जैसा करे संग वैसा चढ़े रंग

हमलोग बहुत अच्छी-अच्छी बातें सुनते हैं। सत्संगमें अच्छे- अच्छे वक्ता आते हैं और वे सभी रहस्यकी बातें, गोपनीय बातें, तत्त्वकी बातें, ज्ञानकी बातें, भक्ति, वैराग्य और सदाचारकी बातें सुनाते हैं। पर इन्हें सुनकर भी उनका असर नहीं होता उसका क्या कारण है? यह विचार करना चाहिये। वक्ताके विषयमें मैं क्या कहूँ और श्रोताओंका दोष भी कैसे बतलाऊँ? सुननेवाले भी भावुक हैं और कहनेवाले भी। मनुष्यका अधिकार है कि वह अपनी अयोग्यता तो प्रकट कर सकता है कि मैं अधिकारी नहीं, लायक नहीं किंतुु दूसरोंको ऐसा कहनेका उसे अधिकार नहीं है। चाहे वक्ता हो, चाहे श्रोता। वह अपने लिये कह सकता है। इस विषयमें मुझे एक कहानी याद आ गयी। कहानीमें भी शिक्षा रहती है, कथामें तो रहती ही है। शास्त्रोक्त बातें तो कथा हैं और लोकोक्तिमें कहानी। कहानी इस प्रकार है—

एक राजा थे। उनके पास एक बड़े विद्वान् पण्डित आया करते थे। वे प्रतिदिन राजाको कथा सुनाते थे। उनको कथा सुनाते बरसों-के-बरस बीत गये। राजा साहबने पण्डितजीको एक दिन कहा कि महाराजजी आपको रोज कथा सुनाते हुए कई वर्ष हो गये। जैसी कथा आज सुनायी वैसी ही प्रतिदिन सुनाते हैं। सुनाते-सुनाते आप बूढ़े हो गये और मैं भी बूढ़ा हो गया, किंतु मैं कई वर्ष पहले जैसा था वैसा ही आज भी हूँ। आपकी कथाके निमित्त सालभरमें ३-४ हजार रुपये लग जाते हैं। वह सरकारमें घाटा ही पड़ता है। चार हजार रुपये प्रति साल खर्चा व्यर्थ करूँ? उसका कुछ तो लाभ होना चाहिये। आपका और मेरा दोनोंका समय नष्ट होता है और रुपया भी खर्च होता है। इसका उपाय बतलाइये कि सुधार क्यों नहीं होता? जबकि आपकी बातें मैं सुनता हूँ। आप वैराग्य, भक्ति, ज्ञानकी बातें कहते हैं, किंतु आपकी बातोंको सुनकर न तो मैं भक्त बना, न ज्ञानी, न सदाचारी और न योगी आप इसका उत्तर एक महीनेके अंदर दें। यदि एक महीनेके अंदर इसका उत्तर नहीं मिलेगा तो यह कथा बंद कर दी जायगी और आपका वेतन बंद हो जायगा। आपको अपनी जीविकाका दूसरा रास्ता देखना पड़ेगा। यह सुनकर पण्डितजीके होश गुम हो गये। पण्डितजी विचार करने लगे कि मैं इसका क्या जवाब दूँ। पण्डितजी इसी चिंतामें मग्न हुए जा रहे थे कि रास्तेमें उन्हें एक सच्चे महात्मा मिले। वे बड़े विरक्त और त्यागी थे, उनके चित्तमें बड़ा वैराग्य था। वे वास्तवमें बड़े उच्च कोटिके महापुरुष थे। पण्डितजीका चेहरा उदास देखकर उन्होंने पण्डितजीसे पूछा कि क्या बात है? पण्डितजी बोले—बात यह है कि एक महीनेके बाद हमारी रोजी यानी जीविका बंद होने जा रही है। महात्माने पूछा—क्यों? उन्होंने बताया कि राजाने मुझसे एक प्रश्न पूछा है और उसका मेरे पास कोई उत्तर नहीं। प्रश्न यह है कि आप ज्ञान, वैराग्य, भक्तिकी बातें कहते हैं और आपकी बातोंको मैं सुनता हूँ, किंतुु मुझमें न तो