सत्यकी महिमा
एक सत्यवादी धर्मात्मा राजा थे। उनके नगरमें कोई भी साधारण मनुष्य बिक्री करनेके लिये बाजारमें अन्न, वस्त्र आदि कोई वस्तु लाता और वह वस्तु यदि सायंकालतक नहीं बिकती तो उसे राजा खरीद लिया करते थे। लोकहितके लिये राजाकी यह सत्य प्रतिज्ञा थी। अत: सायंकाल होते ही राजाके सेवक शहरमें भ्रमण करते और किसीको कोई वस्तु लिये बैठे देखते तो वे उससे पूछकर और उसके संतोषके अनुसार कीमत देकर उस वस्तुको खरीद लेते थे।
एक दिनकी बात है। स्वयं धर्मराज ब्राह्मणका वेष धारण करके घरकी टूटी-फूटी व्यर्थकी चीजें, जो बाहर फेंकने योग्य कूड़ा-करकट थीं, एक पेटीमें भरकर उन सत्यवादी धर्मात्मा राजाकी परीक्षा करनेके लिये उनके नगरमें आये और बिक्रीके लिये बाजारमें बैठ गये, किंतुु कूड़ा-करकट कौन लेता? जब सायंकाल हुआ, तब राजाके सेवक नगरमें सदाकी भाँति घूमने लगे। नगरमें बेचनेके लिये लोग जो वस्तुएँ लाये थे, वे सब बिक चुकी थीं। केवल ये ब्राह्मण अपनी पेटी लिये बैठे थे। राजसेवकोंने इनके पास जाकर पूछा—‘क्या आपकी वस्तु नहीं बिकी?’ उन्होंने उत्तर दिया— ‘नहीं।’ राजसेवकने पुन: पूछा—‘आप इस पेटीमें बेचनेके लिये क्या चीज लाये हैं? और उसका मूल्य क्या है?’ ब्राह्मणने कहा—‘इसमें दारिद्रॺ (कूड़ा-करकट) भरा हुआ है। इसका मूल्य है एक हजार रुपये।’ यह सुनकर राजसेवक हँसे और उन्होंने कहा—‘इस कूड़ा-करकटको कौन लेगा, जिसका एक पैसा भी मूल्य नहीं है?’ ब्राह्मणने कहा—‘यदि इसे कोई नहीं लेगा तो मैं इसे वापस अपने घर ले जाऊँगा, राजसेवकोंने तुरंत राजाके पास जाकर इसकी सूचना दी। इसपर राजाने कहा—‘उन्हें वस्तु वापस न ले जाने दो। मूल्य जो कुछ कम-से-कम हो सके, उन्हें संतोष कराकर वस्तु खरीद लो।’
राजसेवकोंने आकर ब्राह्मणसे उस पेटीके दो सौ रुपये मूल्य कहा, किंतु ब्राह्मणने एक हजारसे एक पैसा भी कम लेना स्वीकार नहीं किया। राजसेवकोंने पाँच सौ रुपयेतक देना स्वीकार कर लिया, परंतु ब्राह्मणने इन्कार कर दिया। तब राजसेवकोंमेंसे कुछ व्यक्ति उत्तेजित होकर राजाके पास आये और बोले—‘महाराज! उनकी पेटीमें दारिद्रॺ (कूड़ा-करकट) भरा हुआ है, एक पैसेकी भी चीज नहीं है और पाँच सौ रुपये देनेपर भी वे नहीं दे रहे हैं। ऐसी परिस्थितिमें आपको उनकी वस्तु नहीं खरीदनी चाहिये।’ राजाने कहा—‘नहीं, हमारी सत्य प्रतिज्ञा है, हम सत्यका त्याग कभी नहीं करेंगे, इसलिये ब्राह्मणको, वे जो माँगें, देकर उस वस्तुको खरीद लो।’ यह सुनकर राजसेवक राजाके इस आग्रहको देखकर हँसे और लौट आये। उन्होंने निरुपाय होकर ब्राह्मणको एक हजार रुपये दे दिये और उनकी पेटी ले ली। ब्राह्मण रुपये लेकर चले गये और राजसेवक पेटीको राजाके पास ले आये। राजाने उस दारिद्रॺसे भरी पेटीको राजमहलमें रखवा दिया।
रात्रिमें जब शयनका समय हुआ, तब राजमहलके द्वारसे वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित एक बहुत सुन्दर युवती निकली। राजा बाहर बैठकमें बैठे हुए थे। उस स्त्रीको देखकर राजाने पूछा—‘आप कौन हैं? किस कार्यसे आयी हैं? और क्यों जा रही हैं?’ उस स्त्रीने कहा—‘मैं लक्ष्मी हूँ। आप सत्यवादी धर्मात्मा हैं, इस कारण मैं सदासे आपके घरमें निवास करती रही हूँ, पर अब तो आपके घरमें दारिद्रॺ आ गया है, जहाँ दारिद्रॺ रहता है वहाँ लक्ष्मी नहीं रहती। इसलिये आज मैं आपके यहाँसे जा रही हूँ।’ राजा बोले—‘जैसी आपकी इच्छा।’
