‘तत्त्वमसि’
‘अरुणके पुत्र आरुणि उद्दालकके श्वेतकेतु नामक एक पुत्र था। वह बारह वर्षकी अवस्थातक केवल खेल-कूदमें ही रहा। पिता सोचते रहे कि वह स्वयं ही विद्या प्राप्त करनेकी इच्छा करे तो उत्तम है, परन्तु उसने वैसी इच्छा नहीं की, तब पितासे नहीं रहा गया। उन्होंने एक दिन उसे अपने पास बुलाकर कहा—‘हे वत्स श्वेतकेतो! तू जा और सुयोग्य गुरुके समीप ब्रह्मचारी होकर रह।’ हे सौम्य! अपने वंशमें कोई भी ऐसा उत्पन्न नहीं हुआ, जिसने वेदोंका त्याग किया हो और जो ब्राह्मणके गुण और आचारोंसे रहित होकर केवल नामधारी ब्राह्मण बनकर रहा हो। ऐसा करना योग्य नहीं है। सारांश तुझे वेदोंका अध्ययन करके ब्रह्मको प्राप्त करना ही चाहिये।
पिता आरुणिका मीठा उलाहना सुनकर श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामें गुरुके घर गया और पूरे चौबीस वर्षकी अवस्थातक गुरुगृहमें रहकर व्याकरणादि छ: अङ्गोंसहित चारों वेदोंका पूर्ण अध्ययन करनेके पश्चात् गुरुकी आज्ञा लेकर घर लौटा। उसने मन-ही-मन विचार किया कि ‘मैं वेदका पूर्ण ज्ञाता हूँ, मेरे समान पण्डित और कोई नहीं है। मैं सर्वोपरि विद्वान् और बुद्धिमान् हूँ।’ इस प्रकारके विचारोंसे उसके मनमें गर्व उत्पन्न हो गया और वह उद्धत तथा विनयरहित होकर बिना ही प्रणाम किये पिताके सामने आकर बैठ गया। आरुणि ऋषि उसका नम्रतारहित औद्धत्यपूर्ण आचरण देखकर इस बातको जान गये कि इसको वेदके अध्ययनसे बड़ा गर्व हो गया है तो भी आरुणि ऋषिने उस अविनयी पुत्रपर क्रोध नहीं किया और कहा—‘हे श्वेतकेतो! तू ऐसा क्या पढ़ आया है कि जिससे अपनेको सबसे बड़ा पण्डित समझता है और इतना अभिमानमें भर गया है। विद्याका स्वरूप तो विनयसे ही खिलता है। अभिमानी पुरुषके हृदयसे सारे गुण तो दूर चले जाते हैं और समस्त दोष अपने-आप उसमें आ जाते हैं। तूने अपने गुरुसे यह सीखा हो तो बता कि ऐसी कौन-सी वस्तु है कि जिस एकके सुननेसे बिना सुनी हुई सब वस्तुएँ सुनी जाती हैं, जिस एकके विचारसे बिना विचार की हुई सब वस्तुओंका विचार हो जाता है, जिस एकके ज्ञानसे नहीं जानी हुई सब वस्तुओंका ज्ञान हो जाता है।
आरुणिके ऐसे वचन सुनते ही श्वेतकेतुका गर्व गल गया। उसने सोचा कि ‘मैं तो ऐसी किसी वस्तुको नहीं जानता। मेरा अभिमान मिथ्या है।’ वह नम्र होकर विनयके साथ पिताके चरणोंपर गिर पड़ा और हाथ जोड़कर कहने लगा—‘भगवन्! जिस एक वस्तुके श्रवण, विचार और ज्ञानसे सम्पूर्ण वस्तुओंका श्रवण, विचार और ज्ञान हो जाता है, उस वस्तुको मैं नहीं जानता। आप उस वस्तुका उपदेश कीजिये।’
