भगवत्प्राप्तिके सरल उपाय तथा प्रेमका रहस्य और प्रभाव
मूक चाण्डाल अपने माता-पिताकी निरन्तर प्रेमके साथ श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सेवा करता था, उसके श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सेवा करनेके प्रभावसे स्वयं भगवान् ब्राह्मणका रूप धारण कर सदा उसके घरमें रहा करते थे। परिणामत: मूक चाण्डाल जब भगवान्के परमधामको गया, तब उसके माता-पिता भी साथमें परमधामको गये—इतना ही नहीं, उसके घरमें जो जीव-जन्तु थे, वे भी उसके प्रभावसे दिव्यरूप धारण कर भगवान्के परमधाममें चले गये। उसमें प्रभाव क्या था? बस, माता-पिताकी सेवाका ही प्रभाव था।
इसी प्रकार शुभा नामकी एक स्त्री अपने पतिकी श्रद्धा-भक्तिपूर्वक प्रेमसे नित्य सेवा करती थी। उस सेवाके प्रभावसे वह अपने पतिके साथ ही विमानमें बैठकर भगवान्के परमधाममें चली गयी। इस बातको जब नरोत्तम ब्राह्मणने भी देखा तब भगवान्से पूछा कि भगवन्! क्या बात है? भगवान्ने बतलाया कि यह मूक चाण्डाल अपने माता-पिताकी सेवा करनेके प्रभावसे और यह शुभा नामकी स्त्री अपने पतिकी सेवा करनेके प्रभावसे मेरे परमधामको जा रहे हैं। इसी कारण मैं इन दोनोंके घरमें अलग-अलग रूप धारण कर सदा वास करता हूँ। उनको तीनों कालोंका ज्ञान है—तुम्हारी सारी घटना उन्हें ज्ञात है। इस प्रकार तीनों बातोंकी प्रशंसा की। मूक चाण्डालमें एक विशेषता और थी, वह यह कि उसका मकान आकाशमें झूला करता, जमीनपर नहीं। मकानका आकाशमें झूलना और तीनों कालोंका ज्ञान होना—यह तो लौकिक प्रभाव है, लौकिक—साधारण प्रभाव है, सांसारिक प्रभाव है, ऋद्धि-सिद्धियोंवाला प्रभाव है। परंतु भगवान्का उसके घरमें निवास करना और उसके घरमें रहनेवाले जीव-जन्तुओंका भी उसके साथ परमधामको चला जाना अलौकिक—पारमार्थिक प्रभाव है, यह असली प्रभाव है। हमलोगोंको असली प्रभावकी तरफ ज्यादा ध्यान देना चाहिये। लौकिक प्रभाव चाहे हो या न हो—उसकी कोई विशेष इज्जत नहीं है। भगवान्ने गोवर्धन पहाड़को धारण कर लिया—यह लौकिक प्रभाव है।
जब सेतुबन्ध-रामेश्वरका पुल बाँधा गया तो हनुमान्-जैसे बन्दर बड़े-बड़े पहाड़ ढोकर लाये थे, पर उनको किसीने ‘गिरिधर’ नहीं कहा और भगवान्को कहते हैं—‘गिरिधर’। बड़ोंको बड़ाई मिल जाया करती है। इसमें कोई वैसी बात नहीं है कि वे पहाड़को धारण करनेसे ‘गिरिधर’ कहलाये। यह तो लौकिक प्रभाव था। भगवान्का अलौकिक प्रभाव तो इस प्रकार है—सैकड़ों-हजारों रूप धारण कर लेना। ग्वालबालोंके रूपमें, बछड़ोंके रूपमें, उनकी गायोंका, उनकी माताओंका कल्याण कर देना। भगवान् लड़का बने तो उसका भी कल्याण किये। बड़े दयालु हैं, उनकी दया अपरम्पार है। कपटवेश धारण करके खोटी नीयतसे लड़का बनानेवाली पूतना जब अपने स्तनोंमें विष लगाकर हलाहल जहर पिलाने आयी और पिला दी, तब भगवान्ने सोचा कि ठीक है—इसने तो मुझे जहर पिलाया, पर मेरा क्या कर्तव्य है? मेरा तो काम है—‘अपने पास कोई भी आये, उसका उद्धार करना।’ भगवान्ने उसका उद्धार कर दिया।
भगवान् श्रीरामचन्द्रजी महाराजने तो सबका उद्धार कर दिया ‘सरयूकी धारासे’। सरयूकी धारासे सबको पार कर दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी मेरे साथ चलना चाहे वह सरयूमें स्नान कर ले तो बेड़ा पार और श्रीकृष्णजी महाराजने एरका नामकी घासद्वारा सबको आपसमें मार करवाकर पार कर दिया। भगवान् रामचन्द्रजीने तो सबका उद्धार किया सरयूकी धारासे और कृष्णचन्द्रजीने सबका उद्धार किया एरकेकी मारसे। भगवान् श्रीकृष्णने महाभारत-युद्धके समय पहले प्रतिज्ञा कर ली कि मैं युद्धमें किसीको शस्त्रसे माँरूगा नहीं, क्योंकि मारनेसे मुक्ति हो जायगी। यह तो भगवान्ने एक प्रकारसे भेदभाव ही किया कि अपने कुटुम्बका तो उद्धार किया और महाभारत-युद्धमें उन मरनेवालोंको दूसरों-दूसरोंसे ही मरवाया।
क्या उसमें कोई कारण था?
हाँ! कारण तो यही है कि जिस वंशमें जन्म लिया, उनका तो उद्धार होना ही चाहिये।
कुलं पवित्रं जननी कृतार्था
वसुन्धरा पुण्यवती च तेन।
अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिँ-
ल्लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेत:॥
(स्कन्द० माहे० कौमार० ५५।१४०)
तात्पर्य यह कि जिसका ज्ञान-स्वरूप सुखसागर परब्रह्म परमात्मामें चित्त विलीन हो जाता है, जिसके आनन्दका सागरकी तरह पार नहीं है, ऐसा जो महात्मा पुरुष है, उसके संसर्गसे, संसर्गके प्रभावसे उसका कुल पवित्र हो जाता है और जन्म देनेवाली माता तो मुक्त हो ही जाती है। तथा जहाँ उसका चरण टिक जाय, वह भूमि भी पवित्र हो जाती है। यह बात तो भक्तोंमें है, फिर भगवान्की बात तो इससे ज्यादा होनी ही चाहिये। भगवान् कहते हैं कि जो अपने साथ बुराई करे, उसके साथ भी भलाई करनी चाहिये। इसे भगवान्ने पूतनाका उद्धार करके दिखलाया।
यदि कहो कि विष देनेवाली पूतनाका उद्धार कर दिया तो अमृतके समान दूध पिलानेवाली माता यशोदाको भगवान् क्या देंगे? उसके लिये तो सबसे बड़ी है मुक्ति।
ना, मुक्तिसे भी बढ़कर एक चीज है।
वह क्या है?
भगवान् खुद ही हैं। भगवान्ने खुद ही अपने-आपको यशोदाको अर्पण कर दिया।
उसके आँगनमें खेलनेसे, उसका बच्चा होकर वात्सल्य-भावसे प्रेम करनेसे और अपने-आपको उसके समर्पण कर देनेसे यशोदाके घरके आँगनकी जो रेत है, जिसको हम सब मिट्टी कहते हैं, उसमें मुक्ति प्रवेश कर गयी। परिणामत: यशोदा किसीको मुट्ठीमें रेत भी भर कर दे दे तो उसकी मुक्ति हो जाय या स्वयं रेत ले ले तो उसकी मुक्ति हो जाय, क्योंकि उस रेतमें भगवान्का प्रभाव प्रवेश कर गया। यशोदा तो मुक्तिका सदाव्रत देती रहती—कोई भी चला जाय, उसीका कल्याण। इसलिये यशोदाका दर्जा उससे ज्यादा है, जैसे काशीमें शिवजीका। काशीमें कोई भी चला जाय और वहाँ शरीर छोड़ दे तो शिवजी उसको मुक्ति दे देते हैं। यह काम तो बहुत ठीक है। ऐसे उदारभाववाली एक कहानी सुनी जाती है।
एक कायस्थ था। वह बड़े उदारभावका था। यह कहानी है, घटी हुई घटना नहीं है। परंतु अपने लोगोंको तो इस कहानीका भाव लेना है। कहानी भले ही हो पर इसका भाव अनुकरणीय है ही।
एक समयकी बात है एक हाथी यमराजके यहाँ पहुँचा। यमराज उससे हँसी-दिल्लगी करने लगे, बोले—अरे तेरी काया तो पहाड़के समान है और तू एक छोटे-से मनुष्यके वशमें कैसे हो गया?