रत्तीभर वैराग्य हुआ, न ज्ञान और न भक्ति हुई, इसका उत्तर दीजिये नहीं तो यह खर्चा मैं बंद करूँगा। महात्मा बोले—इसके लिये आप क्यों चिंता करते हैं। इसका उत्तर तो मैं दे दूँगा। पण्डितजी बोले—आपके उत्तर देनेसे तो हमारी हानि होगी यानी एक हीनता आयेगी कि इसका उत्तर पण्डितजी नहीं दे सके, इस साधुने दिया है। महात्माने कहा—नहीं, आपकी हीनता नहीं होगी। आप राजा साहबसे कह देना कि यह तो मामूली बात है, इसका उत्तर तो हमारे शिष्य भी दे सकते हैं। और मैं आपका शिष्य बन जाऊँगा। जब मैं आपका शिष्य बनकर उत्तर दूँगा, तब तो आपकी कोई हानि नहीं होगी। पण्डितजी बोले तब तो नहीं होगी। पण्डितजी महाराज दूसरे दिन गये। राजाने फिर पूछा कि महाराज! आपने उस विषयका उत्तर तैयार किया। पण्डितजी बोले—‘महाराज इसका उत्तर तो मामूली बात है, वह तो हमारे शिष्य भी दे सकते हैं, हमारे ऐसे बहुत-से शिष्य हैं। राजा बोले—मुझे क्या, आप दें या आपका शिष्य, मुझे मेरे प्रश्नका उत्तर मिलना चाहिये। कल आप अपने शिष्यको ले आइयेगा। दूसरे दिन पण्डितजी उस महात्माको ले गये। वे उनके शिष्य बनकर चले गये। राजाने पूछा—आप इनके शिष्य हैं? बोले—हाँ महाराज! राजाने कहा कि हमारा प्रश्न आपको मालूम है? महात्मा बोले—हाँ, मालूम है। आपका प्रश्न यह है कि आपको ज्ञान, वैराग्य, भक्तिकी बातें सुनते हुए करीब तीस वर्ष बीत गये किंतु उसका असर आपपर क्यों नहीं हुआ। राजाने कहा—ठीक यही बात है। उस शिष्यने कहा—इसका उत्तर मैं तब दे सकता हूँ ‘जब आप अपनी राज्यकी सारी शक्ति तथा अधिकार दो घड़ीभरके लिये मुझे दे दें।’ राजाने कहा—‘ठीक है और सब कर्मचारियोंको बुलाकर कह दिया कि मैं अपने राज्यका अधिकार दो घड़ीके लिये इन्हें देता हूँ, ये जैसा कहें वैसा ही तुमलोग करना। राजगद्दीपर बैठकर महात्माने हुक्म दिया कि पण्डितजीको रस्सीसे बाँध दो। उन्होंने उनको बाँध दिया। फिर आज्ञा दी कि दूसरी रस्सी लाकर इस राजाको भी बाँध दो। आज्ञाके अनुसार राजा भी बाँध दिया गया। दोनों सोचते हैं कि ये क्या कर रहे हैं? कुछ समझमें नहीं आ रहा है। अब महात्मा पण्डितजीसे कहते हैं कि पण्डितजी, आपने राजा साहबको इतने दिनतक कथा सुनायी, अब उनसे कहिये कि मैं तकलीफ पाता हूँ, मेरी रस्सी खुलवा दें। पण्डितजीने राजा साहबसे कहा—‘मेरी रस्सियाँ खुलवा दो। राजाने कहा—‘मैं कैसे खुलवा दूँ।’ पण्डितजी बोले—तो आप खोल दें। राजाने कहा कि ‘मैं तो खुद बँधा हुआ हूँ, मैं कैसे खोल दूँ।’ फिर बोले—‘किसी प्रकार खुलवा दें।’ राजाने कहा—‘मेरा हुक्म नहीं चलता, कैसे खुलवाऊँ।’ न तो मेरा हुक्म चलता है और न मेरे हाथ खुले हुए हैं।’ महात्माने राजा साहबसे कहा कि आपने इतने वर्षोंतक पण्डितजीसे कथा सुनी। पण्डितजीसे कहें कि आप मुझे खोल दीजिये। पण्डितजीने कहा कि मैं तो खुद बँधा हुआ हूँ, मैं कैसे खोल दूँ। अब राजा साहबसे महात्माजी पूछते हैं कि आपके प्रश्नका उत्तर मिला कि नहीं। राजाने कहा—‘मैं समझा नहीं।’ पूछा—‘अभी भी नहीं समझे। आप स्वयं बँधे हुए हैं तो दूसरेको खोल सकते हैं क्या? अपने खुदको ही नहीं खोल सकते तो फिर दूसरेको कैसे खोलेंगे।’ बोले—हाँ समझ गया। पण्डितजीसे कहा—‘आप इसका मतलब समझे? आप बँधे हुए दूसरेको खोल सकते हैं?’ बोले—‘नहीं खोल सकते।’ तब बोले—महाराज, बात यह है कि ये पण्डितजी कथा तो आपको प्रतिदिन सुनाते हैं किंतु ये खुद बँधे हुए हैं। ये खुद संसारके बंधनसे बँधे हुए हैं और आप इनसे मुक्ति चाहते हैं। यदि पण्डितजी खुद मुक्त हों तो आपको मुक्त करें। खाली कथा सुनानेसे थोड़े ही मुक्ति होती है। तोता और मैना ‘राधेकृष्ण-राधेकृष्ण’ रटते रहते हैं। इनको यह ज्ञान नहीं है कि हम राधेकृष्ण-राधेकृष्ण क्यों करते हैं। जब बिल्ली आती है और उनको पकड़ती है तो वे ‘राधेकृष्ण’ भूलकर ‘टॉय-टॉय’ करने लग जाते हैं। यही दशा पण्डितजीकी है। ऐसी परिस्थितिमें पण्डितजी आपको कैसे छुड़ा सकते हैं। जो संसारसे छूटा हुआ है, खुला हुआ है, ऐसे मुक्त पुरुषका असर पड़ सकता है और जो संसारमें खुद बँधे हुए हैं—ऐश, आराम, भोगोंमें बँधे हुए हैं वे दूसरोंको क्या छुड़ायेंगे। ऐसा पुरुष होना चाहिये जिसका संसारसे तीव्र वैराग्य हो। संसारसे केवल तीव्र वैराग्य ही नहीं, उपरति भी हो और उसे परमात्माके तत्त्वका ज्ञान भी हो। ऐसा उच्च कोटिका महापुरुष हो।

जो स्वयं संसारके बंधनसे मुक्त हो, वह दूसरोंको संसारके बंधनसे मुक्त कर सकता है। कई वक्ता कहते हैं कि हम तो बड़े अच्छे हैं, हमारेमें कोई कमी नहीं है। इन सुननेवालोंमें श्रद्धा, प्रेम, बुद्धि और योग्यता नहीं है। इनकी कमीके कारण ही ये लाभ नहीं उठा सकते। हममें यानी वक्तामें कोई कमी नहीं है, सुननेवालोंमें ही कमी है। बहुत अच्छी बात है, सुननेवालोंमें कमी है तभी तो वे जिज्ञासु बनकर सुननेके लिये आये हैं। अत: वक्ताका यह कर्तव्य हो जाता है कि वह उनको ठीक बनाये। वक्ता बहानेबाजी करे यानी अपनी सफाई दे कि मैं तो दूधका धुला हुआ हूँ और जो कुछ दोष है वह सुननेवालोंका है। सुननेवाले कहते हैं कि हमारे अगर दोष नहीं होता तो तुम्हारे यहाँ सुनने आते ही क्यों? दोष दूर करनेके लिये ही तो आये हैं। वक्ताका यह कर्तव्य होना चाहिये कि वह श्रोताके दोषको दूर करे। वक्ता ज्ञानी होना चाहिये, क्योंकि सुननेवाले तो अज्ञानी हैं ही। कहनेवाला यदि ज्ञानी है तो उसपर ही भार पड़ता है, अज्ञानीपर भार नहीं है। वे तो इतना कहकर दूर हो जाते हैं कि हम तो बेसमझ हैं, अज्ञानी हैं, तुम्हारे यहाँ आये हैं अब तुम योग्य बना दो। हम तो अयोग्य हैं ही। तुम हम सबको योग्य बना दो। अगर योग्य बनानेकी तुम्हारी शक्ति नहीं है तो तुम फिर अपनेको उपदेष्टा, शिक्षा देनेवाला, उपदेश देनेवाला क्यों मानते हो? इस