राजा चक्ववेणके त्यागका प्रभाव
राजा चक्ववेणकी कहानी कहीं किसी पुस्तकमें तो मैंने नहीं देखी है; परम्परासे लोकविख्यात है। यह चक्ववेणका इतिहास वास्तविक है या काल्पनिक, मुझको पता नहीं। जो भी कुछ हो, हमें तो इससे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। वह कहानी इस प्रकार है—
एक समय चक्ववेण नामके एक राजा हुए थे। वे बड़े ही सद्गुण-सदाचारसम्पन्न, धर्मात्मा, सत्यवादी, स्वावलम्बी, अध्यवसायशील, त्यागी, विरक्त, ज्ञानी, भक्त, तेजस्वी, तपस्वी और उच्च कोटिके अनुभवी महापुरुष थे। वे राज्यके द्रव्यको दूषित समझकर उसे स्वयं अपने और अपनी पत्नीके काममें नहीं लाते थे। प्रजासे जो कुछ ‘कर’ लिया जाता था, वह सारा-का-सारा प्रजाकी ही सेवामें लगा दिया जाता था। राज्यका कार्य वे निरभिमानपूर्वक निष्कामभावसे तन-मनसे किया करते थे। प्रजापर उनका बड़ा प्रभाव था। रामराज्यकी भाँति उनके राज्यमें कोई दु:खी नहीं था, सभी सब प्रकारसे सुखी थे।
वे अपने शरीरनिर्वाहके लिये पृथक् खेती किया करते थे। स्वयं रानी बैलके स्थानमें हल खींचा करती और वे बीज बोया करते। वे अपने ही खेतमें उपजे हुए अन्नसे अपना भरण-पोषण करते थे। वे गन्ना, रूई, अनाज, फल और शाककी खेती किया करते थे। अपने खेतमें उपजी हुई रूईका ही वस्त्र बनाकर पहनते, अपने खेतमें उपजे हुए गन्नोंका ही गुड़ बनाकर खाते और अपने खेतमें उपजे हुए अन्न, फल, शाकको ही भोजनके काममें लाते थे। उनकी पत्नीके पास कोई भी आभूषण नहीं थे; क्योंकि वे राज्यके द्रव्यसे तो आभूषण बनवाते नहीं और अपनी की हुई खेतीकी उपजसे केवल सादगीसे खाने-पहननेका कामभर चलता था। खेतीके सिवा उन्हें राज्यके कार्योंमें भी तो समय देना पड़ता था। उनका जीवन एक सीधे-सादे सदाचारी किसानके-जैसा था। छ: घंटे शयनके सिवा उनका सारा समय ईश्वरभक्ति, परोपकार, राज्य-कार्य और कृषिके कार्योंमें ही बीतता था। उनका सब जीवोंके प्रति समता, दया और प्रेमका भाव समान था। वे सब प्राणियोंको परमात्माका स्वरूप मानकर सबकी निष्काम प्रेमभावसे सेवा करते थे। वे स्वावलम्बी थे; अपने शरीरका काम स्वयं ही करते थे। किसी राज्यकर्मचारी या नौकर आदिसे नहीं कराते थे। वे जो कुछ भी कार्य करते, आसक्ति और अहंकारसे रहित होकर बड़े ही उत्साह और धैर्यसे किया करते।
एक दिनकी बात है। जिस देशमें राजा चक्ववेण रहते थे, वहाँ एक बड़ा भारी मेला लगा। उसमें नगरके अन्यान्य प्रान्तोंके लोग बड़ी भारी संख्यामें इकट्ठे हुए। राजा-रानीके दर्शनके लिये यों तो बराबर ही लोग आते रहते, पर मेलेके कारण नर-नारियोंकी भीड़ कुछ अधिक रहती थी। राजाके पास अधिकतर पुरुष आते और रानीके पास अधिकतर स्त्रियाँ आया करती थीं। एक दिन बहुत-से गहनों और रेशमी वस्त्रोंसे सजी-धजी अनेक दासियोंसे घिरी हुई बहुत-सी धनी