अनोखा अतिथि

सत्ययुगका पवित्र काल है। देशभरमें यज्ञोंका प्रचार हो रहा है। यज्ञधूमसे और उसके पवित्र सौरभसे आकाश भरा हुआ है। वेदके वरदमन्त्रोंसे दिशाएँ गूँजती हैं। यज्ञका हवि ग्रहण करनेके लिये स्वर्गके देवगण पृथ्वीपर उतरते हैं। पवित्र और आनन्दमयी वाद्यध्वनिसे समस्त जीव प्रफुल्लित हो रहे हैं। यज्ञकर्ता यज्ञकी पूर्णाहुति होनेपर परम श्रद्धासे ऋत्विक‍्गणको दक्षिणा बाँटते हैं। आकांक्षारहित होकर सात्त्विक यज्ञकर्ता वेदविधिका पूर्णतया पालन करते हुए समस्त कार्य सम्पादन करते हैं। ऐसे पवित्र युगमें ऋषि वाजश्रवाके सुपुत्र उद्दालक मुनिने विश्वजित् नामक एक यज्ञ किया। इस यज्ञमें सर्वस्व दान करना पड़ता है। तदनुसार वाजश्रवस (वाजश्रवाके पुत्र) उद्दालकने भी ‘सर्ववेदसं ददौ’ अपना सारा धन ऋषियोंको दे दिया। ऋषि उद्दालकके नचिकेता नामक एक पुत्र था। जिस समय ऋषि ऋत्विज् और सदस्योंको दक्षिणा बाँट रहे थे और उसमें अच्छी-बुरी सभी तरहकी गौएँ दी जा रही थीं, उस समय बालक नचिकेताके निर्मल अन्त:करणमें श्रद्धाने प्रवेश किया। नचिकेताने अपने मनमें सोचा—

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रिया:।

अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत्॥

(कठ० १। १। ३)

‘जो गौएँ (अन्तिम बार) जल पी चुकी हैं, घास खा चुकी हैं और दूध दुहा चुकी हैं; जो शक्तिहीन अर्थात् गर्भ धारण करनेमें असमर्थ हैं, ऐसी गायोंको जो दान करता है वह उन लोकोंको प्राप्त होता है जो आनन्दसे शून्य हैं।’

यज्ञके बाद गोदान अवश्य होना चाहिये, परंतु नहीं देनेयोग्य गौके दानसे दाताका उलटा अमंगल होता है। इस प्रकारकी भावनासे सरल-हृदय नचिकेताके मनमें बड़ी वेदना हुई और अपना बलिदान देकर पिताका अनिष्ट निवारण करनेके लिये उसने कहा—

‘तत् कस्मै मां दास्यसीति।’

‘हे पिताजी! मैं भी आपका धन हूँ, मुझे आप किसको देते हैं?’ पिताने कोई उत्तर नहीं दिया। नचिकेताने फिर कहा—‘पिताजी! मुझे किसको देते हैं?’ पिताने इस बार भी उपेक्षा की। धर्मभीरु नचिकेतासे नहीं रहा गया। उसने तीसरी बार फिर वही प्रश्न किया। ऋषि चिढ़ गये और खीझकर कह उठे—‘तुम्हें देता हूँ मृत्युको।’

‘मृत्यवे त्वा ददामीति’

‘पिताके क्रोधभरे वचन सुनकर नचिकेता सोचने लगा कि ‘शिष्य और पुत्रोंकी तीन श्रेणियाँ हुआ करती हैं—उत्तम, मध्यम और अधम। जो गुरुका अभिप्राय समझकर उसकी आज्ञाकी कोई प्रतीक्षा किये बिना ही सेवा करने लगते हैं, वे उत्तम हैं। जो आज्ञा पानेपर कार्य करते हैं, वे मध्यम हैं और जो गुरुका अभिप्राय समझ लेने और आज्ञा सुन लेनेपर भी गुरुके इच्छानुसार कार्य नहीं करते, वे अधम कहलाते हैं। मैं प्रथम श्रेणीमें चाहे न होऊँ, पर दूसरीमें तो अवश्य हूँ, मैं अधम तो कदापि नहीं हूँ। मुझ-सरीखे गुणसम्पन्न पुत्रको पिताजीने न मालूम क्यों यमको दे दिया? मृत्यु-देवताका मुझसे क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? सम्भवत: पिताजीने क्रोधके आवेशमें ही ऐसा कह दिया है; परंतु जो कुछ भी हो, पिताजीका वचन असत्य नहीं होना चाहिये। यों विचारकर उसने यमराजके यहाँ जानेका ही निश्चय कर लिया। धन्य पितृभक्ति और धन्य त्याग!

पुत्रकी अवस्था देख ऋषि एक ओर बैठ पछता रहे थे कि मैंने क्रोधमें पुत्रसे क्या कह दिया। इतनेहीमें नचिकेताने जाकर पितासे कहा—

अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे।

सस्यमिव मर्त्य: पच्यते सस्यमिवाजायते पुन:॥

(कठ० १। १। ६)

‘हे पिताजी! अपने पूर्वजोंका व्यवहार देखिये, इस समयके साधु पुरुषोंका व्यवहार देखिये। उनके चरित्रोंमें न कभी पहले असत्य था और न अब है। असाधु लोग ही असत्यका आचरण किया करते हैं। परंतु उस असत्यसे कोई अजर-अमर नहीं हो सकता। मनुष्य अनाजकी तरह जरा-जीर्ण होकर मर जाता है और अनाजकी तरह ही कर्मवश पुन: जन्मता है। अतएव इस अनित्य संसारमें मिथ्या आचरणसे क्या प्रयोजन है? आप अपने सत्यका पालन कर मुझे यमराजके पास जानेकी आज्ञा दीजिये।’

पिताको बड़ा दु:ख हुआ, परंतु पुत्रकी सत्यपरायणता देखकर ऋषिने आज्ञा दे दी। नचिकेताने पिताके वचनोंको निभानेके लिये यमसदनकी ओर प्रयाण किया।

यमराजका अतिथि

निर्भीकचित्त नचिकेताने पिताके आज्ञानुसार यमराजके घरपर आकर पता लगाया तो मालूम हुआ कि यमराज कहीं बाहर गये हुए हैं। नचिकेताको तीन रात्रितक अन्न-जल ग्रहण किये बिना यमराजकी प्रतीक्षा करनी पड़ी। तीसरे दिन यमराजके लौटनेपर घरके लोगोंने उनसे कहा—

वैश्वानर: प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान्।

तस्यैताॸशान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम्॥

(कठ० १। १। ७)

‘साक्षात् अग्नि ही ब्राह्मण-अतिथिके रूपमें घरमें प्रवेश करते हैं। साधु गृहस्थ उस अतिथिरूप अग्निके दाहकी शान्तिके लिये उसे जल (पादार्घ्य) दिया करते हैं। अतएव हे वैवस्वत! आप उस ब्राह्मण बालकके पैर धोनेके लिये जल ले जाइये। अतिथि तीन दिनोंसे आपकी बाट देखता हुआ अनशन लिये बैठा है, अतएव आप स्वयं उसकी सेवा करेंगे, तभी वह शान्त होगा।’