हाथीने कहा—महाराज! मनुष्यके वशमें तो मैं क्या, मनुष्यके वशमें तो आप भी हो सकते हैं, यहाँतक कि भगवान् भी हो सकते हैं। मनुष्य ही एक ऐसा है कि भगवान्को भी वशमें कर सकता है और आपको भी वशमें कर सकता है, मेरी तो बात ही क्या है?
यमराज बोले—अरे गजराज! हमारे यहाँ तो रोज हजारों मनुष्य आते हैं।
हाथीने कहा—हाँ महाराज! आपके यहाँ जो आते हैं वे मरकर आते हैं और मैं था जीवित मनुष्यके वशमें। जीवित मनुष्यसे आपका कभी काम नहीं पड़ा, यदि जीवितके साथ काम पड़ा तो सावित्रीके साथ, जिसके वशमें हो ही गये।
यह सुनकर यमराजने अपने दूतोंसे कहा—अच्छा एक जीवित मनुष्य ले आओ। वे दूत रातके समय एक कायस्थके घर आये। गर्मीका महीना था। वह अपने तीन मंजिले महलके छतपर खाटके ऊपर सोया था। दूत खाटके चारों पायोंको पकड़कर आकाश-मार्गसे उड़ चले। जब दूत खाटके साथ उसे लेकर उड़े तो उसकी आँख खुल गयी। उसने खाटपर अपनेको आकाशमें उड़ते देखकर सोचा कि यह क्या बला है? फिर सोचा यदि हिलूँ-चलूँ तो गिर जाऊँगा, फिर तो मर जाऊँगा। अच्छा देख तो लूँ—कौन है? मुँह निकालकर चारों तरफ देखा तो यमके दूतोंके लक्षण दीखे। कायस्थने अपने मनमें विचारा—अरे, यमके दूत तो मरनेके बाद पापी आदमीको ले जाया करते हैं, मुझे तो जीते-जी ही ले जा रहे हैं। फिर सोचा कि कहीं स्वप्न तो नहीं है? नहीं-नहीं, यह स्वप्न कहाँ? मैं तो जगा हुआ हूँ, बैठा हूँ। फिर विचारा—कहीं मेरे चित्तमें भ्रम तो नहीं हो गया है? नहीं-नहीं, भ्रमकी तो कोई बात ही नहीं है। बात सोलहो आने सच थी, जँच गयी। कायस्थने कहा—अरे यमके दूतो! मुझे कहाँ ले जा रहे हो। यमके दूतोंने कहा—यमके पास। उसके मनमें स्फुरणा हुई, उसने अपने जेबसे कागज-पेंसिल निकाली और धर्मराजको एक चिट्ठी लिखी—‘धर्मराजसे हरि भगवान्का यथायोग्य वंचना। इस नये गुमाश्तेको भेज रहा हूँ, इसके हुक्मके अनुसार सब काम करना’ और नीचे हस्ताक्षरकी जगहपर हरिका नाम लिख दिया—‘श्रीहरि:’। फिर उसे जेबमें रख लिया। यमदूत इसे उसी अवस्थामें लेकर सभामें पहुँचे। उस समय सभा लगी हुई नहीं थी। सभामें जाकर खटिया उतार दी। अब प्रात:काल हुआ। प्रात:काल होनेके बाद सभा जुटी। यमराज आये। इनका यमराज भी नाम है और धर्मराज भी। कायस्थने अपना लिखा वह पत्र ले जाकर यमराजके सामने पेश कर दिया। दैवयोगसे हरिके अक्षरों-जैसे अक्षर मिल गये और नीचे सही ‘श्रीहरि:’ की मिल गयी। कागज पढ़ते ही यमराज झट उठ खड़े हो गये और हाथ जोड़कर बोले—बैठिये महाराज! यमराजने उसे तख्तेपर बैठा दिया और आप नीचे उसके चरणोंमें बैठ गये और गुमाश्तेके कहे-अनुसार काम होने लगा। अब आने लगे अपराधी। चित्रगुप्तजी पासमें ही बैठे थे। चित्रगुप्तसे यमराजने एक अपराधीके विषयमें पूछा—क्यों चित्रगुप्तजी यह कौन है, कैसा है? चित्रगुप्तजीने कहा—महाराज! यह बनिया है बनिया।
जो कायस्थ नया गुमाश्ता बना था, उसने कहा—क्या करता है?
चित्रगुप्तने कहा—इसका व्यवहार तो झूठ, कपट, चोरी, बेईमानी—पाप-ही-पापका रहा।
झूठइ लेना झूठइ देना।
झूठइ भोजन झूठ चबेना॥
गुमाश्तेने कहा—अरे! लेना-देना तो झूठा हो सकता है, पर झूठा भोजन और झूठ चबेना कैसे—खाना-पीना झूठा कैसे?
चित्रगुप्त बोले—साहब! बात यह है कि ‘आजकल अन्नपर कंट्रोल हो रहा है, अच्छा अन्न कहींसे लाते समय पता लग जाय तो सरकार पकड़ ले’—इसलिये ये खाते तो हैं गेहूँ तथा चावल और कहते हैं कि आजकल हम तो मिलावट अन्न अर्थात् सस्ता अन्न (बेझड़) खाते हैं—इस प्रकारसे झूठ बोलते हैं। इसलिये ‘झूठइ भोजन झूठ चबेना’ है।
कायस्थने कहा—ठीक है! तो इसके विषयमें क्या किया जाय?
चित्रगुप्त बोले—इसे महाराज! ‘कुम्भीपाक’ नरकमें डलवा दिया जाय।
कायस्थने कहा—तुम्हें मालूम नहीं है?
चित्रगुप्त बोले—क्या?
कायस्थने कहा—इसे वैकुण्ठमें जाने दो।
चित्रगुप्त बोले—महाराज! यह वैकुण्ठके लायक नहीं है।
कायस्थने कहा—तुम्हें इस बातसे क्या मतलब? चलने दो बस।
थोड़ी देरके बाद ग्वालिन आयी। इसके विषयमें चित्रगुप्तने कहा—महाराज! यह ग्वालिन दूध बेचती है, यह जो दूध बालकोंको देती है, उससे बालकोंको बीमारी हो जाती है।
कायस्थने पूछा—कैसे?
चित्रगुप्तने कहा—दूधमें यह आरारोट मिला देती है—तालाबका सफेद-सफेद जल मिलाकर दूध देती है, उसमें मिट्टी मिली होनेके कारण बालकोंको बीमारी हो जाती है। इसलिये यह बड़ा भारी पाप करती है, लोगोंको धोखा देती है। जिन बालकोंको दूध पिलाया जाता है, उनके साथ ऐसा अन्याय करती है। महाराज! इसके हिसाबसे ऐसेको हमारे यहाँ ‘रौरवनरक’ में डाला जाता है।
कायस्थ बोला—नहीं-नहीं, इसे वैकुण्ठमें जाने दो।
चित्रगुप्तने कहा—यह भी वैकुण्ठमें?
