भगवान्की असीम दयाका फल
भगवान्की दयाके विषयमें एक कहानी सुनी जाती है। इस कहानीमें विशेष रहस्य है। कहानी इस प्रकार है—एक संन्यासी महात्मा थे, वे एक बार किसी गृहस्थके यहाँ भिक्षाके लिये गये। उसके दरवाजेपर आवाज दी—‘नारायण हरि’। गृहस्थ घरके भीतर था। वह बाहर आया और हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें गिर गया तथा रोने लगा। महात्माने पूछा—तुम क्यों रोते हो? गृहस्थ बोला—महाराज! मेरे समान संसारमें कोई दु:खी नहीं है, कोई दरिद्र नहीं है। मैं इतना गरीब और दु:खी हूँ कि मैं क्या कहूँ।
मेरे रोनेका कारण यह है कि आप हमारे घर आये और ‘नारायण हरि’ कहकर भिक्षाके लिये प्रेरणा दी किन्तु महाराज! मैं क्या कहूँ, मेरे घरवाले तीन दिनसे भूखे हैं, खानेके लिये घरमें अन्नका एक दाना भी नहीं है। शहरके लोगोंने बड़ी मदद की, उधार रुपया भी दिया। देनेवाले लोग कितना दें, तीन दिनसे हम सब भूखे हैं। हमारे समान कोई गरीब, अनाथ, दरिद्र, भूखा नहीं है। तब उस महात्माने कहा कि तुम्हारे समान संसारमें कोई धनी नहीं है, तुम चाहो तो सबको मालामाल कर सकते हो। रंकको भी धनी बना सकते हो, दरिद्रकी भी दरिद्रता मिटाकर उन्हें एकदम धनी बना सकते हो, ऐसी तुम्हारी सामर्थ्य है। उस गृहस्थने कहा—‘महाराज! मेरी न कोई सामर्थ्य है, न कोई करामात। न मेरे पास रुपया है। आप कैसी बात कह रहे हैं। मेरी समझमें बात नहीं आती। आप कहते हैं—तुम्हारे समान कोई धनी नहीं है, महाराज! मैं समझता हूँ कि मेरे समान कोई दरिद्र नहीं है, कोई गरीब नहीं; कोई अनाथ नहीं है आप बिलकुल विपरीत बात कह रहे हैं। महात्माने कहा—देखो, तुम्हारे घरमें यह क्या है? गृहस्थ बोला—सिल-लोढ़ा है। महात्माने लोढ़ेको उठाया और बोले—‘यह क्या है?’ गृहस्थ बोला—यह पत्थर है। महाराज बोले हम इसे पत्थर नहीं मानते। गृहस्थ बोला—आप मानें चाहे न मानें। आप कहें तो मैं हजारों आदमियोंसे कहलवा दूँ कि यह पत्थर है।
महात्मा बोले—हजार आदमियोंकी बात सुनानी है या मुझे जो प्रत्यक्ष दीख रहा है, उसे मानना है। गृहस्थने कहा—महाराज! आपको कुछ और दीखता है क्या? क्या पत्थर नहीं दीखता? महात्मा बोले—नहीं, मुझे तो कुछ और ही दीख रहा है। गृहस्थ बोला—महाराज! क्या करूँ। इसमें आपकी दृष्टिका दोष है। महात्मा बोले—हमारी दृष्टिका दोष नहीं है, तुमलोगोंकी दृष्टिका दोष है। तुमने कभी पारसका नाम सुना है। गृहस्थ बोला—सुना था और उसका प्रभाव भी सुना था। महात्मा बोले—क्या सुना था। गृहस्थ बोला—सुना था कि लोहेको पारस पत्थरसे छुआ दो तो लोहा सोना बन जाय। महात्मा बोले—यह वही चीज है। तुम्हारे घरमें कोई लोहेका बर्तन है? गृहस्थने कहा—हाँ महाराज—तवा है, चिमटा है, संडसी है, कड़छी है, कूँड़िया है। महाराज! मैं तो गृहस्थ आदमी हूँ। इस तरहके लोहेके बर्तन तो पड़े ही हैं। महात्मा बोले—अच्छा लाओ, लोहा।