आशाप्रतीक्षे संगतॸसूनृतां च

इष्टापूर्ते पुत्रपशूॸश्च सर्वान्।

एतद् वृङ्‍‍क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो

यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे॥

(कठ० १। १। ८)

‘जिस अल्पबुद्धि पुरुषके घरपर अतिथि ब्राह्मण बिना भोजन किये रहता है, उस मन्दबुद्धिकी सारी आशा और प्रतीक्षाएँ—ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंके प्राप्त होनेकी इच्छाएँ उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाला फल, उसकी सम्पत्ति, पुत्र, पशु, सत्यभाषण, यज्ञ और सारे पूर्त (कुएँ, तालाब, धर्मशाला आदि बनानेका पुण्य) नष्ट हो जाते हैं।’ इस बातको सुनकर यमराज जलसे भरा हुआ स्वर्णकलश लेकर दौडे़ और अतिथि नचिकेताको पादार्घ्य देकर आदरपूर्वक कहने लगे—

तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे

अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्य:।

नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु

तस्मात्प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व॥

(कठ० १। १। ९)

‘हे ब्राह्मण! तुम नमस्कार करनेयोग्य अतिथि होकर मेरे घरपर तीन दिनसे बिना कुछ खाये पडे़ हो, तुमको नमस्कार है और इससे मेरे दोषकी निवृत्ति होकर मेरा कल्याण हो। मुझसे बड़ा अपराध हुआ है। अतएव तुम प्रत्येक रात्रिके लिये एक-एक वरके हिसाबसे कुल तीन वर मुझसे माँग लो।’

यमराजके द्वारपर तीन दिनतक अतिथि भूखा पड़ा रहे, कितना बड़ा अपराध; प्राचीन भारतमें अतिथिसेवा गृहस्थका सबसे आवश्यक कर्म माना जाता था। धर्मशास्त्रोंमें लिखा है कि अतिथिको साक्षात् नारायण मानकर उसकी सेवा करनी चाहिये। जो गृहस्थ अतिथिसेवासे शून्य है, उसके समस्त शुभ कर्मोंको वह भूखा अतिथि ले जाता है। भारतके वैदिक युगमें घरपर आये हुए अतिथि-नारायणकी बड़ी सेवा होती थी। यमराजका यह उदाहरण बड़े ही महत्त्वका है, जिस दिनसे भारतने इस परम सेवाव्रतके बन्धनको ढीला कर दिया, जबसे भारतके गृहस्थ केवल अपने स्त्री-पुत्रोंके भोग-विलासकी सामग्रियोंका प्रबन्ध करनेमें ही कर्तव्यकी इतिश्री मानने लगे, जबसे अतिथि-नारायणोंके लिये गृहस्थका द्वार बंद होने लगा, तभीसे भारतकी दुर्गति आरम्भ हो गयी। अस्तु, यमराजकी बातको सुनकर ‘सदा संतुष्ट’ नचिकेताने यह सोचकर कि पिताको सुख पहुँचाना ही पुत्रका सबसे प्रथम कर्तव्य है, यमराजसे यही पहला वर माँगा—

शान्तसंकल्प: सुमना यथा स्या-

द्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो।

त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत् प्रतीत

एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे॥

(कठ० १। १। १०)

‘हे मृत्यो! तीन वरोंमेंसे मैं प्रथम वर यही माँगता हूँ कि मेरे पिता मेरे प्रति शान्तसंकल्प, प्रसन्नचित्त और क्रोधरहित हो जायँ और जब मैं आपके यहाँसे लौटकर घर जाऊँ तो वे मुझे पहचानकर मुझसे प्रेमसे बातचीत करें।’

यमराजने ‘तथास्तु’ कहकर कहा कि मेरे द्वारा तुम्हारे वापस लौट जानेपर तुम्हारे पिता पहलेकी भाँति तुम्हें पहचान लेंगे, मृत्युके मुखसे छूटे हुए तुमको देखकर वे सुखसे सोयेंगे और उनका क्रोध शान्त हो जायगा।

पितृभक्त बालककी पहली कामना पूर्ण हुई। नचिकेताने इस प्रकार पिताका सुख सम्पादन कर फिर समस्त जीवोंके मंगलके लिये स्वर्गके साधन अग्नितत्त्वको जाननेके लिये यमराजसे कहा—‘हे मृत्यो! स्वर्गमें कुछ भी भय नहीं है; वहाँ न आप (मृत्यु) हैं; न किसीको बुढ़ापेका भय है, भूख-प्याससे पार होकर और शोकसे तरकर वहाँ पुरुष बड़ा आनन्द भोगता है। अतएव हे मृत्यो! आप उस स्वर्गके साधनभूत अग्निको यथार्थरूपसे जानते हैं। मुझ श्रद्धावान‍्को आप वह बतलाइये। कारण, उसको जानकर लोग स्वर्गमें रहकर अमृतत्व (देवत्व)-को प्राप्त होते हैं। यह मैं दूसरा वर माँगता हूँ।’

यमराजने बड़ी तपस्या करके अग्निविद्याको जाना था। वास्तविक अधिकारी बिना इस विद्याको देनेसे दाता और ग्रहीता दोनोंमेंसे किसीका कल्याण नहीं होगा। परंतु आज नचिकेताको उत्तम जिज्ञासु जानकर अग्नितत्त्वका महत्त्व बतलाते हुए यमराज बोले—

प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध

स्वर्ग्यमग्निं नचिकेत: प्रजानन्।

अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां

विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम्॥

(कठ० १। १। १४)

‘हे नचिकेता! मैं उस स्वर्गके साधनभूत अग्निको भलीभाँति जानता हूँ और तुमको बतलाता हूँ, तुम इसको अच्छी तरह सुनो। यह अग्नि अनन्त (स्वर्ग)-लोककी प्राप्तिका साधन है, विराट् रूपसे जगत‍्की प्रतिष्ठाका मूल कारण है, इसे तुम विद्वानोंकी बुद्धिरूप गुहामें स्थित जानो।’

इसके अनन्तर यमराजने नचिकेताको समस्त लोकोंके आदिकारण उस अग्निकी और उसके लिये जैसी और जितनी ईंटें चाहिये, वे जिस प्रकार रखी जानी चाहिये, सो सब बतलाया अर्थात् यज्ञस्थानके निर्माणके लिये आवश्यक सामग्रियों और अग्निचयन करनेकी विधिको बतलाया। तीक्ष्णबुद्धि नचिकेताने यमराजकी कही हुई सारी बातोंको दुहराकर अपनी प्रतिभाको सिद्ध कर दिया। यमराजको बालककी अप्रतिम योग्यता देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने पहले तीन वरोंके अतिरिक्त एक चौथा वर यह और दिया कि—

तवैव नाम्ना भवितायमग्नि:

सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण॥

(कठ० १। १। १६)

