सर्वभूतहिते रता:

भगवत्प्राप्तिके अनेक मार्ग हैं, ‘सर्वभूतहित’ भाव सभी मार्गोंमें आवश्यक है। भगवान् प्राणिमात्रमें स्थित हैं, अतएव किसी भी प्राणीका हित करना और उसे सुख पहुँचाना भगवान‍्की बड़ी सेवा है। प्राणिजगत् में जहाँ जिस वस्तुका अभाव है, वहाँ भगवान् उसी वस्तुके द्वारा अपनी पूजा चाहते हैं और उस पूजामें केवल भगवत्प्रीतिके अतिरिक्त अन्य कोई कामना नहीं रहती तो उसी नि:स्वार्थ सेवासे आत्माका उद्धार या भगवत्प्राप्ति अनायास ही हो जाती है। श्रीतुलसीदासजीने कहा है—

परहित बस जिन्ह के मन माहीं।

तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥

‘जिनके हृदयमें दूसरेका हित बसता है, उनको जगत् में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।’ स्कन्दपुराणमें बतलाया है—

परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम्।

नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पद: स्यु: पदे पदे॥

तीर्थस्नानैर्न सा शुद्धिर्बहुदानैर्न तत् फलम्।

तपोभिरुग्रैस्तन्नाप्यमुपकृत्या यदाप्यते॥

(काशी० ६।४-५)

‘जिन सज्जनोंके हृदयमें परोपकारकी भावना जाग्रत् रहती है, उनकी समस्त आपदाएँ नष्ट हो जाती हैं और उन्हें पद-पदपर सम्पदाएँ प्राप्त होती रहती हैं। न तो अनेक तीर्थोंमें स्नान करनेसे वैसी पवित्रता होती है और न प्रचुर दानों तथा उग्र तपस्याओंसे ही वैसा फल प्राप्त होता है, जैसा कि दूसरोंका उपकार करनेसे होता है।’

अन्य वस्तुओंकी तो बात ही क्या, निष्कामभावसे परोपकार करनेवालेको तो परमात्माकी प्राप्ति भी हो सकती है। श्रीमद्भगवद‍्गीताके पाँचवें अध्यायके २५ वें श्लोकमें भगवान‍्ने स्वयं कहा है—

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा:।

छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:॥

‘जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिनके सब संशय ज्ञानके द्वारा निवृत्त हो गये हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं और जिनका वशमें किया हुआ मन निश्चलभावसे परमात्मामें स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त ब्रह्मको प्राप्त होते हैं।’

इससे यह सिद्ध होता है कि उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त पापरहित ऋषिजन सारे भूतोंके हितमें रत रहनेके प्रभावसे निर्वाणब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं। इसलिये मनुष्यको उचित है कि स्वार्थका सर्वथा परित्याग करके अपने तन, मन, धनसे दु:खी, अनाथ और आतुर प्राणियोंकी सेवा करे; अर्थात् अपने तन, मन, धनको अभावग्रस्त दु:खी प्राणियोंके दु:खनाश और हित-साधनमें ही लगा दे। जिन महानुभावोंका यह उद्देश्य है कि मेरा जीवन और सर्वस्व दीन-दु:खी, अनाथ-आतुरोंके लिये ही है, उन्हींका जीवन धन्य है। इस विषयपर एक सुन्दर कहानी है।

एक उच्च कोटिके विरक्त ज्ञानी महात्मा थे। उनमें गीताके उपर्युक्त श्लोकके सारे लक्षण वर्तमान थे। उन समदर्शी महात्माके सत्संगमें बड़े-से-बड़े राजा-महाराजासे लेकर गरीब-से-गरीब मनुष्यतक भी आया करते थे। महात्माजी आनेवाले सत्संगियोंको इसी श्लोकके आधारपर उपदेश दिया करते थे। उनका प्रधान कथन यह होता था कि निष्कामभावसे दु:खी-आतुर प्राणियोंको सुख पहुँचानेसे परमात्मा मिलते हैं।

एक दिनकी बात है कि उस नगरके राजा उन महात्माजीके पास आये। राजाने महात्माजीके चरणोंमें अभिवादन करके पूछा—‘क्या इस युगमें भी भगवत्प्राप्ति हो सकती है? और यदि हो सकती है तो उसका सरल उपाय क्या है?’ महात्माजीने उत्तर दिया—‘परमात्मा प्राणिमात्रके हृदयमें अवस्थित है। अत: सम्पूर्ण प्राणिमात्रकी निष्कामभावसे तत्परतापूर्वक सेवा करनेपर परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है; प्राणियोंमें भी जो दु:खी, अनाथ और आतुर हों, उनकी सेवा करनेसे और भी शीघ्र कल्याण हो सकता है।’ इस उपदेशको सुनकर राजा अपने स्थानपर लौट गये और उसी दिनसे वे अपने तन, मन, धनद्वारा निष्कामभावसे प्राणिमात्रकी एवं दु:खी और आतुरोंकी सेवा विशेषरूपसे करने लगे।

