नाम-कीर्तनसे शत्रुपर विजय

राजा गोपालसिंहका भगवान‍्में अद‍्भुत विश्वास, पूर्वजोंका संक्षिप्त परिचय

वि० सं० ७७५ के लगभगकी बात है। एक क्षत्रिय युवक अपनी पत्नीको साथ लेकर श्रीजगन्नाथजीके दर्शनार्थ पुरी जा रहे थे। पत्नी गर्भवती थी। उस समय मोटर, रेलगाड़ी आदि सवारियाँ थीं नहीं, अत: वे धीरे-धीरे पैदल ही यात्रा कर रहे थे; रात्रिके समय जब वे कोतुलपुर थानाके अधीन लाउग्राममें पहुँचे, तब वहाँ उन्होंने विश्राम करनेके लिये एक गृहस्थका दरवाजा खटखटाया। गृहस्थने उनका इतना बड़ा सत्कार किया, मानो कोई बहुत पुराना मित्र आया हो और वे उसके आनेकी आशासे इतनी राततक प्रतीक्षामें बैठे हों। उसी रात्रिमें क्षत्रिय युवककी पत्नीने एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया। यही शिशु आगे चलकर मल्लराज्यका आदि संस्थापक हुआ; इसीसे इसे ‘आदिमल्ल’ कहते थे। आदिमल्लने जिनके घर जन्म ग्रहण किया, वे भी क्षत्रिय थे। उनकी उपाधि थी मल्ल। इसलिये इन राजाओंकी उपाधि ‘मल्ल’ और इनके राज्यका नाम ‘मल्लभूमि’ हुआ।

इस शिशुके जन्मके तीन दिन बाद ही इसके पिता जगन्नाथपुरी चले गये और उन्होंने वहीं शरीर त्याग कर दिया। शिशुकी माताका भी बीस दिन बाद लाउग्राममें ही देहान्त हो गया। अत: लाउग्रामके उस आश्रयदाता दम्पतिने ही शिशुका पालन-पोषण किया। उसका नाम रखा गया रघुनाथ। रघुनाथके पालक पिताकी आर्थिक अवस्था अच्छी नहीं थी, इसलिये रघुनाथ बालक-अवस्थामें ही गाँवके पण्डित मनोहर पंचाननकी पाठशालामें पढ़ने चला गया और वेतनके बदले उनकी गायें चराने लगा। रघुनाथकी बुद्धि तीव्र थी, यह देखकर सभी कहते कि यह लड़का होनहार होगा। थोड़े ही दिनोंमें उसने पाठशालाकी पढ़ाई समाप्त कर दी।

एक दिन रघुनाथ पण्डित पंचानन महाशयकी गायें चराने खेत गया था; किंतु जब दोपहरतक घर नहीं लौटा, तब पण्डितजीको बड़ी चिन्ता हुई। वे उसकी खोजमें निकले। खोजते-खोजते उन्होंने श्रान्त रघुनाथको एक बरगदके पेड़की छायामें सोये देखा। उसके मुखपर पत्तोंके भीतरसे आकर धूप लग रही थी। उससे बचानेके लिये एक बड़ा भारी विषधर साँप उसके सिरहाने फनको छत्रकी तरह फैलाये बैठा था। यह देखकर पण्डितजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे तुरंत समझ गये कि यह बालक साधारण मनुष्य नहीं, कोई महापुरुष है। कुछ देर बाद साँप चला गया और पंचानन पण्डित रघुनाथको लेकर घर लौटे।

कुछ समय बाद लाउग्रामके राजाकी मृत्युके अनन्तर ये रघुनाथ ही वहाँके राजा बनाये गये। तबसे मल्लराज्यका आरम्भ हुआ। रघुनाथके मरनेपर उनके पुत्र जयमल्ल राजा हुए। वे प्रद्युम्नपुरको जीतकर अपनी राजधानी लाउग्रामसे वहाँ ले आये। प्रद्युम्नपुरमें एक-के-बाद-एक राजा होते गये। बारहवीं पीढ़ीमें खड्गमल्ल हुए, जिन्होंने वर्तमान खड्गपुरको जीता और उसका नाम खड्गपुर रखा। तत्पश्चात् उन्नीसवें राजा जगतमल्ल हुए। उन्होंने पासके वनमें नयी राजधानी स्थापित की। अपने कुलदेवताके नामपर उसका नाम ‘विष्णुपुर’ रखा और वे वहीं आकर रहने लगे।

मल्ल हम्बीरकी वीरता और वैष्णवता

शताब्दियाँ बीत गयीं। एकके-बाद-एक राजा होते गये। हरेक राजा अपने इच्छानुसार राजधानीकी उन्नतिकी चेष्टा करते थे। जिस समय दिल्लीके सिंहासनपर बादशाह अकबर विराज रहे थे, उस समय मल्लभूमिके राजा मल्ल हम्बीर थे। मल्लराजाओंमें वीर हम्बीर सर्वप्रधान राजा हुए। वे जैसे साहसी थे, वैसे ही विद्वान् और राज्य-संचालनमें सुदक्ष थे। इन्होंने मुसलमान आक्रमणकारियोंसे राजधानीको सुरक्षित रखनेके लिये दो दुर्ग बनाये थे।

इन्हीं वीर हम्बीरके समय पठानसेनापति दाउदखाँने विष्णुपुरपर आक्रमण किया। भयानक युद्ध हुआ। मल्लसेनाने प्रबल पराक्रमके साथ युद्ध किया और अन्तमें दाउदखाँको बुरी तरह पराजित होकर भागना पड़ा। इस युद्धमें पठानोंकी सेनाके इतने आदमी मरे कि युद्धस्थल सैनिकोंके मुण्डोंसे भर गया। इसीसे उस स्थानका नाम ‘मुण्डमालाघाट’ पड़ा। यह स्थान वर्तमानमें विष्णुपुरसे तीन मीलपर नदीके किनारे स्थित है। वहाँ दुर्गका ध्वंसावशेष अब भी दिखायी पड़ता है। कई वर्ष हुए, बाढ़के प्रवाहमें मिट्टी बह जानेसे एक बड़ी तोप मिट्टीके नीचेसे निकली थी, वही तोप इस समय विष्णुपुरकी फौजदारी अदालतके सामने रखी है।