आरुणिने कहा—‘हे सौम्य! जैसे कारणरूप मिट्टीके पिण्डका ज्ञान होनेसे मिट्टीके कार्यरूप घट, शराव आदि समस्त वस्तुओंका ज्ञान हो जाता है और यह पता लग जाता है कि घट आदि कार्यरूप वस्तुएँ सत्य नहीं हैं, केवल वाणीके विकार हैं, सत्य तो केवल मिट्टी ही है। हे सौम्य! जैसे कारणरूप सोनेके पिण्डका ज्ञान होनेसे सोनेके कड़े, कुण्डलादि सब कार्योंका ज्ञान हो जाता है और यह पता लग जाता है कि ये कड़े, कुण्डलादि सत्य नहीं हैं, केवल वाणीके विकार हैं, सत्य तो केवल सोना ही है और जैसे नख काटनेकी नहरनी आदिमें रहे हुए लोहेका ज्ञान हो जानेसे लोहेके कार्य खड्ग, परशु आदिका ज्ञान हो जाता है और यह पता लग जाता है कि वास्तवमें ये सब सत्य नहीं हैं, एक लोहा ही सत्य है, बस, इसी तरह वह ज्ञान होता है।
पिता आरुणिके यह वचन सुनकर श्वेतकेतुने कहा—‘पिताजी! निश्चय ही मेरे विद्वान् गुरु इस वस्तुको नहीं जानते हैं; क्योंकि यदि वे जानते होते तो मुझे बतलाये बिना कभी नहीं रहते। अतएव हे भगवन्! अब आप ही मुझको उस वस्तुका उपदेश दीजिये, जिस एकके जाननेसे सब वस्तुएँ जानी जाती हैं।’ आरुणिने कहा—‘अच्छा, सावधान होकर सुन।’
‘हे प्रियदर्शन! यह नाम, रूप और क्रियास्वरूप दृश्यमान जगत् उत्पन्न होनेसे पहले एक, अद्वितीय, सत् ही था। उस सत् ब्रह्मने संकल्प किया कि ‘मैं एक बहुत हो जाऊँ’ ऐसा संकल्प करके उसने पहले तेज उत्पन्न किया, फिर उससे जल उत्पन्न किया और तदनन्तर उससे अन्न उत्पन्न किया, इन्हीं तीन तत्त्वोंसे सब पदार्थ उत्पन्न हुए। जगत्में जितनी वस्तुएँ हैं, सब तेज, जल और अन्न—इन तीनोंके मिश्रणसे ही बनी हैं। जहाँ प्रकाश या गर्मी है, वहाँ तेजतत्त्वकी प्रधानता है; जहाँ द्रव या प्रवाही भाव हैं, वहाँ जलकी प्रधानता है और जहाँ कठोरता है, वहाँ अन्न या पृथ्वीकी प्रधानता है। अग्निमें जो लाल, श्वेत और कृष्णवर्ण है उसमें ललाई तेजकी, सफेदी जलकी और श्यामता पृथ्वीकी है। यही बात सूर्य, चन्द्रमा और बिजलीमें है। यदि अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और बिजलीमेंसे तेज, जल और पृथ्वीको निकाल लिया जाय तो अग्निमें अग्निपन, सूर्यमें सूर्यपन, चन्द्रमामें चन्द्रपन और विद्युत् में विद्युत्पन कुछ भी नहीं रह जायगा। इसी प्रकार सभी वस्तुओंमें समझना चाहिये। खाये हुए अन्नके भी तीन रूप हो जाते हैं। स्थूलभाग विष्ठा बन जाता है, मध्यमभाग मांस बनता है और सूक्ष्मभाग मनरूप हो जाता है। इसी तरह जलके स्थूलभागसे मूत्र बनता है, मध्यमभागसे रक्त बनता है और सूक्ष्मभागसे प्राण बनता है। इसी प्रकार तेल, घृत आदि तैजस पदार्थोंके स्थूलभागसे हड्डी बनती है, मध्यमभाग मज्जारूप हो जाता है और सूक्ष्मभाग वाणीरूप होता है। अतएव मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजमय है अर्थात् मन अन्नसे बनता है, प्राण जलसे बनता है और वाणी तेजसे बनती है।’