एक वर्ष बीतनेपर राजाने एक दिन महात्माजीके पास जाकर कहा—‘मुझे आपके आज्ञानुसार अनुष्ठान करते सालभर हो गया, किंतु अभीतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं हुई।’ महात्माजी बोले—‘राजन्! धैर्य रखो और निष्कामभावपूर्वक दु:खियोंकी सेवा उत्साहके साथ विशेषरूपसे करते रहो। करते-करते तुम्हारा अन्त:करण शुद्ध होकर परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी।’ यह सुनकर राजा घर लौट गये एवं पहलेकी अपेक्षा और भी विशेष उत्साहके साथ दु:खियोंकी सेवा करने लगे।

इस प्रकार करते फिर एक वर्ष व्यतीत हो गया, परंतु परमात्माकी प्राप्ति नहीं हुई। तब राजाने पुन: महात्माजीके पास जाकर प्रार्थना की कि ‘महाराज! आपके आज्ञानुसार सेवाके अनुष्ठानका कार्य चालू है, मैंने आपके आदेशके अनुसार अपना तन, मन, धन, सब कुछ सेवामें लगा रखा है। अबतक राज्यकी अधिकांश धनराशि परोपकारके कार्योंमें व्यय हो चुकी है, फिर भी परमात्माकी प्राप्ति होनेका मुझे कोई भी लक्षण नहीं दिखलायी पड़ता।’ इसपर महात्माजीने कहा—‘तुम दृढ़ विश्वास रखो, जरा भी शंका न करो; तुम्हें निश्चय ही परमात्माकी प्राप्ति होगी। तुम बहुत ही सुन्दर रीतिसे तथा शुद्ध भावसे दीन-दु:खियोंकी सेवा कर रहे हो; परंतु वास्तवमें जिस प्रकारके दु:खी, अनाथ और आतुरकी जैसी सेवा होनी चाहिये, वैसी सेवा अबतक तुम्हारे द्वारा नहीं बन पड़ी है। परंतु परम उल्लास तथा श्रद्धाके साथ सदा-सर्वदा करते-करते कभी-न-कभी वैसी सेवा भी बन ही जायगी। अत: तुम वशमें किये हुए मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको नि:स्वार्थभावसे केवल भगवत्प्रीत्यर्थ दु:खियोंकी सेवामें भलीभाँति लगा दो।’

महात्माजीके अमृतमय वचनोंका श्रवण करके राजा बड़े प्रसन्न हुए और घर आकर महात्माजीके आदेशानुसार ही पुन: अत्यन्त उत्साहसे सबके हितके कार्यमें लग गये। वे अब दीन, दु:खी, दरिद्र और अनाथोंके रूपमें नारायणकी विशेषरूपसे सेवा करने लगे।