वीर हम्बीर बड़े ही योद्धा और विष्णुभक्त थे। वीर हम्बीरके समयसे ही मल्लवंशीय राजाओंने वैष्णवधर्मकी दीक्षा लेनी शुरू की और वैष्णवधर्मके प्रचारार्थ वे इच्छानुसार खर्च करने लगे। राजा वीर हम्बीर अपने प्रारम्भिक जीवनमें वैष्णवधर्मके सम्बन्धमें विशेष नहीं जानते थे। एक बार वृन्दावनसे श्रीजीवगोस्वामी और श्रीकृष्णदास कविराज आदि वैष्णवोंने आचार्य श्रीनिवास, नरोत्तमदास और श्यामानन्द—इन तीन वैष्णवोंके साथ बहुत-से वैष्णवग्रन्थ तीन-चार बैलगाड़ियोंपर लादकर गौड़ देशमें भेजे थे। रास्ता बहुत दूरका था। तीनों गोस्वामी मार्गके कष्ट सहते हुए अपने देश जा रहे थे। मार्गमें जब वे रघुनाथपुर मलिआड़ा पार करके गोपालपुरमें पहुँचे, तब उन्होंने बैलोंको खोल दिया और स्वयं विश्राम करने लगे। उन्हें गहरी नींद आ गयी। तब विष्णुपुरके राजसैनिक गाड़ियोंपर बहुमूल्य चीजें समझकर उनको वहाँसे धीरे-धीरे विष्णुपुर ले गये।

इधर नींदसे जगकर गोस्वामियोंने जब बैलगाड़ियों और पुस्तकोंको न देखा, तब वे बहुत व्याकुल हो गये। श्रीनिवास तो पागलकी तरह फटा-मैला कपड़ा पहने ग्रन्थोंकी खोजमें इस गाँवसे उस गाँव चक्‍कर लगाने लगे। दो गोस्वामी तो हताश होकर वृन्दावन लौट गये, परंतु श्रीनिवास वन-वन और गाँव-गाँव घूमते हुए एक दिन विष्णुपुरसे चार मील दूर देवलीग्राममें आये। वहाँ श्रीकृष्ण-वल्लभ चक्रवर्ती महाशयसे इनकी भेंट हुई। चक्रवर्ती महाशयने बातचीतमें इनका सारा वृत्तान्त जान लिया। उन्होंने श्रीनिवासको आश्वासन देकर कहा—‘आप इसके लिये कोई चिन्ता न करें। हमारे राजा परम दयालु और धार्मिक हैं। उनसे सब बातें स्पष्ट कह देनेपर वे निश्चय ही इसकी व्यवस्था कर देंगे।’

तदनन्तर एक दिन चक्रवर्ती महाशय श्रीनिवासको साथ लेकर राजदरबारमें गये। उस समय वहाँ बड़े समारोहके साथ श्रीमद्भागवतकी कथा हो रही थी। कथावाचक थे राजपण्डित व्यास चक्रवर्ती। वे रासपंचाध्यायीका अर्थ कर रहे थे; किंतु उनका अर्थ ठीक नहीं था। इसलिये आचार्य श्रीनिवासके साथ उनका विवाद छिड़ गया। श्रोताओं तथा राजाने भी श्रीनिवास महाशयसे कथा कहनेके लिये विनयपूर्वक प्रार्थना की। श्रीनिवास बेचारे क्या करते, उनको बाध्य होकर कथा सुनानी पड़ी। वे भागवतके प्रत्येक श्लोकका अर्थ करके ऐसी मधुर भाषामें सबको समझाने लगे कि श्रोता मुग्ध हो गये। राजा, मन्त्री, सभासद—सभी कथा सुनकर आनन्दित हुए। राजाने अतिशय भक्तिके साथ श्रीनिवासको प्रणाम किया और उनकी चरणरज मस्तकपर लगाकर परिचय पूछा। श्रीनिवासने परिचयके साथ ही राजदरबारमें उपस्थित होनेका कारण भी बतलाया।

श्रीनिवास आचार्यकी बात सुनकर राजा अपने बुरे कामके लिये पश्चात्ताप करने लगे तथा हाथ जोड़कर उनसे बोले—‘महाराज! सचमुच हमारा यह बहुत बड़ा भाग्य था कि हमने गाड़ीसहित आपकी पुस्तकोंको यहाँ रखा, नहीं तो आप-जैसे महापुरुष मेरे दरबारमें क्यों आने लगे। आपके श्रीचरणोंको देखकर मैं धन्य हो गया, मेरा वंश और पुरी धन्य हो गयी। अब इस अधमके अपराधोंको क्षमा करें। आपके वे ग्रन्थ सुरक्षित हैं, उन्हें ले लें और मेरे अपराधका जो दण्ड देना हो दें।’ यों कहकर राजा श्रीनिवासके चरणोंमें लोट पड़े। आचार्य श्रीनिवासको दया आ गयी। उन्होंने राजाको सान्त्वना दी और बादमें आषाढ़ मासकी कृष्णा तृतीयाको उनको श्रीराधाकृष्णमन्त्रकी दीक्षा दी। तबसे मल्लभूमिके राजा वैष्णवधर्मकी दीक्षा ग्रहण करने लगे।

राजा वीर हम्बीर परम वैष्णव थे। राजाके अनुरोधसे आचार्य श्रीनिवास कुछ दिन विष्णुपुर रहे। कुछ समय बाद राजा गुरुदेव श्रीनिवासको साथ लेकर वृन्दावन गये और वहाँके सब तीर्थोंमें घूम-फिरकर वापस राजधानी लौट आये। वृन्दावनसे आकर राजाने राजधानीको वैष्णवधर्मकी शिक्षाके अनुसार सजाना आरम्भ किया। बहुत धनराशि व्यय करके यमुना, कालिन्दी, श्यामकुण्ड और राधाकुण्ड नामक चार तालाब बनवाये। विष्णुपुरके पास ही दो गाँवोंके नाम द्वारका और मथुरा रखे गये। यही सब देखकर वैष्णव कवि और साधुओंने विष्णुपुरको ‘गुप्त वृन्दावन’ कहा।

राजाने प्रसिद्ध कारीगरोंसे कालाचाँद (कृष्णचन्द्र) विग्रहकी एक मूर्ति बनवाकर बड़े समारोहके साथ उसकी प्रतिष्ठा करायी। वे अपने जीवनकालमें कालाचाँद-देवका मन्दिर न बनवा सके। बादमें उनके सुयोग्य पुत्र रघुनाथसिंहने मन्दिर-निर्माण करवाया। यह कालाचाँद-मन्दिर आज भी है। मन्दिरके ऊपर जो शिलालेख है, उसके अनुसार यह मन्दिर १६५६ ई० में तैयार किया गया था।

