एक सौ एक वर्षका ब्रह्मचर्य

य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपास: सत्यकाम: सत्यसङ्कल्प: सोऽन्वेष्टव्य: स विजिज्ञासितव्य: स सर्वाॸश्च लोकानाप्नोति सर्वाॸश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच। (छान्दोग्य० ८। ७। १)

एक समय प्रजापतिने कहा कि ‘आत्मा पापसे रहित, बुढ़ापेसे रहित, मृत्युसे रहित, शोकसे रहित, क्षुधासे रहित, पिपासासे रहित, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है। उस आत्माकी खोज करनी चाहिये। वही जाननेयोग्य है। जो उस आत्माको जानकर उसका अनुभव करता है, वह सम्पूर्ण लोकोंको और सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त करता है।’

प्रजापतिके इस वचनको सुनकर देवता और असुर दोनोंने आत्माको जाननेकी इच्छा की। देवताओंमें इन्द्र और असुरोंमें विरोचन प्रतिनिधि चुने गये और उन दोनोंने प्रजापतिके पास जानेका विचार किया। परस्पर द्वेषके कारण आपसमें एक-दूसरेसे कुछ भी न कहकर दोनों समित्पाणि होकर विनयपूर्वक प्रजापतिके पास गये।*

दोनोंने वहाँ जाकर परस्परकी ईर्ष्याको भुलाकर लगातार बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्यका पालन किया। इसके बाद प्रजापतिने उनसे पूछा—

किमिच्छन्ताववास्तम्

‘किस इच्छासे तुम दोनों यहाँ आकर रहे हो?’

उन्होंने कहा भगवन्! आत्मा पापरहित, जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, क्षुधा और पिपासारहित, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है, वह जाननेयोग्य है, वही अनुभव करनेयोग्य है। जो इसको जानकर उसका अनुभव करता है वह सम्पूर्ण लोकों और सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त होता है। आपके ये वचन सबने सुने हैं, इसीसे उस आत्माको जाननेकी इच्छासे हमलोग यहाँ आये हैं।

तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति।

प्रजापतिने कहा—‘आँखोंमें यह जो पुरुष द्रष्टा अन्तर्मुखी दृष्टिवालोंको दीखता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय है, यही ब्रह्म है।’

इन्द्र और विरोचनमें अशुद्ध बुद्धि होनेके कारण इस कथनको अक्षरश: ज्यों-का-त्यों ग्रहण कर लिया। उन्होंने समझा कि नेत्रोंमें जो मनुष्यका प्रतिबिम्ब दीख पड़ता है वही आत्मा है। इसी निश्चयको दृढ़ करनेके लिये उन्होंने प्रजापतिसे फिर पूछा—‘हे भगवन्! जलमें जो पुरुषका प्रतिबिम्ब दीखता है अथवा दर्पणमें शरीरका प्रतिबिम्ब दीखता है, इन दोनोंमेंसे आपका बतलाया हुआ ब्रह्म कौन-सा है? क्या ये दोनों एक ही हैं?’ प्रजापतिने कहा—‘हाँ, हाँ, वह इन दोनोंमें ही दीख सकता है। वही प्रत्येक वस्तुमें है।’

इसके बाद प्रजापतिने उनसे कहा—‘जाओ! उस जलसे भरे हुए कुण्डमें देखो और यदि वहाँ आत्माको न पहचान सको तो फिर मुझसे पूछना, मैं तुम्हें समझाऊँगा।’ दोनों जाकर कुण्डमें अपना प्रतिबिम्ब देखने लगे। प्रजापतिने पूछा—‘तुमलोग क्या देखते हो?’ उन्होंने कहा—

सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्य: प्रतिरूपमिति।

‘भगवन्! नखसे लेकर शिखातक हम सारे आत्माको देख रहे हैं। नख-शिखाकी बात सुनकर ब्रह्माजीने फिर कहा—‘अच्छा, तुम जाओ और शरीरोंको स्नान कराकर अच्छे-अच्छे गहने पहनो और सुन्दर-सुन्दर वस्त्र धारण करो। फिर जाकर जलके कुण्डमें देखो।’ नख और केशके सदृश यह शरीर भी अनात्म है। इसी बातको समझानेके लिये प्रजापतिने यों कहा, परंतु उन दोनोंने इस बातको नहीं समझा। वे दोनों अच्छी तरह नहा-धोकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्रालंकारोंसे सजकर कुण्डपर गये और उसमें प्रतिबिम्ब देखने लगे। प्रजापतिने पूछा, ‘क्या देखते हो?’ उन्होंने कहा—‘हे भगवन्! जैसे हमने सुन्दर-सुन्दर वस्त्र और आभूषण धारण किये हैं, इसी प्रकार हमारे इस आत्माने भी सुन्दर-सुन्दर वस्त्रालंकारोंको धारण किया है।’