कायस्थ बोला—अरे, तुम देखते रहो। कोई भी आये, उसे वैकुण्ठमें भेजो। थोड़ी देरके बाद एक कलवार आया।
कायस्थने पूछा—यह कौन है?
चित्रगुप्तने कहा—कलवार।
कायस्थने पूछा—इसने क्या किया है?
चित्रगुप्तने कहा—इसके मदिराकी भट्ठी है। महाराज! आप तो जानते ही हैं कि ‘मदिरा-पान’ करना ब्रह्महत्याके समान दोष है। और इसके तो दिन-रात मदिराका ही व्यापार है। इसने बड़ा भारी मदिराका प्रचार किया है, मदिराके प्रचारसे लाखों मनुष्योंका धर्म भ्रष्ट कर दिया है। यह ‘महातामिस्र’ नामक नरकमें गिरानेके लायक है।
कायस्थने कहा—नहीं, इसे वैकुण्ठमें भेजो।
चित्रगुप्तने कहा—महाराज! यह भी वैकुण्ठमें जायगा?
कायस्थने कहा—कोई भी आये, उसे वैकुण्ठमें भेजा जाय। इसके बाद कसाई आया।
कायस्थने कहा—यह कौन है?
चित्रगुप्त बोले—महाराज! इसने ‘बूचड़खाना’ खोल रखा है, रोज एक हजार गौ काटनेका इसका नियम है। इसने अपने जीवनमें लाखों-करोड़ों गायें काट डाली हैं। महाराज! यह तो ‘महारौरव’ नरकमें गिरानेके लायक है, फिर आपकी मर्जी है।
कायस्थने कहा—इसको भी वैकुण्ठमें भेजो।
चित्रगुप्तने कहा—महाराज! आप थोड़ा भी विचार नहीं करते।
कायस्थ बोला—इसमें विचार करनेकी तुम्हें कोई जरूरत नहीं है, अब पूछना ही मत, जो आये उसीको वैकुण्ठमें भेजो। लाइन लगा दो।
फिर वेश्या आयी।
चित्रगुप्तने कहा—महाराज! यह वेश्या है, लोगोंका बहुत धर्म भ्रष्ट करती है।
कायस्थ बोला—तू बोल ही मत—जाने दो वैकुण्ठमें।
भगवान्ने देखा—वैकुण्ठमें आनेवालोंकी कतार लगी है और लोग आ रहे हैं। भगवान् मनमें सोचने लगे क्या बात है ये सभी वैकुण्ठमें चले आ रहे हैं, कहीं ऐसी बात तो नहीं कि ‘राजा कीर्तिमान्’ के समान भक्तिका बहुत प्रचार हो गया? फिर ध्यान लगाया कि नहीं, भक्तिका तो ऐसा प्रचार नहीं है जैसा था वैसा ही है। फिर जब यमलोकके विषयमें विचार किया तो देखा—यह अंधेर तो यहाँ है, यहाँ कोई कायस्थ आकर बैठ गया है, जो सबको वैकुण्ठ भेज रहा है। दौड़कर भगवान् यमराजके पास आये। भगवान्को आया देख सब खड़े हो गये, कायस्थ भी खड़ा हो गया। तख्तेपर भगवान्को बैठाकर सब नीचे बैठ गये।
भगवान्ने पूछा—धर्मराज! तेरे यहाँ यह अंधेर क्यों?
धर्मराज बोले—महाराज! आपने जबसे यह नया गुमाश्ता भेजा है, तबसे यह अंधेर है। पहलेके सब बही-खाते, रजिस्टर देख लें—बिलकुल अंधेर नहीं है।
भगवान्ने पूछा—नया गुमाश्ता कहाँ है?
यमराजने कहा—सामने बैठा है न यह!
भगवान्ने पूछा—तू कहाँसे आया? कैसे आया?
कायस्थ बोला—महाराज! कैसे और क्यों पूछ रहे हैं? आपने ही तो मुझे भेजा है।
भगवान्ने यमराजसे पूछा—यह मेरा भेजा हुआ है, यह तुमने कैसे विश्वास कर लिया?
यमराजने कहा—यह आपका पत्र है, देख लें। भगवान्ने पत्र देखा तो ठीक मिल गया।
भगवान्ने कायस्थसे पूछा—यह पत्र किसका लिखा हुआ है?
कायस्थने कहा—महाराज! आपका लिखा हुआ है।
भगवान्ने कहा—मेरी तो तुमसे भेंट ही नहीं हुई, पत्र कैसे लिखा गया?
कायस्थ बोला—महाराज! आप तो सबके हृदयमें हैं। गीतामें आप ही कहते हैं—
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥
(१५।१५)
‘मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति और मुझसे ही ज्ञान होता है और अपोहन (संशय, विपर्यय आदि दोषोंका नाश) भी होता है। सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा मैं ही जाननेयोग्य हूँ। वेदोंके तत्त्वका निर्णय करनेवाला और वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ।’
मेरे दिलमें जब ‘ज्ञान’ हुआ और स्मृति तथा विचार हुए, तभी तो मैंने यह पत्र लिखा। यह आपकी ही तो प्रेरणा है और आप पूछते हैं किसकी प्रेरणासे? भगवान् बोले—यह बात ठीक है, परंतु तुमने यह क्या काम किया? जो आये उसीको वैकुण्ठधाममें भेजकर तुमने बड़ा अन्याय किया।
कायस्थ बोला—महाराज! यह बात तो मैंने पहले ही सोच ली थी कि यह कुर्सी, यह पदवी मुझे सदाके लिये तो मिलनेकी है नहीं। इसलिये जितना समय मिला है उतनेमें जो कुछ करना है वह कर लूँ। मैंने तो यह ‘नियम’ ही बना लिया है कि मुझे किसीको नरकमें नहीं भेजना है, सबको वैकुण्ठमें भेजना है।
भगवान् बोले—अनुचित करनेवालोंको भी वैकुण्ठमें भेज दिया, यह अन्याय किया।
कायस्थ बोला—महाराज! माना मैंने अन्याय किया? मैंने यदि अनुचित किया हो तो उनको वापस भेज दें, किंतु ध्यान दें, वापस भेजनेपर गीताजीके कई श्लोक उठाने पड़ेंगे।
भगवान्ने कहा—क्यों?
कायस्थ बोला—आपने कहा है कि मेरे परमधामको प्राप्त होकर फिर कोई वापस नहीं आता, क्योंकि मेरे परमधामको अव्यक्त, अक्षर और परमगति कहा गया है—
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
(गीता ८।२१)
आपके परमधामको जाकर कोई वापस लौटे तो आपको गीताके इस श्लोकको निकाल देना पड़ेगा।
भगवान् बोले—अरे यह तो बड़ा चालाक आ गया।
भगवान्ने पूछा—तू कौन है?
वह बोला—कायस्थ।
भगवान्ने कहा—तुम कायस्थ हो इसीलिये तुम्हारी ऐसी बुद्धि है, नहीं तो इतनी चालाकी कहाँसे आवे। अच्छा, अब जो हो गया सो तो हो गया। धर्मराज! हम अब जाते हैं, तुम्हें अपना काम ठीक-ठाकसे करना चाहिये।
यमराजने कहा—ठीक है, महाराज! इसके बाद भगवान् चलनेकी तैयारी करने लगे तब कायस्थने भी उनके साथ जानेकी तैयारी कर ली।
भगवान्ने पूछा—तू कहाँ जाता है?
वह बोला—महाराज! जहाँ आप जाते हैं, वहीं मैं जा रहा हूँ।
भगवान्ने कहा—क्यों?