गृहस्थ लोहेके सामान लाया। महात्माजी उन्हें छुआते गये और सोना बनाते गये। महात्मा बोले—अब बताओ यह पत्थर है या पारस? गृहस्थ बोला—महाराज! यह तो प्रत्यक्ष पारस है। महात्माजीने कहा—यदि तुम्हें कोई कहे कि यह पत्थर है तो मानोगे? गृहस्थ बोला—नहीं मानेंगे। महात्मा बोले—अब तू बतला कि तेरे समान संसारमें कोई धनी है क्या? गृहस्थ बोले—हाँ महाराज नहीं है। महात्माजीने कहा—तुम यदि चाहो तो हजारों आदमियोंको धनी बना सकते हो, लखपती बना सकते हो? यह पत्थर तुम्हारे घरमें ही पड़ा था या कहींसे आया? गृहस्थ बोले—महाराज! बाहरसे नहीं आया, यह तो हमारे घरमें ही था। हम जानते नहीं थे। इसलिये दु:खी हो रहे थे।’
यही बात भगवान्की दयाके विषयमें है। भगवान् एवं उनकी दया तो पहलेसे ही है, जैसे उसके घरमें वह पत्थर पहलेसे ही था। किंतुु हम भगवान्की दयाको दया नहीं मान रहे हैं। इसलिये भटकते फिरते हैं।
वह गृहस्थ रोटियोंके लिये भटकता था और हमलोग संसारके विषयभोगोंके लिये मारे-मारे फिरते हैं। क्योंकि भगवान्की दया अपने ऊपर नहीं मानते हैं। दया तो भगवान्की है ही। आप मानें तो भी है, नहीं मानें तो भी है। माननेसे मनुष्य उसे जान लेता है और जाननेसे उसको विशेष आनन्द आता है—परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। पहले तो इस बातको सोचे कि भगवान्की अपार दया है, और दया समझकर उसको मान लें तो बहुत-सा काम सफल हो जाय। और माननेके बाद उसका ज्ञान अपने-आप ही हो जाय, तब तो बेड़ा पार ही है।
इसपर भी एक कहानी है। कुछ आदमी एक गाँवसे दूसरे गाँव जा रहे थे, बड़ी जोरसे वर्षा आ गयी। बादल इतने घने हो गये कि अपना हाथ नहीं दीखता। जंगलमें ठहरनेके लिये किसी बड़े आदमीने धर्मशाला बना रखी थी। ऐसी परिस्थितिसे बचनेके लिये सभी लोग उस धर्मशालामें चले गये। उस धर्मशालामें बहुत-से कमरे थे। वे कमरोंमें बैठ गये किंतु अंधेरा था। कमरेमें जाड़ा लगता था। ठंडी हवा चल रही थी। सभी ठिठुर रहे थे, किंतु एक कमरा गरम था, वहाँ उनको इतनी सर्दी नहीं लग रही थी। वे सोचने लगे—यहाँ गर्मी कैसे आयी। बात यह थी कि एक कोनेमें धधकते हुए अंगार पड़े थे और उनपर राख आ गयी थी। राखसे ढके रहनेके कारण अंगार किसीको दीखते नहीं थे। किंतुु कमरा गरम था। कमरेकी गर्मीका कारण सभी लोग खोजने लगे, सभी कहने लगे कि और तो सब कमरे ठंडे हैं, यही क्यों गरम है? इसका कोई हेतु होना चाहिये। खोज करनेपर राखसे ढकी हुई आग मिल गयी वहाँ बहुत लकड़ियाँ पड़ी थीं। ईंधनकी कोई कमी नहीं थी। लोगोंने ईंधन जलाना शुरू कर दिया। उससे अग्नि प्रकट हो गयी। लोग दौड़-दौड़कर आये, किसीने कहा—भैया! थोड़ी आग मुझे भी दे दो। लोगोंने पूछा कि क्या करोगे? उसने कहा—भोजन बनायेंगे तथा दीपक जलाकर प्रकाश कर लेंगे। दूसरे सज्जन आये और बोले—भैया मुझे भी थोड़ी आग दीजिये। लोगोंने कहा कि आप क्या कीजियेगा। वे बोले— हम अग्निहोत्री ब्राह्मण हैं। पुत्रके लिये यज्ञ करते हैं, इसलिये हमें अग्निकी आवश्यकता है। लोगोंने कहा—ले जाइये। तदनन्तर एक ब्राह्मण आये, कहने लगे थोड़ी आग मुझे भी दे दीजिये। उनसे पूछा गया कि आप अग्निका क्या करेंगे? उन्होंने कहा—मैं अपनी आत्माके कल्याणके लिये अग्निहोत्र करूँगा। निष्कामभावसे अग्निहोत्र करनेवालेका अन्त:करण शुद्ध हो