व्यापारियोंकी स्त्रियाँ रानीका दर्शन करनेके लिये उनके पास आयीं। उन स्त्रियोंने कहा—‘रानीजी! आपके-जैसे वस्त्र तो हमारी मजदूरिनियाँ भी नहीं पहनतीं; आप हमारी दासियोंको देखिये, कैसे वस्त्राभूषण पहने हैं। आपके वस्त्राभूषण तो हमलोगोंसे भी बढ़कर होने चाहिये। जैसे ये हमारी दासियाँ हैं, उसी प्रकार हमलोग तो आपकी दासीके समान हैं। आपके स्वामी बड़े सम्राट् हैं, आप उनसे थोड़ा-सा भी संकेत कर देंगी तो वे आपके लिये हमलोगोंसे बढ़कर वस्त्राभूषणकी व्यवस्था कर देंगे। आप हमारी स्वामिनी हैं, इसलिये हमें आपको इस वेशमें देखकर दु:ख होता है। ऐसे वस्त्र तो भीख माँगनेवाली भिखारिन भी पहनना नहीं चाहती। एक सम्राट्की महारानीके-जैसे वस्त्राभूषण होने चाहिये हम उसी रूपमें आपको देखना चाहती हैं।’ इस प्रकार कहकर वे अपना प्रभाव डालकर चली गयीं। रानीके चित्तपर उनकी बातोंका बड़ा असर पड़ा।
रात्रिमें जब महाराज आये, तब रानीने सब घटना उनको सुनायी और दिनमें जो कुछ धनी व्यापारियोंकी स्त्रियोंने कहा था, सब राजासे निवेदन किया एवं उनसे अनुरोध किया कि मेरे पहननेके लिये बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण मँगा दीजिये। राजाने उत्तर दिया—‘कैसे मँगा दूँ? व्यवहारमें लाना तो दूर रहा, मैं राज्यके पैसोंको छूता भी नहीं, उससे बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।’ रानी भी बहुत उच्च कोटिकी पवित्र स्त्री थीं, किन्तु वस्त्राभूषणोंसे सजी-धजी धनिकोंकी स्त्रियोंका उनपर काफी असर पड़ चुका था, अत: रानीने कहा—‘चाहे जैसे भी हो, आप सम्राट् हैं और मैं आपकी पटरानी हूँ। मेरे लिये तो एक सम्राट्की पटरानीके योग्य बहुमूल्य वस्त्राभूषण मँगानेकी कृपा आपको करनी ही होगी।’ पत्नीकी प्रीतिसे प्रेरित राजाने सोचा—‘रानी कितना भी आग्रह क्यों न करें, मैं राज्यके द्रव्यको तो किसी भी हालतमें उपयोगमें ला नहीं सकता, किंतु मैं सम्राट् हूँ; दुष्ट, अत्याचारी और बलवान् राजाओंसे ‘कर’ ले सकता हूँ।’ यह सोचकर उन्होंने पर-राष्ट्रों तथा अधीनस्थ राज्योंके कार्यका सम्पादन करनेवाले मन्त्रीको बुलाया और कहा—‘मन्त्री! आप राक्षसराज रावणके पास जाइये और कहिये कि राजा चक्ववेणकी ओरसे मैं आया हूँ, उन्होंने मुझे आपसे ‘कर’ के रूपमें सवा मन सोना प्राप्त करनेके लिये आपके पास भेजा है।’
सम्राट्की आज्ञासे मन्त्री कुछ आदमियोंको ले रथमें बैठकर समुद्रके किनारे पहुँचे और फिर जलयानके द्वारा समुद्रके उस पार पहुँचकर लंकामें प्रवेश किया तथा राजसभामें जाकर बड़ी नम्रता और सभ्यताके साथ सम्राट् चक्ववेणका संदेश सुनाया। संदेशको सुनते ही रावण हँसा और उसने सभासदोंसे कहा—‘देखो, ऐसे मूर्ख राजा भी संसारमें अभी हैं, जो ऋषि, देवता, राक्षस आदि सभीसे ‘कर’ लेनेवाले मुझ-जैसे बलवान् सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र महान् सम्राट्से भी करकी आशा रखते हैं!’ उन्होंने राजा चक्ववेणके दूतको कैद करना चाहा, किन्तु सभासदोंके अनुरोध करनेपर उसे छोड़ दिया। वह रावणकी सभासे उठकर समुद्रके किनारे लौट आया।
