ज्ञान और भक्तिके साधनसे अहंता-ममताका अभाव

मनुष्यके पास जितनी अधिक सम्पत्ति और जितना अधिक कुटुम्ब है, उतना ही अधिक बन्धन है। मान लीजिये, किसी एक आदमीके पास सैकड़ों मिलें, खदानें हैं, सैकड़ों आफिस और दूकानें हैं, सैकड़ों मकान हैं, करोड़ों रुपये लोगोंमें जमा हैं, कुटुम्ब भी बहुत बड़ा है, किंतु उनमेंसे किसी एक मिलके या कोयलेकी खदानके आग लग गयी या किसी मिलमें भारी नुकसान लगकर फर्म फेल हो गया या कुटुम्बमें अपना निकटवर्ती पुरुष या अपना लड़का या स्त्री—कोई मर गया अथवा किसी फर्मके दिवालिया होनेसे अपने बीस लाख रुपये उसमें डूब गये या किसी मिल या मकानको सरकारने अपने अधिकारमें कर लिया तो इनमेंसे प्रत्येक घटना ममताके कारण उसे दु:ख देनेवाली ही होती है। वह बेचारा रात-दिन इन सबकी चिन्ताग्निमें जलता रहता है; किंतु जिस मनुष्यके पास कुछ नहीं है, उसका क्या नुकसान होगा और यदि थोड़ा है तो थोड़ा नुकसान होगा। जैसे एक सच्चे साधु हैं, उनके पास एक कमण्डलु है, घास-फूसकी झोपड़ी है, एक-दो ओढ़ने-बिछानेका कपड़ा है। उनका कमण्डलु या कपड़ा कोई ले गया तो उनको किसीसे दूसरा मिल जाता है। कुटिया जल गयी तो दूसरी जगह जाकर बैठ जाते हैं। उनको इनकी इतनी चिन्ता नहीं होती। परंतु जिनके पास अधिक सम्पत्ति है, उनकी पदार्थोंमें अधिक ममता है और जितनी अधिक ममता है, उतना ही अधिक दु:ख है।

यदि ममता नहीं है तो न बहुत सम्पत्तिवाले मनुष्यको दु:ख है और न थोड़ी सम्पत्तिवालेको ही, किंतु अधिक सम्पत्ति होनेपर अधिक ममता होनेकी सम्भावना है। पर राजा जनक और अश्वपति आदि विपुल सम्पत्ति और राज्य-वैभव होते हुए भी कहीं किंचिन्मात्र भी ममता न होनेके कारण सदा सुखी रहते थे, सम्पत्ति आदिके विनाशमें भी कभी उनको दु:ख नहीं होता था। वस्तुत: अहंता-ममता ही समस्त दु:खोंकी जड़ है। इसलिये देहमें अहंता और देहसे सम्बन्ध रखनेवाले प्राणियों, पदार्थोंमें तथा शरीरमें ममताका त्याग करना चाहिये।

एकदेशीय किसी भी शरीर (देह)-में जो किसी भी प्रकारका अभिमान है—जैसे मैं मनुष्य हूँ, मैं साधु हूँ, गृहस्थ हूँ, ब्राह्मण हूँ, क्षत्रिय हूँ, वैश्य हूँ, यह ‘अहं’भाव है। तथा देहसे सम्बन्ध रखनेवाले पदार्थों और प्राणियों तथा अपने शरीरमें जो मेरापन है—जैसे यह मेरी स्त्री है, यह मेरा पुत्र है, यह मेरी सम्पत्ति है, यह मेरी कुटिया है, यह मेरा कमण्डलु है, यह मेरी मृगछाला है आदि-आदि, यह ‘मम’ भाव है। ये दोनों भाव साधकके लिये बड़े ही घातक हैं। अत: इनका त्याग करना परमावश्यक है। इनके सिवा, जिसको हम शुद्ध अहंकार कहते हैं उसका भी अन्तमें त्याग हो जाता है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ ‘मैं ब्रह्म हूँ’—इत्यादि महावाक्यके अनुसार जो ब्रह्ममें अहंबुद्धि है, वह शुद्ध अहंकार है। अद्वैतवादके सिद्धान्तके अनुसार तो यह उच्च कोटिका साधन है, किंतु इस साधनको हम उत्तम मानते हुए भी सबको इसका अधिकारी नहीं समझते, इस कारण इसे करनेके लिये हम सबको नहीं कहते। इस साधनका अधिकारी वही पुरुष है जिसका देहमें अभिमान वास्तवमें नहीं रहा है और जिसकी ब्रह्मके स्वरूपमें ही स्थिति हो गयी है। देहमें अभिमान रहते हुए इस साधनका होना और इस साधनके द्वारा परमगतिकी प्राप्ति होना कठिन है। गीतामें बतलाया गया है—

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।

अव्यक्ता हि गतिर्दु:खं देहवद्भिरवाप्यते॥

(१२।५)

