निरभिमानी शिष्य
उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल, पुलुषका पुत्र सत्ययज्ञ, भल्लवका पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्षका पुत्र जन और अश्वतराश्विका पुत्र बुडिल—ये पाँचों महाशाल अर्थात् जिनकी शालामें असंख्य विद्यार्थी पढ़ते थे, ऐसी महान् शालाओंवाले महान् श्रोत्रिय यानी वेदका पठन-पाठन करनेवाले हैं। एक दिन ये एकत्र होकर वास्तवमें आत्मा क्या है और ब्रह्म क्या है, इस विषयपर विचार करने लगे; परन्तु जब किसी निर्णयपर नहीं पहुँचे, तब किसी दूसरे ब्रह्मवेत्ता विद्वान्के पास जाकर उनसे पूछनेका निश्चय कर आपसमें कहने लगे कि ‘वर्तमान समयमें अरुणके पुत्र उद्दालक आत्मरूप वैश्वानरको भलीभाँति जानते हैं, यदि सबकी राय हो तो हमको उनके पास चलना चाहिये।’ सबकी राय हो गयी और वे उद्दालकके पास गये।
उद्दालकने उनको दूरसे देखते ही उनके आनेका प्रयोजन जान लिया और वे विचार करने लगे—‘ये महाशाल और महान् श्रोत्रिय आते ही मुझसे पूछेंगे और मैं इनके प्रश्नोंका पूर्ण समाधान कर नहीं सकूँगा। इससे उत्तम यही है कि मैं इन्हें किसी दूसरे योग्य पुरुषका नाम बतला दूँ।’ ऐसा विचारकर उद्दालकने उनसे कहा—‘हे भगवन्! मैं जानता हूँ आप मुझसे आत्माके विषयमें कुछ पूछने पधारे हैं, परंतु इस समय केकयके पुत्र प्रसिद्ध राजा अश्वपति इस आत्मरूप वैश्वानरको भलीभाँति जानते हैं, यदि आप सबकी अनुमति हो तो हम सब उनके पास चलें।’ सर्वसम्मतिसे सब राजा अश्वपतिके पास गये।
अश्वपतिने उन छहों ऋषियों—अतिथियोंका अपने सेवकोंद्वारा यथायोग्य अलग-अलग भलीभाँति पूजन-सत्कार करवाया और दूसरे दिन प्रात:काल राजा सोकर उठते ही उनके पास गये और बहुत-सा धन सामने रखकर विनयभावसे उसे ग्रहण करनेकी प्रार्थना करने लगे। परंतु वे तो धनकी इच्छासे वहाँ नहीं गये थे, इससे उन्होंने धनका स्पर्श भी नहीं किया और चुपचाप बैठे रहे। राजाने सोचा, शायद ये मुझे अधर्मी या दुराचारी समझते हैं, इसीलिये मेरा धन (दूषित समझकर) नहीं लेते। यह विचारकर राजा कहने लगे—
न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यप:।
नानाहिताग्निर्नाविद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुत:॥
‘हे मुनियो! मेरे राज्यमें कोई चोर नहीं है, (क्योंकि किसीके पास किसी वस्तुका अभाव नहीं है, कारण) मेरे देशमें ऐसा कोई धनी नहीं है जो कंजूस हो यानी यथायोग्य दान न करता हो, न मेरे देशमें कोई शराब पीता है, न कोई ऐसा द्विज है जो अग्निहोत्र न करता हो, न कोई ऐसा ही व्यक्ति है जो विद्वान् न हो और न कोई व्यभिचारी पुरुष ही मेरे देशमें है, जब पुरुष ही व्यभिचारी नहीं है तो स्त्री तो व्यभिचारिणी होगी ही कहाँसे?’ अतएव मेरा धन शुद्ध है, फिर आप इसे क्यों नहीं लेते?*
मुनियोंने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब राजाने सोचा, शायद धन थोड़ा समझकर मुनि न लेते हों, अतएव वे फिर कहने लगे—
‘हे भगवन्! मैं एक यज्ञ आरम्भ कर रहा हूँ, उस यज्ञमें मैं एक-एक ऋत्विक्को जितना धन दूँगा, उतना ही आपमेंसे प्रत्येकको दूँगा। आप मेरे यहाँ ठहरिये और मेरा यज्ञ देखिये।’
राजाकी यह बात सुनकर उन्होंने कहा—‘हे राजन्! मनुष्य जिस प्रयोजनसे जिसके पास जाता है, उसका वही प्रयोजन पूरा करना चाहिये। हमलोग आपके पास आत्मरूप वैश्वानरका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे आये हैं; क्योंकि इस समय आप ही उसको भलीभाँति जानते हैं। इसलिये आप हमें वही समझाइये। हमें धन नहीं चाहिये।’*
राजाने उनसे कहा—‘हे मुनियो! कल प्रात:काल मैं इसका उत्तर आपको दूँगा।’ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये अभिमानका त्याग करना परम आवश्यक है, केवल मुँहसे माँगनेपर ज्ञान नहीं मिलता। वह अधिकारीको ही मिलता है। राजाके उत्तरसे मुनि इस बातको समझ गये और दूसरे दिन अभिमान त्यागकर सेवावृत्तिका परिचय देनेवाले समिधको हाथोंमें लेकर दोपहरसे पहले ही विनयके साथ शिष्यभावसे सब राजाके पास पहुँचे और जाते ही उनके चरणोंमें प्रणाम करने लगे। राजाने उनको चरणोंमें प्रणाम नहीं करने दिया; क्योंकि एक तो वे ब्राह्मण थे और दूसरे सद्गुरु मान-बड़ाई-पूजाकी इच्छा नहीं रखते। तदनन्तर राजाने उन्हें गुरुरूपसे नहीं, किन्तु दाताके रूपसे वैश्वानररूप ब्रह्मविद्याका उपदेश किया।
(छान्दोग्य-उपनिषद्के आधारपर)