परम धन
महर्षि याज्ञवल्क्यके दो स्त्रियाँ थीं। एकका नाम था मैत्रेयी और दूसरीका कात्यायनी। दोनों ही सदाचारिणी और पतिव्रता थीं; परंतु इन दोनोंमें मैत्रेयी तो परमात्माके प्रति अनुरागिणी थीं और कात्यायनीका मन संसारके भोगोंमें रहता था। महर्षि याज्ञवल्क्यने संन्यास ग्रहण करते समय मैत्रेयीको अपने पास बुलाकर कहा कि ‘हे मैत्रेयी! मैं अब इस गृहस्थाश्रमको छोड़कर संन्यास ग्रहण करना चाहता हूँ। तुम दोनों मेरे पीछेसे आपसमें झगड़ा न कर सुखपूर्वक रह सको, इसलिये मैं चाहता हूँ कि तुम दोनोंको घरकी सम्पत्ति आधी-आधी बाँट दूँ।’
स्वामीकी बात सुनकर मैत्रेयीने अपने मनमें सोचा कि मनुष्य अपने पासकी किसी वस्तुको तभी छोड़नेको तैयार होता है जब उसको पहलीकी अपेक्षा कोई अधिक उत्तम वस्तु प्राप्त होती है। महर्षि घर-बारको छोड़कर जा रहे हैं अतएव इनको भी कोई ऐसी वस्तु मिली होगी, जिसके सामने घर-बार सब तुच्छ हो जाते हैं, अवश्य ही इनके जानेमें कोई ऐसा बड़ा कारण होना चाहिये और वह परम वस्तु जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति-लाभकर अमृतत्वको—परमात्माको पाना ही है।’ यों विचारकर मैत्रेयीने कहा—‘भगवन्! मुझे यदि धन-धान्यसे परिपूर्ण समस्त पृथ्वी मिल जाय तो क्या उससे मैं अमृतत्वको पा सकती हूँ?’ याज्ञवल्क्यने कहा—‘नहीं, नहीं! धनसहित पृथ्वीकी प्राप्तिसे तेरा धनिकोंका-सा जीवन हो सकता है, परंतु उससे अमृतत्व कभी नहीं मिल सकता।’ मैत्रेयीने कहा—
सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहीति। (बृह० २। ४। ३)
‘जिससे मेरा मरना न छूटे, उस वस्तुको लेकर क्या करूँ? हे भगवन्! आप जो जानते हैं (जिस परम धनके सामने आपको यह घर-बार तुच्छ प्रतीत होता है और बड़ी प्रसन्नतासे आप सबका त्याग कर रहे हैं) वही परम धन मुझको बतलाइये।’
याज्ञवल्क्यने कहा—
स होवाच याज्ञवल्क्य: प्रिया बतारे न: सती प्रियं भाषस एह्यास्स्व व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति॥
(बृह० २। ४। ४)
‘मैत्रेयी! पहले भी तू मुझे बड़ी प्यारी थी, तेरे इन वाक्योंसे वह प्रेम और भी बढ़ गया है। तू मेरे पास आकर बैठ, मैं तुझे अमृतत्वका उपदेश करूँगा। मेरी बातोंको भलीभाँति सुनकर उनका मनन कर।’ इतना कहकर महर्षि याज्ञवल्क्यने प्रियतमरूपसे आत्माका वर्णन आरम्भ किया। उन्होंने कहा—
स होवाच न वा अरे पत्यु: कामाय पति: प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पति: प्रियो भवति।
‘मैत्रेयी! (स्त्रीको) पति पतिके प्रयोजनके लिये प्रिय नहीं होता, परंतु आत्माके प्रयोजनके लिये पति प्रिय होता है।’
इस ‘आत्मा’ शब्दका अर्थ लोगोंने भिन्न-भिन्न प्रकारसे किया है, कुछ कहते हैं कि आत्मासे यहाँपर शरीरका लक्ष्य है। यह शिश्नोदर-परायण पामर पुरुषोंका मत है। कुछ कहते हैं कि जबतक अंदर जीव है तभीतक संसार है, मरनेके बाद कुछ भी नहीं, इसलिये यहाँ इसी जीवनका लक्ष्य है। यह पुनर्जन्म न माननेवाले जडवादियोंका मत है। कुछ लोग ‘आत्माके लिये’ का अर्थ करते हैं कि जिस वस्तु या जिस सम्बन्धीसे आत्माकी उन्नति हो, आत्मा अपने स्वरूपको पहचान सके वही प्रिय है।* इसलिये कहा गया है कि ‘आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्’ यह तीव्र मुमुक्ष पुरुषोंका मत है।
कुछ तत्त्वज्ञोंका मत है कि आत्माके लिये इस अर्थमें कहा गया है कि इसमें आत्मतत्त्व है। यह आत्माकी एक मूर्ति है। मित्रकी मूर्तिको कोई उस मूर्तिके लिये नहीं चाहता; परंतु चाहता है मित्रके लिये। संसारकी समस्त वस्तुएँ इसीलिये प्रिय हैं कि उनमें केवल एक आत्मा ही व्यापक है या वे आत्माके ही स्वरूप हैं। महर्षि याज्ञवल्क्यने फिर कहा—