उसी नगरमें एक दु:खी अनाथ विधवा स्त्री रहती थी, जो प्रतिदिन जंगलसे सूखा ईंधन लाकर शहरमें बेचा करती और उसीसे अपना तथा अपने इकलौते नन्हेंसे पाँच वर्षके लड़केका निर्वाह किया करती। वह जो कुछ कमाती, उससे उन दोनोंकी उदरपूर्ति कठिनतासे होती थी, अत: उसके पास एक भी पैसा बच नहीं पाता था। एक दिन जब वह लड़केको साथ लिये ईंधन लाने जंगलको जा रही थी, तब उस बालकने रास्तेमें एक धनी लड़केको लट्टू, फिरकी आदि खिलौनोंसे खेलते देखा। उसे देखकर उस बालकने अपनी माँसे लट्टू, फिरकी आदि ला देनेको कहा। बच्चेकी बात सुनकर माता बोली—‘बेटा! मैं गरीब हूँ, मेरे पास पैसे कहाँ? मैं तो लकड़ी बेचकर जो पैसे लाती हूँ, उससे पेट ही कठिनतासे भर पाता है, फिर खिलौने कहाँसे खरीदूँ?’ निर्दोष लड़का धनी और गरीबका भेद समझता नहीं था। उसे तो खिलौनेका आग्रह था। वह रोने लगा और वहीं लोट गया। माता किसी तरह उठाकर उसे घर लायी। उसने लड़केको बहुत कुछ समझाया; पर लड़केने एक भी न सुनी। इसी कारण उस दिन वह लकड़ी लाने भी नहीं जा सकी; दिनभर दोनोंको फाँका करना पड़ा। बच्चेने अपना हठ नहीं छोड़ा, वह रोता ही रहा। उसके दु:खसे दु:खी होकर माँ भी रोती रही। उसके पास पैसा तो था नहीं कि वह बच्चेका हठ पूरा कर सकती। अर्धरात्रिका समय था, निस्तब्ध रात्रि थी। सब सो रहे थे, परंतु झोंपड़ीके कोनेमें गरीब माँ-पुत्र रो रहे थे। लड़केकी रोनेकी आवाज तीव्र थी। महल समीप ही था। महलमें सोये राजाके कानोंमें रोनेकी ध्वनि पहुँची। करुणापूर्ण रुदनकी ध्वनिसे राजा चौंक पड़े और उठकर इधर-उधर देखने लगे। राजाने कोतवालको बुलाकर कहा—‘देखो, किसी दु:खी आतुर व्यक्तिके रोनेकी आवाज आ रही है, तुम शीघ्र जाओ और उसे आश्वासन देकर मेरे पास लाओ।’ कोतवाल तुरंत उसके पास पहुँच गया और उससे बोला—‘चलो! महाराज साहब तुमको बुला रहे हैं।’ बेचारी ईंधन बेचनेवाली स्त्री कोतवालको देखते ही भयसे काँपने लगी और बोली—‘सरकार! यह छोटा बच्चा है; रोता है, इसके अपराधको क्षमा करें।’ कोतवालने धीरज बँधाते हुए कहा—‘तुम भय मत करो, मेरे साथ चलो, राजाने दया करके ही तुमको बुलाया है।’ किंतु उस बेचारीकी घबराहट दूर नहीं हुई। उसने सोचा—बच्चेके रोनेसे राजाकी नींद टूट गयी है, इसलिये वे दण्ड देंगे; पर उपाय ही क्या, जब वे बुला रहे हैं तो जाना ही पड़ेगा। वह राजाके पास जाने लगी। कोतवालके वचनोंसे उस स्त्रीका रोना तो बंद हो गया, परंतु भयके मारे उसका शरीर काँप रहा था और लड़का रोता हुआ उसके पीछे-पीछे चला जा रहा था।

कोतवालके साथ दोनों राजमहलमें पहुँचे। राजाने इस करुणायुक्त दृश्यको देखकर उस भयभीत स्त्रीको आश्वासन देते हुए कहा—‘बेटी! डर मत। बता, यह बच्चा किसलिये रो रहा है? मैं इसका कारण जानना चाहता हूँ।’ इसपर उस स्त्रीने सारी बात ज्यों-की-त्यों बतला दी। वह बोली—‘महाराज! मैं जंगलसे सूखी लकड़ियाँ लाकर बेचा करती हूँ, उसीसे अपना और इसका पेट भरती हूँ। आज मैं जब लकड़ी लाने जंगलको जा रही थी, तब रास्तेमें एक धनी लड़केको लट्टू, फिरकी आदिसे खेलते देखकर यह मचल उठा और इसने हठ कर लिया कि मुझे ऐसे ही खिलौने ला दे। इसी कारण यह रोने लगा। इसीसे मैं आज लकड़ी लाने भी न जा सकी, जिसके कारण यह भूखसे भी व्याकुल है। आधी रात बीत गयी; यह मानता नहीं, बराबर रो ही रहा है। मैंने बहुत प्रयत्न किया कि यह न रोये, पर छोटा बच्चा है, बेसमझ है, क्या किया जाय।’

राजाने तुरंत महलके अंदरसे साग, पूड़ी, मिठाई मँगवाकर दी और कहा—‘मैं अभी खिलौने मँगा देता हूँ।’ विधवा माताने लड़केको खिलानेकी बहुत चेष्टा की, किंतु हठी बच्चेने माँग पूरी न होनेके कारण कुछ नहीं खाया। माँ भी लड़केको बिना खिलाये कैसे खाती। तब राजाने कोतवालसे कहा—‘अभी बाजार जाओ और यह लड़का जो-जो खिलौने चाह रहा है, वे जहाँ जिसके यहाँ भी मिलें, एक छबड़ी भरकर ले आओ।’ कर्तव्यपरायण कोतवालने तत्काल खिलौनेके दूकानदारके घर जाकर उसे जगाया और उसी समय दूकान खोलकर एक छबड़ी खिलौने देनेको कहा। राजाकी आज्ञा थी, उसने तुरंत एक छबड़ी खिलौने दे दिये। कोतवालने उनका उचित मूल्य चुकाकर छबड़ी लाकर राजाके सामने रख दी। राजाने वे सारे खिलौने बालकको सौंप दिये। बालक दोनों हाथोंमें जितना ले सका, लेकर हँसने और नाचने लगा। बालककी प्रसन्नता देखकर माताकी भी प्रसन्नताकी सीमा नहीं रही।