‘उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्ममें आसक्तचित्तवाले पुरुषोंके साधनमें परिश्रम विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियोंद्वारा अव्यक्तविषयक गति दु:खपूर्वक प्राप्त की जाती है।’

किंतु जो ब्रह्मभूत पुरुष हैं—ब्रह्मके स्वरूपमें जिनकी एकीभावसे स्थिति हो गयी है, उनके लिये यह साधन सुगम है। उन्हें इस साधनसे ब्रह्मकी प्राप्ति सहज ही हो सकती है। भगवान् कहते हैं—

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।

उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मष:।

सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥

(६। २७-२८)

‘क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शान्त है, जो पापसे रहित है और जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके साथ एकीभावको प्राप्त योगीको उत्तम आनन्द प्राप्त होता है। वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्माको परमात्मामें लगाता हुआ अनायास ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अनन्त आनन्दका अनुभव करता है।’

उस ब्रह्मभूत पुरुषके साधनकी स्थितिका वर्णन अगले श्लोकमें किया है—

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:॥

(गीता ६। २९)

‘सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है।’

साधनावस्थामें यह स्थिति दो प्रकारकी होती है—(१) कल्पित और (२) अकल्पित। कल्पित स्थितिमें साधक कभी ब्रह्ममें स्थित होता है, कभी देहमें; किंतु जब ब्रह्ममें अकल्पित स्थिति हो जाती है, तब फिर वह देहमें स्थित नहीं होता। वह सदा ब्रह्ममें ही स्थित रहता है। इसके लिये यह कसौटी है—

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत:॥

(गीता ६। ३२)

‘हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दु:खको भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।’

इस कसौटीसे कसनेपर जो खरा उतरता है, जो इस परीक्षामें उत्तीर्ण हो जाता है, उसको ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। यह बात गीता (६। २८)-में ऊपर बतला चुके हैं। सिद्ध होनेके बाद उस पुरुषकी जो कसौटी है, उसका वर्णन गीता अ० १४ श्लोक २४-२५ में देखना चाहिये—

समदु:खसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकाञ्चन:।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति:॥

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो:।

सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते॥

‘जो निरन्तर आत्मभावमें स्थित, दु:ख-सुखको समान समझनेवाला, मिट्टी, पत्थर और सुवर्णमें समान भाववाला, ज्ञानी, प्रिय और अप्रियको एक-सा माननेवाला और अपनी निन्दा-स्तुतिमें भी समान भाववाला है, जो मान और अपमानमें सम है, मित्र और वैरीके पक्षमें भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भोंमें कर्तापनके अभिमानसे रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है।’

सिद्ध पुरुषके जो ये स्वाभाविक लक्षण बतलाये गये हैं, साधकके लिये ये ही साधन हैं, इसलिये इनको लक्ष्यमें रखकर साधक पुरुषको उन सिद्ध पुरुषोंकी अन्तिम स्थितिमें स्थित होकर साधन करना चाहिये—इन लक्षणोंका अपनेमें सम्पादन करना चाहिये।

इसके लिये ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इस प्रकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें अहंभावपूर्वक स्थिति रखना भी साधन है। भाव यह कि ‘इस देहसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। देहमें जो अहंभाव है और इससे सम्बन्धित वस्तुओं और प्राणियोंमें जो ममभाव है, वह स्वप्नवत् है, मायामात्र है। मैं विज्ञानानन्दघन ब्रह्म हूँ, शरीर और संसारसे मेरा कोई भी सम्बन्ध नहीं।’ इस प्रकार एक विज्ञानानन्दघन ब्रह्मका भाव और उसके सिवा संसार और शरीरका अत्यन्त अभाव देखते रहना—यह अद्वैतपरक साधन है। इस साधनकी हर समय जागृति रहनी चाहिये।

जब देहमें अहंता और देहसे सम्बन्धित पदार्थोंमें ममताका अभाव हो जाता है तब देहमें कोई धर्मी नहीं रहता और धर्मीके न रहनेसे राग-द्वेषका अभाव हो जाता है एवं इच्छा, कामना आदिका अस्तित्व नहीं रहता।उसके मन और बुद्धिमें, सुख-दु:खादि भावोंमें, स्वर्ण, मिट्टी आदि पदार्थोंमें और मान-अपमान, निन्दा-स्तुति आदि दूसरेके द्वारा होने वाली क्रियाओंमें उपर्युक्त गीता अ० १४ श्लोक २४-२५ के अनुसार पूर्ण समता आ जाती है। तब फिर ‘अहं ब्रह्मास्मि’ ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा भाव भी नहीं रहता; क्योंकि वह वास्तवमें ब्रह्म ही हो जाता है और ब्रह्मकी दृष्टिमें यह शरीर और संसार है ही नहीं, तब सम्बन्ध किससे किसका हो? वहाँ सम्बन्धका सर्वथा अभाव हो जाता है या यों समझिये कि सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है।

