गाड़ीवालेका ज्ञान
प्रसिद्ध जनश्रुत राजाके पुत्रका पौत्र जानश्रुति नामक एक राजा था, वह बहुत ही श्रद्धाके साथ आदरपूर्वक योग्य पात्रोंको बहुत दान दिया करता था। अतिथियोंके लिये उसके घरमें प्रतिदिन बहुत-सा भोजन बनवाया जाता था। वह महान् दक्षिणा देनेवाला था। वह चाहता था कि प्रत्येक शहर और गाँवमें रहनेवाले साधु-ब्राह्मण आदि सब मेरा ही अन्न खायँ, इसलिये उसने जहाँ-तहाँ सर्वत्र ऐसे धर्मस्थान, अन्नसत्र या छात्रावास खोल रखे थे, जहाँ अतिथियों आदिके ठहरने और भोजन करनेका सुप्रबन्ध था।
राजाके अन्नदानसे सन्तुष्ट हुए ऋषि और देवताओंने राजाको सचेत करके उसे ब्रह्मानन्दका सुख प्राप्त करानेके लिये हंसोंका रूप धारण किया और राजाको दिखायी दे सकें ऐसे समय वे उड़ते हुए राजाके महलकी छतके ऊपर जा पहुँचे। वहाँ पिछले हंसने अगले हंससे कहा—‘भाई भल्लाक्ष! इस जनश्रुतके पुत्रके पौत्र जानश्रुतिका तेज दिनके समान सब जगह फैल रहा है। इसका स्पर्श न कर लेना, कहीं स्पर्श कर लेगा तो यह तेज तुझे भस्म कर डालेगा।’ यह सुनकर अगले हंसने कहा—
‘भाई! तुम बैलगाड़ीवाले रैक्वको नहीं जानते, इसीसे तुम उस रैक्वसे इसका तेज बहुत ही कम होनेपर भी उसकी-सी प्रशंसा कर रहे हो।’ पिछले हंसने कहा—‘वह गाड़ीवाला रैक्व कौन है और कैसा है, सो तो बता।’ अगले हंसने कहा—‘भाई! उस रैक्वकी महिमाका क्या बखान किया जाय। जैसे जुआ खेलनेके पासेके नीचेके तीनों भाग उसके अन्तर्गत होते हैं, यानी जब जुआरीका पासा पड़ता है तब वह तीनोंको जीत लेता है। इसी प्रकार प्रजा जो कुछ भी शुभ कार्य करती है, वह सारे शुभ कर्म और उनका फल रैक्वके शुभ कर्मके अन्तर्गत है अर्थात् प्रजाकी समस्त शुभ क्रियाओंका फल उसे मिलता है। वह रैक्व जिस जाननेयोग्य वस्तुको जानता है, उस वस्तुको जो जान जाता है उसे भी रैक्वके समान ही सब प्राणियोंके शुभ कर्मोंका फल प्राप्त होता है। मैं उसी विद्वान् रैक्वके लिये ही ऐसा कह रहा हूँ।’
महलपर सोये हुए राजा जानश्रुतिने हंसोंकी ये बातें सुनीं और रातभर वह इन्हीं बातोंको स्मरण करता हुआ जागता रहा। प्रात:काल वन्दीजनोंकी स्तुति सुनकर राजाने बिछौनेसे उठकर वन्दीजनोंसे कहा कि ‘हे वत्स! तुम गाड़ीवाले रैक्वके पास जाकर उससे कहो कि ‘मैं आपसे मिलना चाहता हूँ।’ भाटने कहा—‘हे राजन्! वह गाड़ीवाला रैक्व कौन है? और कैसा है? राजाने जो कुछ हंसोंसे सुना था, सो उसे कह सुनाया। राजाके आज्ञानुसार भाटोंने बहुत-से नगरों और गाँवोंमें रैक्वकी खोज की, परंतु कहीं पता नहीं लगा। तब लौटकर उन्होंने राजासे कहा कि हमें रैक्वका कहीं पता नहीं लगा। राजाने विचार किया कि इन भाटोंने रैक्वको नगरों और ग्रामोंमें ही खोजा है। भला, ब्रह्मज्ञानी महापुरुष विषयी पुरुषोंके बीचमें कैसे रहेंगे? और उनसे कहा कि ‘अरे! जाओ, ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंके रहनेके स्थानोंमें (अरण्य, नदीतट आदि एकान्त स्थानोंमें) उन्हें खोजो।’