जाता है और परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। तत्पश्चात् उनको भी अग्नि लोगोंने दे दी और वे सभी अपना-अपना अभीष्ट काम करने लगे। अब इसमें विचार करना चाहिये कि जब अग्निका ज्ञान नहीं था तब भी कमरा गर्म था। इतना लाभ तो बिना ज्ञान ही मिलता था। अग्निका ज्ञान नहीं रहनेपर भी गर्मी लोगोंको मिल रही थी। जब अग्निका ज्ञान हो गया कि अग्नि कमरेमें है तो सभी लोग अग्निसे लाभ उठाने लगे।
किसीकी मान्यता थी कि ‘अग्नि देवता हैं’ और कुछ लोग अग्निको एक जड पदार्थ समझते थे। इसमें दो शक्ति है—एक जलानेकी और दूसरी प्रकाशकी। जैसे सूर्यमें दोनों शक्तियाँ हैं—एक जलानेवाली शक्ति और दूसरी प्रकाश करनेवाली। चन्द्रमामें केवल एक ही शक्ति है मात्र प्रकाश करनेवाली, जलानेवाली नहीं, क्योंकि वह ठंडा है। अग्निमें दोनों शक्तियाँ हैं। जिनकी यह श्रद्धा थी कि ‘अग्नि देवता हैं’ वे अध्यात्म-विषयक लाभ उठाये, कामना सिद्धि-विषयक लाभ उठाये। सकामभावसे अग्निहोत्र करनेवाले पुत्र-विषयक लाभ उठाये। जो ब्राह्मण उच्च कोटिका महात्मा बनना चाहते थे, वे उस अग्निमें निष्कामभावसे हवन करके आत्मशुद्धि होनेका लाभ उठाये। इसी प्रकार इन बातोंको महात्मा, ईश्वर, गंगा सभीके ऊपर घटा सकते हैं। जिस देशमें महात्मा निवास करते हैं, उस देशमें स्वाभाविक ही जो लाभ होता है वह तो हो ही जाता है, चाहे लोगोंको ज्ञान हो या न हो। महाभारतकी बात है महाराज युधिष्ठिर विराटनगरमें वास करते थे तो भीष्मजीने कौरवोंकी सभामें यह बात कही कि जिस जगह राजा युधिष्ठिर होंगे वहाँ कभी अकाल नहीं होगा। वहाँ कोई महामारी नहीं आयेगी। दैवी प्रकोप नहीं होगा। जहाँ राजा युधिष्ठिर होंगे वहाँकी प्रजा धर्मात्मा बनेगी; सत्यवक्ता होगी और उस देशमें धन-धान्य बढ़ेगा, धर्म बढ़ेगा। बहुत-सी बातें कहीं। इन सब बातोंको सुनकर दूतोंने बताया कि यह जो बात कहते हैं ये सारी बातें विराटनगरमें मिलती हैं। इस आधारपर दुर्योधनने विराट नगरपर चढ़ाई कर दी। यह ध्यान देना चाहिये कि राजा युधिष्ठिरका कितना भारी प्रभाव पड़ता था। वे जिस देशमें वास करते थे, उस देशमें धन-धान्य और धर्मकी वृद्धि होती थी। वहाँ अकाल नहीं पड़ता था, महामारी नहीं आती थी। विराटनगरमें युधिष्ठिर सालभर रहे, किंतु इसपर किसीका भी लक्ष्य नहीं रहा कि युधिष्ठिरमें ये गुण हैं। फिर भी राजा विराटने युधिष्ठिरसे लाभ उठाया और वहाँके निवासी लाभ उठाये। राजा विराट जब यह जान गये कि ये पाण्डव हैं तो विशेष लाभ उठाये। राजा विराट युधिष्ठिरसे बोले कि मैं अपनी लड़की उत्तराका विवाह अर्जुनके साथ करूँगा। लेकिन अर्जुनने कहा कि नहीं, मेरा बेटा अभिमन्यु है, उसके साथ इसका विवाह कर सकते हैं क्योंकि इसे मैंने पढ़ाया है। इसलिये यह मेरी लड़कीके समान है। विराटने अभिमन्युके साथ उत्तराका विवाह कर दिया। इसी प्रकार कहीं भी कोई महात्मा रहे उस महात्माके रहनेसे स्वाभाविक जो लाभ मिलना है वह तो मिलेगा ही, चाहे उसे जानें, चाहे न जानें। महात्माको महात्मा जानने और माननेसे विशेष लाभ होगा। उसको माननेसे