विषयपर दूसरोंके विषयमें कहना कठिन है। मैं अपने विषयमें कह सकता हूँ कि मैं सबको योग्य बना लूँ, उपदेश देकर, आदेश देकर, व्याख्यान देकर, उनका अंधकार दूर कर दूँ या उनका राग-द्वेष दूर कर दूँ, उनको लायक बना लूँ, यह मेरी शक्ति नहीं है। इसीलिये उपदेश देनेकी, आदेश देनेकी मेरी शक्ति भी नहीं है, अधिकार भी नहीं है। इसलिये हम कहते हैं कि हमारी सामर्थ्य भी नहीं है, हम पात्र भी नहीं हैं और हम अधिकारी भी नहीं हैं, न जातिसे, न वर्णसे, न आश्रमसे और न योग्यतासे। मैं इस लायक नहीं हूँ। मैं तो शास्त्रोंमें लिखी हुई बातोंको आपकी सेवामें अपनी भाषामें कह दिया करता हूँ। यह तो मुझे विश्वास है कि उन बातोंको यदि हमलोग काममें लायें तो हमारा सुधार होकर उद्धार हो सकता है। गीताजीकी बातें भगवान‍्की बातें हैं। कोई हमारे घरकी बातें नहीं हैं और शास्त्रोंकी बातें ऋषियोंकी बातें हैं। ऋषियोंकी और भगवान‍्की बातोंको हम काममें लायें तो हमारा सुधार होकर उद्धार हो सकता है और यदि आप काममें लायें तो आपका सुधार होकर उद्धार हो सकता है। एक शक्ति वस्तुगत होती है, जिसमें वस्तुकी शक्तिका इतना प्रभाव पड़ता है कि उसके प्रभावसे अपने-आप ही सबका सुधार हो जाता है। और सुननेवालोंकी श्रद्धापर भी निर्भर करता है। सुननेवाले अपनी श्रद्धासे लाभ उठा सकते हैं। वह हमारे वशकी बात नहीं है। यह तो सुननेवालेकी महिमा है। मेरेमें ऐसी कोई महिमाकी बात, करामात या सामर्थ्य नहीं है कि जो अपने प्रभावको डालकर यानी अपनी शक्ति लगाकर आपलोगोंमें कोई जागृति मैं कर दूँ।

हमारी माता-बहनें भोली-भाली होती हैं, भाईलोग भी भोले होते हैं। हमारे-जैसा चालाक आदमी उन्हें ठग लेता है। कोई रुपया ठग लेता है, कोई सतीत्व। कोई गृहस्थीके रूपमें, कोई साधुके रूपमें, कोई अपनेको ज्ञानी बताकर, अपनेको महात्मा बतलाकर, अपनेको योगी बतलाकर, अपनेको भक्त बतलाकर, भोली-भाली जनताको विशेषकर माता-बहिनोंको ठग लेता है। ऐसी परिस्थितिमें हमलोगोंको माता-बहिनों और भाइयोंको सावधान रहना चाहिये। आजकल व्याख्यान देनेवाले हमारे-जैसे बहुत-से फिरते हैं। वे कंचन और कामिनीके दास होते हैं और कितने ही मान-बड़ाई और प्रतिष्ठाके दास होते हैं। कितने तो अपनेको गुरु कहते हैं और कितने ही अपनेको गुरु ही नहीं कहते, बल्कि ‘हम तो भगवान् हैं’ ऐसा कहते हैं। इस तरह कोई अपनेको भगवान् बतलाते हैं, कोई अपनेको महात्मा बतलाते हैं और कोई अपनेको योगिराज बतलाते हैं। हम उनको जानते हैं कि बाबाजीकी झोलीमें जेवड़ा है किंतु कहते नहीं, क्योंकि कहनेका अपना अधिकार नहीं, किसीका दोष निकालना अपना अधिकार नहीं है। जानते हैं, किंतु जानते हुए भी नहीं कहते। यह दशा इस समय संसारकी हो रही है। खयाल करना चाहिये कि सैकड़ों वक्ताओंमें कोई एक वास्तविक महापुरुष होता है, साधारण मनुष्योंमें तो