प्रजापतिने सोचा कि अन्त:करणकी अशुद्धिके कारण आत्माका यथार्थ स्वरूप इसकी समझमें नहीं आया, सम्भवत: मेरे वचनोंका मनन करनेसे इनके प्रतिबन्धक संस्कारोंके दूर होनेपर इनको आत्मस्वरूपका ज्ञान हो सकेगा। यों विचारकर प्रजापतिने कहा—‘यही आत्मा है, यही अविनाशी है, यही अभय है, यही ब्रह्म है।’

प्रजापतिके वचन सुन इन्द्र और विरोचन सन्तुष्ट होकर अपने-अपने घरकी ओर चले। उनको यों ही जाते देखकर प्रजापतिने मनमें कहा—

अनुपलभ्यात्मानमननुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वासुरा वा ते पराभविष्यन्ति।

ये बेचारे आत्माको जाने बिना ही, साक्षात् अनुभव किये बिना ही जा रहे हैं। इन देव और असुरोंमेंसे जो कोई भी इस (प्रतिबिम्ब-आधार शरीरको ही ब्रह्म माननेके) उपनिषद्‍‍वाले होंगे, उनका तो पराभव ही होगा।

विरोचन तो अपनेको ज्ञानी मानकर शान्त हृदयसे असुरोंके पास जा पहुँचा और प्रतिबिम्बके निमित्त शरीरको ही आत्मा समझकर उसने इस शरीरमें आत्मबुद्धिरूप उपनिषद्का उपदेश आरम्भ कर दिया। उसने कहा—प्रजापतिने शरीरको ही आत्मा बतलाया है, इसलिये यह शरीररूपी आत्मा ही पूजा करनेयोग्य है, यही सेवा करनेयोग्य है, इस जगत‍्में केवल इस शरीररूपी आत्माकी ही पूजा और सेवा करनी चाहिये। इसीकी सेवासे मनुष्यको दोनों लोक (दोनों लोकोंमें सुख) प्राप्त हो सकता है।

इस देहात्मवादके कारणसे जो दान नहीं करता, सत्कार्योमें श्रद्धा नहीं रखता तथा यज्ञादि नहीं करता, उसको आज भी असुर कहा जाता है। यह देहात्मवादी उपनिषद् असुरोंका ही चलाया हुआ है। ऐसे लोग शरीरको ही आत्मा समझकर इसे गहने, कपड़े आदिसे सजाया करते हैं और सारा जीवन इस शरीरकी सेवा-पूजामें ही खो देते हैं। अन्तमें यही लोग मृतशरीरको भी गहने-कपड़ोंसे सजाकर ऐसा समझते हैं कि हम स्वर्गको जीत लेंगे ‘अमुं लोकं जेष्यन्त:।’

इधर दैवी सम्पदावाले इन्द्रको स्वर्गमें पहुँचनेसे पहले ही विचार हुआ कि ‘प्रजापतिने तो आत्माको अभय कहा है, परन्तु इस प्रतिबिम्बरूप आत्माको तो अनेक भय रहते हैं। जब शरीर सजा होता है तो प्रतिबिम्ब भी सजा हुआ दीखता है, शरीरपर सुन्दर वस्त्र होते हैं तो प्रतिबिम्ब भी सुन्दर वस्त्रोंवाला दीखता है, शरीर नख-केशसे रहित साफ-सुथरा होता है तो प्रतिबिम्ब भी साफ-सुथरा दीखता है। इसी प्रकार यदि शरीर अंधा होता है तो प्रतिबिम्ब भी अंधा होता है, शरीर काला होता है तो प्रतिबिम्ब भी काला दीखता है, शरीर लूला-लँगड़ा होता है तो प्रतिबिम्ब भी लूला-लँगड़ा दीखता है, शरीरका नाश होता है तो प्रतिबिम्ब भी नष्ट हो जाता है। इसलिये इसमें तो मैं कुछ भी आत्मस्वरूपता नहीं देखता।