भी बहुत लाभ हो जाता है और मान लेनेसे आगे जाकर वह जान जाता है तथा जाननेसे विशेष लाभ हो जाता है, जाननेसे उसमें श्रद्धा हो जाती है और वह श्रद्धा यदि सकाम हो तो भी लाभदायक और निष्काम हो तो और भी लाभदायक है। यही बात ईश्वरकी भक्तिमें है। बिना प्रभाव जाने ईश्वरकी भक्ति यदि कोई करे तो उससे भी उसको लाभ होता है। जैसे अजामिलने अपने लड़केका नाम ‘नारायण’ रख लिया था। मृत्युकालमें यमके दूत उसे लेनेके लिये आये तो उसने अपने लड़केका नाम लिया—‘नारायण-नारायण’। अजामिल तो समझता था कि मैं अपने लड़केको बुला रहा हूँ। वह यह नहीं समझता था कि मेरे लड़केका जो नाम है वही नाम भगवान्का भी है और इसका उच्चारण करनेसे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और जब पाप नष्ट हो जाते हैं तब वह यमके द्वार नहीं जाता। उसे यह ज्ञान नहीं था। जब भगवान्के पार्षद आये तब उसे यह ज्ञान हुआ। भगवान्के पार्षदोंने यमदूतोंको मार भगाया और वह बच गया। फिर उसने हरिद्वारमें जाकर भगवान्की भक्ति की, जिसके प्रभावसे उसका कल्याण हो गया। तात्पर्य यह कि बिना जाने भी भगवान्की भक्ति करनेसे लाभ होता है और यदि भगवान्को भगवान् मानकर भक्ति करे तो और भी विशेष लाभ हो जाय। फिर भगवान्के विषयमें ज्ञान होनेपर उनमें श्रद्धा हो जाय तो और भी अधिक लाभ हो सकता है। वह श्रद्धा यदि निष्काम हो तो उसके लाभका ठिकाना ही नहीं है।
उपर्युक्त बात समझकर भगवान्के नामका जप निरन्तर गुप्त-रूपसे करना चाहिये। किसीसे यह जनाना नहीं चाहिये कि मैं जप करता हूँ। जप भी एक-तार करना चाहिये। तार टूटने न दे। भगवान्के नामका जप और भगवान्के स्वरूपका ध्यान शिवजीकी भाँति एक-तार करे।
भगवान्के बहुत-से नाम हैं, उनमें कोई भी नाम, जिसमें अपनी श्रद्धा-भक्ति और विश्वास हो वही अपने लिये सबसे बढ़कर है। जैसे मुसलमानोंके लिये अल्ला-खुदा, हिन्दुओंके लिये ओम्, राम, हरि, गोविन्द, वासुदेव, नारायण आदि कोई भी भगवान्का नाम, जिस नामके ऊपर अपनी श्रद्धा-भक्ति हो उसी नामका जप निरन्तर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक करे। यदि भगवान्में प्रेम होनेके लिये अथवा भगवान्की प्राप्तिके उद्देश्यसे जप करे तो वह जप निष्कामके तुल्य है। यदि कोई भी कामना न करे तो भगवान् उसे समयपर अपने-आप ही मिलेंगे। अत: भगवान्की प्राप्तिकी भी कामना न करे। इस प्रकारका भजन बहुत दामी है। भगवान्का ध्यान इस प्रकार करे— ‘भगवान्का रूप और लावण्य अलौकिक है। संसारमें वैसा रूप-लावण्य है ही नहीं। करोड़ों कामदेवोंकी भी यदि उपमा दी जाय तो भी उनके साथ वह उपमा लागू नहीं हो सकती, वह तो अनुपम है, अनुत्तम है। उनके समान कोई उत्तम नहीं है। उनमें कोई उपमा लग नहीं सकती। उसके सदृश कोई वस्तु नहीं जिसकी उपमा दी जाय। वह इतने सुन्दर हैं कि यदि कोई एक बार भी उनके असली रूपकी झाँकी देख ले तो बस उनमें तन्मय हो जाय, संसार भूल जाय, संसारका ज्ञान भूल जाय एवं अपना ज्ञान भूल जाय। उसके आनन्दकी कोई सीमा ही नहीं रहे। जैसे चकोर पक्षी पूर्णिमाके चन्द्रमाको देखकर मुग्ध हो एकटक देखता ही रहता है। पलकें झपकती ही नहीं। इसी प्रकार भगवान्को एकटक देखता ही रहे, पलकें झपके ही नहीं।’ चकोर पक्षी और चन्द्रमाका उदाहरण भी वहाँ नहीं घटता है, क्योंकि उनके समान तो वही हैं। नेत्रोंके द्वारा उनका रूप-लावण्य देखकर, मुखारविन्द देखकर ऐसा माने कि मानो उसे मैं पी जाऊँ या उनको देखता ही रहूँ। देखते-देखते प्रभुका स्वरूप रह जाय अपनेको भूल जाय।