लाखों-करोड़ोंमें कोई एक होता है। मैं दूसरोंके लिये तो नहीं कह सकता कि अमुक आदमी अपनेको योगी कहता है, किंतुु योगी नहीं, अमुक आदमी अपनेको महात्मा कहता है पर महात्मा नहीं। अमुक आदमी अपनेको ज्ञानी कहता है पर ज्ञानी नहीं। दूसरोंके विषयमें इस प्रकार कहनेका हमारा अधिकार नहीं है। अपने विषयमें मैं कह सकता हूँ कि मेरी सामर्थ्य नहीं है। कोई दूसरा आदमी यदि भूलसे मान ले तो धोखा खा सकता है। मैं तो कहता हूँ कि मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ। मेरी यह सामर्थ्य नहीं है, मैं अधिकारी नहीं हूँ। मैं तो अपनी भाषामें महापुरुषोंकी बातें बतला देता हूँ और केवल उन बातोंको काममें लानेसे मनुष्यका कल्याण हो जाता है। वह तो उन बातोंकी शक्ति है, मेरी शक्ति नहीं है। यह तो मैं कह सकता हूँ कि गीताके वचन भगवान् कृष्णके वचन हैं। रामायणमें तुलसीदासजीके वचन हैं। महाभारतमें वेदव्यासजीके वचन हैं। वेदव्यासजी, तुलसीदासजी, भगवान् श्रीकृष्णजीके वचनोंका पालन करनेसे उद्धार हो जाय, इसमें कहना ही क्या है? किंतुु यदि कोई मूर्खतासे मेरे शरीरको महात्मा मान ले, अच्छा भक्त मान ले और इसकी सेवा-पूजा करने लगे तो मेरे ऊपर उनका भार चढ़ता है, किन्तु उनका कल्याण हो जाय इसके लिये मैं गारन्टी नहीं दे सकता, क्योंकि मैं नहीं समझता कि मेरी सेवा करनेसे उनका कल्याण हो जायगा, बल्कि मैं तो यह समझता हूँ कि उन्हें धोखा होगा क्योंकि मैं एक साधारण—मामूली मनुष्य हूँ।

किसीने पूछा कि संसारमें उच्च कोटिके महापुरुषोंको आप बतला दें। इस विषयमें असली बात यह है कि मेरे बतलाये हुए आदमीमें अगर आप श्रद्धा करें तब तो मेरेमें ही करनी अच्छी है। यदि हमारी बातपर विश्वास करके अमुक पुरुष महात्मा है या ज्ञानी है या योगी है, आप मानने लगें तब तो आपने मेरी बातका बहुत अधिक आदर किया—यह तो सोचनेकी बात है। बात यह है कि संसारमें हम किसे महात्मा मानें, भक्त मानें, ज्ञानी मानें, कैसे काम चले? एक नम्बरकी बात तो यह है कि सबसे बढ़कर महात्माओंके भी महात्मा ईश्वर हैं, उनकी शरण होना चाहिये। वे स्वयं प्रकट होकर या महात्माके रूपमें आकर हमलोगोंको मिल सकते हैं। एक नम्बरमें तो ईश्वरोंका ईश्वर, महात्माओंके भी महात्मा—वह परमात्मा हैं। दूसरे नम्बरमें स्वयं भगवान‍्की वाणी—भगवद‍्गीता भी महात्माओंकी महात्मा है। जैसे सिक्खलोग नानक साहबके ‘ग्रंथ साहब’ को ही ईश्वरके तुल्य मानकर, ‘ग्रंथ साहब’ को गुरु मानकर उसके अनुसार चलते हैं वैसे ही भगवद‍्गीता यह एक नंबरकी पुस्तक है। हमारे देखनेमें, जाननेमें अध्यात्मविषयमें इसके बराबर और कोई पुस्तक नहीं है। हम सर्वज्ञ नहीं, हमने सारे शास्त्र नहीं देखे हैं किन्तु जितने देखें हैं उनमें हमें सबसे बढ़कर भगवद‍्गीता मालूम दी। और भी बहुत-सी अच्छी-अच्छी पुस्तकें हैं, जैसे भागवत, रामायण, महाभारत