सद्गुरुकी शिक्षा
वेदका अध्ययन कर चुकनेपर गुरु अपने शिष्यको नीचे लिखे वेद-धर्मोंका उपदेश करते हैं—
सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमद:।
(तैत्ति० १। ११। १)
सत्य बोलो। धर्मका आचरण करो। स्वाध्यायका कभी त्याग न करो। आचार्यको गुरु-दक्षिणा देकर प्रजाके सूत्रको न काटो अर्थात् ब्रह्मचर्य-आश्रमका पालन कर चुकनेपर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करो। सत्यका कभी किसी अवस्थामें भी त्याग न करो। धर्मका कभी त्याग न करो। कल्याणकारी कर्मोंका त्याग न करो। साधनकी जो विभूति प्राप्त है, उसे कभी मत त्यागो। स्वाध्याय और प्रवचनमें कभी प्रमाद न करो।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि।
(तैत्ति० १। ११। २)
देवकर्म (यज्ञ) और पितृकर्म (श्राद्ध, तर्पण आदि)-का कभी त्याग न करो। माताको देवरूपसे पूजो। पिताको देवरूपसे पूजो। आचार्यको देवरूपसे पूजो। अतिथिको देवरूपसे पूजो। जो कर्म निन्दारहित हैं, उन्हींको करो। अन्य (निन्दित कर्म) मत करो। हमारे (गुरुके) श्रेष्ठ आचरणोंका अनुसरण करो, दूसरोंका नहीं।
जो ब्राह्मण अपनेसे श्रेष्ठ हों उन्हें तुरंत बैठनेके लिये आसन दो। कुछ दान करो। श्रद्धासे करो, अश्रद्धासे नहीं। श्रीके लिये दान करो, लक्ष्मी चंचल है, प्रभुकी सेवामें उसे समर्पण नहीं करोगे तो वह तुम्हें त्यागकर चली जायगी, लोक-लाजके लिये ही दान करो। शास्त्रसे डरकर भी दान करो, दान करना उचित है इस विवेकसे दान करो। अपने किसी कर्म अथवा लौकिक आचारके सम्बन्धमें मनमें कोई शंका उठे तो अपने समीप रहनेवाले ब्राह्मणोंमें जो वेदविहित कर्मोंमें विचारशील हों, समदर्शी हों, कुशल हों, स्वतन्त्र हों (किसीके दबावमें आकर व्यवस्था देनेवाले न हों), क्रोधरहित अथवा शान्तस्वभाव हों और धर्मके लिये ही कर्तव्यपालन करनेवाले हों, वे जिस प्रकारका आचरण करें, उसी प्रकारका आचरण तुम करो। यही आदेश है, यही उपदेश है, यही वेदोंका भाव है, यही आज्ञा है, ऊपर बतलायी हुई प्रणालीसे ही आचरण करने चाहिये। इसी प्रकार आचरण करना चाहिये।
(तैत्तिरीय-उपनिषद्)