तदनन्तर राजाने उन दोनोंको यथेष्ट भोजन कराकर तृप्त किया तथा बचे हुए खिलौने और भोजन उस बच्चेकी माँको सौंप दिये। माता और पुत्र—दोनों अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो अपनी झोंपड़ीमें लौट गये। राजाकी अनुमति पाकर कोतवाल भी अपने स्थानको लौट गया। उसी समय राजाको उस विज्ञानानन्दघन परमात्माके स्वरूपकी प्राप्ति हो गयी तथा उनके आनन्द और शान्तिकी सीमा नहीं रही।

प्रात:काल होते ही राजा महात्माजीके पास गये और दण्डवत् प्रणाम करके अपनी सारी घटना आद्योपान्त उन्हें कह सुनायी। तब महात्माजी बोले—‘राजन्! तुमने बहुतेरे लोगोंकी सेवा की और परोपकारके निमित्त बहुत-सा धन खर्च किया, किंतु जैसी सेवा आज हुई है, वैसी इसके पहले नहीं हुई थी।’ महात्माजीके वचन सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए और फिर अपने घरपर चले आये।

जिस समय राजा अपनी घटना सुना रहे थे, उस समय वहाँ महात्माजीकी सेवामें शहरसे दो कोस दूर रहनेवाला एक नितान्त निर्धन देहाती खोमचेवाला भी बैठा था। उसने इस घटनाको बड़े चावसे सुना और महात्माजीसे कहा—‘महाराज! क्या मुझ-जैसे गरीब आदमीको भी भगवान् मिल सकते हैं?’ महात्माजी बोले—‘क्यों नहीं मिल सकते?’ भगवान‍्के यहाँ गरीब और धनीका भेद थोड़े ही है। वे भावके भूखे हैं। एक बार राजा चोल और विष्णुदास नामके एक गरीब ब्राह्मणमें भक्तिविषयको लेकर भगवद्दर्शनके लिये परस्पर होड़ लग गयी थी, जिसमें अन्तमें उस गरीब विष्णुदासकी ही विजय हुई और उस गरीब ब्राह्मणको ही भगवान‍्ने पहले दर्शन दिये।

यह सुनकर खोमचेवालेने पूछा—‘महाराजजी! वह राजा चोल कौन था, गरीब विष्णुदास कौन था और उनमें परस्पर किस प्रकार होड़ लगी थी तथा उस गरीब ब्राह्मणको भगवान‍्ने राजासे पहले किस तरह दर्शन दिये थे? कृपया वह सब कथा मुझे विस्तारसे सुनाइये।’

महात्माजीने कहा—पहले कांचीपुरीमें चोल नामक एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं; उनके अधीन जितने देश थे, वे भी चोल नामसे ही विख्यात हुए। राजा चोल जब इस भूमण्डलका शासन करते थे, उस समय कोई भी मनुष्य दरिद्र, दु:खी, पापमें मन लगानेवाला अथवा रोगी नहीं था। उन्होंने इतने यज्ञ किये थे कि जिनकी कोई गणना नहीं हो सकती।

एक समयकी बात है। राजा चोल ‘अनन्तशयन’ नामक तीर्थमें गये, जहाँ जगदीश्वर श्रीविष्णु शेषशायीके रूपमें विराज रहे थे। वहाँ भगवान् श्रीविष्णुके उस दिव्य विग्रहकी राजाने विधिपूर्वक पूजा की। उन्होंने स्वर्णके बने हुए फूलों तथा मणि-मोतियोंसे भगवान‍्का पूजन करके उनको साष्टांग प्रणाम किया। प्रणाम करके ज्यों ही वे बैठे, उसी समय कांचीनगरीके निवासी ब्राह्मण विष्णुदास भगवान‍्की पूजाके लिये हाथमें तुलसीदल और जल लिये वहाँ आये। उन ब्रह्मर्षिने विष्णुसूक्तका पाठ करते हुए देवदेव भगवान‍्को स्नान कराया और तुलसीकी मंजरी तथा पत्तोंसे उनकी विधिवत् पूजा की। राजा चोलने पहले जो रत्नोंसे भगवान‍्की पूजा की थी, वह सब तुलसीपत्तोंसे ढँक गयी। यह देखकर राजा कुपित होकर बोले—‘विष्णुदास! मैंने मणियों तथा सुवर्णसे भगवान‍्की पूजा की थी, वह कितनी शोभा पा रही थी! किंतुु तुमने तुलसीपत्र चढ़ाकर सब ढक दी; बताओ, ऐसा क्यों किया? मालूम होता है तुम बड़े मूर्ख हो, भगवान् विष्णुकी भक्तिको बिलकुल नहीं जानते। तभी तो तुम अत्यन्त सुन्दर सजी-सजायी पूजाको पत्तोंसे ढके जा रहे हो। तुम्हारे इस बर्तावसे मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है।’