‘मैंने जिस अग्निकी बात तुमसे कही, वह तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी और तुम इस विचित्र रत्नोंवाली शब्दवती मालाको भी ग्रहण करो।’ नचिकेताका तेजोद्दीप्त मुखमण्डल प्रसन्नतासे भर गया! यमराज फिर बोले—जिसने यथार्थरूपसे माता-पिता और आचार्यके उपदेशानुसार तीन बार नाचिकेत अग्निकी उपासना कर यज्ञ, वेदाध्ययन और दान किया है, वह जन्म और मृत्युको तर जाता है और जब वह भाग्यवान् पुरुष उस अग्निको ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ ज्ञानसम्पन्न पूजनीय देव जानता है तब वह शान्तिको प्राप्त होता है। जो नाचिकेत अग्निके स्वरूप, संख्या और आहुति देनेकी प्रणालीको जानकर उसकी उपासना करता है, वह देहपातसे पहले ही मृत्युके पाशको तोड़कर और शोकरहित होकर स्वर्गमें आनन्दको प्राप्त होता है।

नाचिकेत अग्निको स्वर्गका साधन बतलाकर और उसकी कुछ और प्रशंसा करके यमराजने नचिकेतासे कहा—‘तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व’—‘हे नचिकेता! अब तीसरा वर माँगो।’

अधिकारि-परीक्षा

पिताकी प्रसन्नताका वर इस लोकके लिये और स्वर्गके साधन अग्निका ज्ञान परलोकके लिये वरकर नचिकेता सोचता है कि ‘क्या स्वर्ग-सुखमें ही जीवका परम कल्याण है? स्वर्गसे भी तो पुण्यात्माओंका पुण्य क्षय होनेपर वापस लौटना सुना जाता है, अतएव अब तीसरे वरसे उस मृत्युतत्त्व या आत्मतत्त्वको जानना चाहिये, जिसके जाननेपर और कुछ जानना बाकी नहीं रह जाता। यों सोचकर आत्मा परलोकमें जाता है या नहीं, मरनेके बाद आत्माकी क्या गति होती है?’—इस आत्मज्ञानके जटिल प्रश्नको समझनेके हेतुसे नचिकेताने यमराजसे कहा—‘मृत मनुष्यके विषयमें एक संशय है। कोई कहते हैं—शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिके अतिरिक्त देहान्तर-सम्बन्धी कोई अन्य आत्मा है। कोई कहते हैं—ऐसा कोई स्वतन्त्र आत्मा नहीं है। प्रत्यक्ष या अनुमानसे इस विषयका कोई निर्णय नहीं हो सकता। आप मृत्युके अधिपति देवता हैं, अतएव मैं यह आत्मतत्त्व आपसे जानना चाहता हूँ। यही तीसरा वर मैं माँगता हूँ।’ नचिकेताका महत्त्वपूर्ण प्रश्न सुनकर यमराजने सोचा—‘ऋषिकुमार बालक होनेपर भी है बड़ा ही बुद्धिमान्, कैसे गोपनीय तत्त्वको जानना चाहता है। परंतु आत्मतत्त्व उपयुक्त पात्रको ही बतलाना उचित है, अनधिकारीके समीप आत्मतत्त्व प्रकट करनेसे हितके स्थानमें प्राय: अनिष्ट ही हुआ करता है। इसलिये पहले पात्र-परीक्षाकी आवश्यकता है।’ यों विचारकर यमराजने इस तत्त्वकी कठिनताका बखान करके नचिकेताको टालना चाहा। यमराजने कहा—‘देवताओंको भी पहले इस विषयमें संदेह हुआ था। इस आत्मतत्त्वका समझना कोई आसान बात नहीं, यह बड़ा ही सूक्ष्म विषय है, अतएव हे नचिकेता! तुम दूसरा वर माँगो, इस वरके लिये मुझे मत रोको।’

नचिकेता विषयकी कठिनताका नाम सुनकर घबराया नहीं, परंतु और भी अधिक दृढ़तासे कहने लगा—‘हे मृत्यो! पूर्वकालमें देवताओंको भी जब इस विषयमें संदेह हुआ था और जब आप भी कहते हैं कि यह विषय आसान नहीं है, तब मुझे इस विषयका समझानेवाला आपके समान दूसरा वक्ता ढूँढ़नेपर भी कोई नहीं मिल सकता। आप किसी दूसरे वरके लिये कहते हैं; परंतु मैं समझता हूँ कि इसकी तुलनाका कोई वर नहीं है; क्योंकि यही कल्याणकी प्राप्तिका हेतु है। अतएव मुझे यही समझाइये।’

किसी विषयको जब नहीं बतलाना होता है तो सबसे पहले उसकी कठिनताका भय दिखलाया जाता है। यमराजने भी परीक्षाके लिये यही किया; परंतु नचिकेता इस परीक्षामें उत्तीर्ण हो गया। अबकी बार यमराजने और भी कठिन परीक्षा लेनी चाही। साधककी परीक्षाके लिये दो ही प्रधान शस्त्र होते हैं—एक ‘भय’ और दूसरा ‘लोभ’। नचिकेता भयसे नहीं डिगा, इसलिये अब यमराजने दूसरे शस्त्र लोभका प्रयोग उसपर किया। यमराजने कहा—

‘बालक! तुम क्या करोगे ऐसे वरको लेकर? तुम ग्रहण करो इन सुखकी विशाल सामग्रियोंको’—

शतायुष: पुत्रपौत्रान् वृणीष्व

बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान्।

भूमेर्महदायतनं वृणीष्व

स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि॥

(कठ० १। १। २३)

‘सौ-सौ वर्ष जीनेवाले पुत्र-पौत्र माँगो, गौ आदि बहुत-से पशु, हाथी, सुवर्ण, घोडे़ और विशाल भूमण्डलका राज्य माँगो और इन सबको भोगनेके लिये जितने वर्ष जीनेकी इच्छा हो उतने वर्ष जीते रहो।’ इतना ही नहीं—

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं

वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च।

महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि

कामानां त्वा कामभाजं करोमि॥

(कठ० १। १। २४)

‘इसीके समान और कोई वर चाहो तो उसे और प्रचुर धनके साथ दीर्घजीवन माँग लो, अधिक क्या इस विशाल भूमिके तुम सम्राट् बन जाओ! मैं तुम्हें अपनी सारी कामनाओंका इच्छानुसार भोगनेवाला बनाये देता हूँ।’ इसके सिवा—

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके

सर्वान्कामाॸश्छन्दत: प्रार्थयस्व।

इमा रामा: सरथा: सतूर्या

न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यै:।

आभिर्मत्प्रत्ताभि: परिचारयस्व

नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षी:॥

(कठ० १। १। २५)

‘जो-जो भोग मृत्युलोकमें दुर्लभ हैं, उन सबको तुम अपने इच्छानुसार माँग लो। ये रथोंसमेत और वाद्योंसमेत जो सुन्दर रमणियाँ हैं, ऐसी रमणियाँ मनुष्योंको नहीं मिल सकतीं। मेरे द्वारा दी हुई इन सारी रमणियोंसे तुम अपनी सेवा कराओ; परंतु हे नचिकेता! मुझसे मरण-सम्बन्धी (मृत्युके बाद आत्मा रहता है या नहीं।) यह प्रश्न मत पूछो।’

