प्रार्थना
मृत्युशील संसारमें अमर कौन है? चर और अचर सभी तो जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिके चंगुलमें फँसे हैं। सुन्दर मकान बना, उसका जन्म हुआ; कुछ समय बाद वह टूटने-फूटने लगा, व्याधियोंसे घिरा; मरम्मत करायी गयी, इलाज हुआ; अच्छा हो गया। ऐसा होते-होते ही वह जीर्ण हो गया, बूढ़ा हो गया, अब मरम्मतसे काम नहीं चलता, दीवारें गिरने लगीं, छत जमीनमें बैठनेको तैयार हो गयी, एक दिन ऐसा आया कि मकान गिर पड़ा, उसकी मृत्यु हो गयी, बस, यही हाल सबका है। मनुष्य चाहता है मुझे अमुक काम पूरा कर लेना है, वह उसे पूरा करनेकी चेष्टामें लगता है। काम पूरा होता है, परंतु फिर उसमें कुछ कमी मालूम होती है, वह उस कमीको पूरा करनेका प्रयत्न करता है। कमी पूरी होती है, परंतु साथ ही दूसरी कमी आगे तैयार मिलती है। सारांश यह कि मनुष्य इस संसारमें चाहे जितनी ऊँची-से-ऊँची सांसारिक स्थितिको प्राप्त कर ले, कुछ-न-कुछ कमी तो रह ही जायगी। संसारमें ऐसी कोई वस्तु या स्थिति है ही नहीं जो पूर्ण हो, सभी कुछ अपूर्ण हैं, अपूर्णसे पूर्णता कैसे मिल सकती है? अपूर्णको पाकर मनुष्य पूर्णकाम कैसे हो सकता है? परंतु वह इस तत्त्वको समझता नहीं। अपूर्णसे ही पूर्णता प्राप्त करना चाहता है, इसीसे बार-बार कमीका—अभावका अनुभव करता है और दु:खी होता है।
विषयान्धकारमें, जरा-व्याधिके भयानक तूफानमें फँसी हुई जीवन-नौका बड़ी ही तेजीके साथ मृत्युरूपी चट्टानसे टकराकर डूबनेके लिये झकोरे खाती प्रबल धारके साथ ही बहती रहती है। यों किसी-न-किसी कमीको पूरी करनेकी चेष्टामें लगे हुए मनुष्यका अशान्त जीवन कमीकी हालतमें ही नष्ट हो जाता है। कमी तो पूरी होती ही नहीं, हाँ, उसे पूरी करनेके प्रयत्नमें जीवनभर अशान्तिरूपी अग्निकी भयावनी लपटोंमें जलना और कामनाकी परवशतामें भाँति-भाँतिके पापोंका भार संग्रह करना जरूर होता है, यहाँ जीवनभर जले और अगले जीवनमें जलनेके लिये पापका भारी ईंधन जमा कर लिया। बस, आजके हम मनुष्योंकी जीवनधाराका यही स्वरूप है। पर क्या यही वांछनीय है? क्या बार-बार मृत्युके मुखका ग्रास बनना ही हमें अभीष्ट है? यदि नहीं तो हमलोगोंको शीघ्र सावधान होकर ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे हम पूर्ण होकर मृत्युके पंजेसे छूट जायँ। हम अमर हो जायँ। इस अमर होनेका उपाय नित्य सत्य सर्वगत पूर्ण सच्चिदानन्दघन परमात्माको प्राप्त कर लेना है। शास्त्रोंकी सम्मति और संतोंके अनुभवयुक्त वचनोंके अनुसार परमात्मा हमें नित्य प्राप्त है, परंतु इस नित्यप्राप्त वस्तुमें भी हमें जो अप्राप्तिका भ्रम हो रहा है, उसे तो दूर करना ही होगा। उसीको दूर करनेके लिये इस पुस्तकके भिन्न-भिन्न निबन्धोंमें कुछ बातें कही गयी हैं। यद्यपि जगत्के वर्तमान वायुमण्डलमें इस विषयका विशेष महत्त्व नहीं है, आजकलके उच्छृंखल प्रवाहमें बहे हुए अधिकांश मनुष्य तो ऐसे हैं, जो इसको मूर्खोंकी कल्पना समझकर इसकी कुछ भी परवा नहीं करते, कुछ विचारशील और उच्चशिक्षित कहानेवाले इनसे भी आगे बढ़े हुए महानुभाव हैं जो परमेश्वर, परलोक या धर्मसम्बन्धी चर्चामात्रको देशके लिये अत्यन्त हानिकर समझकर उसका नामतक मिटा देना चाहते हैं। तथापि ऐसे लोग भी अभी भारतवर्षमें शेष हैं जो इस विषयकी चर्चाको लाभदायक समझते हैं अथवा कम-से-कम हानिकर तो नहीं समझते। यदि ऐसे सज्जनोंमें किसी एककी भी इस पुस्तकके शब्दोंको पढ़कर परमात्माकी ओर प्रवृत्ति हुई तो मेरे लिये बड़े ही आनन्दका विषय होगा। अवश्य ही यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि इस पुस्तकमें जो कुछ लिखा गया है उसमें वस्तुत: मेरा कुछ भी नहीं है। शास्त्र और संतोंके वाक्य ही प्रकारान्तरसे उद्धृत किये गये हैं। मेरा यह दृढ़ विश्वास अवश्य है कि इनके अनुसार चलनेसे सच्चे सुखके अभिलाषी परमार्थ-पथिकको कुछ-न-कुछ लाभ अवश्य ही होगा, इसी विश्वासके आधारपर मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि पाठकगण यदि उचित समझें तो कभी-कभी इसके किसी-किसी अंशको पढ़ लिया करें।
हनुमानप्रसाद पोद्दार
(कल्याण-सम्पादक)