प्रेम-तत्त्व
१—वह प्रेम प्रेम नहीं है जिसका आधार किसी इन्द्रियका विषय है।
२—नियमोंके सारे बन्धनोंका अनायास आप-से-आप टूट जाना ही प्रेमका एकमात्र नियम है।
३—जबतक नियम जान-बूझकर तोड़े जाते हैं, तबतक प्रेम नहीं है, कोई-न-कोई आसक्ति तुमसे वैसा करवा रही है। प्रेममें नियम तोड़ने नहीं पड़ते, परन्तु उनका बन्धन आप-से-आप टूट जाता है।
४—प्रेममें एक विलक्षण मत्तता होती है, जो नियमोंकी ओर देखना नहीं जानती।
५—प्रेममें भी सुखकी खोज होती है, परंतु उसमें विशेषता यही है कि वहाँ प्रेमास्पदका सुख ही अपना सुख माना जाता है।
६—प्रेमास्पदके सुखी होनेमें यदि प्रेमीको भयानक नरक-यन्त्रणा भोगनी पड़े तो उसमें भी उसे सुख ही मिलता है, क्योंकि वह अपने अस्तित्वको प्रेमास्पदके अस्तित्वमें विलीन कर चुका है।
७—अपना सुख चाहनेवाली तो वेश्या हुआ करती है, जिसके प्रेमका कोई मूल्य नहीं। पतिव्रता तो अपना सर्वस्व देकर भी पतिके सुखमें ही सुखी रहती है, क्योंकि वह वास्तवमें एक पतिके सिवा अन्य किसी पदार्थको ‘अपना’ नहीं जानती।
८—प्रेमास्पद यदि प्रेमीके सामने ही उसकी सर्वथा अवज्ञा कर किसी नवीन आगन्तुकसे प्रेमालाप करे तो इससे प्रेमीको क्षोभ नहीं होता, उसे तो सुख ही होता है; क्योंकि इस समय उसके प्रेमास्पदको सुख हो रहा है।
९—जो वियोग-वेदना, अपमान-अत्याचार और भय-भर्त्सना आदि सबको सहन करनेपर भी सुखी रह सकता है, वही प्रेमके पाठका अधिकारी है।
१०—प्रेम जबानकी चीज नहीं, जहाँ लोक-परलोकके अर्पणकी तैयारी होती है वहीं प्रेमका दर्शन हो सकता है।
११—प्रेमके दर्शन बड़े दुर्लभ हैं, सारा जीवन केवल प्रतीक्षामें बिताना पड़े, तब भी क्षोभ करनेका अधिकार नहीं।
१२—प्रेम खिलौना नहीं है, परन्तु धधकती हुई आग है। जो सब कुछ भुलाकर उसमें कूद पड़ता है, वही उसे पाकर कृतार्थ होता है।
१३—प्रेमका आकार असीम है, जहाँ संकोच या सीमा है वहाँ प्रेमको स्थान नहीं।
१४—प्रेम प्रेमके लिये ही किया जाता है और इसकी साधनामें बिना विरामके नित्य नया उत्साह बढ़ता है।
१५—प्रेम अनिर्वचनीय है, प्रेमका स्वरूप केवल प्रेमियोंकी हृदय- गुफाओंमें ही छिपा रहता है। जो बाहर आता है सो तो उसका कृत्रिम स्वरूप होता है।
१६—भगवान् श्रीरामने देवी सीताजीको सन्देश कहलवाया था—
तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।
जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
१७—कबीरने कहा है—
प्रेम न बाड़ी नीपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देहि लै जाय॥
जब ‘मैं’ था तब ‘हरि’ नहीं, अब ‘हरि’ हैं ‘मैं’ नाहिं।
प्रेम-गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं॥