इस प्रकार ज्ञानमार्गमें जब ‘अहं ब्रह्मास्मि’ आदि महावाक्योंके अनुसार जो शुद्ध अहंभाव है, उसका भी आगे जाकर अभाव हो जाता है, तब उसकी कहीं भी ममता नहीं रहती और वह पुरुष सत्-चित्-आनन्दघन परमात्माको प्राप्त हो जाता है। भगवान‍्ने बताया है—

ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।

सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥

(गीता १८। ५४-५५)

‘फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें एकीभावसे स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियोंमें समभाववाला योगी मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है। उस पराभक्तिके द्वारा वह मुझ परमात्माको मैं जो हूँ और जैसा हूँ ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्वसे जान लेता है तथा उस भक्तिसे मुझको तत्त्वसे जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।’

अहंताके साथ ही उसकी ममताका भी नाश हो जाता है। पहले जब ब्रह्मके स्वरूपमें स्थिति होती है, तब तो उसमें यह शुद्ध अहंकार रहता है कि मैं शरीर नहीं, निर्गुण-निराकार नित्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्म हूँ। अर्थात् उसकी देहमें आत्मबुद्धि हटकर ब्रह्ममें आत्मबुद्धि हो जाती है, किंतु बादमें जब उपर्युक्त साधनके द्वारा उसको पराभक्तिरूप परम ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है तब वह ब्रह्ममें विलीन हो जाता है।

इसी प्रकार भक्तियोगी साधकोंको अहंता-ममताका त्याग करके भक्तियोगका साधन करना चाहिये। देह मैं हूँ और देहसे सम्बन्ध रखनेवाले कुटुम्बी और सांसारिक पदार्थ मेरे हैं—यह अभिमान साधकके लिये साधनमें विघ्न है। मनुष्यको जाति, वर्ण, आश्रम, कुटुम्ब, बुद्धि, बल, गुण, आचरण आदि किसी प्रकारका भी अभिमान नहीं करना चाहिये। जैसे—मैं ब्राह्मण हूँ, ऊँची जातिका हूँ, विद्वान् हूँ, साधु हूँ, ज्ञानी भक्त हूँ, महात्मा हूँ, बुद्धिमान् हूँ, सद‍्गुणी-सदाचारी हूँ, मेरा बड़ा भारी कुटुम्ब है, मेरी स्त्री पतिव्रता है, मेरा पुत्र मातृ-पितृ-भक्त है, मेरे बड़ी-बड़ी मिलें हैं, अनेक मकान हैं, मेरे समान धनी नहीं, बलवान् नहीं, गुणी नहीं, सदाचारी नहीं, श्रेष्ठ नहीं, यों किसी भी प्रकारका अभिमान होना साधनमें महान् विघ्नरूप और खतरेकी चीज है।

इसके सिवा जो शुद्ध अहंता-ममता है, उसका भी अन्तमें त्याग हो जाता है। जैसे—मैं भक्त हूँ, मैं साधक हूँ—यह शुद्ध अहंकार है। यथा—

अस अभिमान जाइ जनि भोरे।

मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥

इस प्रकार मैं भगवान‍्का हूँ और भगवान् मेरे हैं—यह शुद्ध ममता है। यह शुद्ध अहंता-ममता भी आगे जाकर नहीं रहती। अत: साधकको मैं साधक हूँ, भगवान‍्का भक्त हूँ—यह अभिमान भी नहीं रखना चाहिये, किंतु लोग उसको भक्त कहते हैं, महात्मा कहते हैं, धर्मात्मा कहते हैं, इसलिये लोगोंकी दृष्टिमें उनकी मान्यताके अनुसार, उनके विश्वासके अनुसार आचरण करना चाहिये, जैसे कि राजा युधिष्ठिरने यक्षके प्रति कहा था। जब उन्होंने यक्षके पूछे हुए सब प्रश्नोंका यथावत् उत्तर दे दिया, तब यक्षने उनसे पूछा—‘राजन्! तुम महाबलशाली भीमसेन और अर्जुनको छोड़कर नकुलको क्यों जिलाना चाहते हो?’ इसपर युधिष्ठिरने कहा—

धर्मशील: सदा राजा इति मां मानवा विदु:।

स्वधर्मान्न चलिष्यामि नकुलो यक्ष जीवतु॥

(महा० वन० ३१३। १३०)

‘यक्ष! मेरे विषयमें लोग सदा ऐसा समझते हैं कि राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं, अतएव मैं अपने धर्मसे विचलित नहीं होऊँगा। इसलिये मेरा भाई नकुल जीवित हो जाय।’

‘क्योंकि मेरे पिताके कुन्ती और माद्री दो पत्नियाँ थीं—उनमें कुन्तीका पुत्र मैं जीवित हूँ और माद्रीका पुत्र नकुल जीवित हो जाय तो वे दोनों पुत्रवती बनी रहें। मैं दोनों माताओंके प्रति समान भाव रखना चाहता हूँ—यह मेरा धर्म है।’

