विनय

हे दयासागर! हे दीनसर्वस्व! हे हमारे हृदयके परमधन! हम दीन अब कहाँ जायँ? तुम्हारे इन अभय चरणोंके सिवा और कहीं भी तो ठौर नहीं है! बहुत भटके, बहुत धक्‍के खाये, बहुत देखा; पर कहीं ठौर-ठिकाना नहीं लगा! कहीं टिककर नहीं रह सके, कहीं भी शान्ति नहीं मिली। हे पतितपावन! अब तो तुम्हारी शरण आ पड़े हैं। शरणागतवत्सल तुम्हारा विरद है। प्रभो! हमें अब और कुछ भी नहीं चाहिये। विद्या, बुद्धि, धन, मान, परिवार, पुत्र, पाताल, स्वर्ग किसीकी भी इच्छा नहीं है। हम योगी, ज्ञानी, तपस्वी और महात्मा नहीं बनना चाहते। तुम्हारा वैकुण्ठ, तुम्हारी मुक्ति और तुम्हारा परमधाम हमें नहीं चाहिये। हमको तो नाथ! दयाकर अपना वह प्रेम दो जिससे अश्रुपूर्ण-लोचन और गद‍्गदकण्ठ होकर निरन्तर तुम्हारा नाम-गुणगान करते रहें; वह शक्ति दो, जिससे जन्म-जन्मान्तरमें कभी तुम्हारे चरणकमलोंकी विस्मृति एक क्षणके लिये स्वप्नमें भी न हो, तुम्हारा नाम लेते हुए आनन्दसे मरें और तुम्हारी इच्छासे जहाँ जिस योनिमें जन्में तुम्हारी ही छत्र-छायामें रहें। चित्तकी वृत्तियाँ सदा बिना ही कारण तुम्हारी तरफ दौड़ती रहें और यह मस्तक तुम्हारे दासानुदासोंकी पद-पद्मपरागसे सदा ही अभिषिक्त रहे!