संसारमें ऐसा कौन है जो बिना चाहे इतनी भोगसामग्रियों और उनके भोगनेके लिये दीर्घ जीवनव्यापी सामर्थ्य प्राप्त होनेपर भी उन्हें नहीं चाहे, सुनते ही लार टपकने लगती है; परंतु विचार और वैराग्यकी उच्च भूमिकापर पहुँचा हुआ नचिकेता अटल और अचल है। यमराजके प्रलोभनोंका उसके मनपर कोई असर नहीं हुआ। सत्य है—

रमा बिलासु राम अनुरागी।

तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥

‘जो बड़भागी रामके प्रेमीजन हैं, वे रमाके विलास (भोगों)-को वमनके समान त्याग देते हैं’ जिसने एक बार विश्वविमोहन मनोहर झाँकीकी अनोखी छटा देख ली, वह फिर विषयोंकी ओर भूलकर भी नहीं झाँकता। नचिकेताने कहा—‘हे मृत्यो! आपने जिन भोग-वस्तुओंका वर्णन किया वे कलतक रहेंगी या नहीं, इसमें भी सन्देह है। ये मनुष्यकी सारी इन्द्रियोंके तेजको हरण कर लेती हैं! आपने जो दीर्घजीवन देना चाहा है वह भी अनन्तकालकी तुलनामें बहुत थोड़ा ही है। जब ब्रह्माका जीवन भी अल्पकालका है तब औरोंकी तो बात ही क्या है? अतएव मैं यह सब नहीं चाहता। आपके रथ, घोडे़, हाथी और नाच-गान आपके ही पास रहें।

धनसे मनुष्य कभी तृप्त नहीं होता, जहाँ केवल कामनाका ही विस्तार है, वहाँ तृप्ति कैसी? भोग-विलासकी तृष्णामें अभाव और अपूर्णतामें अतृप्ति और ‘आकांक्षा’ के सिवा और क्या रह सकता है? अतएव ‘वरस्तु मे वरणीय: स एव’—मुझे तो वही आत्मतत्त्वरूप वर चाहिये। भला, अजर और अमर देवताओंके समीप आकर नीचेके मृत्युलोकका जरा-मरणशील कौन ऐसा मनुष्य होगा जो अस्थिर और परिणाममें दु:ख देनेवाले विषयोंको चाहेगा? शरीरके सौन्दर्य और विषयभोगके प्रमादोंको अनित्य और क्षणभंगुर समझकर भी कौन ऐसा समझदार होगा जो संसारके दीर्घजीवनसे आनन्द मानेगा? अतएव हे मृत्यो! जिसके विषयमें लोग संशय करते हैं, जो महान् परलोकके विषयमें निर्णयात्मक आत्मतत्त्वविज्ञान है, मुझे वही दीजिये।

योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो

नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते।

(कठ० १। १। २९)

‘यह आत्मतत्त्वसम्बन्धी वर गूढ़ होनेपर भी नचिकेता इसके सिवा दूसरा (अज्ञानी पुरुषोंद्वारा इच्छित) अनित्य वर नहीं चाहता।’

इस अग्निपरीक्षामें भी नचिकेता उत्तीर्ण हो गया। यमराजने अब नचिकेताको आत्मज्ञानका पूर्ण अधिकारी समझा। वास्तवमें जो इस मायामय जगत‍्के सारे सुखोंके मनोहर चित्र, धनके प्रलोभन, रमणियोंके रमणीय प्रणय-बन्धन और कमनीय कीर्तिकी कामना आदि सभी पदार्थोंको आत्मज्ञानकी तुलनामें काकविष्ठावत् या जहरके लड्डुओंके समान अत्यन्त हेय और त्याज्य समझता है, जो इस लोक और परलोकके बडे़-से-बडे़ भोगोंको तुच्छ समझकर सबको लात मार सकता है, वही आत्मज्ञानका यथार्थ अधिकारी है। परंतु जो कौड़ी-कौड़ीके लिये जन्म-जन्मान्तरतक वैरभावको आश्रय देनेके लिये तैयार रहते हैं और काम पड़नेपर आत्मज्ञानके सिवा दूसरी बात नहीं करते, वैसे लोग किस अधिकारके प्राणी हैं, इस बातको विज्ञ पाठक स्वयं सोच लें। विषय-वैराग्य, साधु-संगति और भजन-साधनके प्रभावसे पहले आत्मज्ञानका अधिकार प्राप्त कर तदनन्तर उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये, नहीं तो उभयभ्रष्ट होनेकी ही अधिक सम्भावना है।

श्रेय और प्रेय

यमराजने नचिकेताको परम वैराग्यवान्, निर्भीक और उत्तम अधिकारी समझकर परम प्रसन्न होकर कहा कि ‘हे नचिकेता! एक वस्तु श्रेय (कल्याण) है और दूसरी वस्तु प्रेय है (श्रेय मनुष्यके वास्तविक कल्याण-मोक्षका नाम है और प्रेय स्त्री-पुत्र, धन-मानादि प्रिय लगनेवाले पदार्थोंका नाम है)। इन दोनोंका भिन्न-भिन्न प्रयोजन है और ये अपने-अपने प्रयोजनमें मनुष्यको बाँधते हैं। इन दोनोंमेंसे जो श्रेयको ग्रहण करता है उसका कल्याण (मोक्ष) होता है और जो प्रेयको चुनता है वह आपातरमणीय धन-मानादिमें फँसकर पुरुषार्थसे भ्रष्ट हो जाता है।

‘श्रेय और प्रेय दोनोंमेंसे मनुष्य चाहे जिसको ग्रहण कर सकता है। बुद्धिमान् पुरुष श्रेय और प्रेय दोनोंके गुण-दोषोंको भलीभाँति समझकर उनका भेद करता है और नीर-क्षीरविवेकी हंसकी तरह प्रेयको त्यागकर श्रेयको ग्रहण करता है। परंतु मूर्ख लोग ‘प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते’—योगक्षेमके लिये यानी प्राप्त स्त्री, पुत्र, धनादिकी रक्षा और अप्राप्त भोग्य पदार्थोंकी प्राप्तिके लिये प्रेयको ही ग्रहण करते हैं।’ हे नचिकेता!—

स त्वं प्रियान् प्रियरूपाॸश्च कामा-

नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षी: ।

नैताॸसृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो

यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्या:॥

(कठ० १। २। ३)

‘तुमने मेरे द्वारा बार-बार प्रलोभन दिखलाये जानेपर भी जो प्रिय स्त्री-पुत्रादि और प्रियरूप अप्सरादि समस्त भोग्य विषयोंको अनित्य समझकर त्याग दिया, इस द्रव्यमयी निकृष्ट गतिको तुम नहीं प्राप्त हुए, जिसमें कि साधारणत: बहुत-से मनुष्य डूबे रहते हैं।’