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति। न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्रा: प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्रा: प्रिया भवन्ति। न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति। न वा अरे ब्रह्मण: कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति। न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति। न वा अरे लोकानां कामाय लोका: प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोका: प्रिया भवन्ति। न वा अरे देवानां कामाय देवा: प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवा: प्रिया भवन्ति। न वा अरे वेदानां कामाय वेदा: प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदा: प्रिया भवन्ति। न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति। न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति। आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदॸसर्वं विदितम्। (बृह० ४। ५। ६)
‘अरे, स्त्री स्त्रीके लिये प्रिय नहीं होती, परंतु वह आत्माके लिये प्रिय होती है; पुत्र पुत्रोंके लिये प्रिय नहीं होते, परंतु वे आत्माके लिये प्रिय होते हैं; धन धनके लिये प्यारा नहीं होता, परंतु वह आत्माके लिये प्रिय होता है; ब्राह्मण ब्राह्मणके लिये प्रिय नहीं होता, परंतु वह आत्माके लिये प्रिय होता है; क्षत्रिय क्षत्रियके लिये प्रिय नहीं होता, परंतु वह आत्माके लिये प्रिय होता है; लोक लोकोंके लिये प्रिय नहीं होते, परंतु वह आत्माके लिये प्रिय होते हैं; देवता देवताओंके लिये प्रिय नहीं होते; परंतु आत्माके लिये प्रिय होते हैं, वेद वेदोंके लिये प्रिय नहीं होते, परंतु आत्माके लिये प्रिय होते हैं; भूत भूतोंके लिये प्रिय नहीं होते, परंतु आत्माके लिये प्रिय होते हैं, अरे मैत्रेयी! सब कुछ उनके लिये ही प्रिय नहीं होते, परंतु सब आत्माके लिये ही प्रिय होते हैं। यह परम प्रेमका स्थान आत्मा ही वास्तवमें दर्शन करनेयोग्य, श्रवण करनेयोग्य, मनन करनेयोग्य और निरन्तर ध्यान करनेयोग्य है। हे मैत्रेयी! इस आत्माके दर्शन, श्रवण, मनन और साक्षात्कारसे ही सब कुछ जाना जा सकता है।’ यही ज्ञान है।
इसके पश्चात् महर्षि याज्ञवल्क्यजीने सबका आत्माके साथ अभिन्नरूप बतलाते हुए इन्द्रियोंका अपने विषयोंमें अधिष्ठान बतलाया और तदनन्तर ब्रह्मकी अखण्ड एकरस सत्ताका वर्णन कर अन्तमें कहा कि जबतक द्वैतभाव होता है, तभीतक दूसरा दूसरेको देखता है, दूसरा दूसरेको सूँघता है, दूसरा दूसरेको सुनता है, दूसरा दूसरेसे बोलता है, दूसरा दूसरेके लिये विचार करता है और दूसरा दूसरेको जानता है, परंतु जब सर्वात्मभाव प्राप्त होता है, जब सब वस्तुएँ आत्मा ही हैं ऐसी प्रतीति होती है, तब वह किससे किसको देखे? किससे किसको सूँघे? किससे किसके साथ बोले? किससे किसका स्पर्श करे? तथा किससे किसको जाने? जिससे वह इन समस्त वस्तुओंको जानता है उसे वह किस तरह जाने?
‘वह आत्मा अग्राह्य है इससे उसका ग्रहण नहीं होता; वह अशीर्य है, इससे वह शीर्ण नहीं होता; वह असंग है इससे कभी आसक्त नहीं होता। वह बन्धनरहित है, इससे कभी दु:खी नहीं होता और उसका कभी नाश नहीं होता। ऐसे सर्वात्मरूप, सबके जाननेवाले आत्माको किस तरह जाने? श्रुतिने इसीलिये उसे ‘नेति’-‘नेति’ कहा है, वह आत्मा अनिर्वचनीय है। मैत्रेयी! बस, तेरे लिये यही उपदेश है, यही तो मोक्ष है।’
‘इतना कहकर याज्ञवल्क्यजीने संन्यास ले लिया और वैराग्यके प्रताप तथा ज्ञानकी उत्कट पिपासाके कारण स्वामीके उपदेशसे मैत्रेयी परम कल्याणको प्राप्त हुई।’
(बृहदारण्यक-उपनिषद्के आधारपर)