ध्यान करनेके समय बार-बार रोमांच होने लगे, अश्रुपात होने लगे, आश्चर्य हो, सोचे कि मैं एक तुच्छ आदमी हूँ, फिर भी मुझे भगवान् मिले यह कैसे आश्चर्यकी बात है। खुशीकी सीमा न रहे, ज्ञानकी सीमा न रहे। शान्तिकी सीमा न रहे। वह स्वरूप देखकर भगवान्के चरित्रोंको याद करे। भगवान् रामका चरित्र, कृष्णजीका चरित्र जिसे जो प्यारा हो, जिसे जो अपना इष्ट हो, जिसपर अपनी श्रद्धा हो, उसीकी लीला याद करे। उन्हें देख-देखकर स्वयं मुग्ध हो जाय अथवा मानसिक लीला देखकर उस ध्यानमें तन्मय हो जाय। फिर उस लीलामें उनके गुणोंका दर्शन करे।
गुण, यह कि भगवान् बड़े प्रेमी हैं, बड़े दयालु हैं, क्षमावान् हैं—ये सब उनमें अनन्त गुण हैं। उनमें क्षमा, दया, शान्ति, संतोष, सरलता, ज्ञान, वैराग्य अनेक गुण भरे पड़े हैं, अपरिमित हैं। हमलोग जो अनुमान करते हैं, समझते हैं, वह हमारा अनुमान और समझ बहुत कमजोर है। उनके गुणोंको देख-देखकर ऐसा मुग्ध हो जाय, समझे कि मेरे ऊपर भगवान्की इतनी दया है कि वे मुझ-जैसे तुच्छ नालायकसे भी इतना प्रेम करना चाहते हैं। भगवान्की तरफसे फाटक खुला हुआ है कि तुम चले आओ। भगवान्का हाथ हमारे सिरपर है, अब हमारे लिये किस बातकी कमी है। क्यों चिन्ता करें। भगवान्की दयाका रहस्य समझ जाय, तत्त्व समझ जाय तो क्षण-क्षणमें उसे मुग्धता हो जाय। प्रसन्नता हो जाय तथा उसमें धीरता, गम्भीरता, वीरता—ये गुण आ जायें, निर्भयता आ जाय। वह यह समझे कि मैं भगवान्की शरण हूँ, भगवान्के आश्रित होकर बस भगवान्की गोदमें बैठा हूँ।
एक लड़का किसीको गाली देकर, मारकर अपनी रक्षाके लिये दौड़कर माँकी गोदमें बैठ जाय तो वह देखेगा कि अब मैं सुरक्षित हो गया हूँ। परंतु दूसरा आकर कहे कि तेरे लड़केने मुझे गाली दी है, मारा है तो माँ न्याय करती है। लड़केसे पूछती है कि बेटा! तूने इसे मारा है? वह कहता है—हाँ। माँ कहती है—क्यों मारा? वह कहता है इसने पहले मुझे मारा, तब मैंने इसे मारा। माँ उससे पूछती है—बेटा! तूने इसे क्यों मारा? वह कहता है—इसने पहले मुझे गाली दी थी। लड़केसे पूछती है—बेटा! तूने इसे गाली क्यों दी। वह कुछ भी उत्तर न देकर चुप हो जाता है तब माँ समझ जाती है कि मेरे लड़केका कसूर है, फिर माँ उसे थप्पड़ लगाती है। थप्पड़ लगानेसे लड़का रोने लगता है। जो लड़के शिकायत लेकर आये थे वे खुश हो जाते हैं—मनमें सोचते हैं—मार पड़ गयी, बदला ले लिया और यह लड़का साड़ीके भीतरसे तो हँसता है और ऊपरसे रोता है। हँसता है इसलिये कि माँकी मार तो मीठी है, वह लड़का मुझे मारता तो मेरी जान ले लेता। यही बात भगवान्के विषयमें है।