तदनन्तर रावण जब रात्रिमें मन्दोदरीके पास महलमें गया, तब रावणने हँसकर मन्दोदरीसे विनोद करते हुए कहा—भारतवर्षमें चक्ववेण नामका ‘कोई एक राजा है। आज उसका एक दूत सभामें आया था और उसने मुझसे सवा मन स्वर्ण ‘कर’ के रूपमें देनेको कहा। मुझे इसपर बड़ी हँसी आयी। देखो, संसारमें ऐसे मूर्ख भी अभीतक जीते हैं जो मुझ-जैसे सबसे कर लेनेवालेसे भी कर लेनेकी आशा रखते हैं! मैं तो उसके दूतको कैद करना चाहता था, पर सभासदोंके अनुरोधसे उसे छोड़ दिया।’ मन्दोदरीने दु:ख प्रकट करते हुए कहा—‘स्वामिन्! आपने बहुत बुरा किया। चक्ववेणको मैं जानती हूँ, वे सत्यवादी और धर्मात्मा राजा हैं। उनका चक्र चलता है। जो उनकी आज्ञाका पालन नहीं करता, उसका अनिष्ट हो जाता है। उस दूतको संतोष कराकर ही आपको उसे भेजना चाहिये था। उसका पता लगाकर अब भी उसको संतोष करा दें, नहीं तो पता नहीं, हमारा कितना अनिष्ट हो जायगा।’ रावण बोला—‘तू बड़ी डरपोक है, मामूली मनुष्य-राजाओंसे तू इतना भय करती है, मैं इसकी कुछ भी परवा नहीं करता।’ रानीने कहा— ‘कल प्रात:काल मैं आपको चक्ववेणका प्रभाव दिखलाऊँगी।’ प्रात: होते ही राजाके साथ मन्दोदरी महलके छतपर गयी, जहाँ वह रोज कबूतरोंको अनाज डाला करती थी। अनाज चुगने वहाँ बहुत-से कबूतर आया करते। मन्दोदरीने दाने चुगते हुए पक्षियोंसे कहा—‘राजा रावणकी दुहाई है, खबरदार! दाने न चुगना।’ किंतु वे चुगते ही रहे। फिर रानीने राजासे कहा—‘देखिये, आपके सम्मुख और आपकी दुहाई देनेपर भी ये सब दाने चुगते ही रहे।’ रावणने कहा—‘मूर्खे! ये पक्षी बेचारे क्या समझें!’ मन्दोदरी बोली—‘अब आप राजा चक्ववेणके प्रभावको देखिये।’ फिर उसने पक्षियोंसे कहा—‘सावधान! चक्ववेणकी दुहाई है, कोई दाने न चुगना।’ इतना सुनते ही सब पक्षियोंने एक साथ दाने चुगने बंद कर दिये। उनमेंसे एक कबूतर बहिरा था, वह कुछ भी सुन नहीं पाता था; अत: उसने दाना उठा लिया। ज्यों ही उसने दाना उठाया, त्यों ही उसकी गर्दन टूटकर गिर गयी। रानीने रावणसे कहा—‘देखिये, राजा चक्ववेणकी दुहाईपर सबने दाने चुगने बंद कर दिये, एक बहिरे कबूतरने न सुननेके कारण दाना उठा लिया, जिससे चक्ववेणके चक्रसे उसका मस्तक कटकर गिर गया।’ फिर रानी पक्षियोंसे बोली—‘अब मैं चक्ववेणकी दुहाई हटा लेती हूँ, अब दाने चुगो।’ तुरन्त सब पक्षी दाने चुगने लगे। रानीने फिर कहा—‘जो तुम्हारे सम्मुख खड़े हैं, उन राजा रावणकी दुहाई है, कोई भी दाने न चुगना।’ किंतु राजा रावणके सामने रहते हुए भी किसीने परवा न की और वे दाने चुगते ही रहे। मन्दोदरीने रावणसे कहा—‘देखिये, आपका इन पक्षियोंपर कुछ भी असर नहीं होता, परन्तु राजा चक्ववेणके प्रभावपर विचार कीजिये, उनके सामने न रहते हुए भी उनका कितना असर है।’ रावणने कहा—‘मालूम होता है तुम्हारी इसमें कोई माया है। नहीं तो, ये पक्षी बेचारे क्या समझें।’ ऐसा कहकर रावण टालमटोल करके राजसभामें चला गया।