राजा रघुनाथका भगवत्प्रेम और श्रीमदनमोहनजीकी स्थापना

वीर हम्बीरकी मृत्युके बाद उनके पुत्र रघुनाथ वहाँके राजा हुए। ये भी पिताकी भाँति साहसी योद्धा और बुद्धिमान् थे। राजमहलके नवाब शाहशुजाने एक दिन किसी बहानेसे रघुनाथको अपने दरबारमें बुलाकर उन्हें बंदी कर लिया। अन्तमें उनके वीरत्व और साहसकी परीक्षाके लिये नवाबने अपने एक दुष्ट घोड़ेकी पीठपर चढ़ाकर दौड़ आनेकी रघुनाथको आज्ञा दी। घोड़ा बहुत ही उद्धत था, पर रघुनाथ बड़ी बहादुरीसे उसको वशमें रखे हुए दौड़ाकर वापस ले आये। इससे नवाब बहुत प्रसन्न हुए एवं रघुनाथको बन्धनमुक्त करके उनके साथ मित्रता की। नवाबने राजा रघुनाथके सम्मानमें उन्हें ‘सिंह’ की उपाधि दी। रघुनाथके समयसे ही मल्ल राजाओंकी उपाधि ‘सिंह’ हुई।

नवाबसे विदा लेकर राजा रघुनाथसिंह विष्णुपुरकी ओर चले। चलते-चलते वे एक गाँवमें पहुँचे। वे पूरे वैष्णव थे; ब्राह्मणके सिवा अन्य किसीके घर नहीं खाते थे एवं विष्णुका चरणोदक और तुलसी लिये बिना जल ग्रहण नहीं करते थे। पता लगाकर वे धरणीधर नामक ब्राह्मणके अतिथि हुए। धरणीधर अत्यन्त ही गरीब थे। फिर भी उन्होंने बहुत यत्न करके रघुनाथको घरपर रखा और जो कुछ पत्र-पुष्प मिल सका, उसीसे रघुनाथका आदर-सत्कार किया और भोजन कराया। गरीब होनेपर भी ब्राह्मण बड़े धार्मिक थे; कभी अन्याय नहीं करते और झूठ नहीं बोलते थे। ब्राह्मणके घरमें भगवान् श्रीराधाकृष्णकी मूर्ति थी, नाम था मदनमोहनजी। मदनमोहनजीके अद‍्भुत अपूर्व रूपको देखकर राजा मुग्ध हो गये। उन्होंने ब्राह्मणसे दस हजार रुपये लेकर मदनमोहनको देनेका प्रस्ताव किया। रुपयोंके बदले मदनमोहनको देना होगा—यह सोचकर ब्राह्मण व्याकुल होकर रोने लगे। छोटे बालककी तरह रोते-रोते उन्होंने कहा—‘नहीं, तुम चाहे जितने रुपये दो, मैं अपने भगवान‍्को तुम्हें नहीं दे सकता।’

रात्रिमें मन्दिरमें सोते हुए रघुनाथको भगवान‍्का स्वप्नादेश हुआ और तदनुसार उन्होंने चुपचाप मदनमोहनजीको अपनी गोदमें उठा लिया और उन्हें चद्दरसे ढककर वे घरसे निकल पड़े। उनके हाथ, पैर और हृदय काँप रहे थे। राजाने अपने जीवनमें कभी इस तरहका काम नहीं किया था, इसीसे उनका सारा शरीर काँप रहा था। क्या करें, इष्टदेवका आदेश था। वे धीरे-धीरे घरके किवाड़ बंद करके चल दिये। दो-तीन दिनों बाद वे विष्णुपुर पहुँचे। रानीसे मदनमोहनकी सारी बातें बतलाकर अन्त:पुरके एक कोनेमें श्रीमदनमोहनजीको छिपाकर पधरा दिया।

ब्राह्मण धरणीधर सबेरे जगे और नित्यकी भाँति फूल तोड़ने चले गये। लौटकर जब मन्दिरके किवाड़ खोले, तब देखा कि वहाँ न तो भगवान् श्रीमदनमोहनजी हैं और न राजा रघुनाथ ही हैं। ब्राह्मण बहुत दु:खी हुए और सिर पीटकर रोने लगे। उन्हें निश्चय हो गया कि रघुनाथ ही मदनमोहनजीको लेकर भाग गये हैं। यह सोचकर ब्राह्मण जिस अवस्थामें थे, उसी अवस्थामें शोकसे व्याकुल होकर रघुनाथ और मदनमोहनजीकी खोजमें घरसे निकल पड़े। धरणीधर ब्राह्मण अनेक जगह घूमते-घामते अन्तमें एक दिन विष्णुपुर पहुँचे। वहाँ वे करीब एक मासतक घर-घर भटके, पर कहीं श्रीमदनमोहनजीका पता न चला। तब वे प्राणत्यागका विचार करके नदी-तटपर पहुँचे।

वहाँ एक बुढ़ियाने उन्हें नदीमें कूदनेसे रोका और उनसे सारी बातें जानकर कहा—‘यह किसीसे कहना नहीं, यहाँके राजा रघुनाथसिंह कहींसे एक भगवान‍्को लाये हैं और उनको अन्त:पुरके किसी गुप्त स्थानमें छिपा रखा गया है, यह मैंने सुना है। वहाँ जाकर पता लगाओ, वही तुम्हारे मदनमोहन हैं कि नहीं।’

वृद्धाकी बातें सुनकर ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुए और राजाके दरबारमें उपस्थित हुए। राजाने ब्राह्मणको पहचान लिया तथा उनका श्रद्धाभक्तिपूर्वक बहुत आदर-सत्कार करके धन-रत्न आदि जो भी वे लेना चाहें, देनेको कहा। ब्राह्मण रोते-रोते बोले—‘राजन्! मैं गरीब हूँ और गरीब ही रहना चाहता हूँ, धन-दौलत लेकर भी क्या करूँगा। इनकी मुझे आवश्यकता नहीं है। आप मेरे भगवान् मदनमोहनको ले आये हैं, उनको मुझे लौटा दीजिये। मैं आपके पैरों पड़ता हूँ। मैं भगवान‍्को अपनी आँखों देखना चाहता हूँ, कृपया एक बार मुझे मेरे भगवान‍्को दिखला दीजिये।’ राजा बड़ी चिन्तामें पड़े। उन्होंने कोई उपाय न देखकर ब्राह्मणसे कहा—‘आप दया करके यहाँ कुछ दिन विराजिये। आजसे तीन दिन बाद मैं आपको मदनमोहनजीके दर्शन करा दूँगा।’ ब्राह्मणको राजाके वचनोंसे बड़ा आनन्द हुआ, उन्होंने दोनों हाथ उठाकर राजाको आशीर्वाद दिया।