राजाके आज्ञानुसार भाट फिर गये और ढूँढ़ते-ढूँढ़ते किसी एक एकान्त निर्जन प्रदेशमें गाड़ीके नीचे बैठे हुए शरीर खुजलाते हुए एक पुरुषको उन्होंने देखा। वन्दीजन उनके पास जाकर विनयके साथ पूछने लगे—‘हे प्रभो! क्या गाड़ीवाले रैक्व आप ही हैं?’ मुनिने कहा—‘हाँ, मैं ही हूँ।’
रैक्वका पता लगनेसे भाटोंको बड़ा हर्ष हुआ और तुरन्त राजाके पास जाकर कहने लगे कि ‘हमने अमुक स्थानमें रैक्वका पता लगा लिया।’
तदनन्तर राजा छ: सौ गायें, सोनेका कण्ठहार और खच्चरियोंसे जुता हुआ एक रथ आदि लेकर रैक्वके पास गया और वहाँ जाकर हाथ जोड़कर रैक्वसे बोला—‘भगवन्! यह छ: सौ गायें, एक सोनेका हार और यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ—ये सब मैं आपके लिये लाया हूँ। कृपा करके आप इनको स्वीकार कीजिये और हे भगवन्! आप जिस देवताकी उपासना करते हैं, उस देवताका मुझको उपदेश कीजिये।’
राजाकी बात सुनकर रैक्वने कहा—‘अरे शूद्र*! यह गौएँ, हार और रथ तू अपने ही पास रख।’
यह सुनकर राजा घर लौट आया और विचारने लगा कि ‘मुझको मुनिने शूद्र क्यों कहा। या तो मैं हंसोंकी वाणी सुनकर शोकातुर था इसलिये शूद्र कहा होगा अथवा थोड़ा धन देकर उत्तम विद्या लेनेका अनुचित प्रयत्न समझकर भी मुनि मुझको शूद्र कह सकते हैं। परंतु बिना ज्ञानके तो मेरा शोक दूर होगा नहीं, अतएव मुनिको प्रसन्न करनेके लिये मुझे फिर वहाँ जाना चाहिये।’
यह विचारकर राजा अबकी बार एक हजार गायें, एक सोनेका कण्ठहार, खच्चरियोंसे जुता हुआ एक रथ और अपनी पुत्रीको लेकर फिर मुनिके पास गया और हाथ जोड़कर कहने लगा—‘हे भगवन्! यह सब मैं आपके लिये लाया हूँ, इनको आप स्वीकार कीजिये और धर्मपत्नीके रूपमें मेरी इस पुत्रीको और जहाँ आप रहते हैं इस गाँवको भी ग्रहण कीजिये। तदनन्तर आप जिस देवकी उपासना करते हैं उसका मुझे उपदेश कीजिये।’
राजाके वचन सुनकर, कन्याकी करुणाभरी स्थिति देखकर मुनिने उसको आश्वासन दिया और कहा कि ‘हे शूद्र! तू फिर यही सब वस्तुएँ मेरे लिये लाया है? (क्या इन्हींसे ब्रह्मज्ञान खरीदा जा सकता है?)’ राजा चुप होकर बैठ गया। कुछ समय बाद मुनिने राजाको धनके अभिमानसे रहित हुआ जानकर ब्रह्मविद्याका उपदेश किया। मुनि रैक्व जहाँ रहते थे, उस पुण्य प्रदेशका नाम रैक्वपर्ण हो गया।
(छान्दोग्य-उपनिषद्के आधारपर)