इस भाषणसे यमराजने नचिकेताके विवेक और वैराग्यकी विशेष प्रशंसा कर वित्तमयी संसारगतिकी निन्दा की और साथ ही विवेक-वैराग्यसम्पन्न मनुष्य ही ब्रह्मज्ञानका अधिकारी है, यह भी सूचित किया। इसके अनन्तर श्रेय और प्रेयके परस्पर विपरीत फल उत्पन्न करनेके कारणकी मीमांसा करते हुए यमराज कहने लगे—

दूरमेते विपरीते विषूची

अविद्या या च विद्येति ज्ञाता।

विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये

न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त॥

(कठ० १। २। ४)

‘विद्या और अविद्या—ये दोनों प्रसिद्ध हैं, ये दोनों एक-दूसरेसे अत्यन्त विपरीत और भिन्न-भिन्न तरफ ले जानेवाली हैं। हे नचिकेता! मैं तुम्हें विद्याका अभिलाषी मानता हूँ; क्योंकि तुम्हें बहुत-से भोग भी नहीं लुभा सके।’

अविद्यायामन्तरे वर्तमाना:

स्वयं धीरा: पण्डितम्मन्यमाना:।

दन्द्रम्यमाणा: परियन्ति मूढा

अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा:॥

(कठ० १। २। ५)

‘अविद्यामें पडे़ हुए भी जो लोग अपनेको बडे़ बुद्धिमान् और पण्डित मानते हैं, वे भोगकी इच्छावाले मूढ़जन अंधेसे चलाये हुए अंधोंकी तरह चारों ओर ठोकरें खाते भटकते फिरते हैं।’

वास्तवमें आजकल जगत‍्में ऐसे अनेक मनुष्य हैं, जो बिना समझे-बूझे ही अपनेको तत्त्वज्ञानी माने हुए हैं। यदि उनके अन्त:करणका दृश्य देखा जाय तो उसमें नाना प्रकारकी कामनाओंका ताण्डवनृत्य होता हुआ दिखायी पड़ता है। परंतु बातों और तर्कोंमें कहींपर ब्रह्मज्ञानमें जरा-सी भी त्रुटि नहीं दीखती। यमराजके कथनानुसार इस प्रकारके मिथ्या ज्ञानियोंके लिये मोक्षका द्वार बंद रहता है और उन्हें पुन:-पुन: आवागमनके चक्रमें ही ठोकरें खानी पड़ती हैं ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्’ ऐसा क्यों होता है? यमराज कहते हैं—

न साम्पराय: प्रतिभाति बालं

प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्।

‘धनके मोहसे मोहित, प्रमादमें रत रहनेवाले मूर्खको परलोक या कल्याणका मार्ग दीखता ही नहीं।’ वह तो केवल—

अयं लोको नास्ति पर इति मानी

पुन: पुनर्वशमापद्यते मे॥

(कठ० १। २। ६)

‘यही मानता है कि स्त्री-पुत्रादि भोगोंसे भरा हुआ एकमात्र यही लोक है; इसके सिवा परलोक कोई नहीं है। इसी मान्यताके कारण उसे बार-बार मेरे (मृत्युके) अधीन होना पड़ता है।’

यमराज फिर बोले कि ‘हे नचिकेता! आत्मज्ञान कोई साधारण-सी बात नहीं है। अनेक लोग तो ऐसे हैं जिनको आत्माके सम्बन्धकी बातें सुननेको ही नहीं मिलतीं। बहुत-से लोग सुनकर भी इसे जान नहीं सकते, आत्माका वक्ता भी आश्चर्यरूप कहीं ही कोई मिलता है और इस आत्माको प्राप्त करनेवाला ही कहीं कोई एक निपुण पुरुष ही होता है, इसी प्रकार किसी निपुण आचार्यसे शिक्षा-प्राप्त कोई बिरला ही आश्चर्यरूप पुरुष आत्माको जाननेवाला होता है।’*

किसी साधारण मनुष्यके विवेचनसे आत्माका यथार्थ ज्ञान नहीं होता, आत्मज्ञान तभी होता है जब उसका उपदेश किसी अनन्य (अभेददर्शी) समर्थ पुरुषके द्वारा किया जाता है; क्योंकि यह (आत्मा) सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म होनेके कारण सर्वथा अतर्क्य है। यह ज्ञान तर्कसे प्राप्त नहीं होता, यह तो किसी अलौकिक ब्रह्मज्ञानीके द्वारा बतलाया जानेपर ही प्राप्त होता है। हे नचिकेता! तुमने ऐसा पुरुष पाया है; वास्तवमें तुम सत्य-धारणासे सम्पन्न हो। तुम-जैसा जिज्ञासु मुझे मिलता रहे।’

यों कहकर यमराजने सोचा कि यदि नचिकेताके मनमें कर्मकाण्डके फलोंकी अनित्यताके सम्बन्धमें कुछ भी संदेह रह गया तो उसका परिणाम शुभ नहीं होगा। अतएव यमराजने कहा—

‘हे नचिकेता! मैं जानता हूँ कि धनराशि अनित्य है और अनित्य वस्तुओंसे नित्य वस्तुकी प्राप्ति नहीं होती। यों जानते हुए भी मैंने अनित्य पदार्थोंसे स्वर्गसुखके साधनभूत नाचिकेत अग्निका चयन किया है। इसीसे मैंने यह आपेक्षिक अर्थात् अन्यान्य पदोंकी अपेक्षा नित्य (अधिक कालस्थायी) यमराजका पद पाया है।’

परंतु हे वत्स! तुम तो सब प्रकार श्रेष्ठ हो, तुमने उस परम पदार्थके सम्मुख जगत‍्की चरम सीमाके भोग, प्रतिष्ठा, यज्ञ-फलरूपी हिरण्यगर्भका पद, अभयकी मर्यादा (चिरकालस्थायी जीवन), स्तुत्य और महान् ऐश्वर्यको हेय समझकर धैर्यके द्वारा त्याग दिया है। यथार्थमें तुम बडे़ गुणसम्पन्न हो।

यद्यपि यह आत्मा—यह नित्य प्रकाशरूप आत्मा जीवरूपसे हृदयमें विराजमान है तथापि सहजमें इसके दर्शन नहीं होते; क्योंकि यह अत्यन्त ही सूक्ष्म है, यह अत्यन्त गूढ़ है, समस्त जीवोंके अन्तरमें प्रविष्ट है, बुद्धिरूपी गुफामें छिपा हुआ है, राग-द्वेषादि अनर्थमय देहमें स्थित है और सबसे पुराना है। जब कोई धीर पुरुष इस देवताको आत्मयोगके द्वारा अर्थात् चित्तको विषयोंसे निवृत्तकर उसे आत्मामें समाहित करता है, तब इसे जानकर वह हर्ष और शोकसे तर जाता है। कारण, आत्मामें हर्ष और शोकको कहीं भी स्थान नहीं, ये तो वास्तवमें केवल बुद्धिके विकारमात्र हैं। जिसने ब्रह्मनिष्ठ आचार्यके द्वारा आत्मतत्त्वको सुनकर उसे सम्यक् रूपसे धारण कर लिया है और धर्मयुक्त इस सूक्ष्म आत्माको जड शरीरादिसे पृथक् समझकर प्राप्त कर लिया है, वही आनन्दधामको पाकर अतुल आनन्दमें रम जाता है। मैं समझता हूँ कि नचिकेताके लिये भी वह मोक्षका द्वार खुला हुआ है।