एक दिनकी बात है, रातमें ब्राह्मणने स्वप्न देखा, मानो उनके मदनमोहन उनके सिरपर हाथ फिराते हुए कह रहे हैं—‘मैं तुम्हारी भक्तिसे संतुष्ट हो गया। तुम दु:ख मत करो, घर लौट जाओ। यहाँका यह राजा भी मेरी बड़ी भक्ति करता है, मेरे लिये यह सब राजपाट भूल गया है, इसकी भक्तिसे मैं बँध गया हूँ; इसलिये मैं अब यहीं रहूँगा। पर तुम्हारे यहाँ मैं प्रतिदिन जाऊँगा और प्रतिदिन ही तुम मुझे देखोगे। मैं सिंहासनपर प्रतिदिन इमलीके फूलके काँटे रख आऊँगा। उनको देखकर तुम समझ जाओगे कि मैं रोज ही आता हूँ।’

सबेरा होते ही ब्राह्मणको बुलाने राजा स्वयं गये और ब्राह्मणसे विनयपूर्वक बोले—‘ब्रह्मन्! आप मेरा कोई अपराध न मानें; मेरे साथ पधारें, मैं आपको मदनमोहनजीके दर्शन करा देता हूँ। इसके बाद आप जैसा ठीक समझें, करें।’ राजाकी बात सुनकर धरणीधरके आनन्दकी सीमा न रही। वे राजा रघुनाथसिंहके पीछे-पीछे चलने लगे। अन्त:पुरमें जाकर धरणीधरने मदनमोहनजीके दर्शन किये और दर्शन करते ही वे बेसुध-से हो गये, उनमें बोलनेकी शक्ति नहीं रही। नेत्रोंसे जलधारा प्रवाहित होने लगी, जिससे उनका सारा वक्ष:स्थल भीग गया। वे एकटक भगवान‍्की ओर ही देखते रहे। भगवान् मदनमोहनजीका विग्रह बड़ा ही चित्ताकर्षक और सर्वविध सुसज्जित था। राजा रघुनाथसिंह मदनमोहनजीको विष्णुपुरमें लानेके बाद सब काम छोड़कर भगवान‍्के पास ही रहते और उन्हें बहुमूल्य पदार्थोंसे विविध भाँतिसे सजाते रहते थे। ब्राह्मण धरणीधर आश्चर्यचकित होकर भगवान‍्के विग्रहका दर्शन करते रहे। उनकी आँखोंकी पलकें नहीं पड़ती थीं। फिर बहुत देरतक उन्होंने भक्तिभावपूर्वक प्रणाम और स्तवन किया।

राजाने ब्राह्मणसे बहुत प्रार्थना की, पैर पकड़े, हाथ जोड़कर अनुरोध किया कि आप विष्णुपुरमें रहिये। उन्होंने जमीन देनी चाही, घर बनवा देना चाहा, यहाँतक कि मदनमोहन भगवान‍्की पूजा-अर्चनाका भार देना चाहा; परंतु ब्राह्मण किसी तरह भी विष्णुपुर रहनेके लिये राजी नहीं हुए। हाथ जोड़कर बार-बार भगवान‍्को प्रणाम किया और स्वप्नादेशको याद करके भगवान‍्को विष्णुपुरमें ही छोड़कर भगवान‍्की ओर देखते-देखते वे चले गये।

एक बार रथयात्रा-महोत्सवके समय सैकड़ों हाथी और घोड़े जोड़ने तथा श्रद्धाभक्तिपूर्वक प्रार्थना करनेपर भी श्रीमदनमोहनजीका रथ नहीं चला। कारण यह था कि एक बुढ़िया वीरसिंहपुरसे रथयात्राके दर्शनार्थ आ रही थी, वह थककर रास्तेमें गिर पड़ी। उसको दर्शन दिये बिना रथ आगे नहीं बढ़ता था। आखिर उसे पालकीमें बैठाकर लाया गया, तब रथ चला।

‘राजा गोपालसिंहकी बेगार’

इन्हीं भक्त रघुनाथके पवित्र वंशमें कुछ पीढ़ियोंके बाद सन् १७१२ ई० में गोपालसिंह राजा हुए। वे परम वैष्णव थे। दिन-रात केवल भगवन्नामका जप किया करते, राजकार्यसे उदासीन-से रहते और हरिनाममाला हाथमें लिये भक्तोंके साथ धर्मचर्चा करते तथा वैष्णवग्रन्थ पढ़ते रहते। रास्तेमें कहीं किन्हीं वैष्णव साधु-संन्यासीको देखते तो उन्हें दरबारमें ले आते और बड़े भक्तिभावसे उनकी सेवा-पूजा करते। भक्त राजा गोपालसिंहने अनेकों वैष्णवोंको बहुत-सी करहीन भूमि दान की थी; उन सब वैष्णवोंके वंशधर विष्णुपुरमें आज भी उसे भोग रहे हैं।

एक बार राजाने आज्ञा दी कि ‘राजदरबारके प्रत्येक कर्मचारीको प्रतिदिन कम-से-कम एक बार समयानुसार हरिनामकी माला जपनी पड़ेगी। जो नहीं जपेगा, उसे दण्ड दिया जायगा।’ सब माला मँगाकर नित्य जपने लगे। कुछ दिनों बाद अन्त:पुरकी सेविकाओं तथा महिलाओंने भी प्रतिदिन माला जपनी शुरू कर दी। उसके बाद एक दिन राजाने यह आदेश दिया कि ‘राजधानी विष्णुपुरके प्रत्येक व्यक्तिको प्रतिदिन माला जपनी पड़ेगी। बूढ़े, युवक, बालक, बालिका, स्त्री सभीको दिनमें कम-से-कम एक बार माला अवश्य जपनी ही होगी।’ राजाकी आज्ञा थी, बाध्य होकर सब लोग भगवन्नाम जपने लगे। दिनमें कम-से-कम एक बार सभीको हरिनामकी माला लेकर बैठना पड़ता था। बहानाबाजी करके बचनेका कोई रास्ता न था; क्योंकि प्रत्येक मनुष्य प्रतिदिन माला जपता है या नहीं, यह जाननेके लिये राजाने बहुत-से गुप्तचर नियुक्त कर रखे थे और स्वयं राजा भी समय-समयपर छिपे वेषमें घूम-घूमकर देखा करते थे। समय-असमयका कोई हिसाब नहीं था, जिस किसी समय भी दिनमें एक बार माला जपनी थी, क्योंकि राजाने माला जपनेका समय निश्चित नहीं किया था। लोग भोजन करने जाते, परंतु रसोई होनेमें या परसनेमें कुछ देर होती तो उसी समय हाथमें माला लेकर बाहर बैठ जाते और जप करने लगते। राजा गोपालसिंहजीका यह कार्य वस्तुत: बहुत ही स्तुत्य था। सच्चा हितैषी बन्धु तो वही है, जो किसी प्रकार भी अपने आत्मीयको भगवान‍्में लगा दे—

