ब्रह्म ही विजयी है
एक समय स्वर्गके देवताओंने परमात्माके प्रतापसे असुरोंपर विजय प्राप्त की। इस विजयसे लोगोंमें देवताओंकी पूजा होने लगी। देवोंकी कीर्ति और महिमा सब तरफ छा गयी। विजयोन्मत्त देवता भगवान्को भूलकर कहने लगे कि हमारी ही जय हुई है। हमने अपने पराक्रम और बुद्धिबलसे दैत्योंका दमन किया है, इसलिये लोग हमारी पूजा करते हैं और हमारे विजयगीत गाते हैं। मद अन्धा बना देता है, देवता भी विजयमदमें अन्धे होकर इस बातको भूल गये कि कोई सर्वशक्तिमान् ईश्वर है और उसीके बल और प्रभावसे सब कुछ होता है। उसकी सत्ता बिना पेड़का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।
भगवान् बडे़ दयालु हैं। उन्होंने देखा कि देवतागण मिथ्या अभिमानमें मत्त होकर मुझे भूलने लगे हैं, यदि इनके यह अभिमान दृढ़ हो गया तो असुरोंकी भाँति इनका भी सर्वनाश हो जायगा। विजय प्राप्त करनेपर जहाँ सत्-पुरुषोंमें नम्रता आती है, वहाँ इनमें अभिमान बढ़ रहा है। यों विचारकर देवताओंके अभिमानका नाश कर उनका उपकार करनेके लिये परमात्मा ब्रह्मने अपनी लीलासे एक ऐसा अद्भुत कौतूहलप्रद रूप प्रकट किया जिसे देखकर देवताओंकी बुद्धि चक्कर खा गयी। देवता घबराये और उन्होंने इस यक्षसदृश रूपधारी अद्भुत पुरुषका पता लगानेके लिये अपने अगुआ अग्निदेवसे कहा कि ‘हे जातवेदस्*! हम सबमें आप सर्वापेक्षा अधिक तेजस्वी हैं, आप इनका पता लगाइये कि ये यक्षरूप वास्तवमें कौन हैं?’
अग्निने कहा—‘ठीक है, मैं पता लगाकर आता हूँ।’ यों कहकर अग्नि वहाँ गये, परंतु उसके समीप पहुँचते ही तेजसे ऐसे चकरा गये कि बोलनेतकका साहस नहीं हुआ। अन्तमें उस यक्षरूपी ब्रह्मने अग्निसे पूछा कि ‘तू कौन है?’ अग्निने कहा—‘मेरा नाम प्रसिद्ध है, मुझे अग्नि कहते हैं और जातवेदस् भी कहते हैं।’ ब्रह्मने फिर पूछा—‘यह सब तो ठीक है, परंतु हे अग्नि! तुझमें किस प्रकारकी सामर्थ्य है, तू क्या कर सकता है!’ अग्निने कहा—‘हे यक्ष! इस पृथ्वी और अन्तरिक्षमें जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ हैं, उन सबको मैं जलाकर भस्म कर सकता हूँ।’
ब्रह्मने सोचा कि इसका अहंकार बातोंसे नहीं दूर होगा, इसको कुछ चमत्कार दिखलाना चाहिये। यों सोचकर ब्रह्मने उसमेंसे अपनी शक्ति खींच ली और ‘तस्मै तृणं निदधौ’—उसके सामने एक सूखे घासका तिनका डालकर कहा—‘और सबको जलानेकी बात तो पीछे देखी जायगी, पहले ‘एतद्दह’—इस तृणको तू जला।’
अग्निदेवता अपने पूरे वेगसे तृणके निकट गये और उसे जलानेके लिये सर्वप्रकारसे यत्न करने लगे, परंतु तृणको नहीं जला सके। लज्जासे उनका मस्तक नीचा हो गया और अन्तमें यक्षसे बिना कुछ कहे ही अग्निदेवता अपना-सा मुँह लिये देवताओंके पास लौट आये और कहा कि ‘मैं तो इस बातका पता नहीं लगा सका कि यह यक्ष कौन है?