विष्णुदास बोले—‘राजन्! आपको भक्तिका कुछ भी पता नहीं है, केवल राज्यलक्ष्मीके कारण आप घमंड कर रहे हैं। बताइये तो आजसे पहले आपने कितने वैष्णव-व्रतोंका पालन किया है?’

राजाने कहा—‘ब्राह्मण! यदि तुम विष्णुभक्तिके अत्यन्त गर्वमें आकर ऐसी बात करते हो तो बताओ, तुममें कितनी भक्ति है? तुम तो दरिद्र हो, निर्धन हो। तुमने श्रीविष्णुको संतुष्ट करनेवाले यज्ञ और दान आदि कभी नहीं किये हैं तथा पहले कहीं कोई देवालय भी नहीं बनवाया है। ऐसी दशामें भी तुम्हें अपनी भक्तिका इतना घमंड है? अच्छा, तो आज यहाँ जितने भी श्रेष्ठ ब्राह्मण उपस्थित हैं, वे सभी कान खोलकर मेरी बात सुन लें। देखना है, मैं पहले भगवान् विष्णुका दर्शन पाता हूँ या यह; इससे लोगोंको स्वयं ही ज्ञात हो जायगा कि हम दोनोंमेंसे किसमें कितनी भक्ति है।’

यह कहकर राजा चोल अपने राजभवनको चले गये और उन्होंने महर्षि मुद‍्गलको आचार्य बनाकर वैष्णव-यागका अनुष्ठान आरम्भ किया, जिसमें बहुत-से ऋषियोंका समुदाय एकत्रित हुआ, बहुत-सा अन्न खर्च किया गया और प्रचुर दक्षिणा बाँटी गयी।

‘उधर विष्णुदास भी वहीं भगवान‍्के मन्दिरमें ठहर गये और श्रीविष्णुको संतुष्ट करनेवाले शास्त्रोक्त नियमोंका भलीभाँति पालन करते हुए सदा ही व्रतका अनुष्ठान करने लगे। माघ और कार्तिकके व्रत, तुलसीके बगीचेका भलीभाँति पालन, एकादशीका व्रत, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इस द्वादशाक्षर मन्त्रका जप तथा गीत-नृत्य आदि मांगलिक उत्सवोंके साथ षोडशोपचारद्वारा प्रतिदिन श्रीविष्णुकी पूजा—यही उनकी जीवनचर्या थी। वे इन्हीं व्रतोंका पालन करते थे। चलते, खाते और सोते समय भी उन्हें निरन्तर श्रीविष्णुका स्मरण बना रहता था। वे समदर्शी थे और सम्पूर्ण प्राणियोंमें भगवान् श्रीविष्णुको स्थित देखते थे। उन्होंने भगवान् श्रीविष्णुके संतोषके लिये उद्यापन-विधिसहित माघ और कार्तिकके विशेष-विशेष नियमोंका भी सर्वदा पालन किया।’

इस प्रकार राजा चोल और विष्णुदास दोनों ही होड़ लगाकर भगवान् श्रीविष्णुकी आराधना करने लगे। दोनों ही अपने-अपने व्रतमें स्थित रहते थे, दोनोंकी ही इन्द्रियाँ और कर्म भगवान‍्में ही केन्द्रित थे।