इसपर श्वेतकेतुने कहा—‘हे पिताजी! मुझको यह विषय और साफ करके समझाइये।’ उद्दालक आरुणि बोले—‘हे सौम्य! जैसे दही मथनेसे उसका सूक्ष्म सार तत्त्व नवनीत ऊपर तैर आता है, इसी प्रकार जो अन्न खाया जाता है, उसका सूक्ष्म सार अंश मन बनता है। जलका सूक्ष्म अंश प्राण और तेजका सूक्ष्म अंश वाक् बनता है। असलमें ये मन, प्राण और वाणी तथा इनके कारण अन्नादि कार्यकारण-परम्परासे मूलमें एक ही सत् वस्तु ठहरते हैं। सबका मूल कारण सत् है, वही परम आश्रय और अधिष्ठान है। सत् के कार्य नाना प्रकारकी आकृतियाँ सब वाणीके विकार हैं, नाममात्र हैं। यह सत् अणुकी भाँति सूक्ष्म है, समस्त जगत्का आत्मारूप है, जैसे सर्पमें रज्जु कल्पित है, इसी प्रकार जगत् इस ‘सत्’ में कल्पित है। हे श्वेतकेतो! वह ‘सत्’ वस्तु तू ही है। ‘तत्त्वमसि’।
हे सौम्य! जैसे शहदकी मक्खी अनेक प्रकारके वृक्षोंके रसको एकत्र करके उसको एक रस करके शहदके रूपमें परिणत करती है, शहदरूपको प्राप्त रस जैसे यह नहीं जानता कि मैं आमके पेड़का रस हूँ या मैं कटहरके वृक्षका रस हूँ। इसी प्रकार सुषुप्तिकालमें जीव सत् वस्तुके साथ एकीभावको प्राप्त होकर यह नहीं जानते कि हम सत् में मिल गये हैं। सुषुप्तिसे जागकर पुन: वे अपने-अपने पहलेके बाघ, सिंह, वृक, शूकर, कीट, पतंग और मच्छरके शरीरको प्राप्त हो जाते हैं। यह जो सूक्ष्मतत्त्व है यही आत्मा है, यह सत् है और हे श्वेतकेतो! वह तू ही है। ‘तत्त्वमसि’।
श्वेतकेतुने कहा—‘भगवन्! मुझको फिर समझाइये।’ आरुणि बोले—‘हे सौम्य! जैसे समुद्रके जलसे ही बादलोंके द्वारा पुष्ट हुई गंगा आदि नदियाँ अन्तमें समुद्रमें ही मिलकर अपने नाम-रूपको त्याग देती हैं, यह नहीं जानतीं कि ‘मैं गंगा हूँ’, ‘मैं नर्मदा हूँ’ और सर्वथा समुद्रभावको प्राप्त हो जाती हैं और फिर मेघके द्वारा वृष्टिरूपसे समुद्रसे बाहर निकल आती हैं; किन्तु यह नहीं जानतीं कि हम समुद्रसे निकली हैं। इसी प्रकार ये जीव भी ‘सत्’ मेंसे निकलकर ‘सत्’ में ही लीन होते हैं और पुन: उसीसे निकलते हैं, परंतु यह नहीं जानते कि हम ‘सत्’ से आये हैं और यहाँ वही बाघ, सिंह, वृक, शूकर, कीट, पतंग या मच्छर जो-जो पहले होते हैं वे हो जाते हैं। यह जो सूक्ष्मतत्त्व सबका आत्मा है, यह सत् है, यही आत्मा है और ‘हे श्वेतकेतो! वह ‘सत्’ तू ही है।’ ‘तत्त्वमसि’।
श्वेतकेतुने कहा—‘भगवन्! मुझे फिरसे समझाइये।’ उद्दालक आरुणिने ‘तथास्तु’ कहकर समझाना शुरू किया—
‘हे सौम्य! बड़े भारी वृक्षकी जड़पर कोई चोट करे तो वह एक ही चोटमें सूख नहीं जाता, वह जीता है और उन छेदोंमेंसे रस झरता है। वृक्षके बीचमें छेद करनेपर भी वह सूखता नहीं, छेदोंमेंसे रस झरता है, इसी प्रकार अग्रभागपर चोट करनेसे भी यह जीता है और उसमेंसे रस टपकता है। जबतक उसमें जीवात्मा व्याप्त रहता है, तबतक वह मूलके द्वारा जल ग्रहण करता हुआ आनन्दसे रहता है। जब इस वृक्षकी शाखाओंमें एक शाखासे जीव निकल जाता है, तब वह सूख जाती है, दूसरीसे निकलनेपर दूसरी और तीसरीसे निकलनेपर तीसरी सूख जाती है और जब सारे वृक्षको जीव त्याग देता है तब वह सब-का-सब सूख जाता है। इसी प्रकार यह शरीर भी जब जीवसे रहित होता है तभी मृत्युको प्राप्त होता है। जीव कभी मृत्युको प्राप्त नहीं होता, यह जीवरूप सूक्ष्मतत्त्व ही आत्मा है। यह सत् है, यही आत्मा है और हे श्वेतकेतो! वह ‘सत्’ तू ही है।’ ‘तत्त्वमसि’।