इस प्रकार विचारकर इन्द्र समित्पाणि होकर फिर प्रजापतिके पास आया। प्रजापतिने इन्द्रको देखकर कहा—‘इन्द्र! तुम तो विरोचनके साथ ही शान्त हृदयसे वापस चले गये थे, अब फिर किस इच्छासे आये हो?’ इन्द्रने कहा—‘भगवन्! जैसा शरीर होता है वैसा ही प्रतिबिम्ब दीखता है, शरीर सुन्दर वस्त्रालंकृत और परिष्कृत होता है तो प्रतिबिम्ब भी वस्त्रालंकृत और परिष्कृत दीखता है। शरीर अंध, स्राम या अंगहीन होता है तो प्रतिबिम्ब भी वैसा ही दीखता है। शरीरका नाश होता है तो इस प्रतिबिम्बरूप आत्माका भी नाश होता है। अतएव इसमें मुझे कोई आनन्द नहीं दीख पड़ता।’

प्रजापतिने इन्द्रके वचन सुनकर कहा—‘हे इन्द्र! ऐसी ही बात है। वास्तवमें प्रतिबिम्ब आत्मा नहीं है, मैं तुम्हें फिर समझाऊँगा, अभी फिर बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतसे यहाँ रहो।’

इन्द्र बत्तीस वर्षतक फिर ब्रह्मचर्यके साथ गुरुके समीप रहा, तब प्रजापतिने उससे कहा—

य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति।

‘जो इस स्वप्नमें पूजित होता हुआ विचरता है, स्वप्नमें अनेक भोग भोगता है वह आत्मा है, अमृत है, अभय है, वही ब्रह्म है।’

इन्द्र शान्त हृदयसे अपनेको कृतार्थ समझकर चला, परंतु देवताओंके पास पहुँचनेके पहले ही उसने सोचा कि ‘स्वप्नके द्रष्टा आत्मामें भी दोष है। यद्यपि शरीर अंधा होनेसे यह स्वप्नका द्रष्टा अंधा नहीं होता, शरीरके स्राम (व्याधिपीड़ित) होनेसे यह स्राम नहीं होता, शरीरके दोषसे यह दूषित नहीं होता, शरीरके वधसे इसका वध नहीं होता तथापि यह नाश होता हुआ-सा, भागता हुआ-सा, शोकग्रस्त होता हुआ-सा और रोता हुआ-सा लगता है, इससे मैं इसमें भी कोई आनन्द नहीं देखता!’

इस प्रकार विचारकर इन्द्र हाथमें समिधा लेकर फिर प्रजापतिके समीप आया और प्रजापतिके पूछनेपर उसने अपनी शंका उनको सुनायी।

प्रजापतिने कहा—‘इन्द्र! ठीक यही बात है। स्वप्नका द्रष्टा आत्मा नहीं है। मैं तुम्हें फिर उपदेश करूँगा, तुम फिर बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतसे यहाँपर रहो।’

इन्द्र तीसरी बार बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्यके साथ फिर रहा। इसके बाद प्रजापतिने कहा—‘जिसमें यह जीव निद्राको प्राप्त होकर सम्पूर्ण इन्द्रियोंके व्यापार शान्त हो जानेके कारण सम्पूर्ण रीतिसे निर्मल और पूर्ण होता है और स्वप्नका अनुभव नहीं करता, यह आत्मा है, अमृत है, अभय है, यही ब्रह्म है।’

इन्द्र आत्माका यथार्थ स्वरूप समझमें आ गया मानकर शान्त हृदयसे स्वर्गकी ओर चला, परंतु देवताओंके पास पहुँचनेके पहले ही मार्गमें विचार करनेपर उसे सुषुप्ति-अवस्थामें पड़े हुए जीवको आत्मा समझनेमें दोष दीख पड़ा। उसने सोचा कि ‘सुषुप्ति-अवस्थामें आत्मा जाग्रत् और स्वप्नकी तरह ‘यह मैं हूँ’ ऐसा अपनेको नहीं जानता। न इन भूतोंको जानता है और न उनमेंसे विनाशको ही प्राप्त होता है। यानी सुषुप्ति-अवस्थाका सुख भी निरन्तर नहीं भोग सकता, अतएव इसमें भी कोई आनन्द नहीं दीखता।’