विवृत्तॸसद्म नचिकेतसं मन्ये’

यमराजके वचनोंसे अपनेको आत्मज्ञानका अधिकारी समझकर नचिकेताने कहा—

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्।

अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद॥

(कठ० १। २। १४)

‘हे भगवन् ! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो धर्म और अधर्मसे अतीत तथा इस कार्य और कारणरूप प्रपंचसे पृथक् एवं भूत तथा भविष्यत् से भिन्न जिस सर्वप्रकारके व्यावहारिक विषयोंसे अतीत परब्रह्मको आप देखते हैं उसे मुझे बतलाइये।’

साधन और स्वरूप

नचिकेताके प्रश्नको सुनकर यमराजने आत्माका स्वरूप बतलानेसे पूर्व उसके साक्षात् साधन प्रणवका उपदेश आरम्भ किया। यमराज बोले—

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति

तपाॸसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति

तत्ते पदॸसंग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥*

(कठ० १। २। १५)

‘समस्त वेद जिसका प्रतिपादन करते हैं, समस्त तप जिसे बतलाते हैं अर्थात् जिसके लिये किये जाते हैं, जिसको प्राप्त करनेके लिये साधकगण ब्रह्मचर्यका अनुष्ठान किया करते हैं, वह पद मैं संक्षेपमें बतलाता हूँ। वह है ‘ॐ’।

वह परात्पर परमात्मा जो सब नामोंसे परे होनेपर भी सब नामोंसे भरा हुआ है, जो सर्वथा नामविहीन होते हुए भी अनेक नामोंसे सम्बोधित किया जाता है, उसके समस्त नामोंमें ‘ॐ’ सर्वश्रेष्ठ है। ‘ॐ’ शब्द ब्रह्मका प्रतीक है। यह अक्षर ही ब्रह्म है और इसी अक्षरको ब्रह्मस्वरूप समझकर इसकी उपासना करनेसे साधक जो चाहता है सो पाता है।

‘यो यदिच्छति तस्य तत्।’

यह ओंकार ही ब्रह्मकी प्राप्तिका सबसे उत्तम और श्रेष्ठ अवलम्बन है और इसी अवलम्बनको जान लेनेसे ब्रह्मलोकमें महिमा होती है।

इस प्रकार प्रणवोपासनारूपी साधन बतलाकर अब यमराज आत्माका स्वरूप बतलाते हुए कहते हैं—

न जायते म्रियते वा विपश्चि-

न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।

अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥*

(कठ० १। २। १८)

‘यह चैतन्यस्वरूप आत्मा न जन्मता है, न मरता है, न यह किसी दूसरेसे उत्पन्न हुआ है, न कोई दूसरा ही इससे उत्पन्न हुआ है। यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत है और सनातन है, शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मरता।’ मरना और मारना सब शरीरमें है, आत्मा न कभी मरता है, न कोई उसे मार सकता है। शस्त्रादिसे देह कट जानेपर भी देहमें स्थित यह आत्मा ज्यों-का-त्यों बना रहता है। जिस प्रकार मकानके नष्ट होनेसे उसमें स्थित आकाश नष्ट नहीं होता, इसी प्रकार देहादिके नाशसे आत्माका नाश नहीं होता। इसीलिये यमराज कहते हैं—

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुॸहतश्चेन्मन्यते हतम्।

उभौ तौ न विजानीतो नायॸहन्ति न हन्यते॥*

(कठ० १। २। १९)

‘अज्ञानी मारनेवाला समझता है कि ‘मैं इसे मारता हूँ’ और मरनेवाला समझता है ‘मैं मरा हूँ’ परंतु वे दोनों ही नहीं समझते हैं; क्योंकि यह आत्मा न तो किसीको मारता है और न कोई मरता ही है।’ यह आत्मा—

अणोरणीयान् महतो महीया-

नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।

(कठ० १। २। २०)

जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर और जो महान‍्से भी महत्तर है, जो जीवकी हृदय-गुफामें छिपा हुआ है—इसे वही देख पाता है जो कामनाओंसे रहित है, जो कर्मोंकी सिद्धि और असिद्धिमें समचित्त है, जो सुत-वित्त-दाराकी उत्पत्ति या विनाशमें हर्ष और शोकको नहीं प्राप्त होता, जो प्रत्येक अवस्थामें परमात्माकी एक अनन्त सत्ताको उपलब्ध करता हुआ शान्त और स्थिर रहता है। परंतु जो इस प्रकारका नहीं है, उसे आत्माके दर्शन नहीं होते; क्योंकि यह आत्मा निश्चल होनेपर भी दूरतक पहुँच जाता है, सोया हुआ ही सर्वत्र चला जाता है, विद्या और धनादि मदयुक्त होते हुए भी मदरहित है। इसे मेरे अतिरिक्त अन्य कौन जान सकता है।

अशरीरॸ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥

(कठ० १। २। २२)

यह समस्त अनित्य शरीरोंमें रहते हुए भी शरीररहित है, समस्त अस्थिर पदार्थोंमें व्याप्त होते हुए भी सदा स्थिर है, इस नित्य और महान् विभु आत्माको जो धीर पुरुष जान लेता है, वही शोकसे तर जाता है।

यह एक ही आत्मा सब ओरसे और सबमें व्यापक होनेपर भी—

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो

न मेधया न बहुना श्रुतेन।*

‘न तो यह वेदके प्रवचनसे प्राप्त होता है, न विशाल बुद्धिसे मिलता है और न केवल जन्मभर शास्त्रोंके श्रवण करनेसे ही मिलता है।’ यह मिलता है उसीको जो इसको पानेके लिये परम व्याकुल हो जाता है और मिलता है उसको—

यमेवैष वृणुते तेन लभ्य-

स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूॸस्वाम्॥

(कठ० १। २। ३२)

—जिसको यह स्वप्रकाश आत्मा स्वयं स्वीकार कर लेता है और जिसके निकट अपना यथार्थ स्वरूप प्रकट कर देता है।

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥

जबतक परमात्माको पानेके लिये हृदयमें व्याकुलता और अधीरता नहीं उत्पन्न होती, जबतक साधक निष्काम साधनसे सम्पन्न नहीं हो जाता, जबतक परमात्माके नित्य स्वरूपके साथ उसके मनका सर्वथा संयोग नहीं हो जाता, तबतक सारी बातें और सारी क्रियाएँ शुष्क और व्यर्थ हैं। ऐसे पुरुषका ज्ञान केवल मौखिक और लोकरंजकमात्र होता है। उससे कोई लाभ नहीं होता। जो पापोंमें रत है, जो दम, शम तथा चित्तवृत्तियोंके निरोधरूप समाधिसे रहित है, जिसका मन अशान्त है, उसको केवल पाण्डित्यकी प्रचुरता और तर्कोंकी तीक्ष्णतासे ही आत्मसाक्षात्कार नहीं हो सकता। जो शम-दमादि गुणोंसे युक्त है, जो शुद्ध, संयत और समाहितचित्त है, जो इन्द्रिय-लालसाओंसे विरत है और जिसने श्रवण, मनन तथा निदिध्यासनद्वारा अभेदरूप प्रज्ञान प्राप्त कर लिया है, वही उस प्रज्ञानके द्वारा इस आत्माको प्राप्त होता है—