‘एक दिनकी बात है, विष्णुदासने नित्यकर्म करनेके पश्चात् भोजन तैयार किया; किंतुु उसे किसीने चुरा लिया। चुरानेवालेको किसीने नहीं देखा। विष्णुदासने भोजन चुरा लिये जानेपर भी दुबारा भोजन नहीं बनाया; क्योंकि ऐसा करनेपर सायंकालकी पूजाके लिये अवकाश नहीं मिलता, अत: प्रतिदिनके नियमके भंग हो जानेका भय था। दूसरे दिन उसी समयपर भोजन बनाकर वे ज्यों ही भगवान् विष्णुको भोग लगानेके लिये गये, त्यों ही कोई आकर फिर सारा भोजन चुरा ले गया। इस प्रकार लगातार सात दिनोंतक कोई आ-आकर उनके भोजनका अपहरण करता रहा। इससे विष्णुदासको बड़ा विस्मय हुआ। वे विचार करने लगे—‘अहो! यह कौन प्रतिदिन आकर मेरी रसोई चुरा ले जाता है? मैं क्षेत्र-संन्यास ले चुका हूँ, अब किसी तरह इस स्थानका परित्याग नहीं कर सकता। यदि दुबारा भोजन बनाता हूँ तो सायंकालकी पूजा छूट जाती है। जबतक सारी सामग्री भगवान् श्रीविष्णुके निवेदन न कर लूँ, तबतक मैं भोजन नहीं करता। प्रतिदिन उपवास करनेसे मैं इस व्रतकी समाप्तितक जीवित कैसे रह सकूँगा? अच्छा, आज मैं रसोईकी भलीभाँति रक्षा करूँगा।’

‘यों सोचकर भोजन बनानेके पश्चात् विष्णुदास वहीं कहीं छिपकर खड़े हो गये। इतनेमें ही एक चाण्डाल दिखायी दिया, जो उनका अन्न चुराकर ले जानेको उद्यत था। भूखके मारे उसका सारा शरीर दुर्बल हो रहा था, मुखपर दीनता छा रही थी, शरीरमें हाड़ और चामके सिवा और कुछ बाकी नहीं बचा था। उसे देखकर श्रेष्ठ ब्राह्मण विष्णुदासका हृदय करुणासे व्यथित हो उठा। उन्होंने उससे कहा—‘भैया! जरा ठहरो, ठहरो! क्यों रूखा-सूखा खाते हो? यह घी तो ले लो।’ इस प्रकार बोलते हुए विप्रवर विष्णुदासको आते देख वह चाण्डाल बड़े वेगसे भागा और भयसे मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। विष्णुदास तुरंत उसके समीप पहुँच गये और करुणावश अपने वस्त्रसे उसे हवा करने लगे। तदनन्तर जब वह उठकर खड़ा हुआ, तब विष्णुदासने देखा—वह चाण्डाल नहीं, साक्षात् भगवान् नारायण ही शंख, चक्र और गदा धारण किये सामने विराजमान हैं। उनकी कटिमें पीताम्बर है, चार भुजाएँ हैं, हृदयमें श्रीवत्सका चिह्न तथा मस्तकपर किरीट शोभा पा रहे हैं। अलसीके फूलकी भाँति श्यामसुन्दर शरीर और कौस्तुभमणिसे जगमगाते हुए वक्ष:स्थलकी अपूर्व शोभा हो रही है। अपने प्रभुको प्रत्यक्ष सम्मुख देखकर द्विजश्रेष्ठ विष्णुदास रोमांच, अश्रुपात आदि सात्त्विक भावोंसे इस प्रकार समन्वित हो गये कि वे भगवान‍्की स्तुति और नमस्कार करनेमें भी समर्थ न हो सके। उस समय वहाँ इन्द्र आदि देवता तथा ऋषि-महर्षि भी आ पहुँचे। भगवान् श्रीविष्णुने सात्त्विक व्रतका पालन करनेवाले अपने भक्त विष्णुदासको छातीसे लगा लिया और उन्हें अपने-ही-जैसा रूप देकर वे वैकुण्ठ-धामको ले चले।

उस समय यज्ञमें दीक्षित हुए राजा चोलने देखा, विष्णुदास एक सुन्दर विमानपर बैठकर भगवान् श्रीविष्णुके धाममें जा रहे हैं। राजाने तुरंत ही अपने गुरु महर्षि मुद‍्गलको बुलाकर कहा—‘जिसके साथ होड़ लगानेके कारण मैंने यह यज्ञ-दान आदि कर्मका अनुष्ठान किया है, वह ब्राह्मण आज भगवान् श्रीविष्णुका रूप धारण करके मुझसे पहले ही वैकुण्ठधाममें जा रहा है। मैंने इस वैष्णवयागमें भलीभाँति दीक्षित होकर अग्निमें हवन किया और दान आदिके द्वारा ब्राह्मणोंका मनोरथ पूर्ण किया; तथापि अभीतक भगवान् मुझपर प्रसन्न नहीं हुए और इस ब्राह्मणको केवल भक्तिके ही कारण श्रीहरिने प्रत्यक्ष दर्शन दिया है। अत: जान पड़ता है, भगवान् विष्णु केवल दान और यज्ञोंसे प्रसन्न नहीं होते; उन प्रभुका दर्शन करानेमें भक्ति ही प्रधान कारण है।