श्वेतकेतुने कहा—‘भगवन्! मुझे फिर समझाइये।’ पिता आरुणिने कहा—‘अच्छा, एक बड़ा फल तोड़कर ला। फिर तुझे समझाऊँगा।’ श्वेतकेतु फल ले आया। पिताने कहा—‘इसे तोड़कर देख इसमें क्या है?’ श्वेतकेतुने फल तोड़कर कहा—‘भगवन्! इसमें छोटे-छोटे बीज हैं।’ ऋषि बोले—‘अच्छा, एक बीजको तोड़कर देख उसमें क्या है?’ श्वेतकेतुने बीजको फोड़कर कहा—‘इसमें तो कुछ भी नहीं दीखता।’ तब पिता आरुणि बोले—‘हे सौम्य! तू इस वट-बीजके सूक्ष्मभावको नहीं देखता, इस अत्यन्त सूक्ष्मतत्त्वसे ही महान् वटका वृक्ष निकलता है। बस, जैसे यह अत्यन्त सूक्ष्म वट-बीज बड़े भारी वटके वृक्षका आधार है, इसी प्रकार सूक्ष्म सत् आत्मा इस समस्त स्थूल जगत्का आधार है। हे सौम्य! मैं सत्य कहता हूँ, तू मेरे वचनमें श्रद्धा रख। यह जो सूक्ष्मतत्त्व आत्मा है वह सत् है और यही आत्मा है। ‘हे श्वेतकेतो! वह ‘सत्’ तू ही है।’ ‘तत्त्वमसि’।
श्वेतकेतुने कहा—‘भगवन्! मुझको पुन: दूसरे दृष्टान्तसे समझाइये।’ उद्दालकने एक नमककी डली श्वेतकेतुके हाथमें देकर कहा—‘वत्स! इस डलीको अभी जलसे भरे हुए लोटेमें डाल दे और फिर कल सबेरे उस लोटेको लेकर मेरे पास आना।’ श्वेतकेतुने ऐसा ही किया। दूसरे दिन प्रात:काल जब श्वेतकेतु जलका लोटा लेकर पिताके पास गया, तब उन्होंने कहा—‘हे सौम्य! रातको जो नमककी डली लोटेमें डाली थी, उसको जलमेंसे ढूँढ़कर निकाल तो दे, मैं उसे देखूँ।’ श्वेतकेतुने देखा पर नमककी डली उसे नहीं मिली; क्योंकि वह तो जलमें गलकर जलरूप हो गयी थी। तब आरुणिने कहा—‘अच्छा, इसमेंसे इस तरफसे थोड़ा-सा जल चखकर बता तो कैसा है।’ श्वेतकेतुने आचमन करके कहा—‘पिताजी! जल खारा है।’ आरुणि बोले—‘अच्छा अब बीचमेंसे लेकर चखकर बता।’ श्वेतकेतुने चखकर कहा—‘पिताजी! यह भी खारा है।’ आरुणिने कहा—‘अच्छा! अब दूसरी ओरसे जरा-सा पीकर बता कैसा स्वाद है।’ श्वेतकेतुने पीकर कहा—‘पिताजी! इधरसे भी स्वाद खारा ही है।’ अन्तमें पिताने कहा—‘अब सब ओरसे पीकर फिर जलको फेंक दे और मेरे पास चला आ।’ श्वेतकेतुने वैसा ही किया और आकर पितासे कहा—‘पिताजी! मैंने जो नमक जलमें डाला था, यद्यपि मैं अपनी आँखोंसे उसको नहीं देख पाता, परंतु जीभके द्वारा मुझको उसका पता लग गया है कि उसकी स्थिति उस जलमें सदा और सर्वत्र है।’ पिताने कहा—‘हे सौम्य! जैसे तू वहाँ उस प्रसिद्ध ‘सत्’ नमकको नेत्रोंसे नहीं देख सका तो भी वह विद्यमान है, इसी प्रकार यह सूक्ष्मतत्त्व आत्मा है, वह सत् है और वही आत्मा है और हे श्वेतकेतो! वह ‘आत्मा’ तू ही है।’ ‘तत्त्वमसि’।