अतएव साधक यह भाव रखें कि मैं वास्तवमें भक्त और उच्च कोटिका साधक नहीं हूँ, बनना चाहता हूँ, लोग मुझको भक्त या उच्च कोटिका साधक मानते हैं, किंतु मुझमें बड़ी कमी है, मुझे वैसा बनना चाहिये, वैसा ही आचरण करना चाहिये। मैं तो भगवान‍्के दासोंका दासानुदास हूँ, उनका नाममात्रका किंकर हूँ, जैसा कि हनुमान‍्जीने कहा है—

एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।

पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान॥

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें।

सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें॥

नाथ जीव तव मायाँ मोहा।

सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा॥

ता पर मैं रघुबीर दोहाई।

जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥

सेवक सुत पति मातु भरोसें।

रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥

(रा० च० मा० किष्किन्धा० २।१-२)

जब हनुमान‍्जी भरतजीसे मिले हैं, उस समय भरतजीने पूछा—

को तुम्ह तात कहाँ ते आए।

मोहि परम प्रिय बचन सुनाए॥

तब हनुमान‍्जी उत्तरमें कहते हैं—

मारुत सुत मैं कपि हनुमाना।

नामु मोर सुनु कृपानिधाना॥

दीनबंधु रघुपति कर किंकर।

..........................................॥

(रा० च० मा० उत्तर० १। ४-५)

अत: यह समझना चाहिये कि ‘मैं भगवान‍्के दासानुदासकी श्रेणीमें आ जाऊँ तो मेरा बड़ा अहोभाग्य है। अर्थात् भगवान‍्के दास हैं हनुमान‍्जी, मैं उनका भी दास बनकर रहूँ तो मेरा अहोभाग्य है, फिर दास होनेकी तो बात ही क्या है? पर मैं ऐसा हूँ नहीं, होना चाहता हूँ। लोग मुझे भक्त कहते हैं, यह मेरे लिये लज्जाकी बात है।’ यह तो है उस भक्तके हृदयके भावकी बात और बाहरमें लोग जैसा उसे मानते हैं वैसा ही वह सदाचरण करता है। वह समझता है कि जैसा लोग मुझे मानते हैं, उसीको स्वाँगका रूप समझकर भगवान‍्की प्रसन्नताके लिये ठीक उसी प्रकार बरतना है। किंतु वास्तवमें कहीं भी यह अभिमान नहीं करना है कि मैं ब्राह्मण हूँ, क्षत्रिय हूँ, वैश्य हूँ, साधु हूँ, गृहस्थ हूँ, सद‍्गुणी-सदाचारी हूँ, श्रेष्ठ हूँ, भक्त हूँ इत्यादि।

मैं भक्त हूँ, अमुक भक्त नहीं है—यों दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें अच्छेपनका अभिमान आ जाय तो वह साधनमें बाधा है। भगवान् मेरे ही स्वामी हैं और मैं ही उनका सेवक हूँ—यह भाव न रखकर सब भगवान‍्के हैं और भगवान् सबके स्वामी हैं—वे मेरे भी स्वामी हैं—यह भाव रखना अच्छा है। इसकी अपेक्षा भी यह भाव और अच्छा है कि सब भगवान‍्के स्वरूप हैं या सबमें भगवान् विराजमान हैं, इसलिये सबकी सेवा ही भगवान‍्की सेवा है।

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥

(रा० च० मा० किष्किन्धा० दोहा ३)

यह बड़ा उत्तम भाव है। मैं सबका सेवक हूँ, तुच्छ हूँ, सब मेरे स्वामी हैं, मैं उनके चरणोंकी धूलके समान हूँ—इस प्रकारके भावसे आगे जाकर शुद्ध अहंकार भी मिट जाता है और यह भाव आ जाता है कि मैं कुछ भी नहीं हूँ, केवल भगवान् ही हैं। उसे अपना ज्ञान भी नहीं रहता है, केवल भगवान‍्का ही ज्ञान रहता है, उसमें अहंता-ममताका अभाव हो जाता है। फिर उसकी सारी चेष्टा भगवान‍्के संकेतके अनुकूल, अपने-आप ही होती रहती है। उसका करना ‘होने’ में बदल जाता है। जैसे कठपुतलीको सूत्रधार जैसे नचाता है वैसे ही नाचती है, वैसे ही उसकी सारी क्रियाएँ होती हैं। कठपुतलीमें तो अन्त:करण नहीं है और इसमें अन्त:करण होते हुए भी काठकी कठपुतलीकी ज्यों चेष्टा होती है। इसमें कठपुतलीकी अपेक्षा मन-बुद्धि विशेष होनेके कारण मनमें परमात्माका चिन्तन और बुद्धिमें परमात्माका निश्चय विशेषरूपसे रहते हैं। यही असली भक्ति है, यही असली शरणागति है। उस कठपुतलीका अपनी हार-जीतसे भी कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार साधकका भी किसी साधनके फलसे सम्बन्ध नहीं रहना चाहिये। उसे तो अपनी सम्पूर्ण क्रियाओं, उनके फलों और अपने-आपको भी भगवान‍्के अर्पण कर देना चाहिये। भगवान‍्ने गीतामें बताया है—