आदि जितनी भी पुस्तकें हैं—वे सभी अच्छी हैं। पुस्तकोंसे हम बहुत लाभ उठा सकते हैं। इसी बातको खयालमें रखकर हमलोग पुस्तकोंके प्रचारकी चेष्टा करते हैं। गीतामें भगवान् कहते हैं—‘हे अर्जुन! तेरा-मेरा संवाद, यानी इस गीताशास्त्रका संसारमें जो प्रचार करता है, उसके समान मेरा प्यारा काम करनेवाला दुनियामें न तो कोई है और न भविष्यमें कोई होगा। भगवान‍्ने यह घोषणा की। गीताजीके १८ वें अध्यायके ६८ और ६९ वें श्लोकमें गीताकी बड़ी महिमा गायी है। जो कोई मेरे भक्तोंको गीता धारण करवायेगा वह मेरी परमभक्तिके द्वारा मुझे प्राप्त होगा। इतना ही नहीं, उससे बढ़कर मेरा प्यारा काम करनेवाला दुनियामें न कोई है और न भविष्यमें कोई होगा। इस बातको पढ़कर हमारे मनमें यह श्रद्धा हुई, यह विश्वास हुआ कि भगवान् इस प्रकारकी गारण्टी दे रहे हैं तो इसपर थोड़ा गौर करना चाहिये। यह एक अलौकिक बात है, अद‍्भुत बात है, छिपी हुई रहस्यकी बात है। अबतक भगवान् की, गीताकी तथा शास्त्रोंकी बात बतायी गयी। जिनका संग करनेसे हमारी आत्मामें तीव्र वैराग्य पैदा हो, वह श्रेष्ठ पुरुष है। जिनका संग करनेसे, जिनके दर्शनसे, भाषणसे, स्पर्शसे, चिन्तनसे भी हमारी आत्मामें तीव्र वैराग्य पैदा हो तो समझ लेना चाहिये कि यह वीतराग पुरुष है। क्योंकि सूर्यभगवान‍्की रोशनी यानी धूपमें हम बैठते हैं तो हम गरम हो जाते हैं। तब प्रतीत होता है कि सूर्यभगवान‍्में न जाने कितनी गर्मी है। हम पाँच मिनट धूपमें बैठते हैं तो चरणोंसे लेकर मस्तकतक एकदम गरम हो जाते हैं—तब सोचते हैं कि यह गर्मी कहाँसे आयी, उसी समय ज्ञान हो जाता है कि यह गर्मी सूर्यभगवान‍्से आयी। अग्निके नजदीक बैठते हैं तो उसकी शक्तिके अनुसार उसका भी ताप आता है और केदारनाथमें बर्फपर चलते हैं तो वहाँ चरणोंसे लेकर मस्तकतक सर्दी छा जाती है, वह बर्फका प्रभाव है। इसी प्रकार जिसके दर्शन, स्पर्श, भाषण, वार्तालाप तथा चिन्तनसे हमारेमें महात्माओंके लक्षण आयें, गुणातीत पुरुषोंके, ज्ञानी महात्माओंके लक्षण जो गीताजीमें लिखे हैं आने लगें तो समझ लेना चाहिये कि ये ज्ञानी महात्मा पुरुष हैं। जिनके संग, दर्शन, स्पर्श और भाषणसे हमारे हृदयमें, हमारे भावोंमें वे लक्षण आने लगें, जो लक्षण भगवान‍्ने अपने भक्तोंके लिये गीताके बारहवें अध्यायके तेरहवें श्लोकसे अध्यायकी समाप्तितक बतलाये हैं तो यह समझ लेना चाहिये कि ये भगवान‍्के भक्त हैं। यह उनकी सच्ची परीक्षा है। और जिनके दर्शनसे हमारे शरीरमें, मन-बुद्धि और इन्द्रियोंमें दैवी सम्पदाके वे लक्षण आने लगें जो गीताके १६ वें अध्यायके पहले तीन श्लोकोंमें लिखे हैं तो यह समझना चाहिये कि यह दैवी सम्पदावाला पुरुष है। और जिनके संग, दर्शन, भाषण, वार्तालापसे आसुरी सम्पदाके लक्षण हमारेमें आयें यानी काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग-द्वेष