थे, जगत‍्को भी इसी रूपमें देखते थे, अतएव भगवान् श्रीकृष्णको भी वे यदुनाथ कहना भूल गये और गोपीनाथके नामसे ही पुकारने लगे—

ऊधो जदुपति पै गये, किये गोपको भेस॥

भूले जदुपति नाम, कह्यो ‘गोपाल गुसाईं’।

एक बार ब्रज जाहु देहु गोपिन दिखराई॥

उद्धव कहने लगे—हे गोपाल, हे गोपीनाथ! एक बार चलो न व्रजको? उस प्रेमलोकको छोड़कर यहाँ इस रूखी-सूखी मथुरामें कहाँ आ बसे?

बृंदाबन सुख छाड़िकै, कहाँ बसे हो आय?

प्रेमसिंधु हरि जानिकै ऊधो पकरे पाय॥

सुमिरत ब्रजको प्रेम, नेम कछु नाहिंन भावे।

उमग्यो नैनन नीर बात कछु कहत न आवे॥

उद्धव भगवान‍्के पैर पकड़कर फुफकार मारकर रोने लगे, भगवान् भी प्रेमविह्वल हो जमीनपर गिर पड़े और फिर अपने पीताम्बरसे आँसू पोंछते हुए बोले—‘वाह, तुम तो खूब योग सिखाकर आये उद्धव!’

सूर स्याम भूतल गिरे रहे नैन जल छाइ।

पोंछि पीट-पटसों, कह्यो—‘भल आये जोग सिखाइ’॥

भगवान‍्ने कहा—‘उद्धव! देखा, तुमने गोपबालाओंका निर्मल विशुद्ध, अहैतुक और अनन्यप्रेम! इसीलिये मैं उन्हें क्षणभर नहीं भूल सकता।’ धन्य! इसी प्रसंगमें व्रज-रस-रसीले श्रीनन्ददासजी कहते हैं—

उद्धवजीने कहा—

करुनामयी रसिकता है तुम्हरी सब झूठी।

जबहीलौं नहिं लख्यो तबहिलौं बाँधी मूठी॥

मैं जान्यो ब्रज जायके तुम्हरो निरदय रूप।

जो तुमको अवलंबही वाको मेलो कूप॥

कौन यह धर्म है?

पुनि-पुनि कहै, अहो चलो जाय बृंदाबन रहिये।

प्रेम-पुंजको प्रेम जाय गोपिन सँग लहिये॥

और काम सब छाड़िके उन लोगन सुख देहु।

नातरु टूट्यो जात है अब ही नेह-सनेहु॥

करोगे फिर कहा?

उद्धवजीके शब्द सुनकर भगवान‍्की क्या दशा हुई? सुनिये श्रीनन्ददासजीके ही मुखारविन्दसे—