‘प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्।’

जो साधनसम्पन्न नहीं हैं, उनको आत्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इसी बातको बतलानेके लिये यमराजने फिर कहा है कि ‘हे नचिकेता! देखो, दूसरोंकी तो बात ही क्या है, जो ब्राह्मण और क्षत्रिय समस्त धर्मोंके रक्षक और प्राणस्वरूप हैं; जो इतने श्रेष्ठ हैं, वे भी उस परमात्माके ‘अन्न’ बन जाते हैं। सबका संहार करनेवाला मृत्यु भी जिस परमात्माके भोजनका उपसेचन अर्थात् साग-पात बन जाता है, ऐसे उस महामहिमान्वित परमात्माको संसारके भोगोंमें आसक्त और साधनरहित मनुष्य कैसे जान सकता है कि वह ‘इस प्रकार’ है।

आत्मा और परमात्माका निर्णय करके यमराजने शिष्योंको कर्मसे अग्निविद्या और ज्ञानसे ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति बतलानेके लिये कहा, जो यजमानको दु:ख-सागरसे पार करनेके लिये पुलके समान हैं, वही नाचिकेत अग्नि है—और जो संसार-सागरसे पार होना चाहनेवालोंके लिये परम आश्रयस्वरूप है वही अक्षर परब्रह्म है। कर्मके द्वारा अपरब्रह्मको और ज्ञानके द्वारा परब्रह्मको जानना चाहिये। जीवकी मुक्तिके लिये जितने पथ हैं, उन सबमें ज्ञान ही प्रधान है। तदनन्तर यमराजने आत्माका रथीरूपसे वर्णन करते हुए कहा—

आत्मानॸ रथिनं विद्धि शरीरॸ रथमेव तु।

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च॥

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाॸस्तेषु गोचरान्।

आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिण:॥

(कठ० १। ३। ३-४)

‘शरीर रथ है, आत्मा रथका स्वामी रथी है, बुद्धि सारथि है और मन लगाम है, ऐसा समझो। श्रोत्रादि इन्द्रियाँ घोड़े हैं, शब्द-स्पर्शादि विषय ही इनके दौड़नेका मैदान है और शरीर, इन्द्रिय तथा मनसे युक्त आत्माको भोक्ता कहते हैं।

घोड़ोंसे ही रथ चलता है, परंतु उस रथको चाहे जिस तरफ ले जाना हाथमें लगाम पकड़े हुए बुद्धिमान् सारथिका काम है। इन्द्रियरूपी बलवान् और प्रमथनकारी घोड़े विषयरूपी मैदानमें मनमाना दौड़ना चाहते हैं, परंतु यदि बुद्धिरूपी सारथि मनरूपी लगामको जोरसे खींचकर उन्हें अपने वशमें रखता है तो घोड़ोंकी ताकत नहीं कि वे मनरूपी लगामके सहारे बिना ही चाहे जिस तरफ दौड़ने लगें। यह सबको विदित है—इन्द्रियाँ वास्तवमें विषयका ग्रहण तभी कर सकती हैं जब मन उनके साथ हो। घोड़े उसी ओर दौड़ते हैं जिस ओर लगामका सहारा होता है, परंतु इस लगामको ठीक रखना सारथिके बल, बुद्धि और मार्गके ज्ञानपर निर्भर करता है। यदि बुद्धिरूप सारथि विवेकपूर्ण स्वामीका आज्ञाकारी, लक्ष्यपर सदा स्थिर, बलवान् और इन्द्रियरूपी अश्वोंकी संचालन-क्रियामें निपुण नहीं होता तो इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़े उनके वशमें न रहकर लगामको अपने वशमें कर लेते हैं और परिणाममें वे रथको रथी और सारथिसमेत चाहे जैसे बुरे स्थानमें ले जाकर पटक देते हैं। परंतु—

यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा।

तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथे:॥

(कठ० १। ३। ६)

‘जिसकी बुद्धिमें विवेक होता है, जिसका मन एकाग्र और समाहित होता है, उसकी इन्द्रियाँ अच्छे घोड़ोंकी तरह बुद्धिरूप सारथिके वश रहती हैं।’

जिसका मन निग्रहरहित है, जो अविवेकी है और जो सदा अपवित्र है, ऐसे रथको कभी अपने लक्ष्य परमपद ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं होती। उसे बारंबार कष्टमय जन्म-मरणरूप संसारमें ही भटकना पड़ता है। परंतु—

यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्क: सदा शुचि:।

स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते॥

(कठ० १। ३। ८)

‘जो विवेकी है, जिसका मन निगृहीत है, जो सदा पवित्र रहता है, वह ऐसे परमपदको पाता है जहाँसे लौटकर फिर जन्म ग्रहण नहीं करना पड़ता।’ जिसका बुद्धिरूप सारथि विवेकी है, जिसकी मनरूप लगाम स्थिर है, जिसके इन्द्रियरूपी घोड़े लगामके साथ-ही-साथ विवेकमयी बुद्धिके वशमें हैं, वह इसी रथकी सहायतासे संसार-सागरके उस पार अपने लक्ष्यस्थानपर अनायास ही जा पहुँचता है और वही—

तद्विष्णो: परमं पदम्।

—विष्णुका परमपद है।

यमराजने फिर कहा कि ‘इन्द्रियोंसे उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धिसे महत् श्रेष्ठ है, महत् से अव्यक्त श्रेष्ठ है और अव्यक्तसे पुरुष श्रेष्ठ है।’ बस, इस पुरुषसे परे और कोई नहीं है—

सा काष्ठा सा परा गति:।

यही चरम सीमा है, यही परम गति है, परंतु यह केवल—

दृश्यते त्वग्रॺया बुद्धॺा सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:॥

सूक्ष्मदर्शियोंके द्वारा सूक्ष्म वस्तुके निरूपणमें निपुण एकाग्रतायुक्त बुद्धिसे ही देखा जा सकता है। अतएव ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ उठो! जागो! और महापुरुषोंके पास जाकर इसे जानो।

बुद्धिमान् लोग इस मार्गको तलवारकी धारपर चलनेके समान बतलाते हैं—

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥

इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं, इसीसे वे केवल बाहरकी वस्तुओंको देखती हैं, अन्तरात्माको नहीं देखतीं। कोई विवेकसम्पन्न पुरुष ही अमृतत्वकी शुभ इच्छासे इन इन्द्रियोंको अन्तर्मुखी करके अन्तरात्माको देख पाता है। अज्ञानी लोग बाह्य विषयोंकी ओर ही दौड़ते हैं और इसीसे वे सर्वत्र व्याप्त मृत्युके फंदेमें फँस जाते हैं, परंतु ज्ञानी पुरुष उस अमृतत्वको जानकर इन अनित्य पदार्थोंसे नित्य वस्तुकी प्रार्थना नहीं करते।