आदि आने लगें तो यह समझना चाहिये कि यह देखनेमें तो मनुष्य है लेकिन वास्तवमें साक्षात् राक्षस है अन्यथा हम राक्षस क्यों होते जा रहे हैं? इनका ही तो हमारे ऊपर प्रभाव पड़ा है। इसी प्रकार जिनके दर्शन, भाषण, स्पर्शसे हमारे शरीरमें योगका ज्ञान बढ़े तो यह समझना चाहिये कि यह योगी है। क्योंकि कहावत है—‘जैसा करे संग वैसा चढ़े रंग’ अपनेपर जैसा रंग चढ़े उसको देखकर परीक्षा करनी चाहिये। यह पक्‍की और सच्ची परीक्षा है। इसपर राजस्थानके बीकानेर राज्यकी एक कहानी याद आ गयी—

बीकानेर राज्यमें एक राजा थे। जब वे गद्दीपर बैठे तब उन्होंने बुजुर्गों तथा अपने सब कुटुम्बवालोंको बुलाया और कहा कि दादाजी! एक बात मैं आपलोगोंसे पूछता हूँ, आप निर्भयतासे जैसी बात आपके दिलमें आये, सच्ची बात कहें। वे बोले—आप पूछें। चाहे छोटा ही हो राजाकी पदवीपर है, इसलिये आदरसूचक सम्बोधनसे बोलते हैं। राजाने पूछा कि आपने यानी बूढ़े आदमियोंने हमारी तीन पुस्तोंका राज्य देखा है। मेरा भी राज्य अभी दस-पाँच वर्षोंसे आपलोग देख रहे हैं। इसके पहले मेरे पिताजीका राज्य था। वह भी आपने देखा है। उसके पहले मेरे दादाजीका राज्य था, उसे भी आपने देखा है। अपेक्षाकृत हमारे तीनोंके राज्यमें किसका राज्य बढ़िया है। मेरा शासन बढ़िया है या मेरे पिताजीका शासन बढ़िया था या मेरे दादाजीका शासन बढ़िया था। एक बुजुर्गने कहा कुँवर साहब आप बड़े आदमी हैं। आपकी परीक्षा हमलोग नहीं कर सकते। आपकी, आपके पिताजी और आपके दादाजीकी परीक्षा करना हमारी सामर्थ्यसे बाहर है। हम अपनेपर जो असर पड़ा वह बात कह सकते हैं। उससे आप अंदाजा लगा लीजिये। उन्होंने कहा—जब आपके दादाजीका राज्य था तब मेरी उम्र बीस सालकी थी। और मैं बालूके टीलेपरसे आ रहा था। मेरे कानोंमें एक स्त्रीके रोनेकी आवाज पड़ी। मैं उसके पास गया। वह वैश्यजातिकी स्त्री थी। उसके शरीरपर लगभग दस हजारके जेवर लदे हुए थे। वह रो रही थी। मैंने पूछा कि बहन! तूँ क्यों रो रही है? उसने बतलाया कि मैं मुकलावा (गौना) लेकर अपने पीहरसे ससुराल जा रही थी। मेरे साथ बैलगाड़ी तथा ऊँटपर हजारों रुपयोंका सामान लदा हुआ था। मेरे साथ बहुत रक्षक भी थे, किंतु बीस आदमियोंका दस्युदल आया और एकाएक हमला कर दिया। हमारे जितने आदमी थे सब भाग गये तथा मैं भी भाग गयी और वे सब माल लूटकर ले गये। मैं अपने प्राणोंको बचाकर इस टीलेपर चली आयी हूँ। मैंने उसके पीहर तथा ससुरालका पता पूछा, वह उसने बतला दिया, मैं उसके ससुरालवालोंको जानता था। मैंने कहा कि बहिन, तू कोई बातकी फिकर मत कर। मैं तुम्हें घरपर पहुँचा दूँगा। अपनी बहनके समान समझकर मैं उसे उसकी ससुराल ले गया। ससुरालवाले उसकी खोजमें थे ही। उनके पास पहले ही खबर पहुँच गयी थी कि डाकू आये और सब धन लूटकर ले गये और अपनी बहूका पता नहीं, कहाँ है?