कायस्थ बोला—आपने ही गीतामें अर्जुनसे कहा है कि हे अर्जुन! ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती हैं, परंतु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता।
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥
(८।१६)
महाराज! ब्रह्मलोकतक तो गया हुआ प्राणी वापस लौटता है? यह तो यमराजका लोक है, यहाँसे तो वापस लौटना ही पड़ता है। लेकिन अब तो मैं आपको प्राप्त हो गया हूँ। वापस कैसे लौटूँगा? आपको पाकर फिर मैं वापस नहीं लौटता। यदि लौटायेंगे तो गीताजीके श्लोकमें दोष आ जायगा।
भगवान्ने कहा—अच्छा भाई, चल। जब भगवान् जाने लगे तब यमराजसे फिर पूछा कि यमराज! यह प्राणी आया कैसे? यह तो बता? यमराजने सारी कथा कह सुनायी।
यमराजने कहा—महाराज! एक दिनकी बात है, यह जो हाथी बैठा है न, इससे मैं हँसी-दिल्लगी करने लग गया कि तू मनुष्यके वशमें कैसे हो गया? तेरा शरीर तो इतना विशाल पहाड़के समान है। इसने कहा कि महाराज! मनुष्यके वशमें तो भगवान् भी हो सकते हैं और आप भी हो सकते हैं। मैंने कहा कि मेरे यहाँ तो मनुष्य रोज ही आते हैं। इसपर इसने कहा कि हाँ महाराज! आते तो हैं पर मरकर आते हैं तो मैंने दिल्लगीमें कह दिया कि अच्छा एक जिंदे आदमीको ले आओ। इसके बाद मैंने आदमी लानेके लिये दूतोंसे कहा, हो सकता है इसे ही लिवा लाये होंगे। इसपर भगवान्ने दूतोंको बुलाया और पूछा—दूतो! क्या इसे तुम्हीं सब लाये थे?
वे बोले—हाँ महाराज! हमलोग ही लाये थे। इसपर भगवान्के सामने ही यमराजने दूतोंसे कहा—तुमलोगोंने आकर हमसे कहा क्यों नहीं कि इसे लाये हैं।
दूत बोले—महाराज! हम क्या कहें, यह आया और आपको कोई पत्र सौंपा और आप हाथ जोड़कर खड़े हो गये, गद्दी दे दी, पदवी दे दी हम सबने देखा और सोचा कि हो सकता है कि यह जान-पहचानका हो। तब बतावें कैसे? इसके बाद हाथीने कहा—क्यों महाराज! मैंने जो कहा था कि मनुष्यके वशमें तो आप भी हो सकते हैं और भगवान् भी हो सकते हैं, आपलोग वशमें हो गये कि नहीं? भगवान् भी हो गये, आप भी हो गये। भगवान् और यमराज दोनोंने कहा—ठीक है। इसके बाद भगवान् और वह कायस्थ जब जाने लगे तब कायस्थने कहा कि महाराज! देखिये, यह हाथी जो सूँड़ उठाये बैठा है, इसको भी साथमें ले लें। इन यमराज महाराजको उनकी पदवी दे दें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। यमराज-जैसी पदवी हमें नहीं चाहिये।
भगवान् बोले—क्यों?
कायस्थने कहा—इसने भी तो आपके दर्शन कर लिये। यह बेचारा आपका दर्शन करके भी यमलोकमें ही पड़ा रहेगा?
भगवान्ने कहा—इसको भी ले लो। इसके बाद भगवान्ने उन लोगोंसे कह दिया कि तुमलोग पहले जैसे काम करते थे, वैसे ही काम करो, कानूनके अनुसार न्याय करो और जो हो गया, सो हो गया।
अब यदि कोई पूछे कि बनियेकी बुद्धि कैसी होती है? बनियेकी भी बुद्धि अच्छी होती है। अपने ठहरे बनिये, अपनेको भी कोई पदवी मिल जाय, भूले-भटके भगवान् दे दें तो अपनेको भी वही कायस्थवाली नीति बर्तनी चाहिये। उससे कम क्यों रहें।
किसीने कहा कि मिली हुई तो है। अभी मिली हुई तो नहीं है, पर भगवान्की कृपा हो तो मिल भी सकती है; क्योंकि भगवान् अपनी कृपासे मच्छरको भी ब्रह्मा बना सकते हैं और ब्रह्माको भी मच्छरसे हीन बना सकते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—
मसकहि करइ बिरंचि प्रभु
अजहि मसक ते हीन।
भगवान्का ऐसा प्रभाव है। वे अपने प्रभावसे जो मर्जी आये सो बना दें। अपनी तो किसीकी ऐसी सामर्थ्य है नहीं। न कोई करामात है, न कोई प्रभाव है—कुछ भी नहीं और भगवान् चाहें तो चाहे जिसको जो बना दें।
ऐसा बननेके लिये कौन-सा रास्ता अपनाया जाय। रास्ता अपनानेके लिये भी एक दृष्टान्त है। भगवान्का एक अनन्य भक्त था, वह तन, मन, धन, जन सबसे भक्ति करता था और सर्वस्व भगवान्के समर्पण करता था। समर्पण करके वह जो काम करता सब भगवान्का ही समझकर करता, क्योंकि भगवान्का काम समझकर करनेसे हर समय प्रसन्नता रहती है और थकावट नहीं आती। हँसता-हँसता, नाचता-नाचता, वह बड़े विनोदसे, आनन्दसे चौबीसों घंटे भगवान्का काम करता रहता।
चौबीसों घंटे काम कैसे करता था, सोता था कि नहीं?
अरे भाई! जैसे दिनमें करता वैसे ही स्वप्नमें भी अपनेको काम करता देखता। इसलिये उसके चौबीसों घंटे काम चलता रहता। ऐसा था वह भक्त, इसलिये भगवान्ने साक्षात् प्रकट होकर उसे दर्शन दिया और दर्शन देकर बोले कि तेरी जो इच्छा हो माँग।
भक्तने कहा—महाराज! आपके दर्शन होनेके बाद इच्छा बाकी रहती है क्या? और आपसे बढ़कर कोई चीज है क्या, जो आपको छोड़कर दूसरी चीज मागूँ।
भगवान् बोले—तू जैसा कहता है सब ठीक है, परंतु मेरे संतोषके लिये कुछ भी माँग ले और माँग वही जो तुम्हें जँचे।
भक्तने कहा—ठीक है महाराज! आपने मेरे ऊपर ही भार दे दिया कि ‘तेरे जो जँचे वही माँग’। मैं तो यही माँगता हूँ कि ‘सबका उद्धार कर दें।’
भगवान् बोले—अरे सबका उद्धार कर दूँ तो इन सबका जो पाप है वह कौन भोगेगा? अपने पुण्यका तो त्याग भी किया जा सकता है कि मैंने जो कुछ भले कर्म किये हैं वे सब ‘श्रीकृष्णार्पणमस्तु’ —सब भगवान्के अर्पण हैं। जितने अच्छे कर्म हैं, उनको यदि आज भी हम भगवान्के समर्पण कर दें तो ‘खाता’ चुकता हो जाय। परंतु जो ‘पापकर्म’ हैं वे या तो ‘प्रायश्चित्त’ से नष्ट होते हैं या ‘भोग’ से अथवा ‘साधन’ करनेसे। अन्यथा इनके ‘पाप’ रहते हुए इनकी मुक्ति कैसे होगी? इनके पाप कौन भोगेगा?
भक्तने कहा—अच्छा महाराज! इन सबका पाप मैं भोग लूँगा। दुनियामें जितने प्राणी हैं, उन सबको तो आप मुक्त कर दें और उनके जितने पाप हैं उन्हें मेरे जिम्मे लगा दें। आप भुगतवाइये और मैं भोगूँ। जिस दिन ये भुगतते-भुगतते समाप्त हो जायँगे, तब अपने-आप ‘खाता’ चुकता हो जायगा।
भगवान् बोले—भाई! तू तो मेरा ‘भक्त’ है। तुम्हें क्या वरदानमें पापोंका दण्ड भुगताऊँ?