जो यहाँ (कार्यमें) है वही वहाँ (कारणमें) है। परंतु जो उपाधिके सम्बन्धसे और भेदज्ञानके कारण अविद्याके प्रभावसे उस अभिन्नस्वरूप ब्रह्मको नाना रूपोंमें देखता है—

मृत्यो: स मृत्युमाप्नोति।

—वह बार-बार मृत्युको (जन्म-मरणको) ही प्राप्त होता है। इस ज्ञानकी प्राप्ति केवल विचारसे ही हो सकती है। यहाँ किंचित् भी भेद नहीं है। जिसको यहाँ भेद दीखता है उसीको बार-बार मृत्युकी शरण लेनी पड़ती है। जैसे शुद्ध जलमें शुद्ध जल मिलानेपर दोनों मिलकर एकरस तन्मय हो जाते हैं, इसी प्रकार आत्मदर्शी पुरुषका आत्मा परमात्मासे मिलकर ब्रह्मरूप बन जाता है।

यमराजने आगे चलकर फिर कहा—‘हे नचिकेता! मैं प्रसन्न होकर तुम्हें यह अत्यन्त गोपनीय सनातन ब्रह्मतत्त्व बतला रहा हूँ। मृत्युके बाद जीवका क्या होता है सो तुम सुनो। जिसके जैसे कर्म और जैसी वासना होती है, जिसका जैसा ज्ञान होता है, उसीके अनुसार कोई तो मृत्युके बाद माताके गर्भमें जाता है, और कोई मृत्युके पश्चात् वृक्ष, पाषाणादि स्थावर योनिको प्राप्त होता है। जब समस्त प्राणी निद्राग्रस्त रहते हैं तब जो एक निर्गुण ज्योतिर्मय ब्रह्म सुप्रकाशितरूपसे जाग्रत् रहकर समस्त विषयोंको प्रकाशित करता है, वही शुद्ध है, वही ब्रह्म है, उसीका नाम अमृत है, उसके सिवा और कोई छिपा हुआ ब्रह्म नहीं है। पृथ्वी आदि सभी लोक उसीमें अवस्थित हैं, उसका अतिक्रमण कोई भी नहीं कर सकता।’

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो

रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा

रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो

रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा

रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥

(कठ० २। २। ९-१०)

अग्नि एक ही है, परंतु जैसे सम्पूर्ण भुवनमें प्रवेश करनेपर वही भिन्न-भिन्न वस्तुओंमें भिन्न-भिन्नरूपमें दीखता है, इसी प्रकार समस्त प्राणियोंमें रहनेवाला आत्मा एक ही है, परंतु सबमें भिन्न-भिन्नरूपमें दीखता है। आकाशकी तरह निर्विकार होनेके कारण बाहर भी वही रहता है। जैसे एक ही वायु लोकमें प्रवेशकर भिन्न-भिन्नरूपसे दीखता है, इसी प्रकार सब प्राणियोंमें व्यापक एक ही आत्मा भिन्न-भिन्नरूपमें दीखता है तथा बाहर भी रहता है। अग्नि और वायुके दृष्टान्तमें केवल यही अन्तर है कि अग्नि तो प्रकाशस्वरूप होकर लोकमें प्रवेश करता है और वायु प्राणस्वरूप होकर प्रत्येक देहमें प्रवेश करता है।

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न

लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषै:।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा

न लिप्यते लोकदु:खेन बाह्य:॥

(कठ०२। २। ११)

जैसे एक ही सूर्य सब लोकोंकी आँख है, अच्छी-बुरी सभी वस्तुओंका प्रकाश सूर्यसे होता है तथापि वह बाह्य दोषोंसे लिप्त नहीं होता। इसी प्रकार वह आत्मा सर्वव्यापी होनेपर भी जगत‍्के दु:खोंसे लिप्त नहीं होता, उनसे बाहर रहता है।

समस्त भूत-प्राणियोंके अंदर शक्तिरूपसे रहनेवाला वह आत्मा एक ही है। वही सबका नियन्ता है, वह एक ही अनेक रूपमें दिखायी देता है। जो धीर पुरुष इस प्रकार आत्माको जानते हैं, उनको ही—

तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्।

—नित्य सुख प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं।

नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना-

मेको बहूनां यो विदधाति कामान्।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-

स्तेषां शान्ति: शाश्वती नेतरेषाम्॥

(कठ० २। २। १३)

जो नित्योंका भी नित्य है, जो चेतनोंका भी चेतन है, जो एक ही अनेकोंकी कामनाएँ पूर्ण करता है उस शरीरस्थ आत्माका जिनको अनुभव होता है वे ही नित्य शान्तिको प्राप्त होते हैं, दूसरे नहीं। जिसको सूर्य प्रकाशित नहीं कर सकता, जो चन्द्रमा और तारागणोंसे प्रकाशित नहीं होता, बिजली जिसे प्रकाशित नहीं कर सकती, उसको बेचारा अग्नि तो क्या प्रकाशित करे? जिसके प्रकाशसे ही सबका प्रकाश होता है, उसी परिपूर्ण प्रकाशकी दिव्य ज्योतिसे समस्त विश्व प्रकाशित हो रहा है।

इस दृश्यमान संसारके समस्त पदार्थ उस परब्रह्मसे निकलकर उसीकी सत्तासे सदा काँपते हुए अपने-अपने काममें लगे रहते हैं; क्योंकि वह उठे हुए वज्रके सदृश महाभयंकर है।

भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्य:।

भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चम:॥

(कठ० २। ३। ३)

अग्नि इसीके भयसे तपता है, सूर्य इसीके भयसे तपता है तथा इन्द्र, वायु और पंचम मृत्यु इसीके भयसे दौड़ते हैं।

जो पुरुष इस शरीरके नाश होनेसे पूर्व ही उस आत्माको जान लेता है, वही मुक्त होता है, नहीं तो—

सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते॥

—इन जन्म-मरणशील लोकोंमें उसे फिर जन्म ग्रहण करना पड़ता है।

जब मनुष्यकी सारी कामनाएँ नष्ट हो जाती हैं और जब मन सब प्रकारकी मलिनताको त्यागकर अत्यन्त विशुद्ध बन जाता है और जब अन्त:करणकी समस्त कामनाएँ सम्पूर्णरूपसे नष्ट हो जाती हैं तब यह—

अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते।

(कठ० २। ३। १४)

—मरणशील मनुष्य अमृत बनकर यहींपर ब्रह्मको प्राप्तकर ब्रह्मानन्दमें मग्न हो जाता है। इस अवसरपर उसके हृदयकी (‘मैं’ और ‘मेरे’ की) समस्त ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं और वह अमृत बन जाता है। बस—

एतावदनुशासनम्।

—यही शास्त्रका उपदेश है, इससे परे और कुछ भी नहीं है।

(कठोपनिषद्के आधारपर)