सुनत सखाके बैन नैन भरि आये दोऊ।

बिबस प्रेम-आवेस रही नाहीं सुधि कोऊ॥

रोम-रोम प्रति गोपिका ह्वै रहि साँवर गात।

कलप-सरोरुह, साँवरो, ब्रजबनिता भई पात॥

उरझि अँग-अँग ते।

फिर किसी तरह सचेत होकर भगवान‍्ने कहा—

हो सचेत कहि भलो सखा पठयो सुधि लावन।

अवगुन हमरे आनि तहाँते लगे बतावन॥

मोमें तिनमें अंतरो एकौ छिन भर नाहिं।

ज्यों देखी मो माहिं ते त्यों मैं तिनहीं माहिं॥

तरंगन वारि ज्यों।

इसके बाद भगवान‍्ने अपना गोपीरूप दिखलाकर उद्धवका भ्रम दूर किया—

गोपीरूप दिखाइ तबै मोहन बनवारी।

ऊधो भ्रमहि निवारि डारि मुख मोहकी जारी॥

अपनो रूप दिखाइकै लीन्हों बहुरि दुराय।

नन्ददास पावन भयो जो यह लीला गाय॥

प्रेमरस-पुंजनी।

यह तो शब्दोंसे किया जा सकनेवाला वर्णन है। वास्तविक गोपीप्रेम तो इससे बहुत ऊँचा है। कुछ महानुभावोंकी धारणा है कि गोपियोंका भगवान‍्के प्रति वही प्रेम था जो कान्ता—स्त्रीका अपने स्वामीके प्रति होता है। कुछ सज्जन कहते हैं कि यह बात नहीं है, जैसा परकीया—परायी स्त्रीका प्रेम अपने जारके प्रति होता है वैसा प्रेम गोपियोंका था। मेरी समझसे ये दोनों ही उदाहरण गोपीप्रेमके लिये पूरे लागू नहीं होते। यह सत्य है कि कान्ताभावमें शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्यका समावेश हो जाता है। पतिव्रता स्त्री अपना नाम, गोत्र, जीवन, धन-धर्म सभी कुछ पतिके अर्पणकर प्रत्येक चेष्टा पतिके लिये ही करती है और पतिके सम्बन्धियोंकी सेवामें शान्तभाव, पतिकी सेवामें दास्यभाव, पतिके साथ परामर्श करनेमें सख्यभाव और भोजनादि करानेमें वात्सल्यभाव रखती है तथा अपना शरीर और मन सब भाँति नि:संकोचरूपसे पतिके अर्पण कर देती है, परंतु भगवान‍्के प्रति गोपियोंके समान केवल प्रेममूर्ति शुद्ध भागवत जीवोंका जो प्रेम होता है वह तो कुछ विलक्षण ही होता है। ऐसे ही परकीयाका भाव भी सर्वांगपूर्ण नहीं है। परकीयाके प्रेमकी इतनी ही बात उदाहरणस्वरूपमें ली जा सकती है कि जैसे परकीयाकी चित्तवृत्ति घरका काम-काज करते हुए भी आठों पहर जारमें लगी रहती है, इसी प्रकार भक्तकी भी भगवान‍्में लगी रहती है; परंतु परकीयाके मनमें तो अंग-संगरूप कामवासना रहती है। गोपियोंमें कामवासनाका लेश भी नहीं था। परकीयाका प्रेमास्पद जार होता है। भगवान् परमात्मामें जारभाव कभी नहीं हो सकता। परमात्मा सर्वथा शुद्ध और निर्विकार हैं, इसलिये यही कहा जाता है कि गोपी-प्रेममें दिव्य परकीयाभाव है जो परम विशुद्ध सर्वथा अनन्य तो है ही, परंतु इससे भी परे उस कोटिका है जहाँतक हमारी कल्पना पहुँचती ही नहीं, इसीसे वह अनिर्वचनीय और अचिन्त्य है।

गोपी-प्रेम विलक्षण है। उसमें ‘शृंगार’ है पर ‘राग’ नहीं है; ‘भोग’ है पर ‘अंगसंयोग’ नहीं है; ‘आसक्ति’ है पर ‘अज्ञान’ नहीं है; ‘वियोग’ है पर ‘बिछोह’ नहीं है; ‘क्रन्दन’ है पर ‘दु:ख’ नहीं है; ‘विरह’ है पर ‘वेदना’ नहीं है; ‘सेवा’ है पर ‘अभिमान’ नहीं है; ‘मान’ है पर ‘धैर्य’ नहीं है; ‘त्याग’ है पर ‘संन्यास’ नहीं है; ‘प्रलाप’ है पर ‘बेहोशी’ नहीं है; ‘ममता’ है पर ‘मोह’ नहीं है; ‘अनुराग’ है पर ‘कामना’ नहीं है; ‘तृप्ति’ है पर ‘अनिच्छा’ नहीं है; ‘सुख’ है पर ‘स्पृहा’ नहीं है; ‘देह’ है पर ‘अहम्’ नहीं है; ‘जगत् ’ है पर ‘माया’ नहीं है; ‘ज्ञान’ है पर ‘ज्ञानी’ नहीं है; ‘ब्रह्म’ है पर ‘निर्गुण’ नहीं है; ‘मुक्ति’ है पर ‘लय’ नहीं है।

भगवान् श्रीकृष्ण और गोपियोंकी यह परम भावकी रासलीला नित्य है, प्रत्येक युगमें है, आज भी होती है; प्रत्येक युगके अधिकारी संतोंने इसे देखा है, अब भी अधिकारी देखते हैं, देख सकते हैं।

यदि इस प्रकारके प्रेमकी तनिक भी झाँकी देखकर धन्य होना चाहते हो, यदि इस अचिन्त्य प्रेमार्णवका कोई एक बिन्दु प्राप्त करना चाहते हो तो भोग और मोक्षकी अभिलाषाको छोड़ दो। श्रीकृष्णमें अपना चित्त जोड़ दो; प्राण खोलकर रोओ, उनके नाम और रूपपर आसक्त हो जाओ। बेच डालो अपना सब कुछ उनके एक रूपबिन्दुके लिये, सर्वस्व निछावर कर दो उनके चरणोंपर, लगा दो अपना तन, मन, धन उनकी सेवामें सदाके लिये अपना सम्पूर्ण आत्मसमर्पण कर दो।

तुम पुरुष हो या स्त्री, ब्राह्मण हो या चाण्डाल, पुण्यात्मा हो या पापी, जो कुछ भी हो, दृढ़ताके साथ भगवान् श्रीकृष्णके निज-जन बननेकी प्रतिज्ञा कर लो। सारे जीवोंमें श्रीकृष्णके दर्शन करो, सुख-दु:ख, सम्पत्ति-विपत्ति और जीवन-मरण सभीमें उस प्रेमास्पदको पहचानकर आनन्दानुभव करो। दिल खोलकर मुक्तकण्ठसे श्रीकृष्ण-नामका संकीर्तन करो, श्रीकृष्णके लिये सच्चे हृदयसे हृदयविदीर्णकारी क्रन्दन करो, सब जगह श्रीकृष्ण रसिकशेखरकी त्रिभंग माधुरी देखो। उनकी कृपा होगी और तुम्हें प्रेम मिलेगा, तुम कृतार्थ हो जाओगे। सबको कृतार्थ कर दोगे। यह निश्चय रखो!

जदपि जसोदा नंद ग्वालबाल सब धन्य।

पै या जगमें प्रेमको गोपी भईं अनन्य॥

—रसखानजी