भक्तने कहा—यदि ऐसी बात है तो आप बड़े दयालु हैं, दयाके समुद्र हैं, परम दयालु हैं। सबपर दया करके सबको माफ कर दीजिये।
भगवान् बोले—यह बात तो असम्भव है।
भक्तने कहा—असम्भव तो कुछ नहीं है। यदि आप कहते हैं कि असम्भव है तो आप तो असम्भवको भी सम्भव कर सकते हैं, क्योंकि आप परमेश्वर हैं, परमात्मा हैं। परमात्मा तो ऐसे सामर्थ्यवान् हैं कि असम्भवको भी सम्भव कर दें।
भगवान् बोले—भाई! इस विषयमें बातचीत करनेमें तो मैं तुमसे हार गया।
भक्तने कहा—महाराज! हारनेसे क्या हुआ? यदि आपकी सामर्थ्य नहीं है तो फिर आपको मुझसे यह कहना उचित था कि भाई! स्त्री माँग लो, पुत्र माँग लो, धन माँग लो, मुक्ति माँग लो। बस! यह कहना उचित नहीं था कि तेरी जो इच्छा हो, वह माँग लो। यदि सामर्थ्य नहीं है तो यह बात क्यों कही कि तेरी जो मर्जी आये वही माँग? और सामर्थ्य है तो मैं जो मागूँ वह दें।
भगवान् बोले—अच्छा भैया! तुम जीते और हम हारे।
भक्तने कहा—महाराज! इस जीतसे क्या फायदा? मिली तो एक छदाम भी नहीं। मेरी हार भले ही हो पर सबका कल्याण होना चाहिये। ऐसी जीत किसी कामकी नहीं, जिससे एकका भी कल्याण न हो।
भगवान् बोले—अच्छा, मनुष्यका मेरा दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप, चिन्तन, मेरे नामका जप, ध्यान और किसी भी प्रकारसे मेरा संसर्ग हो जानेपर कल्याण हो जाता है वही शक्ति, वही सामर्थ्य मैं तुझे दे रहा हूँ। तेरे भी दर्शन, भाषण, स्पर्श, वार्तालाप, चिन्तन, नामोच्चारणसे भी उस जीवका ‘कल्याण’ हो जाय। तेरी जैसी इच्छा हो, जितनोंका उद्धार करना चाहे, कर।
इसके बाद भक्त विचार करने लगा कि भाई! काम तो अपना बना नहीं, पर भगवान् जो दें वही सही, मालिककी मर्जी। यदि मालिककी इच्छा सबका उद्धार करनेकी नहीं है तो जो दें वही ले लूँ। अत: भगवान्ने जो दिया वही उसने अपने लिये ले लिया। यह एक दृष्टान्त है।
पहले बात यह कही गयी थी कि कायस्थके जैसा अधिकार किसको मिले? कायस्थको तो मिला तीन ही दिन। उससे ज्यादा मिला राजा कीर्तिमान्को और उससे भी और ज्यादाकी जगह खाली है—यानी सबका उद्धार अभीतक नहीं हुआ, यदि उस खाली जगहपर कोई आ जाता, तो हम सबका उद्धार हो जाता। उस प्रकारका अधिकार किसको मिले? मैंने जो इस भक्तकी कथा कही—इस भक्त-जैसा जिसके हृदयका भाव हो, उसको मिले। जिसमें यह भाव हो कि दूसरोंके पापोंका फल, दु:खका भी दण्ड मुझे भुगता दो, इन सबका उद्धार कर दो—ऐसा दिल हो, इतनी उदारता हो, इस प्रकारका निष्कामभाव हो, ऐसा हृदयमें त्याग हो उनको ऐसा अधिकार मिलता है। यह जो उच्च कोटिकी दया है, सुहृद्भाव है—इन्हें भगवान्से भी बढ़कर हम कहें तो कोई आपत्ति नहीं। क्योंकि भक्तोंकी महिमा इसी प्रकार गायी गयी है—
मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा।
राम ते अधिक राम कर दासा॥
(रा० च० मा० ७।१२०।१६)
भक्तोंकी यही महिमा है। जो दूसरोंके कल्याणके लिये और उनके पाप भोगनेके लिये तैयार हैं, एक मनुष्यका ही नहीं, सब दुनियाका। किंतु भगवान् भी अपने भक्तको कैसे भुगतायें, वह तो उसकी बात रखनी थी। भगवान्को भुगताना थोड़े ही था। भगवान् तो परीक्षा लेते हैं, भगवान् तो कसौटीपर चढ़ाकर कसनेके लिये ऐसा करते हैं।
अब शुरूमें जो भगवान्के प्रेमकी बात उठायी थी, वह तो रह ही गयी। है तो ये भी सब भगवान्के प्रेमके ही अन्तर्गत। अब खास प्रेमकी बात बतलायी जाती है—गोपियोंमें सबसे बढ़कर राधिकाजी हैं। उनका जो भाव था, उसका ज्ञान वर्तमानके मनुष्योंमें देखनेमें नहीं आता। ऊपरका दिखानेका तो बहुत आता है, किंतु राधाजीका जो असली भाव है, वह छिपा हुआ है।
श्रीराधा-भाव जैसा आविष्कार अभीतक नहीं हुआ, आजसे लगभग पाँच हजार वर्ष पहले वक्तमें जब भगवान् श्रीकृष्णजीने अवतार लिया था, गोपियाँ थीं, राधिकाजी थीं उस समय वह प्रेमका भाव एकदम प्रत्यक्ष प्रेम मूर्तिमान् होकर नाच रहा था।
यदि कहें कि उस समय मूर्तिमान् होकर नाच रहा था, तो इस समय क्यों नहीं नाच रहा है?
उस समय साक्षात् भगवान्ने अवतार लिया था। यदि इस समय भी भगवान् आयें तो शायद वैसा हो जाय। दूसरी बात यह है कि उस समय केवल भगवान्का ही अवतार नहीं था, भक्तोंका भी अवतार था। गोपियाँ कौन थीं? किसी-किसीका कहना है कि वालखिल्य आदि मुनि गोपियोंके रूपमें प्रकट हुए। किसीके मतमें वेदकी श्रुतियाँ थीं। कोई कहते हैं कि भगवान्के परमधाममें निवास करनेवाले भक्त गोपियोंके रूपमें प्रकट हुए। इसलिये प्रेम मूर्तिमान् होकर नाचा करता था। प्रेम, प्रेमास्पद और प्रेमी—ये तीनों एक ही चीज हैं। एक प्रेमने ही तीन रूप धारण किये हैं। भगवान्की दृष्टिमें गोपियाँ प्रेमास्पद और भगवान् प्रेमी तथा गोपियोंकी दृष्टिमें भगवान् प्रेमास्पद और गोपियाँ प्रेमी तथा उनका जो सम्बन्ध है वह प्रेमका सम्बन्ध है। प्रेम तो बीचमें सम्बन्ध करानेवाला है। मानो प्रेम वहाँ भावके रूपमें है। ऐसी वे तीन चीजें वहाँ थीं। इस बातपर आपको ध्यान देना चाहिये।
उस समय भगवान् स्वयं प्रकट हुए थे और उनके ‘परिकर’ भी साथ आये थे। यह कथा सुनी जाती है, शायद कोई पुराणमें हो, अभी देखी नहीं है सुनी हुई है।
एक समयकी बात है। जब नारद मुनिपर कामदेवने प्रभाव डाला तो कामदेवसे नारदजीने कहा—अरे कामदेव! तैंने मुझे भी नहीं छोड़ा? एक घर तो छोड़ना चाहिये। अपने यहाँ कहावत है—‘एक घर तो डाकण भी छोड़े’ (एक घर तो ‘डाइन’ भी छोड़ देती है)।
उसने कहा—मैं किसीको भी नहीं छोड़ता।
नारदजीने कहा—तुमको आजतक जीतनेवाला कोई नहीं मिला क्या?