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परा:।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥

(१२। ६-७)

‘परंतु जो मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वरको ही अनन्य भक्तियोगसे निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं, हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगानेवाले प्रेमी भक्तोंका मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाला होता हूँ।’

वह भक्त सदा-सर्वदा कर्म करता हुआ भी कुछ नहीं करता और भगवान‍्की कृपासे भगवान‍्को प्राप्त हो जाता है—

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद‍्व्यपाश्रय:।

मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥

(गीता १८। ५६)

‘मेरे परायण हुआ कर्मयोगी भक्त तो सम्पूर्ण कर्मोंको करता हुआ भी मेरी कृपासे सनातन अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जाता है।’

इसलिये भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनको वैसा ही बननेकी आज्ञा देते हैं—

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्पर:।

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव॥

(गीता १८। ५७)

‘सब कर्मोंको मनसे मुझमें अर्पण करके तथा समबुद्धिरूप योगको अवलम्बन करके मेरे परायण हुआ निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो।’

उपर्युक्त प्रकारसे साधन करते-करते जब मनुष्य भगवान‍्के सर्वथा शरण हो जाता है, तब उसकी अहंता-ममताका सर्वथा अभाव होकर उसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है और वह फिर पूर्णतया गीता अ० १२ श्लोक १३-१४ के अनुसार भगवान‍्का ज्ञानी भक्त बन जाता है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च।

निर्ममो निरहंकार: समदु:खसुख: क्षमी॥

संतुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चय:।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय:॥

‘जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावरहित, स्वार्थभावरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दु:खकी प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालोंको भी अभय देनेवाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है, वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझे प्रिय है।’

यह भगवान‍्को प्राप्त पुरुषकी कसौटी है। इस प्रकार भगवान‍्का साधक भक्त अनन्यभक्तिके द्वारा नेत्रोंसे भगवान‍्का साक्षात् दर्शन पाकर और शुद्ध (पवित्र) बुद्धिद्वारा भगवान‍्को यथार्थरूपसे तत्त्वत: जानकर भगवान‍्में प्रवेश कर जाता है।

गीतामें भगवान् भी कहते हैं—

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।

ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्त: सङ्गवर्जित:।

निर्वैर: सर्वभूतेषु य: स मामेति पाण्डव॥

(११। ५४-५५)

‘परंतु हे परंतप अर्जुन! अनन्यभक्तिके द्वारा इस प्रकार रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखनेके लिये, तत्त्वसे जाननेके लिये तथा प्रवेश करनेके लिये अर्थात् एकीभावसे प्राप्त होनेके लिये भी शक्य हूँ। हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको करनेवाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियोंमें वैरभावसे रहित है, वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।’

इस प्रकार ज्ञानके मार्गमें तो ‘मैं साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा हूँ।’ यों बड़े-से-बड़ा बनकर अहंकारका नाश करना है और भक्तिके मार्गमें ‘मैं सबका सेवक हूँ, दासानुदास हूँ, किंकर हूँ, सबके चरणोंकी धूलि हूँ, कुछ भी नहीं हूँ’—यों छोटे-से-छोटा बनकर अहंकारका नाश करना है। सबसे पहले देश, जाति, वर्ण, आश्रम आदि सांसारिक अहंकारका नाश करना है,फिर अन्तमें मैं भक्त हूँ, साधक हूँ, इस शुद्ध अहंकारका भी नाश हो जाता है। ज्ञानके मार्गमें तो यथार्थ ज्ञानसे सब प्रकारके अहंकारका नाश होता है और भक्तिके मार्गमें भगवान‍्की कृपासे सब प्रकारके अहंकारका नाश होता है। इन दोनों ही साधनोंसे अहंता-ममताका नाश होनेपर उस पुरुषके कर्म अकर्म हो जाते हैं। उसका करना होनेमें बदल जाता है। एवं दोनों ही प्रकारके साधकोंको परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। अन्तिम फल दोनोंका एक ही है (देखिये, गीता १८। ५४-५५ एवं ११। ५४-५५)।

किंतु बाहरमें उसका व्यवहार वैसा ही होता है जैसा उच्च कोटिके सात्त्विक साधकका व्यवहार होता है। लौकिक दृष्टिमें वह ब्रह्मचारी या साधु या गृहस्थ जो भी है, उस स्वाँगके अनुसार उसका श्रेष्ठ ब्रह्मचारी, श्रेष्ठ साधु या श्रेष्ठ गृहस्थका व्यवहार होता है। उसमें स्वाभाविक ही कोई दोष नहीं आते, वह अपने स्वाँगको नहीं लजाता। इस विषयमें एक छोटी-सी कहानी है—