इधर, राजा चक्ववेणके मन्त्रीने समुद्रके किनारे एक नकली लंकाकी रचना की। उसने कज्जलके समान अत्यन्त महीन मिट्टीको समुद्रके जलमें घोलकर रबड़ीकी तरह बना लिया तथा तटकी जगहको चौरस बनाकर उसपर उस मिट्टीसे एक छोटे आकारमें नकली लंका की रचना की। धुली हुई मिट्टीकी बूँदोंको टपका-टपकाकर उसीसे लंकाके परकोटे, बुर्ज और दरवाजों आदिकी रचना की। परकोटेके चारों ओर कँगूरे भी काटे गये एवं उस परकोटेके भीतर लंकाकी राजधानी और नगरके प्रसिद्ध बड़े-बड़े मकानोंको भी छोटे आकारमें रचना करके दिखाया गया। इन सबकी रचना करनेके बाद वह पुन: रावणकी सभामें गया। उसे देखकर रावण चौंक उठा और उससे बोला—‘क्यों जी! तुम फिर यहाँ किसलिये आये हो?’ उसने कहा—‘मैं आपको एक कौतूहल दिखलाना चाहता हूँ। आप मेरे साथ समुद्रतटपर चलिये।’ रावण कौतूहल देखनेको उत्सुक हो गया और कुछ सभासदोंको साथ लेकर समुद्रतटपर गया, जहाँ उस मन्त्रीने छोटे आकारमें नकली लंकाकी रचना की थी।
उसने रावणसे पूछा—‘देखिये, यह ठीक-ठीक आपकी लंकाकी नकल है न?’ रावणने उसकी अद्भुत कारीगरी देखी और कहा—‘ठीक है; क्या यही दिखानेके लिये मुझे यहाँ लाये थे?’ मन्त्री बोला—‘नहीं-नहीं, इस लंकासे आपको मैं एक कौतूहल दिखाता हूँ; देखिये, लंकाके पूर्वका परकोटा, दरवाजा, बुर्ज और कँगूरे साफ-साफ ज्यों-के-त्यों दीख रहे हैं न? रावणने कहा—‘दीख रहे हैं।’ मन्त्रीने कहा—‘मेरी रची हुई लंकाके पूर्वद्वारके कँगूरोंको मैं राजा चक्ववेणकी दुहाई देकर गिराता हूँ, इसके साथ ही आप अपनी लंकाके पूर्वद्वारके कँगूरे गिरते हुए देखेंगे।’ इतना कहकर मन्त्रीने ‘राजा चक्ववेणकी दुहाई है’ कहकर अपनी रची लंकाके पूर्वद्वारके कँगूरे गिरा दिये। उनके गिरनेके साथ-साथ ही रावणको असली लंकाके पूर्वद्वारके कँगूरे गिरते हुए दिखायी दिये। यह देखकर रावणको बड़ा आश्चर्य हुआ। इसके बाद दूतने कहा—‘अब मैं अपनी रची हुई लंकाके पूर्वके परकोटेके द्वारके आस-पासकी चारों बुर्जें मिटाता हूँ, इसके साथ-साथ ही आप अपनी असली लंकाकी बुर्जोंको भी मिटती हुई देखेंगे।’ यह कहकर उसने चक्ववेणकी दुहाई देकर अपनी बनायी मिट्टीकी लंकाकी बुर्जें मिटा दीं, उसके साथ ही रावणकी असली लंकाके पूर्वद्वारकी बुर्जें भी चकनाचूर होकर नष्ट हो गयीं। यह देखकर रावणको बहुत ही आश्चर्य हुआ और उसे मन्दोदरीकी कही हुई बात याद आ गयी।