मैंने वहाँ पहुँचकर उन्हें बताया कि टीलोंके बीच बैठकर रो रही थी। वह घर पहुँचकर बेहाल होकर रोने लगी और अपनी सास, श्वशुर, पतिको कहने लगी कि मेरी बड़ी भारी दुर्दशा हुई, जो कुछ मालमत्ता था वह सब लुट गया और मैं भी किसी प्रकार अपने प्राण लेकर जंगलमें भाग गयी। इन्होंने मेरी रक्षा की और ये मुझे यहाँ ले आये, मैं इनका क्या गुण गाऊँ। अब आपलोग इनको संतुष्ट करके भेजें। इसपर ससुरालवाले बोले—महाराज आपने हमारा बड़ा उपकार किया, हमारी बहूको जीवन-दान दिया, हमारे धनकी रक्षा की। हम आपको एक हजार रुपया पुरस्कार देना चाहते हैं। मैंने कहा कि मैंने रुपयोंके लिये उपकार नहीं किया। मैंने अपना कर्तव्य समझकर यह कार्य किया। मैंने सोचा कि तूँ मनुष्य है और यह मेरा धर्म है। अत: मैंने धर्म समझकर यह काम किया है। इनामके लिये नहीं किया। उन्होंने बहुत कोशिश की और कहा अच्छा पाँच सौ रुपया ले लें, कुछ तो लें। किंतु मैंने एक पैसा भी नहीं लिया। वे बेचारे लाचार हो गये, मैंने नहीं लिया तो वे क्या करें। फिर मैं अपने घर आ गया। जबतक आपके दादाजी जीवित थे, तबतक मेरी ऐसी वृत्ति बनी रही। जब आपके दादाजीका शरीर शान्त हो गया, उस समय मेरी आयु करीब पचास वर्षकी हो गयी। उस समय मेरे मनमें यह बात आने लगी कि मुझे एक स्त्री मिली थी। कैसा मौका था, जंगलमें उसका दस हजार रुपयेका जेवर उतार लेते तो मुझे कौन पकड़ता। वे दस हजार रुपये और आजतक ब्याज होता तो कितना होता, क्योंकि आठ आनेके ब्याजसे बारह वर्षमें दुगुना होता है, इस प्रकार काफी रुपये हो जाते। मैंने बड़ी भूल की कि धर्मके झंडेको पकड़कर बैठ गया। अब धर्म मुझे क्या काम देता है। यदि मैं वह गहना उतार लेता तो आज मालामाल हो जाता, ऐसी भावना मुझमें आने लगी। विचारके द्वारा तो वह बात मुझे बुरी मालूम देती किंतुु रुपयोंकी आसक्तिके कारण मनमें यह बात आने लगी कि मैंने वह भूल की। वह रुपया घरमें आ जाता तो आज मौज करता। और कुँवरसाहब, जब आप गद्दीपर बैठे उस समय मेरी उम्र सत्तर वर्षकी हो गयी थी और अब मेरी उम्र ७५ या ८० के नजदीक जाने लगी है, तथा मेरी स्त्री मर गयी। अब मेरे मनमें आने लगा कि उस समय उसे समझाकर अपने साथ ले आता तो बुढ़ापेकी अवस्थामें स्त्री-की- स्त्री रहती और रुपयों-का-रुपया। दस हजार रुपयोंका गहना भी अपने हजम हो जाता और उसे समझाकर अपनी औरत बना लेते और अब मौज करते। अब बुढ़ापेमें वह सेवा करती और रुपयोंसे मौज करते। कुँवरसाहब, अब जब हम मरनेके नजदीक हैं तब यह बात हमारे दिलमें आने लगी। वृद्धावस्थामें यह दशा है। कुँवरसाहब, हमने तो अपनी दशा आपको बतलायी। आपमें कौन बड़ा, कौन छोटा उसका निर्णय करनेकी हमारी सामर्थ्य नहीं। मैंने तो आपको यह बतला दिया कि आपके राज्यमें हमारे मनकी यह दशा है और आपके बापके राज्यमें यह दशा थी और आपके दादाजीके राज्यमें यह दशा थी। अब किसका राज्य बढ़िया और किसका राज्य घटिया इसका अंदाज तो आप स्वयं ही लगायें।

कहनेका अभिप्राय यह है कि ‘जैसा करे संग वैसा चढ़े रंग’। कोयलेकी दलालीमें हाथ काला होता ही है। हम कोयलेकी खानमें गये तो हमारा कपड़ा भी काला हो गया। यह बात हमने अक्षरश: बहुत जगह देखी है, आजमाईश करके देखी है कि जैसा संग किया गया है उसका असर जरूर होगा। अपने ऊपर जैसा असर हो उससे हमें अंदाज लगाना चाहिये। यह असली परीक्षा है। मैंने यह जो युक्ति बतलायी, यह युक्ति ऐसी बलवान् है कि इसके लिये किसीको पूछनेकी आवश्यकता नहीं।