एक बहुरूपिया था। वह अपने स्वाँगको पूरी तरह पेश उतारा करता था, उसमें किंचिन्मात्र भी कहीं दोष नहीं आने देता था। एक दिन वह राजाके पास गया और इनाम पानेके उद्देश्यसे उसने राजासे कहा— ‘महाराज! आप कौन-सा स्वाँग देखना चाहते हैं?’ राजा बोले—‘तुम केशरी सिंहका स्वाँग लाओ।’ बहुरूपियेने निवेदन किया—‘सिंहका स्वाँग लानेके लिये न कहिये, यह स्वाँग बड़ा क्रूर है। जब सिंहके रूपमें मैं आऊँगा, तब सिंहके स्वभावके अनुकूल ही चेष्टा करूँगा, उसमें कोई दोष या त्रुटि नहीं आने दूँगा। स्वाँगको नहीं लजाऊँगा। उस समय यदि स्वाँगकी रक्षाके लिये मुझसे कोई अपराध हो जाय तो उसे आप क्षमा कर देंगे।’ राजाने कहा—‘बहुत अच्छा, स्वाँगकी रक्षाके लिये तुमसे कोई अपराध होगा तो वह क्षम्य समझा जायगा। तुम सिंहका स्वाँग लाओ।’ यह बात सारे शहरमें फैल गयी। इससे शहरके सब लोग सचेत हो गये।

दूसरे दिन वह सिंह बनकर गर्जता, दहाड़ता हुआ बाजारको लाँघकर राजदरबारमें पहुँचा। शहर और सभाके सभी लोग चुपचाप स्तम्भित हुए-से उसको देखते रहे, किंतु राजाके एक छोटे-से लड़केने ‘मैं राजकुमार हूँ’ इस अभिमानमें आकर सिंहकी गुदामें एक दातुन घुसा दिया, तब सिंहने दुहत्थीसे—आगेके दोनों पंजोंसे उस राजकुमारपर ठीक सिंहकी भाँति प्रहार किया, जिससे उसके प्राण निकल गये। सिंह दहाड़ता हुआ वापस लौट गया। राजकुमारकी मृत्यु हो जानेसे राजपरिवार और राजसभाके सदस्योंको बड़ा ही दु:ख और क्षोभ हुआ। दूसरे दिन वह बहुरूपिया भी अपने असली रूपमें आया। उसने खूब दु:ख प्रकट किया और निवेदन किया कि ‘महाराज! इसीलिये मैं आपसे प्रार्थना करता था कि सिंहका स्वाँग लानेके लिये न कहिये। मुझसे बड़ा भारी अपराध बन गया, जो मैं राजकुमारकी मृत्युमें कारण बना। अब तो मैं बहुरूपिया हूँ, अब आप मेरा चाहे जितना अपमान करें, दण्ड दें, किंतु उस समय मैं केशरी सिंहके स्वाँगमें था, केशरी सिंहके स्वभावके अनुसार चेष्टा कर रहा था। आप बतलाइये यदि कोई केशरी सिंहकी गुदामें दातुन घुसा दे तो उसे केशरी सिंह कैसे बरदाश्त कर सकता है? मैं स्वाँगको नहीं लजाता, स्वाँगको लजाऊँ तो न तो मैं स्वाँगको ही सफल बना सकता हूँ, न जी ही सकता हूँ। मैं भगवान‍्का उपासक हूँ। उन्हींकी कृपासे मेरा स्वाँग सफल होता है और मुझे उसमें विजय प्राप्त होती है।’ राजा यह सब सुन रहे थे, किंतु उनके हृदयमें राजकुमारकी मृत्युके कारण बहुत दु:ख और क्षोभ था, पर वे वचनबद्ध होनेके कारण कुछ भी कर न सके। बहुरूपियेने पूछा—‘महाराज! अब दूसरा कौन-सा स्वाँग लाऊँ?’ इसपर राजकुमारके मरणशोकसे दु:खित मन्त्रीने कहा—‘तुम महात्मा शुकदेवजीका स्वाँग लाओ।’ बहुरूपिया चला गया और पन्द्रह दिन बाद श्रीशुकदेवजीके ही-जैसा एक उच्च कोटिके ज्ञानी महात्माका स्वाँग बनाकर निकला और शहरके किनारे, उत्तरकी ओर बालूके टीलेपर जाकर बैठ गया। इससे शहरमें तुरंत यह खबर फैल गयी कि एक बहुत बड़े उच्च कोटिके महात्मा बालूके टीलेपर बैठे हैं। यह जानकर दर्शनार्थियोंकी वहाँ भीड़ लग गयी। जब यह खबर मन्त्रीने सुनी तो उन्होंने राजासे कहा—‘राजन्! मेरी समझमें वह बहुरूपिया ही स्वाँग धरकर आया है, राजकुमारको मारनेका मेरे हृदयमें बहुत भारी दु:ख था और है, इस उद्देश्यसे ही मैंने उसे शुकदेवजीका स्वाँग लानेको कहा था। यह स्वाँग बहुत कठिन है, इससे वह कहीं इसे लजा दे तो इसे दण्ड दिया जा सकता है, अत: आप भी मेरे साथ उसका दर्शन करने चलिये ताकि उसको विशेष लोभ देकर स्वाँगके स्वरूपसे विचलित किया जाय।’ यों बातचीत करके वे दोनों वहाँ गये, मन्त्री और राजाने महात्माको नमस्कार किया और उनके चरणोंमें रत्नों और सोनेकी मुहरोंकी थैलियाँ रख दीं। वे महात्मा उन थैलियोंकी अवहेलना करके झट वहाँसे उठकर जंगलकी ओर चल दिये। मन्त्री उनके पीछे-पीछे गये। जब एकान्त स्थान आ गया, तब मन्त्रीने उनके कानमें कहा—‘तू बहुरूपिया है, महात्मा शुकदेवजीका स्वाँग लेकर आया है, यह मैं जानता हूँ। इन थैलियोंमें कई लाख रुपयोंका धन है, अत: मेरा यह अनुरोध है कि तू यह सब द्रव्य स्वीकार कर ले, फिर हम दोनों आधा-आधा बाँट लेंगे।’ उस महात्माके रूपमें आये हुए बहुरूपियेने मन्त्रीकी बात बिलकुल अनसुनी कर दी और विरक्तभावसे जंगलमें चला गया। तब राजा और मन्त्री लौट आये।