तुलसी सो सब भाँति परम हित

पूज्य प्रानतें प्यारो।

जाते होय सनेह रामपद

एतो मतो हमारो॥

यह लोगोंको ‘गला पकड़कर अमृत पिलाना’ था, परंतु कुछ लोग इससे नाराज हो गये और वे इसे ‘गोपालसिंहकी बेगार’ कहने लगे।* आगे चलकर यह एक साधारण कहावत हो गयी। बाँकुड़ा और विष्णुपुरके आसपास आज भी इसका प्रचार है। जब कोई काम करनेके बाद अपनी मजदूरी या लाभ नहीं पाता, तब उस काम करनेको वह ‘गोपालकी बेगार’ कह देता है। जो काम करनेसे जी चुराता है, उसे उसका मालिक कह देता है कि ‘तू तो ‘गोपालकी बेगार’ काट रहा है।’

विष्णुपुरपर आक्रमण और सामुदायिक कीर्तन

मराठा सेनापति भास्कर पण्डित बहुत दिनोंसे मल्लराज्यपर आक्रमण करनेका सुयोग देख रहे थे, परंतु मल्लसैनिकोंकी शक्ति और युद्धकौशल देखकर उन्हें आक्रमण करनेका साहस नहीं होता था; किंतु गोपालसिंहको राज्यसंचालनमें उदासीन सुनकर भास्कर पण्डितने मल्लराज्यपर आक्रमण करनेका अच्छा अवसर समझा और बड़ी भारी सेना लेकर उन्होंने मल्लराज्यपर चढ़ाई कर दी।

मल्लराज गोपालसिंहके सेनापतियोंको मराठोंकी इस चढ़ाईका कुछ भी पता न चला। उस ओर किसीका ध्यान भी नहीं था। मराठोंकी सेना मुण्डमालाघाटपर आकर डट गयी। वहाँ एक दुर्ग था, जिसपर बहुत-सी तोपें सजायी हुई थीं। पुरानी व्यवस्थाके अनुसार मल्लराज्यमें पैर रखनेके पहले शत्रुको या तो इस दुर्गपर अधिकार करना पड़ता था या पराजय स्वीकार करके भागना पड़ता था। मराठा सैनिक मुर्शिदाबाद, ढाका और मल्लराज्यके अनेक ग्रामोंको लूटकर विष्णुपुर आये थे।

उस समय दोपहरका समय था; किंतु सेनापतिके आदेशसे एक दल सैनिक तुरंत दौड़कर दुर्गके निकट पहुँच गया। पर दुर्गपर बहुत-सी तोपें सजी देखकर उसे बड़ा भय हुआ और उसके आगे बढ़नेकी चाल मन्द पड़ गयी। मराठा सेनापति भास्कर पण्डितके सौभाग्यसे उस समय दुर्गमें सैनिकोंमेंसे कोई न था। दुर्गके सैनिक इच्छानुसार जहाँ-तहाँ स्वच्छन्द विचरा करते थे, नहीं तो, भास्कर पण्डितको वहीं पराजय स्वीकार करनी पड़ती। मराठा सैनिक और आगे बढ़े। इसी समय दुर्गके एक तोपचालकने उनको देख लिया। उसने तत्काल दुर्गके भीतर जाकर तोपें दागनी आरम्भ कर दीं। तोपोंकी आवाज सुनकर मल्लराज्यके अन्य सैनिक भी दौड़ आये और तोपें दागने लगे। तोपोंके मुँहसे गोले बरसने लगे और मराठा-सैनिक मरने लगे। दुर्गमें केवल पंद्रह सैनिक थे, उन्होंने देखा कि अत्यन्त समीप आ जानेके कारण मराठासैनिकोंपर गोलोंकी मार ठीक नहीं पड़ रही है, तब उन्होंने बंदूकें चलाना शुरू किया और एक आदमीने दौड़कर सेनापतिको सूचना दी।

राजा गोपालसिंहने मराठा सेनापति भास्कर पण्डितके आक्रमणकी बात सुनकर सेनाकी एक टुकड़ी मुण्डमालाघाटकी ओर भेजी। भयंकर युद्ध छिड़ गया। मल्लसेना संख्यामें कम थी, पर वह प्राणपणसे लड़ने लगी। मराठोंके भी बहुत सैनिक मरे; परंतु अन्तमें उन्होंने दुर्गपर अधिकार कर लिया, तब शेष मल्लसेना धीरे-धीरे हटकर राजदरबारमें आ गयी।

युद्धमें विजय पाकर भास्कर पण्डित आनन्दित हो विष्णुपुरकी ओर बढ़ने लगे। बीचमें रात हो जानेके कारण सेनापतिने रास्तेके पास ही पड़ाव डाल दिया। इस समय विष्णुपुरमें जहाँ फौजदारी और दीवानी अदालत है, वहीं भास्कर पण्डितने छावनी डाली थी, इससे अब भी उस जगहका नाम ‘मराठाडाँगा’ है।

गढ़की सेनाने भागकर राजाको सूचना दी। मराठे राजधानीकी ओर आ रहे हैं, यह जानकर राजाने प्रजाको आदेश दिया कि ‘सब लोग अपनी धन-सम्पत्ति और परिवारको लेकर भीतरी दुर्गके अंदर चले आवें।’ प्रजा भयभीत हो गयी। जिसके पास जो कुछ था, लेकर बाल-बच्चोंसहित सबने दुर्गमें आश्रय लिया। कुछ लोग धन-सम्पत्तिको वहीं छोड़कर केवल अपने प्राण बचानेके लिये ही दुर्गमें दौड़ आये!