वह बोला—आजतक मुझे जीतनेवाला कोई नहीं मिला। हमने तो शिवजीको भी पछाड़ दिया, तुम क्या चीज हो, हम भगवान्को भी पछाड़ सकते हैं। कामदेवके इस अहंकारकी बात सुनकर नारदजीको बर्दाश्त नहीं हुआ। नारदजी भगवान् विष्णुके पास गये और बोले कि प्रभो! आप कहते हैं न कि ‘मैं किसीके गर्वको नहीं रहने देता’। इसे सुनकर भगवान् बोले—क्या बात है?
नारदजी बोले—इस समय कामदेवको बड़ा अभिमान हो गया है। वह कहता है कि मुझे जीतनेवाला दुनियामें कोई नहीं है। क्योंकि मैंने शिवजीको पछाड़ दिया और भगवान्को भी पछाड़ सकता हूँ।
भगवान् बोले—अच्छा नारद! तुम जाओ उससे कह दो कि विष्णुभगवान्ने कहा है—‘मैं तुम्हें जीतूँगा’। कौन-सी लड़ाई करना चाहते हो—मैदानकी या किलेकी? किलेकी लड़ाईका यह मतलब है कि जैसे कोई वनमें, गुफामें जाकर आजन्म ब्रह्मचर्यका पालन करे तो वह है किलेकी लड़ाई और मैदानकी लड़ाई यह है कि स्त्रियोंके बीचमें रहकर कामदेवको जीत ले—यह है मैदानकी लड़ाई। नारदने कहा—ठीक है। नारदजीने यह बात जाकर कामदेवसे कह दी। नारदकी बात सुनकर कामदेवने कहा— मुझे कोई किलेकी लड़ाईमें भी नहीं जीत सकता, फिर मैदानमें तो जीत ही कौन सकता है। कामदेवकी वह बात नारदजीने जाकर भगवान्से कही।
भगवान्ने कहा—नारद! जाओ, तुम उससे कह दो कि कृष्णावतारमें मैं तुमसे मैदानकी लड़ाई करूँगा और तुम्हें जीतूँगा। तुम सावधान हो जाओ। भगवान्ने यह बात नारदसे कहलवाकर कामदेवको सावधान कर दिया, फिर भगवान्ने अवतार लिया। अवतार लेकर ‘‘सोलह हजार एक सौ आठ’’ रानियाँ ब्याहीं। कहा जाता है कि जिनसे लाखों पुत्र हुए और गोपियोंके साथ बहुत ही प्रेम किया। इसमें स्वकीय और परकीय दोनों बातें दिखलायी हैं, जैसे—रुक्मिणी आदि हैं, उनका माधुर्य प्रेम स्वकीय था। और गोपियोंका माधुर्य प्रेम परकीय था—वे दूसरोंकी स्त्रियाँ थीं और उनका भगवान्में सखापनका प्रेम था, जैसे पुरुष-पुरुषका हो ऐसा प्रेम था और उन अपनी धर्मपत्नियोंके साथमें सहवास था। उनमें प्रधान रुक्मिणी थीं और इनमें प्रधान ‘श्रीराधिकाजी’ थीं। इनमें प्रधान आठ सखियाँ थीं और उनमें प्रधान आठ पटरानियाँ थीं। और बहुत—हजारों गोपियाँ थीं और हजारों रानियाँ थीं। उन दूसरे पुरुषोंकी स्त्रियोंके साथ रहकर यह पवित्रता सिद्ध करके दिखला दी। कामदेवके मदको एकदम चूर कर दिया। भगवान्में तो कामदेव प्रकट ही कैसे हो, उन गोपियोंमें भी कामदेवका विनाश कर दिया और उधर अपनी जो स्त्रियाँ हैं, उनके साथ भी कामसे रहित होकर जैसे ज्ञानी महात्मा राजा जनक आदि अपनी स्त्रियोंके साथ सहवास करके निर्लिप्त रहते थे, इस तरह रहे यह थी मैदानकी लड़ाई।
स्वयं भगवान् अपने परिकरोंको साथ लेकर आये। क्योंकि कामदेवका मद चूर करना था। कामदेवके मदको चूर करनेके उद्देश्यसे भगवान्ने अवतार लिया और वह प्रेमावतार हुआ—प्रेमकी मूर्ति, सभी प्रेमकी मूर्ति। भगवान्का तो यह ध्येय था कि जो कुछ भी लीला, चेष्टा करनी है सब नीतियुक्त, धर्मयुक्त, शास्त्रयुक्त, शुद्ध और पवित्र करनी है और प्रेम खूब बढ़ाना है।
प्रेम बढ़ानेके लिये ही भगवान्ने ब्रह्माजीके ऊपर पर्दा डालकर उनकी बुद्धिको मोहित कर दिया और ब्रह्माजी ग्वालबाल और बछड़ोंको चुराकर ले गये। फिर भगवान्ने ही अनेक रूप धारण किये। अनेक रूप धारण करके भगवान्ने उस समय ऐसा प्रेमका प्रवाह बहाया कि पशुओंमें भी प्रेमका प्रवाह बह चला। मनुष्योंमें ही नहीं वृक्षोंमें भी। वृक्षोंमें जैसे बिना ऋतुके फल लगना और भगवान्को देखकर रस बहाना। यहाँतक प्रेम दिखाया कि गायें भी बछड़ा बने हुए भगवान्को दूध पिलाने लगीं। इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं, क्योंकि भगवान् प्रेमकी मूर्ति हैं, भगवान्के कारण गौओंमें यदि प्रेमका प्रादुर्भाव हो जाय तो इसमें कोई आश्चर्यकी बात ही नहीं, किंतु जो दो वर्षका बछड़ा है, चार वर्षका बछड़ा है, मतलब एक वर्षका, दो वर्षका—जिन्हें गौओंने दूध पिलाना छोड़ दिया है उनसे भी गौएँ प्रेम कर रही हैं। यह बात देखकर बलदेवजीको बड़ा आश्चर्य हुआ और बोले—यह तो अप्राकृत चीज है—प्रकृतिसे बाहरकी चीज है, न्यायसे तो ऐसा होना नहीं चाहिये, स्वभावसे यह बात नहीं होनी चाहिये। बात क्या है? विचार करने लगे। गोप-ग्वालोंको देखते हैं—उनका लड़का यदि कोई कसूर कर देता और उसे मारने-पीटने जाता, किन्तु पास जानेपर लड़का हँस देता तो वह भी हँस देता, उनको भी हँसी आ जाती, सारा क्रोध दूर भाग जाता और उसे लेकर अपने हृदयसे लगाने लग जाते, वहाँ क्रोध-भाव बदलकर वात्सल्य-भाव हो जाता। इस प्रकारकी बात देखकर बलदेवजीने जब ध्यान लगाकर देखा तो जितने ग्वाल-बाल, बछड़े हैं—सब कृष्ण-ही-कृष्ण दिखायी दिये। तब भगवान्से पूछा कि क्या बात है? भगवान्ने सब बात बतायी कि ब्रह्माजी इस प्रकारसे ग्वालबालोंको और बछड़ोंको चुराकर ले गये और मैं ही अनेक रूप धारण करके लीला कर रहा हूँ। तब बात समझमें आयी।
