घोड़ेके सिरसे उपदेश
अश्विनीकुमार देवलोकके चिकित्सक हैं। इन्होंने दैव अथर्वण-ऋषिके शिष्य दध्यङ् अथर्वण ऋषिसे वेदाध्ययन किया था। दध्यङ् ऋषि ब्रह्मज्ञानी थे, परंतु वैराग्यादि साधनोंके अभावमें अश्विनीकुमारोंको अनधिकारी समझकर उन्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश नहीं किया था। विद्याके अभिमानमें एक समय अश्विनीकुमारोंने इन्द्रका अपमान किया, तब इन्द्रने इन्हें यज्ञभागसे बहिष्कृत कर दिया। तबसे इनको किसी भी यज्ञमें भाग मिलना बंद हो गया। इन्होंने नाराज होकर गुरु दध्यङ् ऋषिसे इन्द्रसे लड़कर उसे जीतने अथवा ओषधि आदिके द्वारा इन्द्रका विनाश करनेकी आज्ञा चाही। दध्यङ् ऋषि महान् पुरुष थे, उन्होंने काम-क्रोधादिकी निन्दा करते हुए अश्विनीकुमारोंको अन्यान्य उपायोंसे सफलता प्राप्त करनेकी आज्ञा दी और यह कहा कि तुमलोग यदि हृदयके अभिमान काम-क्रोधादि दोषोंसे रहित और वैराग्ययुक्त होकर मुझसे पूछोगे तो मैं तुम्हें अधिकारी पाकर दुर्लभ ब्रह्मविद्याका उपदेश करूँगा। पश्चात् गुरुकी आज्ञासे अश्विनीकुमारोंने च्यवन ऋषिके नेत्र अच्छे कर दिये और च्यवनजीने अपने तपोबलसे उन्हें यज्ञमें अधिकार दिलवा दिया। इस प्रकार बिना ही लड़ाईके अश्विनीकुमारोंका मनोरथ सिद्ध हो गया।
एक समय इन्हीं दध्यङ् ऋषि आश्रममें इन्द्र आया। अतिथिवत्सल ऋषिने इन्द्रसे कहा कि ‘आप मेरे अतिथि हैं जो कुछ कहिये सो मैं करूँ।’ इन्द्रने कहा—‘मुझे ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये।’ दध्यङ् ऋषि दुविधामें पड़ गये। वचन देकर नहीं करते हैं तो वाणी असत्य होती है और उपदेशके योग्य अधिकारी इन्द्र है नहीं। आखिर उन्होंने वचनको सत्य रखनेके लिये उपदेश देनेका निश्चय किया और भलीभाँति ब्रह्मविद्याका उपदेश किया। उपदेश करते समय ऋषिने प्रसंगवश भोगोंकी निन्दा की तथा भोगदृष्टिसे इन्द्रको और एक कुत्तेको एक-सा सिद्ध किया। इन्द्र ब्रह्मविद्याका अधिकारी तो था ही नहीं, स्वर्गादि भोगोंकी निन्दा सुनकर उसे क्रोध आ गया और उसने दध्यङ् ऋषिपर कई तरहसे सन्देह करके निन्दा, शाप और हत्याके डरसे उन्हें मारनेकी इच्छा छोड़ दी, परंतु उसने यह कहा कि यदि आप इस ब्रह्मविद्याका उपदेश किसी दूसरेको करेंगे तो मैं उसी क्षण वज्रसे आपका सिर उतार लूँगा।
क्षमाशील ऋषिने शान्त हृदयसे इन्द्रकी बात सुनकर बिना ही किसी क्षोभ या क्रोधसे उससे कहा—‘अच्छी बात है, हम किसीको उपदेश करें तब सिर उतार लेना!’ इस बर्तावका इन्द्रपर प्रभाव पड़ा और शान्त होकर स्वर्गको लौट गया।
कुछ दिनों बाद अश्विनीकुमारोंने वैराग्यादि साधनोंसे सम्पन्न होकर ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके लिये गुरुके चरणोंमें उपस्थित होकर अपनी इच्छा जनायी और ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेके लिये प्रार्थना की। इसपर सत्यपरायण दध्यङ्ने सोचा कि ‘इनको उपदेश न देनेसे मेरा वचन असत्य होगा और उपदेश करनेपर इन्द्र मेरा सिर उतार लेगा। वचन असत्य होनेकी अपेक्षा मर जाना उत्तम है। प्रतिज्ञाभंग और असत्यका जो महान् दोष होता है, उसके सामने मृत्यु क्या चीज है। शरीरका नाश तो एक दिन होगा ही।’ यह विचारकर उन्होंने उपदेश देना निश्चय कर लिया और अश्विनीकुमारोंको इन्द्रके साथ जो बातचीत हुई थी वह कहकर सुना दी। अश्विनीकुमारोंने पहले तो कहा कि ‘भगवन्! आप हमलोगोंको अब कैसे उपदेश देंगे? क्या आपको इन्द्रके वज्रसे मरनेका डर नहीं है?’ परंतु जब दध्यङ् ऋषिने कर्मवश शरीरधारीकी मृत्युकी निश्चयता, परमार्थरूपसे नि:सारता और सत्यकी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी, तब अश्विनीकुमारोंने कहा ‘भगवन्! आप किंचित् भी भय न करें। हम एक कौशल करते हैं, जिससे न आपकी मृत्यु होगी और न हमें ब्रह्मविद्यासे वंचित होना पड़ेगा। हम पृथक्-पृथक् हुए अंगोंको जोड़कर जीवित करनेकी विद्या जानते हैं। पहले हम इस घोड़ेका सिर उतारते हैं; फिर आपका सिर उतार कर इस घोड़ेकी धड़पर रख देते हैं और घोड़ेका सिर आपकी धड़से जोड़ देते हैं। आप घोड़ेके सिरसे हमें ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये, फिर जब इन्द्र आकर आपका घोड़ेवाला सिर काट देगा, तब हम पुन: उसका सिर उतार कर आपकी धड़से जोड़ देंगे और इन्द्रके द्वारा काटा हुआ घोड़ेका सिर घोड़ेकी धड़से जोड़ देंगे। न घोड़ा ही मरेगा और न आपको ही कुछ होगा।’ दध्यङ् ऋषिने इस प्रस्तावको स्वीकार करके उन्हें भलीभाँति ब्रह्मविद्याका उपदेश किया। जब इन्द्रको इस बातका पता लगा तो इन्द्रने आकर वज्रसे दध्यङ् ऋषिके धड़से जोड़ा हुआ घोड़ेका सिर काट डाला। पश्चात् अश्विनीकुमारोंने संजीवनी विद्याके प्रभावसे घोड़ेके धड़से जुड़ा हुआ ऋषिका सिर उतार कर उनकी धड़से जोड़ दिया और घोड़ेके धड़पर घोड़ेका सिर रखकर उसे जोड़ दिया। दोनों जीवित हो गये।
(तैत्तिरीय ब्राह्मण और बृहदारण्यक-उपनिषद्के आधारपर)