दो दिन बाद फिर वह बहुरूपिया राजभवनमें आया और बोला— ‘महाराज! शुकदेवजीका स्वाँग आपको कैसा लगा?’ राजाने कहा— ‘बहुत अच्छा’। तब बहुरूपियेने फिर पूछा—‘अब कौन-सा स्वाँग लाऊँ?’ वहाँ राजाका भक्त एक नाई था। उसने सोचा, ‘इसने राजकुमारकी हत्या कर दी—यह इसका बड़ा अपराध है, इसे विशेष दण्ड मिलना चाहिये।’ यह सोचकर उसने कहा—‘पतिव्रता सतीका स्वाँग लाओ।’ राजा और मन्त्रीने भी इसका समर्थन किया। बहुरूपिया इसे सहर्ष स्वीकार करके घर चला गया।

कुछ दिनों बाद उसने देखा एक मुर्दा तैरता हुआ नदीके किनारे आ लगा है, वह उसे घरपर ले गया। उसने पतिके रूपमें उसे सजाकर स्वयं सोलह शृंगारोंसे सम्पन्न पतिव्रता सती स्त्रीका स्वाँग बनाया और पतिकी वैकुण्ठी बनाकर बड़ी धूमधाम और गाजे-बाजेके साथ बाजारमें होते हुए श्मशान जानेके लिये जुलूस निकाला। यह खबर तुरंत सारे शहरमें फैल गयी। हजारों नर-नारी उस मुर्देके साथ होकर श्मशानघाटपर गये। जब यह समाचार मन्त्रीको मिला तब उसने राजासे कहा—‘यह वही बहुरूपिया है, पतिव्रता सतीका स्वाँग लेकर आया है, मैं इसे जलानेका प्रबन्ध करनेके लिये स्वयं जाता हूँ।’ यों कहकर मन्त्री बहुत-से आदमियोंको लेकर मरघटपर गये। करीब सौ मन काठका ढेर लगवाकर चिता बनवा दी। वह पतिव्रता सती स्त्री अपने पतिके शवको गोदमें लेकर चितामें भस्म होनेके लिये बैठ गयी। चिताके चारों ओर आग लगा दी गयी। उसी समय बड़े जोरसे आँधी-तूफान आया। उसके कारण मन्त्री, मन्त्रीके साथ आये हुए आदमी तथा शहरके सब लोग वहाँसे भाग गये। आँधीके साथ घोर वर्षा होने लगी। वर्षा इतने जोरसे हुई कि उसने चिताकी धधकती हुई लपटोंको शान्त कर दिया। तब वह बहुरूपिया चिताके उस ओरसे, जिस ओर आग नहीं लग पायी थी, नीचे उतर पड़ा और उसने फिर चिताके चारों ओर आग प्रज्वलित कर दी। तदनन्तर वह अपने घर लौट गया। उस अग्निसे वह मुर्दा भस्म हो गया। दूसरे दिन मन्त्री और राजाने जाकर देखा—वहाँ भस्म और मुर्देकी हड्डीके सिवा कुछ नहीं है।