पापोंका फल भगवान् हमारे हितके लिये भुगताते हैं यानी मारते हैं, क्योंकि भगवान् हमारे पापोंका दण्ड भुगताकर भविष्यमें जो लाखों जन्म होनेवाले हैं, उनसे बरी कर देते हैं। उद्धार कर देते हैं। जैसे माँने अपने लड़केको दो थप्पड़ मारकर जो दूसरे लड़के मारने आये थे उनसे उसको बरी कर दिया। भगवान् हमलोगोंको सारे पापोंसे यानी दुर्गुणोंसे, सारे दुर्व्यसनोंसे, दुराचारोंसे बचा लेते हैं। निद्रा, प्रमाद—ये सभी खतरेकी चीजें हैं, मामूली मार मारकर सभी खतरोंसे मुझे बचा लिया। जैसे कोई रोगी है, कोई बीमार है, कोई लड़का मर जाता है या घरमें आग लग जाती है। यह मार है परंतु है बहुत मीठी। इससे जीवका कल्याण हो जाता है। भगवान् सभी पापोंसे मुक्त कर देते हैं। ये सभी अपने मनके विपरीत चीजें आकर प्राप्त हो जायँ तो यही समझना चाहिये कि यह भगवान्की देन है, जो दया करके आपने दिया है। जो भगवान्की दयाके तत्त्वको समझता है वह तो हँसता ही रहेगा। कोई भी घटना हो उसमें भगवान्की दया-ही-दया दीखे। पहले तो दया माननी होती है कि ‘मेरे ऊपर भगवान्की बड़ी भारी दया है। मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा जो अमृतके समान लगती है, उनका नाश हो रहा है।’ यह देखकर जो लोग चिन्ता करते हैं वे मूर्ख हैं, समझदार आदमी ऐसा नहीं करते। यह मान ले कि भगवान्की बड़ी भारी दया है। उस दयाको बारम्बार याद करके वह मुग्ध होता रहे। भगवान् श्रीरामचन्द्रजी लंकासे जब अयोध्या आये तब अमित रूप धारण करके सबसे यथायोग्य मिलते हैं, जिससे मिलते हैं, उसे बड़ा आश्चर्य होता है। बड़ी प्रसन्नता होती है कि ‘भगवान् सबसे पहले मुझसे मिले। मेरा भाग्य खुल गया। कहाँ भगवान् कहाँ मैं। कितने आश्चर्यकी बात है। मैं एक तुच्छ आदमी हूँ, मुझसे त्रिलोकीके नाथ सबसे पहले मिल रहे हैं।’ ऐसा उनको अनुभव हुआ।
भगवान् शंकर भगवती उमासे कहते हैं—हे उमा! काठकी कठपुतलीको जैसे सूत्रधार नचाता है, ऐसे ही भगवान् सबको नचाते हैं, यानी लीला करते हैं। उस लीलाको लीला मान ले तो बेड़ा पार है। भगवान्की प्रत्येक लीलामें भगवान्का विधान भरा है। जो कुछ हो रहा है, सब भगवान्के हुक्मसे हो रहा है। यदि भगवान्की दया न मानें तो यह भी मूर्खता है और यदि मानकर चलें तो आगे जाकर यह दयाकी बात समझमें आ सकती है। फिर माननेकी बात नहीं रहेगी, परंतु शुरूमें तो मानना पड़ता है, फिर माननेपर देखो कैसा आनन्द आता है। उसमें इतनी धीरता आ जाती है, इतनी गम्भीरता आ जाती है, इतनी निर्भरता आ जाती है जितनी बालकके हृदयमें माँकी गोदमें बैठनेसे निर्भयता आ जाती है।
भगवान्की गोदमें बैठनेके बाद फिर भय किसका? उसमें गम्भीरता आ जाती है, क्योंकि भगवान्में गम्भीरता है। उसमें तितिक्षा आ जाय, प्रेमकी जागृति हो जाय, भगवान्में परम श्रद्धा हो जाय फिर तो भगवान्को छोड़कर वह कहाँ जाय। आदमी जब भगवान् पर निर्भर हो जाता है तो उसका बेड़ा पार हो जाता है।