अपनी सेनाकी पराजयकी बात सुनकर राजा गोपालसिंहने सोचा कि ‘अब कोई उपाय नहीं है।’ तब उन्होंने विश्वासपूर्वक दुर्गमें सबको हरिनाम-कीर्तन करनेकी आज्ञा दी। यद्यपि उस समय भी गढ़में चालीस हजार शिक्षित सेना मौजूद थी और उसको परास्त करना मराठा सेनापति भास्कर पण्डितके लिये सीधा काम न था, पर राजाने यह सब कुछ नहीं सोचा। उन्होंने राजधानीके सब लोगोंके साथ हरिनाम-कीर्तन करना आरम्भ कर दिया। हरिनामकी तुमुल ध्वनिसे गढ़ गूँज उठा। भास्कर पण्डितकी थकी सेना रात्रिमें विश्राम करने लगी।

पर मल्लसेनापति निश्चिन्त नहीं थे। राज्यमें एक सन्थालीसेना थी; वे लोग बहुत विश्वासी और साहसी थे। अन्त:पुरकी रक्षामें चारों ओर उनको नियुक्त कर दिया गया। मल्लसेनापतियोंने प्रतिज्ञा की कि ‘प्राण भले ही चले जायँ, मराठोंको गढ़की ओर एक पैर भी नहीं बढ़ने दिया जायगा।’ इसी उद्देश्यसे उन्होंने राजाकी आज्ञाकी कोई प्रतीक्षा न करके मल्लभूमिकी स्वाधीनता-रक्षाके लिये रातोंरात गढ़के चारों ओर सेना सजा दी और बड़ी तोपोंको बारूद भरकर तैयार कर लिया। धनभण्डारको राजप्रासादके गुप्त स्थानोंमें छिपाकर रख दिया गया। राजाको इन सब बातोंका कुछ भी पता न था, वे तो गढ़में प्रजाके साथ मिलकर जोरोंसे केवल हरिनाम-कीर्तन कर रहे थे।

सबेरा होते ही मल्लसेनाओंने तोपें चलानी शुरू कर दीं। मराठे-सैनिक भी आ डटे। लड़ाई आरम्भ हो गयी। मराठे-सैनिक दुर्गपर आक्रमण करनेके लिये दुर्गकी खाई पार करनेकी चेष्टा करने लगे; किंतु बड़े-बड़े तालाबोंसे खाईमें जल प्रवाहित करनेकी सुव्यवस्था होनेके कारण खाईका पानी बरसाती नदीके प्रवाहकी भाँति बड़े जोरोंसे बह रहा था, अत: उसे पार करना सम्भव नहीं था। उधर गढ़पर बहुत-सी तोपें सजाकर हजारों सैनिक प्रतीक्षा कर रहे थे। दुर्गका सुदृढ़ लौहद्वार बंद था। इससे मराठोंने अनुमान कर लिया कि दुर्गमें निश्चय ही बड़ी भारी सेना है; परंतु बहुत देशोंको पराजित करनेसे उनका लोभ बढ़ा हुआ था। फिर उनका अहंकार भी बढ़ा था। वे तेजस्वी-साहसी योद्धा भी थे। अत: मल्लसेनासे पराजय स्वीकार कैसे करते! उन्होंने बड़ा प्रयत्न करके किसी तरह खाई पार कर ली और बंदूकें चलाकर युद्धारम्भका संकेत कर दिया। मल्लसैनिकोंने मराठा सैनिकोंको खाई पार करते देखकर एक ही साथ तोपें दागनी शुरू कर दीं और साथ-साथ बंदूकें भी चलाने लगे। तोपोंके गोलों और बंदूकोंकी गोलियोंसे मराठा सैनिक मरने लगे और उनके शव खाईके जलमें बहने लगे। जो मराठादल खाईमें पहले उतरा था, उसमेंसे एक भी न बचा। मराठा सेनापति भास्कर पण्डितने दूसरे दलको आज्ञा दी। उसमेंसे कुछ सैनिक पार हो गये; परंतु द्वारके पास जाते-न-जाते वे सब भी मारे गये। इस तरह मराठा सेनापतिने तीन बार चेष्टा की और तीनों ही बार वे विफल रहे। मराठे-सैनिक मरने लगे।

राजा गोपालसिंह उस समय भी दुर्गके भीतर हरिनाम-कीर्तन कर रहे थे। सब लोग आतुर थे और बड़ी करुणासे तन्मय होकर भगवान‍्का पवित्र नाम-कीर्तन कर रहे थे। युद्धके सम्बन्धमें वे कुछ नहीं जानते थे। दुर्गमें प्रजाका समय डरते-डरते बीत रहा था। लोग तोप-बंदूकोंकी आवाजें तो सुन रहे थे, पर युद्धका क्या परिणाम हो रहा है, इसका किसीको पता न था। सच्ची आर्तभक्तिका मानो मूर्तिमान् प्रवाह बह रहा था। सामुदायिक सच्ची पुकार (प्रार्थना) का शुभ परिणाम हुआ। सहज दयालु भगवान‍्का करुणासमुद्र उमड़ा और उसका कार्य आरम्भ हो गया।

मदनमोहनजीके द्वारा तोपोंका चलाया जाना और शत्रुकी पराजय

युद्ध करते-करते दोनों ओरकी सेनाएँ थक गयीं। मराठासैनिक खाई पार करके विश्राम करने जंगलमें चले गये। तब मल्लसेनाको भी विश्राम मिल गया। इस बीचमें समय पाकर मल्लसेना तोपोंमें बारूद भरने लगी और नये-नये सैनिकोंके दल दुर्गमें आने लगे। अचानक, आश्चर्यचकित होकर मल्लसैनिकोंने देखा कि एक अश्वारोही राजप्रासादसे निकलकर बड़े जोरसे दुर्गकी ओर घोड़ा दौड़ाता आ रहा है। घोड़ेके खुरकी धूल चारों ओर उड़ रही है और वह घुड़सवार इतने वेगसे चला आ रहा है कि वह कौन है, यह भी अच्छी तरह दिखलायी नहीं पड़ता। सहसा दल-मादल तोपें गरजने लगीं और थोड़ी ही देर बाद देखा गया कि जंगलमें, जहाँ मराठे विश्राम कर रहे थे, वहाँ दल-मादल तोपोंके गोले वर्षाकी असंख्य बूँदोंकी भाँति पड़ रहे हैं और इसके फलस्वरूप असंख्य मराठे-सैनिक मौतके शिकार हो रहे हैं। देखते-देखते भास्कर पण्डितकी आधी सेना समाप्त हो गयी। कोई उपाय न देखकर मराठा सेनापतिने पराजय स्वीकार कर ली और वे शेष सेनाको लेकर धीरे-धीरे पीछे हटने लगे। सुयोग देखकर मल्लसैनिक भी दुर्गसे निकल आये और मराठासैनिकोंके पीछे आक्रमण करते हुए वेगसे चलने लगे। मराठोंकी सेना भंग हो गयी और सैनिकोंने, जहाँ जिसे रास्ता मिला, भागकर प्राण बचाये। मराठासेनापति भास्कर पण्डित कुछ सैनिकोंको लेकर वनमें छिप गये; परंतु जंगलमें वे रास्ता नहीं खोज सके। बहुत दिनोंतक घूम-फिरकर छिपे-छिपे वे मेदिनीपुर जिलेके चन्द्रकोणाकी तरफ भाग गये। इस प्रकार मल्लभूमिके सैनिकोंने दुर्धर्ष मराठोंका गर्व चूर्ण कर दिया।