कुछ ही दिनों बाद वह बहुरूपिया अपने रूपमें राजभवनमें आया और बोला—‘महाराज! सतीका स्वाँग कैसा रहा?’ राजाने कहा—‘बहुत अच्छा।’ राजाने फिर पूछा—‘तुम जीते कैसे रहे?’ उसने कहा— ‘महाराज! मैं स्वाँग नहीं लजाता, इसलिये भगवान् मेरी रक्षा करते हैं। मैं स्वर्गमें गया था, आपके पिता-पितामहसे भी मिला था, उनके दाढ़ी मूँछ, नख बड़े-बड़े हो रहे थे। मैंने उनसे पूछा था कि आप सब सकुशल हैं न? कोई कष्ट तो नहीं है न? आपका क्या संदेशा राजासे कहूँ?’ उन्होंने कहा—‘यहाँ और सब तो आनन्द है, केवल नाईका कष्ट है, एक नाईको यहाँ भेज देना।’ यह सुनकर राजाने उसी नाईसे कहा—‘तुम जाकर उनकी सेवा करो।’ मन्त्रीने नाईसे कहा—‘जैसे यह स्वर्गमें गया, वैसे ही तुम कल स्वर्गमें जाओ।’ तब नाईने बहुरूपियेको अलग ले जाकर कहा—‘तुम मुझे क्यों मरवाते हो?’ बहुरूपियेने उत्तर दिया—‘तुमने ही मेरी अनिष्ट-कामना की थी, मेरे विनाशके लिये सतीका स्वाँग लानेके लिये कहा था, इसीलिये मैं तुमको भेजता हूँ। जो मनुष्य दूसरेके अनिष्टके लिये चेष्टा करता है, उसका अपना ही अनिष्ट होता है।’ नाईने कहा—‘मेरा अपराध क्षमा करो, मैं तुम्हारे शरण हूँ, मुझे इस घोर विपत्तिसे बचाओ।’

तब बहुरूपियेने राजसभामें आकर राजाके सामने मन्त्रीसे आदिसे अन्ततक सब सच्ची-सच्ची घटना सुना दी कि ‘मैं स्वाँग नहीं लजाता, अत: भगवान् मेरी सब प्रकारसे रक्षा करते हैं। जब आपलोग चितामें आग लगाकर आँधी-वर्षाके भयके कारण चले आये, तब बड़े जोरसे वर्षा हुई, जिससे आग शान्त हो गयी और मैं बच गया। फिर मैंने चिताके चारों तरफ आग लगा दी जिससे वह मुर्दा जल गया। स्वर्गमें जाकर कोई वापस नहीं आ सकता, मैं तो भगवान‍्की कृपासे बच गया था, इस बेचारे नाईके प्राण नहीं लेने चाहिये।’

इसपर राजाने उससे कहा—‘तुम्हारे स्वाँगसे हम बहुत प्रसन्न हैं। जो घटना होनेवाली थी, वह हो गयी। अब तुमको उसका कोई शोक नहीं करना चाहिये।’ यों कहकर राजाने प्रसन्नतापूर्वक उस बहुरूपियेको हजारों रुपयोंका इनाम दिया, वह इनाम लेकर अपने घर चला गया।

इस कहानीसे एक तो यह शिक्षा मिलती है कि ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—जिस किसी आश्रममें और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,शूद्र—जिस किसी वर्णमें मनुष्य हो, उसे अपना स्वाँग नहीं लजाना चाहिये। जो स्वाँग नहीं लजाता, उसकी भगवान् सब प्रकारसे रक्षा करते हैं; जैसे भगवान‍्ने उस बहुरूपियेकी रक्षा की। एवं दूसरी यह शिक्षा मिलती है कि दूसरेके अनिष्टका चिन्तन कभी नहीं करना चाहिये, नहीं तो, जैसे नाईको भय प्राप्त हुआ, वैसे भय प्राप्त हो सकता है।

अतएव उपर्युक्त विवेचनसे यह समझना चाहिये कि ज्ञानी महात्मापुरुष लोकसंग्रहके लिये स्वाँगकी भाँति काम करते हैं। लोग उनको जिस वर्ण, आश्रममें समझते हैं, उनके सामने वे वैसा ही आचरण करते हैं। अपना असली परिचय अपने अन्तरंग लोगोंके सिवा अन्य किसीको नहीं देते। किंतु जो व्यक्ति ‘मैं ज्ञानी हूँ, महात्मा हूँ, योगी हूँ, महापुरुष हूँ, अधिकारी पुरुष हूँ’—ऐसा कहते हैं, वे वास्तवमें योगी, ज्ञानी, महात्मा आदि नहीं हैं, वे तो मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा-सेवाके किंकर, दम्भी,पाखण्डी हैं। जो श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, वे कंचन-कामिनीके लोभसे या अपनी मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा बढ़ानेके लिये दूसरेकी अपनेमें श्रद्धा बढ़ानेके हेतु नहीं बनते; क्योंकि उनको न कुछ करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है और न कुछ न करनेसे ही प्रयोजन रहता है। उनमें स्वार्थका अत्यन्त अभाव हो जाता है। गीतामें भगवान‍्ने बतलाया है—

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।

न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय:॥

(३। १८)

‘उस महापुरुषका इस विश्वमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मोंके न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता।’

अत: परमात्माकी प्राप्तिके लिये मनुष्यको ज्ञान या भक्तिके साधनद्वारा अहंता-ममताका अत्यन्त अभाव करना चाहिये।