प्रार्थना
उपनिषद् हमारी वह अमूल्य निधि है, जिसमें संरक्षित विविध ज्ञान-विज्ञानमयी अचिन्त्य रत्नराशिकी निर्मल सच्चिदानन्दमयी ज्योतिका एक कण प्राप्त करनेके लिये समस्त संसारके तत्त्वज्ञ श्रद्धापूर्वक सिर उठाये और हाथ पसारे खडे़ हैं। उपनिषदोंमें उस कल्याणमय ज्ञानका अखण्ड और अनन्त प्रकाश है, जो घोर क्लेशमयी और अन्धकारमयी भवाटवीमें भ्रमते हुए जीवको सहसा उससे निकालकर नित्य निर्बाध ज्योतिर्मयी और पूर्णानन्दमयी ब्रह्मसत्तामें पहुँचा देता है। आनन्दकी बात है कि आज उन्हीं उपनिषदोंसे चुनी हुई कुछ कथाएँ पाठकोंको भेंट की जा रही हैं। लगभग दस वर्ष पूर्व बम्बईमें ‘उपनिषदोनी बातों’ नामक एक गुजराती पुस्तक देखी थी, तभी हिन्दीमें भी वैसी कथाएँ लिखनेका मन हुआ था और उसी समय कुछ कथाएँ लिखी गयी थीं। उनमेंसे कुछ तो बिलकुल गुजरातीकी शैलीपर ही थीं, कुछ अन्य प्रकारसे। वे ही कथाएँ अब पाठकोंको पुस्तकरूपमें मिल रही हैं। इसके लिये गुजराती पुस्तकके लेखक और प्रकाशक महोदयका मैं हृदयसे कृतज्ञ हूँ। इस छोटी-सी पुस्तकसे हिन्दीके पाठकोंने यदि लाभ उठाया तो सम्भव है आगे चलकर उपनिषदोंकी ऐसी ही चुनी हुई अन्यान्य कथाओंके प्रकाशनकी चेष्टा की जाय। भूल-चूकके लिये विद्वान् पाठक क्षमा करें और कृपापूर्वक सूचना दे दें, जिससे यदि नया संस्करण हो तो उस समय उचित सुधार कर दिया जाय। आशा है, पाठक इस प्रार्थनापर ध्यान देंगे।
हनुमानप्रसाद पोद्दार