इस प्रकार विचारकर इन्द्र समित्पाणि होकर चौथी बार फिर प्रजापतिके पास आया। उसे देखकर प्रजापतिने कहा—‘तुम तो शान्त हृदयसे चले गये थे, लौटकर कैसे आये!’ इन्द्रने कहा—‘भगवन्! इस सुषुप्तिमें स्थित यह आत्मा जाग्रत् और स्वप्नमें जैसे अपनेको जानता है वैसा वहाँ ‘यह मैं हूँ’ यों नहीं जानता, इन भूतोंको भी नहीं जानता और इस अवस्थामेंसे इसका विनाश-सा भी होता है, अतएव मैं इसमें भी कोई आनन्द नहीं देखता।’

प्रजापतिने कहा—‘इन्द्र! ठीक है। सुषुप्तिमें पड़ा हुआ जीव वास्तवमें आत्मा नहीं है। मैं तुम्हें फिर इसी आत्माका ही उपदेश करूँगा, किसी दूसरे पदार्थका नहीं। तुम यहाँ पाँच सालतक फिर ब्रह्मचर्यव्रतसे रहो।’

तीन बार बत्तीस-बत्तीस वर्षका ब्रह्मचर्यव्रत पालन करनेपर भी प्रतिबन्धकरूप तनिक-से भी हृदयके मलको नाश करके प्रकृत अधिकारी बनानेके हेतुसे फिर पाँच वर्ष ब्रह्मचर्यके लिये प्रजापतिने आज्ञा दी। पूरे एक सौ एक वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन कर चुकनेपर प्रजापतिने कहा—‘इन्द्र! यह शरीर मर्त्य है, सर्वदा मृत्युसे ग्रस्त है, तो भी यह अमृतरूप तथा अशरीरी आत्माका अधिष्ठान (रहने और भोगादि भोगनेका स्थान) है। यह अशरीरी आत्मा जब अविवेकसे सशरीर अर्थात् शरीरमें आत्मभाव रखनेवाला होता है, तभी सुख-दु:खसे ग्रस्त होता है। जहाँतक देहात्मबोध रहता है वहाँतक सुख-दु:खसे छुटकारा नहीं मिल सकता। विज्ञानसे जिसका देहात्मभाव नष्ट हो गया है, उस अशरीरीको नि:सन्देह सुख-दु:ख कभी स्पर्श नहीं कर सकते।’ इसके बाद वायु, अभ्र और विद्युतादिका दृष्टान्त देते हुए अन्तमें प्रजापतिने कहा, ‘इस शरीरमें जो मैं देखता हूँ’ ऐसे जानता है वह आत्मा है और नेत्र उसके रूपके ज्ञानका साधन है, जो इस गन्धको मैं सूँघता हूँ, ऐसे जानता है वह आत्मा है और गन्धके ज्ञानके लिये नासिका है, जो मैं इस वाणीका उच्चारण करता हूँ, ऐसे जानता है वह आत्मा है और उसके उच्चारणके लिये वाणी है; जो मैं सुनता हूँ, ऐसे जानता है वह आत्मा है और उसके श्रवणके लिये श्रोत्र है, जो जानता है कि मैं आत्मा हूँ वह आत्मा है और मन उसका दैवी चक्षु है। अपने स्वरूपको प्राप्त वह मुक्त इस अप्राकृत चक्षुरूपी मनके द्वारा इन भोगोंको देखता हुआ आनन्दको प्राप्त होता है।’ यही आत्मतत्त्व है।

इन्द्र आनन्दमें मग्न हो गया और देवलोकमें लौटकर उसने देवताओंको इस आत्माका उपदेश किया। देवताओंने इस आत्माकी उपासना की। इसीसे उन्हें सर्वलोक और सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्ति हुई। जो इस आत्माको भलीभाँति जानकर इसका साक्षात्कार करता है, वही सर्वलोक और सम्पूर्ण आनन्दको प्राप्त होता है।*