तदनन्तर राजा चक्ववेणके मन्त्रीने कहा—‘राजन्! आप यदि सवा मन सोना ‘कर’ के रूपमें नहीं देंगे तो भी राजा चक्ववेणको आपसे युद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। राजा चक्ववेणके प्रभावका चक्र चलता है। मैं अकेले ही आपकी लंकाको नष्ट-भ्रष्ट करनेके लिये काफी हूँ। अभी राजा चक्ववेणकी दुहाई देकर आपकी लंकाको क्षणमात्रमें एक हाथके झटकेसे नष्ट किये देता हूँ। आप उस लंकाकी रक्षा कर सकें तो करें। यदि आपको लंकाकी रक्षा करनी है तो ‘कर’ के रूपमें सवा मन सोना दे दीजिये; इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है।’ रावणने सोचा—‘मेरे देखते-देखते क्षणमात्रमें पूर्वद्वारके कँगूरे और चारों बुर्जें गिर गयीं, जो धातुनिर्मित और बहुत ही मजबूत थीं। इसी प्रकार इस सारी लंकाको नष्ट करना इसके बायें हाथका खेल है।’ यह सोचकर रावणने सवा मन सोना ‘कर’ के रूपमें देना स्वीकार कर लिया और मन्त्रीसे कहा—‘चलिये, मैं आपको सवा मन सोना दे देता हूँ।’ तत्पश्चात् उन्हें सवा मन सोना देकर विदा किया।
मन्त्री सवा मन सोना लेकर राजा चक्ववेणके पास वापस लौट आया। उसने राजा-रानीके पास जाकर उनके सामने सवा मन सोना रख दिया और कहा—‘आपकी आज्ञासे रावणसे ‘कर’ के रूपमें सवा मन सोना ले आया हूँ।’ राजाके यह पूछनेपर कि ‘तुमने यह सोना कैसे प्राप्त किया?’ उसने आद्योपान्त सारी घटना उनको कह सुनायी।
यह घटना सुनकर रानीको बड़ा आश्चर्य हुआ और उसपर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा। उसने राजासे पूछा—‘यह क्या बात है?’ राजाने कहा— ‘हमलोग स्वावलम्बी होकर परिश्रमपूर्वक खेती करके अपना निर्वाह करते हुए वैराग्य और त्यागपूर्वक अपना जीवन बिताते हैं और निष्कामभावसे प्रजाके धनको प्रजाकी सेवामें ही लगा देते हैं, अपने व्यक्तिगत कार्यके लिये राज्यके पैसेको छूतेतक भी नहीं, इसीका यह प्रभाव है।’
यह सुनकर रानीका दिल बदल गया। रानी बोली—‘स्वामिन्! मैं बहुमूल्य वस्त्राभूषण नहीं पहनूँगी। जिस प्रकार अबतक नियमसे रहती आयी हूँ, वैसे ही रहूँगी, कुछ भी परिवर्तन नहीं करूँगी। धनी व्यवसायियोंकी स्त्रियोंके कुसंगसे मेरी बुद्धि त्याग-वैराग्य और धर्मसे विचलित हो गयी थी, किंतु अब उनके संगका मुझपर कोई असर नहीं रह गया है। मैंने आपसे जो कुछ दुराग्रह किया, उसके लिये मैं क्षमा-प्रार्थना करती हूँ। मेरे अपराधको आप क्षमा करें और इस स्वर्णको वापस लौटा दें।’
राजाने उसकी बात मानकर मन्त्रीसे कहा कि ‘मन्त्री! इसपर जो कुसंगका असर पड़ा था, वह ईश्वरकी कृपासे दूर हो गया है। अब इस धनको जहाँसे तुम लाये थे, वहीं वापस कर दो।’ राजाकी आज्ञा होते ही मन्त्री वह स्वर्ण लेकर लंकापति रावणके पास पुन: गया और सभामें जाकर बोला—‘महाराज चक्ववेणने आपका यह स्वर्ण वापस लौटा दिया है। उनकी पत्नीकी जो बहुमूल्य वस्त्राभूषण पहननेकी अभिलाषा हो गयी थी, वह भगवत्कृपासे अब नहीं रही। अत: अब इसकी उन्हें आवश्यकता नहीं है।’