भगवान्ने अनेक रूप धारण करके ऐसी लीला की कि वहाँके गोपोंमें, गोपियोंमें, गौओंमें, बछड़ोंमें—स्वयं उस रूपमें बन करके सबमें प्रेमकी जागृति कर दी। ग्वालोंके साथ भी शुद्ध प्रेम, गोपियोंके साथ भी शुद्ध प्रेम, गोपोंकी माताओंके साथ भी शुद्ध प्रेम और गौओंके साथ भी शुद्ध प्रेम। किसीके साथ वात्सल्यभावका प्रेम और किसीके साथ सख्यभावका प्रेम। गोपियोंके साथ, गोपोंके साथ तो सख्यभावका प्रेम और गोपोंकी माताओं तथा बछड़ोंकी माताओंके साथ वात्सल्यभावका प्रेम। उस समय एक प्रेमका प्रवाह बह रहा था। प्रेमका ऐसा प्रवाह बहा कि मानो प्रेमकी बाढ़ आ गयी। उस समय भगवान्की सभी चेष्टाएँ उन प्रेमियोंको खुश करनेके लिये, आह्लादित करनेके लिये, मुग्ध करनेके लिये, उत्तरोत्तर प्रेम बढ़ानेके लिये और उन सब गोपियोंका भी एक ही ध्येय—भगवान्को खुश करनेके लिये और भगवान्में अपना प्रेम बढ़ानेके लिये था। इस प्रकार प्रेम साक्षात् मूर्तिमान् होकर नृत्य करता था। दोनोंका एक ही लक्ष्य। भगवान्के लिये गोपियाँ प्रेमास्पद और गोपियोंके लिये भगवान् प्रेमास्पद। वास्तवमें तीनों—प्रेमास्पद, प्रेमी और प्रेम धातुसे एक ही हैं। जिस समय भगवान्ने श्रीकृष्णरूपमें अवतार लिया था, वह प्रेमावतार था। उस समय सब गोपियोंसे बढ़ करके राधिकाजी थीं। रुक्मिणीजीके समान ही नहीं, बल्कि रुक्मिणीजीसे भी बढ़कर राधिकाजी थीं। रुक्मिणीजी जो हैं, वे ऐश्वर्य-शक्तिकी मालिकिन थीं—सबको ऐश्वर्य दिया करती थीं और राधिकाजी प्रेमकी मालिकिन थीं जो सबको प्रेम प्रदान करती थीं। श्रीराधिकाजी प्रेमका ही अवतार थीं—प्रेमने ही ‘श्रीराधिकाजी’ का रूप धारण किया और प्रेमने ही ‘श्रीकृष्णजी’ का रूप धारण किया। यों कह दो अथवा यों कह दो कि साक्षात् सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्म परमात्मा ही साक्षात् श्रीकृष्ण हैं और राधिकाजी उनकी आह्लादिनी शक्ति थीं।
एक ऐश्वर्य शक्ति होती है और एक आह्लादिनी शक्ति, जो भगवान् सारे संसारको आह्लादित करते रहते हैं, मुग्ध करते रहते हैं, आनन्द और प्रेमका दान करते रहते हैं। उन (दुनियाको आनन्द देनेवालेको आनन्द और प्रेम प्रदान करनेवाले)-को प्रेम प्रदान करनेवाली शक्तिका नाम है ‘आह्लादिनी शक्ति’। इस प्रकार उन राधाजीका अवतार आह्लादिनी शक्तिका अवतार था। इसलिये उस वक्त प्रेम मूर्तिमान् होकर नाचा करता था। इस जमानेमें तो उसकी छाया भी नहीं। फिर भी उस बातको लक्ष्य करके आपलोगोंके सम्मुख जो बात कही जाती है, वह बात पूरी नहीं कही जाती।
असली बात तो हमारी बुद्धिमें समाती ही नहीं, क्योंकि हमारी बुद्धिमें वह ताकत नहीं। जैसे तुलसीदासजीने कहा कि भरत और रामके मिलनेकी बात कविकी वाणी गा नहीं सकती, जैसे गाडरकी ताँत सुराग नहीं गा सकती। इसी प्रकार वाणीकी पहुँच वहाँ नहीं है जो उसकी छायाको भी छू सके। बात तो सच्ची है। प्रेम चीज जिसे विशुद्ध प्रेम, पूर्ण प्रेम या अनन्य प्रेम कहते हैं यह तो एक प्रकारसे शब्दोंका उच्चारण किया जाता है, किंतु बुद्धि उसे समझ नहीं सकती। परमात्माका जो प्रेमस्वरूप है या दोनोंका यह अवतार—भगवान् (कृष्णजी) साक्षात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म और राधिकाजी उनकी आह्लादिनी शक्ति, उनके प्रेमके विषयको बुद्धि ग्रहण करनेमें किस प्रकार असमर्थ है जैसे कि घड़ेमें विशाल समुद्र समा नहीं सकता—घड़ेमें यदि समुद्र भरना चाहें तो मूर्खता है, क्योंकि वह समा ही नहीं सकता। अपनी बुद्धि तो घड़ेके समान भी नहीं है। बुद्धिमें जो बात आती है, वह स्पष्ट नहीं हो पाती। उस प्रेमका आविष्कार करना तो बहुत दूर है—उस प्रेमको किसी उदाहरणसे गढ़कर बतलाया नहीं जा सकता, मनकी भी शक्ति गढ़नेकी नहीं। कोई भी दृष्टान्त या उदाहरण गढ़ कर बतलानेकी मनकी सामर्थ्य नहीं। बुद्धिमें समझनेकी जो बात है, उसका मन कोई दृष्टान्त या उदाहरणका रूपक नहीं बाँध सकता। उसके जितने नजदीक पहुँचकर जितना भी उसका रूपक बाँध दे। पर एक क्षणमें समझो कि एक सेकेंडमें जो उस रूपकका चित्र आता है, उसका वर्णन किया जाय तो घंटों ही लग जायँ। मनमें क्षणमात्रमें, आँख खोले इतनी देरमें वह चित्र आता है, परंतु उस चित्रको समझानेके लिये बहुत समय लग जाता है। वाणीकी इतनी शक्ति नहीं जितनी कि मनकी है। चित्र बनानेवालेको भगवान्का एक चित्र लेकर चरणोंसे मस्तकतक समझाया जाय कि चरण ऐसे हैं, हाथ ऐसे हैं, तो वह आँखोंके सामने क्षणमें—क्षणभरमें दीख रहा है, आँख खुले और मीचे—इतनी देरमें वह चित्र दीख रहा है, परंतु वाणीके द्वारा उसे समझाया जाय तो कितनी देर लगे। बहुत देर लगे। वह भी किसी एक कागजका चित्र। वह कैसे समझाये। यह तो अलौकिक है। प्रश्न होता है कि फिर इस विषयमें अपनेको क्या करना चाहिये?
