सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ
एक समय प्रसिद्ध विदेह राजा जनकने बहुदक्षिणा नामक बड़ा यज्ञ किया। यज्ञमें कुरु, पांचाल आदि देशोंके बहुत-से ब्राह्मण एकत्र हुए। जनक राजाने ब्राह्मणोंको बहुत दक्षिणा दी, अन्तमें ‘इन ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता कौन है, यह जाननेकी इच्छासे जनक अपनी गोशालामेंसे एक हजार गौएँ निकालकर प्रत्येक गायके दोनों सींगोंमें दस-दस सोनेकी मुहरें बाँध दीं और ब्राह्मणोंसे कहा कि ‘हे पूजनीय ब्राह्मणो! आप लोगोंमें जो ब्रह्मिष्ठ हों वे इन गायोंको अपने घर ले जायँ’ परंतु किसी भी ब्राह्मणका उन्हें ले जानेका साहस नहीं हुआ। अन्तमें महर्षि याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य ब्रह्मचारीसे कहा कि ‘हे प्रियदर्शन! हे सामश्रवा! (सामवेदके अध्ययन करनेवाले) इन गायोंको अपने घर ले चल।’ गुरुके इन वचनोंको सुनकर शिष्य उन गौओंको हाँककर गुरुके घरकी ओर ले जाने लगा। यह देखकर सभामें बैठे हुए ब्राह्मणोंको इस बातपर बड़ा क्रोध हुआ कि ‘हमलोगोंके सामने ‘मैं ब्रह्मिष्ठ हूँ’ ऐसा याज्ञवल्क्य कैसे कह सकता है।’
महाराज जनकके होता ऋत्विज् अश्वलने आगे बढ़कर याज्ञवल्क्यसे पूछा—
त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसि।
‘हे याज्ञवल्क्य! क्या तुम्हीं इन सबमें ब्रह्मिष्ठ हो?’ यद्यपि ये शब्द अपमानजनक थे, परंतु याज्ञवल्क्यने इस उद्धतपनसे कुछ भी विकारको न प्राप्त होकर नम्रताके साथ उत्तर दिया—
नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं स्म:।
‘भाई! ब्रह्मिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं। हमें तो गौओंकी चाह है। इसीलिये हमने गौएँ ली हैं।’
ब्रह्मनिष्ठाभिमानी अश्वल याज्ञवल्क्यको नीचा दिखानेके लिये उनसे एकके बाद एक बड़े-बड़े जटिल प्रश्न पूछने लगा। याज्ञवल्क्य सबका उत्तर तुरंत ही देते गये। इसके बाद ऋतभागपुत्र आर्तभाग, लह्यपुत्र भुज्यु, चक्रपुत्र उशस्त, कुषीतकपुत्र कहोल, वचक्नुपुत्री गार्गी और अरुणपुत्र उद्दालकने कई गम्भीर प्रश्न किये और याज्ञवल्क्यसे तुरंत उनका उत्तर पाया। सब ब्राह्मण थक गये, तब अन्तमें गार्गीने आगे बढ़कर सब ब्राह्मणोंसे कहा—‘हे पूज्य ब्राह्मणो! यदि आपकी अनुमति हो तो मैं इस याज्ञवल्क्यसे दो प्रश्न फिर करना चाहती हूँ। यदि उन दो प्रश्नोंका उत्तर यह दे सका तो फिर मैं यह मान लूँगी कि आपमेंसे कोई भी इस ब्रह्मवादीको नहीं जीत सकेंगे।’ ब्राह्मणोंने कहा—‘गार्गी! पूछ।’
गार्गीने गम्भीर स्वरसे कहा—‘हे याज्ञवल्क्य! जैसे वीरपुत्र विदेहराज या काशिराज उतारी हुई डोरीके धनुषपर फिरसे डोरी चढ़ाकर शत्रुको अत्यन्त पीड़ा देनेवाले दो बाणोंको हाथमें लेकर शत्रुके सामने खड़ा होता है, इसी प्रकार मैं दो प्रश्नोंको लेकर तुम्हारे सामने खड़ी हूँ, तुम यदि ब्रह्मवेत्ता हो तो इन प्रश्नोंका उत्तर मुझे दो।’ याज्ञवल्क्यने कहा—‘गार्गी! पूछ।’ गार्गी बोली—
सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति। (बृह० ३। ८। ६)
‘हे याज्ञवल्क्य! जो ब्रह्माण्डसे ऊपर है, जो ब्रह्माण्डसे नीचे है और जो इस स्वर्ग और पृथिवीके बीचमें स्थित है तथा जो भूत, वर्तमान और भविष्यरूप है, ऐसा शास्त्र जाननेवाले लोग कहते हैं, वह ‘सूत्रात्मा’ (जगद्रूप सूत्र) किसमें ओतप्रोत है?’