दूसरी बात यह है कि जैसे कोई एक बुद्धिमान्, विद्वान्, आयुर्वेदशास्त्रका ज्ञाता वैद्य है, किंतुु उसके हाथमें यश नहीं है तो लोग उससे इलाज नहीं करवाते हैं। परंतु एक पढ़ा-लिखा नहीं है, धीरे-धीरे इलाज करते-करते उसे थोड़ा अभ्यास हो गया है, अनुभव हो गया है और उसका इलाज ठीक होता है तो लोग उससे इलाज कराने लगते हैं। इसी प्रकार सफलता यदि थोड़ी भी हो जाय तो दुनिया उलट पड़े। जैसे अंगुलमें (उड़ीसामें) एक लड़का था, उसके विषयमें यह अफवाह हुई कि उसके पास एक जड़ी-बूटी है, जिसे सभी रोगोंमें वह देता है और जिसको देता है वह ठीक हो जाता है। लोगोंको झूठा भ्रम हो गया था। वह बात सच्ची नहीं थी। संयोगवश कुछ आदमियोंका दु:ख दूर हो गया तो लोग टूट पड़े। हजारों, लाखों आदमी गये। बड़े-बड़े अफसर गये, धनी गये, उसके हाथमें यश था, सफलता थी, वह दवा नहीं जानता था। वह न कोई विद्वान् था और न वैद्य ही। किंतुु थोड़ी-सी दवा कुछ आदमियोंको दी, सफलता हो गयी। इससे गाँव टूट पड़ा, शहर टूट पड़ा, लोग टूट पड़े। अपने भारतवर्षके हजारों, लाखों आदमी वहाँ जाकर भिक्षा माँगने लगे। कहते कि तुम एक चुटकी दवा दे दो। एक जलसा-सा हो गया। यदि सच्ची सफलता हो जाय तो बात ही क्या है। भगवान्के यहाँ तो सच्ची सफलता है। महात्माके यहाँ सच्ची सफलता है। यह बात खयाल रखनी चाहिये कि भगवान् मुझे विद्या, बुद्धि, ज्ञान और कुछ न देकर बस सफलता दे दें। भगवान् सफलता दे दें तो सफलता-ही-सफलता है। किसी प्रकारकी हानि नहीं, नुकसान नहीं।
एक कहानी सुनी जाती है। बीकानेरमें एक बंजारा था। वह बीकानेरकी मेट (मुलतानी मिट्टी) बेचता था। पुराने जमानेमें रेल नहीं थी, बहुत-से बैलोंपर माल लाद-लादकर ले जाता और उसे बेचता। एक बार वह दिल्लीके लिये मेट लादकर चला, रास्तेमें जैसे-जैसे मेट बिकती जाती वह खाली जगहमें बालू भरता जाता। एक बुद्धिमान् आदमी दिल्लीसे बीकानेर जा रहा था, मिला, उसने बंजारेसे कहा कि जो बोरा खाली हो जाता है उसमें बालू क्यों भरता है? बंजारेने कहा कि क्या करूँ? उसने कहा—दो बैलोंका माल एकपर लाद दो। एकको खाली कर दो। व्यर्थमें बैलपर इतना बोझ लादकर उसे क्यों मार रहे हो। उस बंजारेकी समझमें बात आ गयी कि इस आदमीने बुद्धिमानीकी बात कही है। यह बात किसी औरने नहीं बतायी। बंजारा बोला—वाह, तुम्हें धन्यवाद है। कहाँसे आ रहे हो। उसने कहा—दिल्लीसे। बंजारा बोला—दिल्लीमें तुम कौन-सा कार-बार करते हो? वह बोला—दिल्लीमें मैंने बहुत व्यापार किया। बंजारेने पूछा—कितना रुपया कमाया। वह बोला—रुपया तो दस हजार पैदा हुआ था। घाटा लग गया। रुपया भी खर्च हो गया और सिरपर गाँवका ऋण हो गया। मेरी आशा निष्फल हो गयी, मैं सबसे मुँह छिपाकर और अपना प्राण लेकर भाग रहा हूँ, उसने कहा—भैया! आपने हजारों रुपया पैदा तो किया, परंतु बुद्धिसे काम नहीं लिया, तुम्हारी बुद्धि फलवती नहीं है। तुम अपनी बुद्धि अपने पास रखो। तुम्हारेमें इतनी बुद्धि होती तो तू दीवाला निकालकर अपना मुँह छिपाकर क्यूँ आता। वह धीरे-धीरे दिल्ली चला गया और जाकर एक बनियेके यहाँ रेत और बची हुई मुल्तानी मिट्टी उतार दी। सारी मुल्तानी मिट्टी दिल्लीमें बिक गयी और बालूकी ढेरी लगी रही।