राजा चोल बचपनसे ही यज्ञकी दीक्षा लेकर उसीमें संलग्न रहते थे, इसलिये उन्हें कोई पुत्र नहीं हुआ था; अत: उन्होंने अपने भानजेको राजसिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया। तत्पश्चात् वे यज्ञशालामें गये और यज्ञकुण्डके सामने खड़े होकर श्रीविष्णुको सम्बोधित करते हुए तीन बार उच्च स्वरसे निम्नांकित वचन बोले—‘भगवान् विष्णु! आप मुझे मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा निश्चल भक्ति दीजिये।’ यों कहकर वे सबके देखते-देखते अग्निमें कूद पड़े। राजा ज्यों ही अग्निकुण्डमें कूदे, त्यों ही भक्तवत्सल भगवान् श्रीविष्णु प्रकट हो गये और उन्होंने राजाको छातीसे लगाकर एक श्रेष्ठ विमानपर बिठाया। फिर उसे अपने ही समान रूप देकर उन देवेश्वरने देवताओंसहित वैकुण्ठ धामको प्रस्थान किया।’*

कथा सुनकर खोमचेवालेके चित्तमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने उत्साहपूर्वक महात्माजीसे पूछा—‘मुझ-जैसे अकिंचनको शीघ्र-से-शीघ्र भगवान् कैसे मिल सकते हैं! महात्माजी बोले—‘तू सब प्राणियोंमें परमात्माको व्यापक देखकर अपने कर्मोंके द्वारा उनकी सेवा किया कर, जैसा कि गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने बतलाया है—

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥

(१८।४६)

‘जिस परमेश्वरसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वरकी अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि (परमात्मा)-को प्राप्त हो जाता है।’

महात्माजीका आदेश पाकर खोमचेवाला अपने गाँवको लौट गया और उनके आज्ञानुसार साधन करने लगा। वह खोमचेसे नित्य दो रुपये कमाता था, जिनमेंसे डेढ़ रुपयेमें तो अपना और अपने कुटुम्बका भरण-पोषण कर लेता, शेष आठ आने बचते, उनको दु:खी, अनाथ, असहाय, आतुर और भूखे प्राणियोंकी सेवामें लगा देता था।

इस प्रकार सेवा करते उसे तीन वर्ष बीत गये, पर भगवत्प्राप्तिका कोई भी चिह्न न देखकर वह एक दिन पुन: महात्माजीके पास आकर कहने लगा—‘महाराजजी! मैं नित्य दो रुपये कमाता हूँ, डेढ़में अपना भरण-पोषण करके आठ आने दु:खियोंकी सेवामें लगाता हूँ, परंतु अभीतक भगवान‍्की प्राप्तिका कोई पूर्व लक्षण भी मुझमें नहीं दीखता। आप ही बतलाइये, मैं क्या करूँ जिससे शीघ्र-से-शीघ्र भगवान‍्की प्राप्ति हो।’ महात्माजी बोले—‘तू जो करता है सो ठीक ही करता है, और भी उत्साह तथा उल्लासके साथ एवं विश्वासपूर्वक गरीब, दीन, दु:खी, आतुर, दरिद्ररूप नारायणकी सेवा विशेषरूपसे करता रह।’ इसपर खोमचेवाला ‘बहुत अच्छा’ कह अपने घर लौट गया और महात्माजीके आज्ञानुसार पुन: विशेष उत्साहपूर्वक दु:खियोंकी सेवा करने लगा।

उसी शहरमें झोंपड़ी बाँधकर एक लकड़ी बेचनेवाला रहता था; वह जंगलसे सूखी लकड़ी लाकर उसे बेचकर बड़ी कठिनतासे अपनी उदरपूर्ति करता था। एक दिनकी बात है कि जंगलमें उसे समीपमें लकड़ियाँ नहीं प्राप्त हुईं तो वह कुछ दूर चला गया, जिससे उसे लौटनेमें विलम्ब हो गया। जब वह लकड़ियाँ लेकर वापस आया तब दिनके बारह बज गये और ग्रीष्मकालकी कड़ी धूपके कारण वह पसीनेसे तर हो गया। वह अभी शहरसे एक मील दूरपर था, तब उसका जी मिचलाने लगा और वह चक्‍कर खाकर जमीनपर गिर पड़ा। लकड़ियोंका गट्ठर उसके सिरसे एक किनारे गिर गया और वह बेहोश हो गया।