अपनेको तो यही करना चाहिये कि भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजीका जो स्वरूप है, अथवा जिसका जो इष्टदेव है, चाहे भगवान् शिव हों, चाहे भगवान् श्रीराम हों, चाहे भगवान् विष्णु हों—इस विषयमें कोई फर्क नहीं। इसलिये प्रकरणवश श्रीकृष्णजीकी बात कही। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजीका जो स्वरूप है, संसारमें जितने बढ़िया-से-बढ़िया श्रीकृष्णचन्द्रजीके चित्र मिलते हैं, उनमेंसे भी जो बढ़िया-से-बढ़िया अपनेको मिले, अपनी बुद्धि जहाँतक पहुँच सके, अपनी बुद्धिसे जो बढ़िया-से-बढ़िया चित्र लगे, वह लेकर उस चित्रके आधारपर भगवान्के स्वरूपको देखें। आधारपर कहनेका मतलब उस चित्रको नहीं, उस चित्रके आधारपर भगवान् श्रीकृष्णजीके स्वरूपको देखें। क्योंकि वह चित्र तो जड है और भगवान् चेतन हैं। जैसे समझो कि मेरा यह शरीर और भीतरमें आत्मा है। ऐसे ही किसीने मेरा चित्र उतार लिया और वह सामने लाकर रखा। चित्रमें और मेरेमें अन्तर है, क्योंकि मैं तो बोलता हूँ, बात करता हूँ, चेतनतासे हिलता-डोलता हूँ, आँखके संकेतसे बतला सकता हूँ और वह मेरा चित्र कैसे बतला सकता है। उसमें तो कोई हाव-भाव आदि कुछ भी नहीं है। मेरा और उसका जो अन्तर है, इसी प्रकार भगवान्के चित्रमें और भगवान्में अन्तर इतना ही नहीं है, बल्कि बहुत ज्यादा है।
भगवान्में और भगवान्के चित्रमें अन्तर ज्यादा कैसे है? मान लो भगवान्का असली चित्र तो उतार लिया। उसमें आकृति आ गयी पर भगवान्के हाव-भाव, गुण आदि उस चित्रमें कैसे आयें, वे तो नहीं आ सकते। मेरा चित्र तो आप मेरे इस शरीरसे उतार सकते हैं, परंतु अपनेको जो भगवान्के चित्र मिलते हैं, वे कैमरेद्वारा भगवान्के श्रीविग्रहसे उतारे हुए नहीं हैं, कितना फर्क है। अब इस विषयमें अपनेको मददकी जरूरत पड़ी तब चित्रकी मदद ली और उस चित्रमें जो बात नहीं है, उसमें हाव-भाव, कटाक्ष और प्रेम, गुण आदिके लिये महात्माओंके वचन, शास्त्र अपने लिये आधार हैं। उनसे लेकर उस चित्रमें सजावें। ऐसा भगवान्का स्वरूप है—उसमें और भी विलक्षणता है। जैसे मेरा शरीर है और मेरे भीतर आत्मा है। मेरा शरीर तो चेतन नहीं है, पर मेरे भीतरकी आत्मा चेतन है। शरीर क्षेत्र है, यह क्षेत्रज्ञ है, किंतु भगवान्का तो शरीर भी चेतन है। वहाँ सब चेतन है। भगवान्का शरीर ही चेतन नहीं, उनके ऊपर जो आयुध या उनके ऊपर वस्त्र, आभूषण, माला आदि जो भी कुछ हैं, वे सब भी चेतन हैं। इसलिये उनमें बहुत अन्तर है। ये सारी बातें उसमें अपने मनसे मानें और मान करके ऐसा स्वरूप देखें, देखते ही रहें।
यदि कहो कि यह मान्यता तो आप कहते हैं, पर ऐसी मान्यताकी हम अपनेमें पूर्णता कैसे ले आयें?
शुरूमें इसके लिये इस प्रकार होना चाहिये—जब अपने नेत्रोंसे चित्रको देखें तब उसमें यह ताकत नहीं रहे कि नेत्र वहाँसे हटा सकें। यदि भगवान् ही नेत्रोंसे ओझल हो जायँ अन्तर्धान हो जायँ तो उपाय क्या, परंतु अपनी यह सामर्थ्य नहीं रहे कि अपने नेत्रोंको हटा सकें। दूसरी बात यह कि पलक नहीं मार सकें—एकटक ही देखें। तीसरी बात, ऐसा विचार करें कि मानो आपसमें अपने दृष्टिसे भगवान्को देख रहे हैं, भगवान् अपनेको देख रहे हैं—परस्परमें जो दृष्टिपात है, उस दृष्टिपातमें जो आदान-प्रदान है, वह प्रेम ही है। प्रेमका तो कोई आकार नहीं होता, वह प्रेम तो प्रेम ही है। जब वह प्रेम नेत्रोंकी वृत्तिके द्वारा—अचल हो जाय, नेत्र भगवान्की तरफ और भगवान् उनकी तरफ। तब उस समय शरीरमें प्रसन्नता, हृदयमें प्रफुल्लता, नेत्रोंमें प्रसन्नता, रोमांचके चिह्न एकदम होने लगते हैं। मानो भगवान् परमधामसे पधारे हैं। सबसे पहले शुरूमें जब आभास हो कि भगवान् आये, तब ऐसी भावना करे कि मानो भगवान्के चरणोंमें मैं साष्टांग प्रणाम कर रहा हूँ और भगवान् प्रतिक्रियामें मानो हमें उठाकर अपने हृदयसे लगा रहे हैं। जैसे भरतजी महाराज चित्रकूटमें गये, भगवान् रामके चरणोंमें गिर गये और उनको उठाकर भगवान् रामने अपने हृदयसे लगा लिया। इसी प्रकार हम श्रीकृष्णजीके चरणोंमें गिर गये और भगवान् श्रीकृष्णजीने उठाकर अपने हृदयसे हमें लगा लिया। हमने भगवान्के चरणस्पर्श किये और भगवान्ने हमारा आलिंगन किया। दोनों क्रियाओंमें ही भगवान्के दर्शनके बाद स्पर्श हुआ। स्पर्श होनेके बाद फिर आपसमें बातचीत की। बातचीतके समय उस आश्चर्यको देखकर कि भाई! कहाँ तो मैं—कहाँ भगवान्—कितने आश्चर्यकी बात है और भगवान्की कृपाको, भगवान्के प्रेमको, दयाको—इनको देख-देखकर आश्चर्यके साथ-साथ प्रसन्नता, आनन्दमें मुग्ध हो जाय। थोड़ी देर तो आपसमें बातचीतमें वाणीसे बोल नहीं सके। उसके बाद धैर्य धारण करके बातचीत करे। जैसे सुतीक्ष्णजीकी अवस्था हो गयी—सुतीक्ष्णजी भगवान्को देखकर मुग्ध होकर चरणोंमें गिर पड़े और थोड़ी देर बोल भी नहीं सके। फिर उसके बाद भगवान्की स्तुति की। इस प्रकारसे साधन-अवस्थामें भगवान्की स्तुति की और फिर भगवान्से वार्तालाप। जैसे हमलोग बातचीत करते हैं, ऐसे भगवान्से बातचीत। इस अवस्थामें भगवान्से स्वयं प्रश्न करे कि आपका दर्शन सुलभ कैसे है? भगवान् कहते हैं कि प्रेमसे है। फिर पूछे प्रेम सुलभ कैसे है? तो वे कह रहे हैं—श्रद्धासे है। इस प्रकार अपने मनमें जो आवे, वैसी ही बातचीत करे। उस वक्त जो स्फुरणा हो, जो बातचीतकी भावना हो—जैसे भगवान् अपने श्रीविग्रहसे उत्तर दे रहे हैं। भगवान्के ओंठ हिल रहे हैं, बोल रहे हैं, जवाब दे रहे हैं और हम उनको सुन रहे हैं। जो सुन रहे हैं, वह भी इस स्थूल शरीरसे नहीं सुन रहे हैं, बल्कि अपना भी शरीर मानसिक है और भगवान्का शरीर भी मानसिक है—दोनोंके जो दर्शन हैं, भाषण हैं, वार्तालाप हैं—दोनों ही मनसे ही हो रहे हैं। इस प्रकारसे जो दर्शन है, भाषण है, वार्तालाप है, उनका जो चिन्तन है—सभी अलौकिक है। और उनमें जो सुगन्ध आती है वह भी अलौकिक। उनमें जो गन्ध है, वह नासिकाके लिये अमृतके समान है। उनका जो दर्शन है, वह नेत्रोंके लिये अमृतके समान है। उनका जो स्पर्श है, वह हाथोंके लिये, अंगके लिये अमृतके समान है, उनकी जो वाणी है वह कानोंके लिये अमृतके समान है। इन्द्रियोंके लिये उनका सभी—दर्शन, स्पर्श, भाषण, वार्तालाप, सुगन्ध आदि अमृतके समान है। इस प्रकार अपने मानसिक दर्शन-ध्यान प्रतिदिन करें—दिनमें एक बार, दो बार, पाँच बार— जब अपने मनमें आवे तभी। इस प्रकार करते-करते पहले तो यह चीज होती है मानसिक, मनका संकल्प या उनको यों कहें कि अपनी भावना और भावना होते-होते वह भावना आगे जाकर दृढ़ हो जाय तो फिर भावना नहीं रहती—वह प्रत्यक्षकी तरह ‘अकल्पित बात’ हो जाती है।