याज्ञवल्क्यने कहा—
स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति। (बृह० ३। ८। ४)
‘हे गार्गी! जो स्वर्गसे ऊपर है, जो पृथ्वीसे नीचे है और जो स्वर्ग और पृथ्वीके बीचमें स्थित है तथा जो भूत, वर्तमान और भविष्यरूप है, ऐसा शास्त्रवेत्तागण कहते हैं वह व्याकृत (विकृतिको प्राप्त कार्यरूप स्थूल) जगद्रूप सूत्र अन्तर्यामीरूप आकाशमें ओतप्रोत है।’ इस उत्तरको सुनकर गार्गीने कहा—‘हे याज्ञवल्क्य! तुमने मेरे इस प्रश्नका ऐसा स्पष्ट उत्तर दिया, इसके लिये तुम्हें नमस्कार है। अब दूसरे प्रश्नके लिये तैयार हो जाओ।’ याज्ञवल्क्यने सरलतासे कहा—‘गार्गी! पूछ।’
गार्गीने एक बार उसी प्रश्नोत्तरको फिरसे दोहराकर याज्ञवल्क्यसे कहा—
कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति।
‘हे याज्ञवल्क्य! तुम कहते हो व्याकृत जगद्रूप सूत्रात्मा तीनों कालोंमें सर्वदा अन्तर्यामीरूप आकाशमें ओतप्रोत है, तो वह आकाश किसमें ओतप्रोत है?’
याज्ञवल्क्यने कहा—
स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वनाकाशमसङ्गमरसमगन्धमचक्षु-ष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन। (बृह० ३। ८। ८)
‘हे गार्गी! अन्तर्यामीरूप अव्याकृतका अधिष्ठान यही वह अक्षर है, इस अविनाशी शुद्ध ब्रह्मका वर्णन ब्रह्मवेत्तागण इस प्रकार करते हैं—यह स्थूलसे भिन्न, सूक्ष्मसे भिन्न, ह्रस्वसे भिन्न, दीर्घसे भिन्न, लोहितसे भिन्न, स्नेह (चिकनाहट)-से भिन्न, प्रकाशसे भिन्न, अन्धकारसे भिन्न, वायुसे भिन्न, आकाशसे भिन्न, संगरहित, रसरहित, गन्धरहित, चक्षुरहित, श्रोत्ररहित, वाणीरहित, मनरहित, तेजरहित, प्राणरहित, मुखरहित, परिमाणरहित, छिद्ररहित और देश, काल, वस्तु आदि परिच्छेदसे रहित सर्वव्यापी अपरिच्छन्न है। वह कुछ भी खाता नहीं और उसे भी कोई खाता नहीं,’ इस प्रकार वह सब विशेषणोंसे रहित एक ही अद्वितीय है।
इस प्रकार समस्त विशेषणोंका ब्रह्ममें निषेध करके अब उसका नियन्तापन बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं—
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत:। एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासा मासा ऋतव: संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्य: स्यन्दन्ते श्वेतेभ्य: पर्वतेभ्य: प्रतीच्योऽन्या यां यां च दिशमनु। एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्या: प्रशॸ सन्ति यजमानं देवा दर्वीं पितरोऽन्वायत्ता:। (बृह० ३। ८। ९)
‘हे गार्गी! इस प्रसिद्ध अक्षरकी आज्ञामें सूर्य और चन्द्रमा ये नियमितरूपसे वर्तते हैं। हे गार्गी! इस प्रसिद्ध अक्षरकी आज्ञासे ही स्वर्ग और पृथ्वी हाथमें रखे हुए पाषाणकी तरह मर्यादामें रहते हैं। हे गार्गी! इस प्रसिद्ध अक्षरकी आज्ञामें रहकर ही निमेष, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतु और संवत्सर इस कालके अवयवोंकी गणना करनेवाले सेवककी तरह नियमितरूपसे आते-जाते हैं। हे गार्गी! इस प्रसिद्ध अक्षरके शासनमें रहकर ही पूर्ववाहिनी गंगा आदि नदियाँ श्वेत हिमालय आदि पहाड़ोंमेंसे निकलकर समुद्रकी ओर बहती हैं तथा पश्चिमवाहिनी सिन्धु आदि और अन्यान्य दिशाओंकी ओर बहती हुई दूसरी नदियाँ इसी अक्षरके नियन्त्रणमें आजतक वैसे ही बहती हैं। हे गार्गी! इस प्रसिद्ध अक्षरकी आज्ञासे मनुष्य दाताओंकी प्रशंसा करते हैं और इन्द्रादि देवगण यजमान और पितृगण दर्वीके अनुगत हैं अर्थात् देवता यजमानद्वारा किये हुए यज्ञसे और पितृगण उनके लिये किये जानेवाले होममें घी डालनेकी चमचीसे यानी उस होमसे पुष्ट होते हैं।’