दल-मादल तोपोंके चलानेके सम्बन्धमें सबका यह कहना है कि स्वयं प्रभु मदनमोहनजीने उनको चलाया था। राजाकी प्रार्थनासे संतुष्ट होकर राजधानी विष्णुपुरका शत्रुओंसे उद्धार करनेके लिये स्वयं भगवान‍्ने ही आकर तोपें चलायीं, जिससे मराठे तो हारकर भाग गये और मल्लसैनिकोंके आनन्दकी सीमा न रही। राजधानी विष्णुपुरके रास्तोंपर सैनिक स्वच्छन्द टहलने लगे और राजधानीकी प्रजा सैनिकोंको अनेक प्रकारके उपहार देने लगी। भगवान‍्की भृत्यवत्सलता और भगवान‍्में विश्वाससे अद‍्भुत परिणामका यह ज्वलन्त उदाहरण है!

गोपालसिंहके राजत्वकालमें राज्यकी सुव्यवस्था

राजा गोपालसिंहके राजत्वकालमें फ्रांसके आबिरेन्याल नामक भ्रमणकारी विष्णुपुर आये थे। उन्होंने मल्लराज्यमें भ्रमण करके राज्यरक्षाकी व्यवस्था, प्रजाका सरल व्यवहार और अतिथि-सत्कारके सम्बन्धमें बहुत प्रशंसा की है। उन्होंने लिखा है कि मल्लभूमिकी प्रजाकी स्वाधीनता और धन-सम्पत्तिको कोई अपहरण नहीं करता था, राज्यमें कभी चोरी या डकैती नहीं होती थी। कोई विदेशी सज्जन यदि कभी मल्लराज्यमें आते तो मल्लराजा उनकी रक्षाका भार और जितने दिन वे राज्यमें रहते, उनका समस्त व्यय वहन करते थे। विदेशी सज्जनके साथ सदा ही राज्यकी ओरसे एक सहायक नियुक्त रहता। वे राज्यमें जहाँ जाना चाहते, वह उन्हें वहीं ले जाता। इसके लिये किसीको एक पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ता था। राज्यके लोग कभी किसीकी हिंसा नहीं करते, कोई किसीका अनिष्ट नहीं करते थे। सब इतने सरल और धर्मभीरु थे कि यदि कोई रास्तेमें रुपयोंकी थैली पा जाता तो वह तुरंत उसे राजाके पास पहुँचा देता और राजा चारों ओर ढोल पिटवा देते कि जिसकी थैली खो गयी हो, वह आकर ले जाय। गोपालसिंहके समय मल्लराज्यकी ऐसी व्यवस्था थी।

राजा गोपालसिंहकी मृत्युके बाद उनके लड़के चैतन्यसिंह राजा हुए। वे भी पिताकी तरह ही परम वैष्णव थे और दिन-रात धर्मकी विवेचना, धर्मग्रन्थपाठ तथा नाम-संकीर्तनमें लगे रहते एवं ब्राह्मणोंकी खूब भक्ति करते।

सुना जाता है कि ब्राह्मण धरणीधरके यहाँसे जो मदनमोहनजीकी मूर्ति विष्णुपुर लायी गयी थी और जिनकी भक्ति राजा रघुनाथसिंह— गोपालसिंह आदि करते रहे, वही आजकल कलकत्तेके बाग-बाजारके श्रीमदनमोहनजीके मन्दिरमें विराजित है।*

उपसंहार

विष्णुपुरके राजा गोपालसिंहकी ‘दल-मादल’ तोपोंके विषयमें ऐसी लोकोक्ति है कि जिस समय शत्रुओंकी सेनाने विष्णुपुरके चारों ओर बड़ा भारी घेरा डाल दिया और विष्णुपुरके गढ़में रहनेवाले सैनिक निराश हो गये, उस समय दल-मादल तोपोंको एक बहुत बड़े घोड़ेपर दोनों ओर सजाकर भगवान् मदनमोहन ही घोड़ेपर सवार होकर किलेसे बाहर निकले और शत्रु-सेनाके घेरेपर तोप दागते हुए चारों ओर अलातचक्रकी तरह घूमने लगे। उन तोपोंके गोलोंसे बहुत-सी शत्रुसेना मारी गयी और बचे हुए लोग भाग गये। तदनन्तर घोड़ेसहित भगवान् किलेमें लौट आये और तोपोंको लालबाँध (तालाब) पर उतारकर स्वयं अपने मन्दिरमें प्रवेश कर गये।

शत्रु-सेनापतिको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने सोचा कि ‘न जाने इनके पास ऐसे कितने घुड़सवार होंगे, जब कि इस एक ही घुड़सवारने हमारी सेनाको परास्त कर दिया।’ वे भयभीत हो मन्त्रीसहित घोड़ेके पीछे-पीछे विष्णुपुरके राजा गोपालसिंहके पास मन्दिरमें आकर उनके शरणापन्न हुए। उन्होंने राजाके चरणोंमें पड़कर अपराधके लिये क्षमा माँगी। राजा गोपालसिंहने पूछा—‘अपराध किस बातका?’ इसपर शत्रु-सेनापतिने सारा हाल आद्योपान्त कह सुनाया कि ‘आपके एक ही घुड़सवार वीर पुरुषने तोपोंके गोलोंद्वारा हमारी सारी सेनाको तहस-नहस करके पराजित कर दिया। आपके पास ऐसे कितने वीर पुरुष हैं?’ राजा गोपालसिंहने कहा— ‘हमारे पास तो ऐसा कोई सवार नहीं है, जो घोड़ेपर तोप बाँधकर युद्ध करे।’ सेनापति बोले—‘यह तो प्रत्यक्ष घटना है। दोनों तोपें लालबाँधके इधर-उधर पड़ी हैं और घोड़ा मन्दिरके अहातेमें मन्दिरके दरवाजेके बाहर मौजूद है एवं घुड़सवारको हमने स्वयं इस सभामण्डपमें प्रवेश करते देखा है।’ यह सुनकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ।