थोड़ी देर बाद राजाने एक बहुत ही सुन्दर युवा पुरुषको राजमहलके दरवाजेसे निकलते देखा तो उससे पूछा—‘आप कौन हैं? कैसे आये हैं और कहाँ जा रहे हैं?’ उस सुन्दर पुरुषने कहा—‘मेरा नाम दान है। आप सत्यवादी धर्मात्मा हैं, इस कारण सदा मैं आपके यहाँ निवास करता रहा हूँ। अब जहाँ लक्ष्मी गयी है, वहीं मैं जा रहा हूँ; क्योंकि जब लक्ष्मी चली गयी, तब आप दान कहाँसे करेंगे?’ तब राजा बोले—‘बहुत अच्छा।’
उसके बाद फिर एक सुन्दर पुरुष निकलता दिखायी दिया। राजाने उससे भी पूछा—‘आप कौन हैं? कैसे आये हैं और कहाँ जा रहे हैं?’ उसने कहा—‘मैं यज्ञ हूँ। आप सत्यवादी धर्मात्मा हैं, अत: आपके यहाँ मैं सदासे निवास करता रहा। अब आपके यहाँसे लक्ष्मी और दान चले गये तो मैं भी वहीं जा रहा हूँ; क्योंकि बिना सम्पत्तिके आप यज्ञका अनुष्ठान कैसे करेंगे?’ राजा बोले—‘बहुत अच्छा।’
तदनन्तर फिर एक युवा पुरुष दिखायी दिया। राजाने पूछा—‘आप कौन हैं? कैसे आये और कहाँ जा रहे हैं?’ उसने कहा—‘मेरा नाम यश है। आप धर्मात्मा सत्यवादी हैं, अत: मैं आपके यहाँ सदासे रहता आया हूँ; किंतु आपके यहाँसे लक्ष्मी, दान, यज्ञ सब चले गये तो उनके बिना आपका यश कैसे रहेगा? इसलिये मैं भी वहीं जा रहा हूँ, जहाँ वे गये हैं।’ राजाने कहा—‘ठीक है।’
तत्पश्चात् एक सुन्दर पुरुष फिर निकला। उसे देखकर उससे भी राजाने पूछा—‘आप कौन हैं, कैसे आये और कहाँ जा रहे हैं?’ उसने कहा—‘मेरा नाम सत्य है। आप धर्मात्मा हैं, अत: मैं सदा आपके यहाँ रहता आया हूँ; किंतु अब आपके यहाँसे लक्ष्मी, दान, यज्ञ, यश— सब चले गये तो मैं भी वहीं जा रहा हूँ।’ राजाने कहा—‘मैंने तो आपके लिये ही इन सबका त्याग किया है, आपका तो मैंने कभी त्याग किया ही नहीं, इसलिये आप कैसे जा सकते हैं? मैंने लोकोपकारके लिये यह सत्य प्रतिज्ञा कर रखी थी कि कोई भी व्यक्ति मेरे नगरमें बिक्री करनेके लिये कोई वस्तु लेकर आयेगा और सायंकालतक उसकी वह वस्तु नहीं बिकेगी तो मैं उसे खरीद लूँगा। आज एक ब्राह्मण दारिद्रॺ लेकर बिक्री करने आये जो एक पैसेकी भी चीज नहीं; किंतु सत्यकी रक्षाके लिये ही मैंने विक्रेता ब्राह्मणको एक हजार रुपये देकर उस दारिद्रॺ (कूड़ा-करकट)को खरीद लिया। तब लक्ष्मीने आकर कहा कि आपके घरमें दारिद्रॺका वास हो गया, इसलिये मैं नहीं रहूँगी। इसी कारण मेरे यहाँसे लक्ष्मी आदि सब चले गये। ऐसा होनेपर भी मैं आपके बलपर डटा हुआ हूँ।’ यह सुनकर सत्यने कहा—‘जब मेरे लिये ही आपने इन सबका त्याग किया है, तब मैं नहीं जाऊँगा।’ ऐसा कहकर वह राजमहलमें वापस प्रवेश कर गया।
थोड़ी ही देर बाद ‘यश’ लौटकर राजाके पास आया। राजाने पूछा—‘आप कौन हैं और क्यों आये हैं?’ उसने कहा—‘मैं वही यश हूँ, आपमें सत्य विराजमान है। चाहे कोई कितना ही यज्ञकर्त्ता, दानी और लक्ष्मीवान् क्यों न हो, किंतुु बिना सत्यके वास्तविक कीर्ति नहीं हो सकती। इसलिये जहाँ सत्य है, वहीं मैं रहूँगा।’ राजा बोले—‘बहुत अच्छा।’
