तेरी हँसी

हे मेरे प्राणाराम राम! तू बड़ा ही लीलामय है, खूब खेल खेलता है। मनमाना नाच भी नचाता है और अलग बैठा टुक-टुक देखता हुआ हँसा भी करता है। यह सृष्टि तेरे हास्यका ही तो विलास है, परंतु तेरा हँसना नित नये-नये रंग लाता है; तेरी एक हँसीमें सृष्टिका उदय होता है, दूसरीमें उसकी स्थिति होती है और तीसरीमें वह तेरे अंदर पुन: विलीन हो जाती है। पर तू तीनों ही अवस्थाओंमें हँसता है। इतनी उधेड़-बुन हो जाती है, परन्तु तेरी एकरसी हँसीमें कहीं अन्तर नहीं पड़ता। लोग तेरी हँसीके नाना अर्थ करते हैं; उनका वैसा करना अनुचित भी नहीं है; क्योंकि लोगोंको भिन्न-भिन्न रूप भासते ही हैं। यही तो तेरी हँसीकी विलक्षणता है, इसीमें तो तेरी मौजका अजब नजारा है। किसीका जन्म होता है, तू हँसता है; वह खाता-खेलता और रंग-रागमें मस्त रहता है, तू हँसता है; फिर हाथ फैलाकर जब वह सदाके लिये सो जाता है—क्रन्दनकी करुण-ध्वनिसे दिशाएँ रो उठती हैं, तू तब भी हँसता ही है। तेरी हास्यलीला अनादि और अनन्त है!

लोग तेरे इस हास्यकी थाह लेना चाहते हैं, अपने परिमित और विलास-विभ्रमग्रस्त विमोहयुक्त बुद्धिबलसे तेरी हँसीका रहस्य जानना चाहते हैं, यह बुद्धिका सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर होते-होते सर्वथा विलुप्त हो जाना नहीं तो क्या है? जलका जरा-सा नगण्य कण सब ओरसे परिपूर्ण पारावारहीन जल-निधिका अन्त जानना चाहता है, यह असम्भव भावना नहीं तो क्या है? जबतक वह अलग खड़ा देखेगा तबतक तो पता लगेगा कैसे? और कहीं पता लगानेकी लगनमें अंदर चला गया तब तो उसकी अलग सत्ता ही नष्ट हो जायगी, फिर पता लगायेगा ही कौन? जो ढूँढ़ने गया था, वही खो गया! अत: हे महामहिम मुनि-मन-मोहन मायिक-मुकुटमणि राम! मेरी समझसे तो तेरे इस हास्यका मर्म जाननेकी सामर्थ्य जगत‍्के किसी भी प्राणीमें नहीं है। हाँ, कोई तेरा खास प्रेमी तेरी कृपासे रहस्य समझ पाता होगा; परन्तु उसका समझना-न-समझना हमारे लिये एक-सा है, क्योंकि वह फिर तुझसे अलग रहता ही नहीं—

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥

जो तेरी मधुर मुसकानपर मोहित होकर तेरी ओर दौड़ता है और तेरे समीप पहुँच जाता है, उसे तो तू अपने गोदसे कभी नीचे उतारता नहीं और जो विषय-विमोहित हैं, उनको तेरे रहस्यका पता नहीं।

आश्चर्य है कि इसपर भी हम तेरी लीलाओंके रहस्योद्घाटनका दम भरते हैं और जो बात हमारी स्थूल बुद्धिमें नहीं जँचती, उसे तेरे लिये भी असम्भव मान बैठते हैं। हमारी इस बुद्धिपर—हमारे इस बाल-चापल्यपर तुझे दया तो आती ही होगी दयामय!

महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वेदव्यास और गोसाईं तुलसीदासजी प्रभृति संतोंको धन्य है, जिनकी वाणीसे तूने दयाकर अपनी कुछ लीलाएँ जगत‍्को सुनायीं। तेरी इन लीलाओंके दिव्यालोकसे असंख्य प्राणियोंका तमोमय मार्ग प्रकाशित हो उठा, जिसके सहारे वे अनायास ही अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँचकर सदाके लिये सुखी हो गये। परन्तु तेरी ये लीलाएँ हैं बड़ी ही विचित्र, अद‍्भुत और मोहिनी, बड़े-बड़े तार्किक विद्वानोंकी बुद्धि इनकी मोहकतामें पड़कर चकरा जाती है। अवश्य ही जो लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक बुद्धिका व्यर्थाभिमान छोड़कर तेरी शरण हो जाते हैं, उनके विवेकचक्षुओंके सामने तेरी दुस्तर मायाका आवरण हट जाता है।

नाथ! अब तो ऐसा कर दे, जिससे प्रत्येक अवस्था, प्रत्येक समय, प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक चेष्टामें तेरी नित्य अनन्त कृपाकी पूर्ण अखण्ड माधुरी मूरतिके दर्शन होते रहें और फिर वह पूर्ण कृपाविग्रह कभी आँखोंसे ओझल हो ही नहीं। सुना है, तेरी हँसीका रहस्य तभी जाना जा सकता है।