वहाँके बादशाहको ऐसी बीमारी हो गयी थी कि हकीमने बतलाया कि राजपूतानेके ओरकी रेत हो तो मँगाओ, उससे ज्यादा आराम मिलेगा। राजाने पूछा—महाराज! कहाँ मिलेगी? वैद्यने कहा—वह तो दूर मिलेगी, आने-जानेमें तीन दिन लग जायँगे। एक दिन जानेमें एक दिन प्रबन्ध करनेमें, तीसरे दिन ले आनेमें। एक आदमीने कहा—महाराज, एक बनियेके यहाँ बालूका ढेर लगा हुआ है। राजाने कहा—यदि यहाँ मिल जाय तो बीकानेरसे क्यों मँगाया जाय। जाओ, खरीद लाओ, वह बनियाके पास गया और पूछा कि यह रेत और मुलतानी माटी कहाँसे आयी, क्या भाव है, उसने कहा—यह रेत राजपूतानेकी है जिस भावमें मिट्टी बेची, उसी भावमें इसे भी बेचूँगा। आप चाहे जितना ले लें तो बालू भी मुलतानी मिट्टीके भाव बिक गयी। यह देखकर सभी बंजारे मिलकर उससे बोले कि उसकी बात तुम मान लेते तो इस लाभसे वंचित रहते। तात्पर्य यह कि जिसकी बुद्धि काम न करे उसकी बात नहीं माननी चाहिये, चाहे कितना ही बुद्धिमान्, कितना ही पण्डित हो। आपलोग अपनी बुद्धि लगा देंगे तो घाटेमें रहेंगे। बुद्धि लगाना ही नहीं, जो बात ईश्वरने कही है, शास्त्रोंमें कही गयी है, महात्मा कहते हैं, वही काम करना चाहिये। प्रत्यक्षमें लाभ हो सकता है और जहाँ अपनी बुद्धि लगा दी वहीं अंधेरा हो जाता है। जैसे—एक था नास्तिक और एक था आस्तिक। दोनों एक बड़े फल-लदे आमके पेड़के नीचे बैठे थे—आस्तिकने कहा कि भगवान्के यहाँ भूल नहीं होती, होती ही नहीं। भगवान्की ओरसे होनेवाली क्रिया उसका विधान, मंगलमय ही है। सबका हित करनेवाला, कोई भी काम हो सब मंगलमय ही है। वहाँ देर तो है, पर अंधेर नहीं। नास्तिक कहता है—एक बात मैं बतलाऊँ। आस्तिक बोला—बतलाओ। नास्तिक बोला—यह जो बड़ा-सा पेड़ है, उसमें भगवान्ने छोटा-छोटा फल लगाया और छोटे पेड़में बड़ा-बड़ा फल लगाया। जैसे कोहड़ा है, वह पक जानेपर कोई पाँच सेरका, कोई दस सेरका हो जाता है और आमका पेड़ इतना बड़ा है उसमें छोटा-छोटा आम लगाया। कोई एक पावका, कोई आध पावका, कोई तीन छटाँकका, इससे सिद्ध होता है कि ईश्वरमें बुद्धिकी कमी है। इतनेमें उसके सिरपर ऊपरसे एक आम आकर गिरा, वह पक गया था। उसके गिरनेसे उसके सिरपर चोट लगी। नास्तिक बोला—राम राम राम राम। आस्तिकने कहा—अगर बड़ा भारी आम दस सेरका तेरे सिरपर गिरता तो क्या हालत होती। कपाल-क्रिया हो जाती। देखो, रामसे भूल नहीं होती, उनमें भूल मानना मूर्खता है।
एक बात भगवान्की दयाके विषयमें बता रहा हूँ। भगवान्की दया हम जितनी मात्रामें मानते हैं, उससे हजारों, लाखों गुना बढ़कर हमपर उनकी दया है। यह यदि आप मान लें तो आपमें इतनी प्रसन्नता, शान्ति हो जाय कि संसारकी, शरीरकी चिन्ता भूल जायँ और भगवान्-ही-भगवान् याद आयें।
आपका भगवान्में विश्वास होना चाहिये। आपकी श्रद्धा होनी चाहिये। आप यह बात मान लें तो आगे जाकर भगवान् खुद अपनेको जना देंगे—
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहिं तुम्हइ होइ जाई॥
भगवान्को जो जानना चाहते हैं उन्हें वे जना देते हैं। वह उन्हें जानकर वैसे ही बन जाते हैं। अपने सदृश बना सकते हैं। उनके पास कोई कमी नहीं, उनके लिये कुछ भी करना असम्भव नहीं।