तदनन्तर यज्ञ आया। राजाने उससे पूछा—‘आप कौन हैं और किसलिये आये हैं?’ उसने कहा—‘मैं वही यज्ञ हूँ, जहाँ सत्य रहता है, वहीं मैं रहता हूँ, चाहे कोई कितना ही दानशील और लक्ष्मीवान् क्यों न हो, किंतुु बिना सत्यके यज्ञ शोभा नहीं देता। आपमें सत्य है, अत: मैं यहीं रहूँगा।’ राजा बोले—‘बहुत अच्छा।’
तत्पश्चात् दान आया। राजाने उससे भी पूछा—‘आप कौन हैं और कैसे आये हैं?’ उसने कहा—‘मैं वही दान हूँ। आपमें सत्य विराजमान है और जहाँ सत्य रहता है वहीं मैं रहता हूँ; क्योंकि कोई कितना ही लक्ष्मीवान् क्यों न हो, बिना सद्भावके दान नहीं दे सकता। आपके यहाँ सत्य है, इसलिये मैं यहीं रहूँगा।’ राजा बोले—‘बहुत अच्छा।’
इसके अनन्तर लक्ष्मी आयी। राजाने पूछा—‘आप कौन हैं और क्यों आयी हैं?’ उसने कहा—‘मैं वही लक्ष्मी हूँ। आपके यहाँ सत्य विराजमान है। आपके यहाँ यश, यज्ञ, दान भी लौट आये हैं। इसलिये मैं भी लौट आयी हूँ।’ राजा बोले—‘देवि! यहाँ तो दारिद्रॺ भरा हुआ है, आप कैसे निवास करेंगी?’ लक्ष्मीने कहा—‘राजन्! जो कुछ भी हो, मैं सत्यको छोड़कर नहीं रह सकती।’ राजा बोले—‘जैसी आपकी इच्छा।’
तदनन्तर वहाँ स्वयं धर्मराज उसी ब्राह्मणके रूपमें आये। राजाने पूछा—‘आप कौन हैं और कैसे आये हैं?’ धर्मराज बोले—‘मैं साक्षात् धर्म हूँ, मैं ही ब्राह्मणका रूप धारण करके एक हजार रुपयेमें आपको दारिद्रॺ दे गया था। आपने सत्यके बलसे मुझ धर्मको जीत लिया। मैं आपको वर देनेके लिये आया हूँ, बतलाइये, मैं आपका कौन-सा अभीष्ट कार्य करूँ?’ राजाने कहा—‘आपकी कृपा है। मुझको कुछ भी नहीं चाहिये। आप जिस प्रकार सदा करते आये हैं, उसी प्रकार करते रहिये।’
इस दृष्टान्तसे यह सिद्ध हो गया कि जहाँ सत्य है, वहाँ सब कुछ है। वहाँ कभी सम्पत्ति, दान, यज्ञ, यशकी कमी भी हो जाय तो मनुष्यको घबराना नहीं चाहिये। यदि सत्य कायम रहेगा तो ये सभी आप ही लौट आयेंगे और ये न आयें तो भी कोई हानि नहीं, उसका परम कल्याण है। अत: कल्याणकामी पुरुषको सत्यका कभी त्याग नहीं करना चाहिये, बल्कि निष्कामभावसे उसका अवश्य दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिये।
यथार्थ भाषण, सद्गुण और सदाचारका नाम ही सत्य है। भगवान्ने गीतामें कहा है—
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते॥
यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥
(१७। २६-२७)
‘सत् —इस प्रकार यह परमात्माका नाम सत्यभाव (परमात्माके अस्तित्व)-में और श्रेष्ठभाव (सद्गुण) में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कर्म (सदाचार)-में भी सत् शब्दका प्रयोग किया जाता है तथा यज्ञ, तप और दानमें जो स्थिति (निष्ठा) है वह भी ‘सत्’ इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्माके लिये किया हुआ (भगवदर्थ) कर्म तो निश्चय ही ‘सत्’ ऐसे कहा जाता है।’
किसी कविकी यह उक्ति प्रसिद्ध है—
बंदा सत नहिं छाँड़िये सत छाँड़े पत जाय।
सतकी बाँधी लच्छमी फेरि मिलैगी आय॥