इसके बाद देवताओंने वायुसे कहा कि ‘हे वायो! तुम जाकर पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है!’ वायुदेव ‘बहुत अच्छा’ कहकर यक्षके पास गये, परंतु उनकी भी अग्नि-सी दशा हो गयी, वे बोल नहीं सके।
यक्षने पूछा—‘तू कौन है?’ वायुने कहा—‘मैं वायु हूँ, मेरा नाम और गुण प्रसिद्ध है—गमनक्रिया करनेवाला और पृथ्वीकी गन्धको वहन करनेवाला हूँ। अन्तरिक्षमें गमन करनेवाला होनेके कारण मुझे मातरिश्वा भी कहते हैं’ यक्षने कहा—‘तुझमें क्या सामर्थ्य है?’ वायुने कहा—‘इस पृथ्वी और अन्तरिक्षमें जो कुछ भी पदार्थ हैं, उन सबको मैं ग्रहण कर सकता हूँ।’ (‘उड़ा सकता हूँ।’) ब्रह्मने वायुके सम्मुख भी वही सूखा तिनका रख दिया और कहा ‘एतदादत्स्व’—इस तिनकेको उड़ा दे।
वायुने अपना सारा बल लगा दिया, परंतु तिनका हिला भी नहीं। यह देखकर वायुदेव बड़े लज्जित हुए और तुरंत ही देवताओंके पास आकर उन्होंने कहा—‘हे देवगण! पता नहीं यह यक्ष कौन है, मैं तो कुछ भी नहीं जान सका।’
जब मुनीमोंसे काम नहीं होता तब मालिककी बारी आती है। इसी न्यायसे देवताओंने इन्द्रसे कहा कि ‘हे देवराज! अब आप जाइये।’ इन्द्र यक्षके समीप गये। देवराजको अभिमानमें भरा हुआ देखकर यक्षरूपी ब्रह्म वहाँसे अन्तर्धान हो गये, इन्द्रका अभिमान चूर्ण करनेके लिये उनसे बाततक नहीं की। इन्द्र लज्जित तो हो गये, परंतु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और ध्यान करने लगे। इतनेमें उन्होंने देखा कि अन्तरिक्षमें अत्यन्त शोभायुक्त और सब प्रकारके उत्तमोत्तम अलंकारोंसे विभूषित हिमवान्की कन्या भगवती पार्वती उमा खड़ी हैं। पार्वतीके दर्शन कर इन्द्रको हर्ष हुआ और उन्होंने सोचा कि पार्वती नित्य ज्ञानबोधस्वरूप भगवान् शिवके पास रहती हैं; अतएव इन्हें यक्षका पता अवश्य ही मालूम होगा। इन्द्रने विनयभावसे उनसे पूछा—
‘माता! अभी जो यक्ष हमें दर्शन देकर अन्तर्धान हो गये, वे कौन थे?’ उमाने कहा—‘वह यक्ष प्रसिद्ध ब्रह्म था। हे इन्द्र! उस ब्रह्मने ही असुरोंको पराजित किया है, तुमलोग तो केवल निमित्तमात्र हो; ब्रह्मके विजयसे ही तुमलोगोंकी महिमा बढ़ी है और इसीसे तुम्हारी पूजा भी होती है। तुम जो अपनी विजय और महिमा मानते हो सो सब तुम्हारा मिथ्या अभिमान है, इसे त्याग करो और यह समझो कि जो कुछ होता है सो केवल उस ब्रह्मकी सत्तासे ही होता है।’
उमाके वचनोंसे इन्द्रकी आँखें खुल गयीं, अभिमान जाता रहा। ब्रह्मकी महान् शक्तिका परिचय पाकर इन्द्र लौटे और उन्होंने अग्नि और वायुको भी ब्रह्मका उपदेश दिया। अग्नि और वायुने भी ब्रह्मको जान लिया। इसीसे ये तीनों देवता सबसे श्रेष्ठ हुए। इनमें भी इन्द्र सबसे श्रेष्ठ माने गये। कारण, उन्होंने ब्रह्मको सबसे पहले जाना था। इससे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मको सबसे पहले जाननेवाला ही सर्वश्रेष्ठ है।
(केन-उपनिषद्के आधारपर)