इस बातको सुनकर रावणके हृदयपर चक्ववेणके त्यागका और भी अधिक असर पड़ा। उसने वह स्वर्ण रखकर मन्त्रीको बहुत ही आदर-सत्कारपूर्वक विदा किया। मन्त्रीने वापस आकर राजा-रानीको स्वर्ण लौटा देनेका सब हाल सुना दिया। दूतकी बात सुनकर राजा-रानीको बहुत ही प्रसन्नता हुई। राजा चक्ववेणका प्रभाव यक्ष, राक्षस, देवता, मनुष्य, ऋषि, मुनि, पशु, पक्षी आदि सभीपर था।
इस कहानीसे हमलोगोंको यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये—प्रत्येक स्त्री-पुरुषको निष्कामभावसे अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मके अनुसार न्याय और सत्यतापूर्वक अपनी जीविका चलानी चाहिये। दूसरोंके आश्रित होकर अपना जीवन-निर्वाह करना भी अपने लिये घृणास्पद है। झूठ, कपट, बेईमानी करके उपार्जित द्रव्यसे हमें यदि मेवा-मिष्ठान्न भी मिल जायँ तो वे हमारे लिये विषके समान हैं, किंतु अपने न्यायोपार्जित पवित्र द्रव्यसे एक मुट्ठी चने भी खानेको मिलें तो वे हमारे लिये अमृतके समान हैं। हमें बीमारी और आपत्तिकालके अतिरिक्त—नौकर-चाकर, स्त्री-पुत्र और शिष्य आदिके रहते हुए भी अपने शरीरका काम जहाँतक हो सके, स्वयं ही करनेका अभ्यास डालना चाहिये, जिससे कि हमें दूसरोंके अधीन होकर जीना न पड़े। कल्याणकामी पुरुषोंके लिये दूसरोंके आश्रित होकर जीना लज्जास्पद है।
साथ ही हमें समयको अमूल्य समझकर एक क्षण भी व्यर्थ नहीं बिताना चाहिये। हर समय भगवान्को याद रखते हुए परोपकार और शरीर-निर्वाह आदिका कार्य करते रहना चाहिये। छ: घंटे सोनेके अतिरिक्त एक क्षण भी न तो समय व्यर्थ बिताना चाहिये और न उसका दुरुपयोग करना चाहिये। मनुष्यका जीवन बड़ा ही मूल्यवान् है। अत: क्षणमात्र भी निकम्मा नहीं रहना चाहिये, अपनी बुद्धिसे हम जिसको सबसे बढ़कर कार्य समझें, उसी कार्यको करते रहना चाहिये।
थोड़ी देरका कुसंग भी मनुष्यके लिये बहुत हानिकारक हो जाता है—इस बातको ध्यानमें रखकर नास्तिक, नीच, प्रमादी, भोगी, पापी, निकम्मे, आलसी, दूसरोंपर निर्भर रहकर जीवन-निर्वाह करनेवाले, बहुमूल्य वस्त्राभूषण धारण करनेवाले, खेल-तमाशा और मादक वस्तुओंका सेवन करनेवाले, दुर्व्यसनी स्त्री या पुरुषोंका कभी भूलकर क्षणमात्र भी संग नहीं करना चाहिये और प्रमाद, आलस्य, निद्रा, भय, उद्वेग, राग, द्वेष, अहंकार और दुर्व्यसन आदिसे रहित होकर अपना जीवन विवेक, वैराग्य, त्याग और संयमपूर्वक निष्कामभावसे भजन-ध्यान, सत्संग-स्वाध्यायमें ही बिताना चाहिये तथा सम्पूर्ण प्राणिमात्रको परमात्माका स्वरूप समझकर, आसक्ति और अहंकारसे रहित होकर निष्कामभावपूर्वक तन-मनसे सबकी सेवा करनी चाहिये एवं सबपर समान भावसे हेतुरहित दया और प्रेम रखना चाहिये।