दोनों वहाँसे सभामण्डपके भीतर गये तो शत्रुसेनापतिने मदनमोहनकी विशाल मूर्तिको देखकर तुरंत कहा कि ‘बस, ये ही तो थे।’ तब राजा गोपालसिंहने भगवान् मदनमोहनके वस्त्रोंको देखा तो वे पसीनेसे भीगे हुए थे। राजा गोपालसिंह करुणभावसे अश्रुपात करते हुए बोले—‘मैं बड़ा ही राज्यलोलुप हूँ। मेरे इस तुच्छ कामके लिये आपको युद्धमें जाना पड़ा।’ फिर उन्होंने शत्रुसेनापतिको आश्वासन देकर आदरपूर्वक विदा कर दिया और कहा—‘आप धन्यभाग्य हैं, जो आपको साक्षात् भगवान‍्के दर्शन हुए। आपने जो कुछ आश्चर्य देखा है, यह सब इन भृत्यवत्सल शरणागतपालक दयासिन्धु भगवान् मदनमोहनजीकी ही लीला है।’

उन दोनों तोपोंमेंसे एक तो लालबाँध तालाबके कच्चे परकोटेके बाहर पास ही पड़ी हुई अभी मौजूद है और सुना जाता है कि दूसरी लालबाँध तालाबके कीचड़में धँस गयी है। इन्हीं दोनों तोपोंका नाम ‘दल-मादल’ था। ये दोनों तोपें राज्यमें पहलेसे ही थीं या स्वयं भगवान् ही इन्हें लाये, यह तो भगवान् ही जानें, पर जो तोप मौजूद है, उसकी लम्बाई करीब १२.५ फुट और उसके पीछेके गोलेका माप करीब ८ फुट है तथा गोले निकलनेका तोपका मुँह करीब १ फुट है। उसे देखनेसे मालूम होता है कि उस जमानेमें इतनी बड़ी तोप ढालनेका कोई यन्त्र नहीं था और वह धातु भी इतनी चिकनी तथा अद‍्भुत-सी प्रतीत होती है, जैसे कई धातु मिलाकर बनायी गयी हो। सैकड़ों वर्ष बीतनेपर भी उसपर कहीं कोई जंग बिलकुल नहीं लगा है। दूसरे, यह भी आश्चर्य होता है कि इतनी-इतनी बड़ी दो तोपें एक घोड़ेपर लादना और उनका चलाना, कैसे सम्भव हुआ। इसीसे यह अनुमान होता है कि ये तोपें स्वयं भगवान‍्के द्वारा ही लायी हुई हैं। भगवान‍्के लिये सभी कुछ सम्भव है; वे असम्भवको भी सम्भव कर सकते हैं। वास्तवमें क्या बात है, सो तो भगवान् ही जानें।

तर्कवादी लोग कहते हैं कि ‘यह सब ‘मिथ्या कल्पनामात्र’ है। नामकीर्तनसे शत्रुसेनापर विजय प्राप्त करनेकी बात करना निरा पागलपन है और भगवान‍्ने तोप चलाकर शत्रुको परास्त कर दिया, यह तो सर्वथा अयुक्त है। साथ ही ‘शत्रुसेना सिरपर खड़ी हो और कोई सबको लेकर कीर्तन करने बैठ जाय’—यह तो प्रत्यक्ष कर्तव्यविमुखता है।’

कर्तव्यकी दृष्टिसे बात सर्वथा सत्य है। जिनकी भगवान‍्में पूर्ण विश्वासयुक्त निर्भरता नहीं है, वे यदि मोहवश भगवान‍्के नामकी मिथ्या आड़ लेकर बैठ जायँ अथवा भयसे कर्तव्यविमुख होकर अपनी कमजोरी छिपानेके लिये कोई कीर्तनका ढोंग करें तो अवश्य ही उनका कार्य पागलपन और अयुक्त है तथा कर्तव्यविमुखता भी स्पष्ट है और उन्हें सफलता भी नहीं मिल सकती; परंतु जिनको पूर्ण विश्वास है, उनके लिये न तो यह कल्पना है, न पागलपन और न अयुक्त ही है। उनके लिये तो यह ज्वलन्त सत्य है। प्राचीन तथा अर्वाचीन ग्रन्थोंमें ऐसे बहुत-से उदाहरण मिलते हैं, जहाँ भगवान‍्ने भक्तोंके कार्य स्वयं किये हैं। बर्बरीकने बताया था कि ‘रणक्षेत्रमें केवल श्रीकृष्णका ही चक्र चल रहा था।’ राणा जयमल्लके लिये भगवान‍्ने उनके शत्रुसे लड़कर उसे परास्त किया था। और भी अनेकों कथाएँ हैं। गीतामें भगवान‍्ने जो ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ की प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार भगवान‍्का ऐसा करना स्वाभाविक ही है। चाहिये विश्वासपूर्ण सच्ची निर्भरता! महात्मा गाँधी तो बड़े बुद्धिमान् थे, उन्होंने भी एक स्थानपर कहा है—‘मैं बिना किसी हिचकिचाहटके कह सकता हूँ कि लाखों आदमियोंद्वारा सच्चे दिलसे एक ताल और लयके साथ गायी जानेवाली रामधुनकी ताकत फौजी ताकतके दिखावेसे बिलकुल अलग और कई गुना बढ़ी-चढ़ी है।’ इतनेपर भी सर्वसाधारणके लिये उचित और सुरक्षित यही है कि ‘भगवान‍्का स्मरण करते हुए कर्तव्यका पूर्णरूपसे पालन किया जाय।’ इसमें भगवद्विश्वास भी है और कर्तव्यपालन भी! विश्वासी पुरुषोंको इस इतिहाससे अपने विश्वासको और भी सुपुष्ट और सुदृढ़ करना चाहिये।