इसके बाद याज्ञवल्क्य फिर बोले—
यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद् भवति। यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मण:। (बृह० ३। ८। १०)
‘हे गार्गी! इस अक्षरको बिना जाने यदि कोई पुरुष इस लोकमें हजारों वर्षोंतक देवताओंको उद्देश्य करके यज्ञ करता है, व्रतादि तप करता है तो भी उस कर्मका फल तो अन्तवाला ही होता है। अर्थात् फल देकर वह कर्म नष्ट हो जाता है, वह अक्षय परम कल्याणको प्राप्त नहीं होता।’*
हे गार्गी! जो पुरुष इस अक्षरको नहीं जानकर (भगवत्प्राप्ति होनेसे पूर्व ही) इस लोकसे मृत्युको प्राप्त होता है, वह (बेचारा) कृपण (दीन, दयाके योग्य) है और हे गार्गी! जो इस अक्षरको जानकर इस लोकमें मरणको प्राप्त होता है, वह ब्राह्मण (ब्रह्मवित्, मुक्त) हो जाता है, अब याज्ञवल्क्य ब्रह्मका उपाधिरहित स्वरूप बतलाते हुए कहते हैं—
तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतॸ श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रे तस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति।
(बृह० ३। ८। ११)
‘हे गार्गी! यह प्रसिद्ध अक्षर किसीको नहीं दीखता, पर यह सबको देखता है। इसकी आवाज कानोंसे कोई नहीं सुन सकता; परन्तु यही सबकी सुनता है। यह किसीकी धारणामें नहीं आता; परन्तु यही सबका मन्ता है! कोई इसे बुद्धिसे नहीं जान सकता; परन्तु यही सबका विज्ञाता (जाननेवाला) है। इससे भिन्न द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है और इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है। हे गार्गी! वह व्याकृत आकाश इसी प्रसिद्ध अक्षर अविनाशी ब्रह्ममें ही ओतप्रोत है।’*
महर्षि याज्ञवल्क्यके इस विलक्षण व्याख्यानको सुनकर गार्गी सन्तुष्ट हो गयी और प्रमुदित होकर ब्राह्मणोंसे कहने लगी कि—‘हे पूज्य ब्राह्मणो! याज्ञवल्क्यको नमस्कार करो। ब्रह्मसम्बन्धी विवादमें इसको कोई भी नहीं हरा सकता। इसकी पराजय मनकी कल्पनामें भी नहीं आ सकती।’ इतना कहकर गार्गी चुप हो गयी।
इसके बाद शकलके पुत्र शाकल्य या विदग्धने याज्ञवल्क्यसे कई इधर-उधरके प्रश्न किये। अन्तमें याज्ञवल्क्यने उससे कहा कि अब मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, तू यदि उसका उत्तर नहीं दे सकेगा तो तेरा मस्तक कट जायगा। शाकल्य उत्तर नहीं दे सका और उसका मस्तक धड़से अलग हो गया। याज्ञवल्क्यके ज्ञान और तेजको देखकर सारी सभा चकित हो गयी। तदनन्तर याज्ञवल्क्यने फिर ब्राह्मणोंसे कहा—‘तुम लोगोंमेंसे कोई एक या सब मिलकर मुझसे कुछ पूछना हो तो पूछे,’ परन्तु किसीने कुछ नहीं पूछा। चारों ओर याज्ञवल्क्यकी जयध्वनि होने लगी। विज्ञानानन्दसे याज्ञवल्क्य और गार्गीका चेहरा चमक रहा था।
इसी ब्रह्मको यथार्थरूपसे जाननेकी चेष्टा करना और अन्तमें जान लेना मनुष्यजन्मकी सफलताका एकमात्र प्रमाण है।
(बृहदारण्यकोपनिषद्के आधारपर)