इसी समय वह खोमचेवाला अपने गाँवसे खोमचा लेकर शहरकी ओर चला; रास्तेमें लकड़हारेको मूर्च्छित पड़ा देखकर उसके हृदयमें दया आ गयी। खोमचेवालेके पास उबले हुए चने और जल पर्याप्त था ही, उसने तुरंत एक चुल्लू जल लेकर उसके मुखपर छिड़का, कुछ जल उसके मुखमें डाल दिया और कपड़ेके पल्लेसे उसे हवा करने लगा, जिससे लकड़हारेको कुछ होश हुआ और उसने आँखें खोलीं। जब वह होशमें आकर बैठा, तब खोमचेवालेने उसको पेड़की छायामें ले जाकर और उसे नितान्त गरीब, दु:खी और भूखा समझकर खानेके लिये उबले हुए यथेष्ट चने दे दिये और जल पिला दिया। इससे उसकी आत्मा बड़ी ही तृप्त हुई और उसने अपनी सारी दु:ख-कहानी खोमचेवालेको कह सुनायी। तदनन्तर वह उस खोमचेवालेका आभारी होकर विनययुक्त वचनोंसे उसकी स्तुति करने लगा। इसपर खोमचेवालेने कहा—‘भैया! स्तुति करनेयोग्य तो भगवान् हैं। यह जो कुछ है, भगवान‍्का ही है; मैं तो केवल निमित्तमात्र हूँ। स्तुति तो तुझे भगवान‍्की ही करनी चाहिये। और मेरे लायक जो सेवा-चाकरी हो सो बतला, मैं तेरी सेवामें उपस्थित हूँ।’ लकड़हारेने कहा—‘अब मैं सबल हो गया हूँ, मुझे कोई तकलीफ नहीं है, यह लकड़ीका बोझा मेरे सिरपर उठा दो, जिससे मैं शहरको चला जाऊँ।’ खोमचेवालेने उसका गट्ठर सिरपर उठा दिया और वह शहरकी ओर चल पड़ा।

इसके पश्चात् ज्यों ही खोमचेवाला अपना खोमचा और जलपात्र लेकर शहरकी ओर चलनेको उद्यत हुआ कि भगवान् प्रकट हो गये। भगवान‍्के दर्शन करके उसके रोमांच और अश्रुपात होने लगे, उस समय उसके आनन्द और शान्तिका पारावार नहीं रहा। तब भगवान‍्ने उससे कहा— ‘गरीब-दु:खीके रूपमें की हुई तेरी सेवासे मैं संतुष्ट हूँ, अब जो इच्छा हो सो वरदान माँग।’ खोमचेवाला बोला—‘प्रभो! आज आपने अपना दर्शन देकर मुझे कृतार्थ कर दिया, अब इससे बढ़कर और है ही क्या; जिसे मैं माँगू।’ भगवान‍्के बारंबार आग्रह करनेपर उसने पुन: कहा—‘आपमें मेरा अनन्य विशुद्ध प्रेम सदा बना रहे।’ इसपर भगवान् ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्धान हो गये।

खोमचेवाला भगवान‍्के प्रेमानन्दमें निमग्न होकर महात्माजीके पास आया और उनके चरणोंमें साष्टांग प्रणिपात करनेके बाद अपनी सारी घटना उनसे आद्यन्त कह सुनायी। महात्माजी बोले—‘इस दरिद्र, दु:खी, गरीब लकड़हारेको जो तूने चने खिलाकर जल पिलाया—तेरा यह सेवाकार्य बहुत ही श्रेष्ठ हुआ। पहले तेरे जितने सेवाकार्य हुए, उनमें यह सबसे बढ़कर है।’ खोमचेवाला महात्माजीकी वाणी सुनकर आनन्दमग्न हो गया और उनको नमस्कार करके अपने घर लौट गया।

इस कहानीसे हमलोगोंको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि दु:खी-अनाथ प्राणियोंकी सेवा करते-करते भगवान‍्की प्राप्तिमें विलम्ब हो तो उकतावें नहीं, वरं सबमें भगवद‍्बुद्धि करके निष्कामभावसे परम श्रद्धा, विश्वास, विनय और प्रेमपूर्वक तत्परताके साथ सेवा करते ही रहें। सेवामें श्रद्धा-प्रेमपूर्वक भगवद्भाव और निष्कामभाव होनेसे वह उच्च कोटिकी साधना हो जाती है। अत: यह साधन करते हुए इन भावोंकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहनी चाहिये। उपर्युक्त दोनों भाव (भगवद्भाव और निष्कामभाव) साथ रहें तब तो बात ही क्या, इनमेंसे केवल एक भाव भी रहे तो भी भगवत्प्राप्ति हो सकती है। अतएव हमलोगोंको समस्त प्राणियोंमें उस परब्रह्म परमात्माको व्याप्त समझकर सबकी सेवा और परोपकार करनेमें तत्पर होकर लग जाना चाहिये।