श्वेतकेतुने कहा—‘पिताजी! मुझे फिर उपदेश कीजिये।’ तब मुनि उद्दालक बोले—‘सुन, जैसे चोर आँखोंपर पट्टी बाँधकर किसी मनुष्यको बहुत दूरके गान्धार देशसे लाकर किसी जंगलमें—निर्जन प्रदेशमें छोड़ दे और वह पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओंकी ओर देख-देखकर सहायताके लिये पुकार करके कहे कि ‘मुझको आँखोंपर पट्टी बाँधकर चोरोंने यहाँ लाकर छोड़ दिया है।’ और जैसे उसकी करुण पुकारको सुनकर कोई दयालु पुरुष दयावश उसकी आँखोंकी पट्टी खोल दे और उससे कह दे कि ‘गान्धार देश इस दिशामें है, तू इस रास्तेसे चला जा, वहाँ पहुँच जायगा।’ और वह बुद्धिमान् अधिकारी पुरुष जैसे उस दयालु पुरुषके वचनोंपर श्रद्धा रखकर उसके बताये मार्गपर चलने लगता है और एक गाँवसे दूसरे गाँव पूछ-परछ करता हुआ आखिर अपने गान्धार देशको पहुँच जाता है। इसी प्रकार अज्ञानकी पट्टी बाँधे हुए काम, क्रोध, लोभादि चोरोंके द्वारा संसाररूप भयंकर वनमें छोड़ा हुआ जीव ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुके दयापरवश हो बतलाये हुए मार्गसे चलकर अविद्याके फंदेसे छूटकर अपने मूल स्वरूप ‘सत्’ आत्माको प्राप्त हो जाता है। यह जो सूक्ष्म-तत्त्व है, सो आत्मा है। वह सत् है, वही आत्मा है, ‘हे श्वेतकेतो! वह ‘सत्’ आत्मा तू ही है।’ ‘तत्त्वमसि’।
श्वेतकेतुने कहा—‘भगवन्! कृपापूर्वक मुझको फिर उपदेश कीजिये।’ तब मुनि उद्दालक बोले—‘सुन, जैसे कोई एक रोगी मनुष्य मरनेवाला होता है, तब उसके सम्बन्धीलोग उसे घेरकर पूछते हैं कि तुम हमें पहचानते हो या नहीं! जबतक उस रोगी जीवकी वाणीका मनमें, मनका प्राणमें, प्राणका तेजमें और तेजका ब्रह्ममें लय नहीं हो जाता, तबतक वह सबको पहचान सकता है। परंतु जब उसकी वाणीका मनमें, मनका प्राणमें, प्राणका तेजमें और तेजका ब्रह्ममें लय हो जाता है तब वह किसीको नहीं पहचान सकता, यह जो सूक्ष्मभाव है सो आत्मा है, वह सत् है, वही आत्मा है, ‘हे श्वेतकेतो! वह आत्मा तू ही है।’ ‘तत्त्वमसि’।
श्वेतकेतुने कहा—‘भगवन्! कृपापूर्वक मुझे फिर समझाइये।’ तब मुनि कहने लगे—‘अच्छा, सुन, एक आदमी चोरीके सन्देहमें पकड़ा जाता है और उससे पूछा जाता है कि तैंने चोरी की या नहीं? वह अस्वीकार करता है। तब राज्यके अधिकारी जलती हुई कुल्हाड़ी लाकर उसके हाथमें देनेकी आज्ञा करते हैं, कुल्हाड़ी लायी जाती है और यदि उसने चोरी की है और झूठ बोलकर छूटना चाहता है तो आत्माको असत्यके साथ जोड़नेके कारण कुल्हाड़ीका स्पर्श होते ही उसका हाथ जल जाता है और उसे अपराधके लिये दण्ड दिया जाता है। परंतु यदि वह चोर नहीं होता और सत्य ही कहता है तो आत्माको सत्यके साथ संयुक्त रखनेके कारण उसका हाथ उस कुल्हाड़ीसे नहीं जलता और वह बन्धनसे छूट जाता है।*
इस प्रकार सत्यताके कारण जलती हुई कुल्हाड़ीसे सत्यवक्ता बच जाता है, इससे सिद्ध होता है कि जीव सत् है, वह सत् है, वही आत्मा है। ‘हे श्वेतकेतो! वह आत्मा तू ही है।’ ‘तत्त्वमसि’।
इस प्रकार पिता उद्दालक आरुणिके उपदेशसे श्वेतकेतु आत्माके अपरोक्ष ज्ञानको प्राप्त होकर कृतार्थ हो गया।
(छान्दोग्य-उपनिषद्के आधारपर)