सिनेमा
सिनेमा भी आजकलकी सभ्यताका एक अंग है और शिक्षित स्त्री-पुरुष सभ्यताके सभी अंगोंमें प्रवेश करना चाहते हैं, अतएव स्वाभाविक ही इधर भी उनका प्रवेश खूब हो रहा है। नि:संदेह चित्रपट एक कला है और संयमी, सदाचारी तथा नि:स्वार्थ पुरुषोंके द्वारा इसका सदुपयोग हो तो इससे मनोरंजनके साथ ही बहुत कुछ उपकार भी हो सकता है। परन्तु उपकारकी जितनी सम्भावना है उससे अधिक अपकारकी है। जन्म-जन्मान्तरके बुरे संस्कारोंके कारण प्राय: मनुष्य बुरी बातोंको जितनी जल्दी ग्रहण करता है, उतनी अच्छी बातोंको नहीं करता। कथानक अच्छे-से-अच्छा हो, सब बातें शिक्षाप्रद हों तथापि उसमें कुछ-न-कुछ तो शृंगार-रस रखना ही पड़ेगा। जहाँ स्त्रियोंके पार्ट पुरुष करते हों वहाँ तो विशेष आपत्तिकी बात नहीं है, परन्तु जहाँ स्त्रियोंके पार्ट स्त्रियाँ करेंगी, वहाँ वे चाहे कितने ही उच्च घरानेकी हों और पुरुषमात्र कितने ही सच्चरित्र हों, नित्यके संगसे उनके द्वारा प्रमाद होनेकी सम्भावना है ही! नर और नारीके शरीरोंकी प्रकृतिने रचना ही ऐसी की है कि उनमें परस्पर शारीरिक मिलनकी इच्छा उत्पन्न हो ही जाती है। फिर युवावस्थामें तो यह मिलनेच्छा बड़ी तीव्र होती है, ऐसी अवस्थामें नित्य साथ रहकर, शृंगारके पार्ट कर-कर पद्मपत्रवत् निर्लेप बने रहना असम्भव-सा ही है। नित्यके अबाध संगमें इन्द्रिय-संयम बना रहना मामूली बात नहीं है। बड़े-बड़े वनवासी फल-मूलाहारी तपस्वी महान् विद्वान् और ऊँचे साधक भी तीव्र आकर्षणके प्रभावसे जब इन्द्रियोंके वश हो जाते हैं तब शृंगारकी लीलाभूमि सिनेमामें रहनेवाले जवान उम्रके साधारण अभिनेताओं और अभिनेत्रियोंकी तो बात ही कौन-सी है! इस भारी पतनकी आशंका तो सिनेमा-जगत् में पर्याप्त सुधार—जिसकी आशा नहीं है—होनेपर भी रहेगी ही; वर्तमान सिनेमाओंमें तो पद-पदपर सबके पतनके लिये गहरी खाइयाँ खुदी हैं। गंदे गाने, अश्लील मजाक, अर्द्धनग्नावस्थाके नाच, शृंगारसे पूर्ण कथानक, मिस कहलानेवाली एक्ट्रेसोंके गंदे हाव-भाव, सभी चीजें नरकके दरवाजे हैं। चित्रपट इस समय धन कमानेका पूरा साधन बन गया है; अधिक-से-अधिक धन कमाना ही संचालकोंका उद्देश्य है। करोड़ोंकी पूँजी लगाकर व्यापारी इस क्षेत्रमें धन कमानेके लिये कूद पड़े हैं। कलाका विकास और शुद्ध भावोंका प्रचार प्राय: किसीका उद्देश्य नहीं है। इसीलिये जिन-जिन सामग्रियोंसे जनता अधिक आकर्षित होती है, उन्हींको एकत्रकर प्रदर्शन करना सिनेमा-संचालकोंका कर्तव्य हो गया है, फिर चाहे उनसे जनताकी रुचि बिगड़े, वह आचरणभ्रष्ट हो और सदाके लिये नरकके गढ़ेमें क्यों न गिर पड़े। जनताके पतनकी जिम्मेदारीका खयाल किसीको नहीं है। ध्यान है तो केवल धनका और यह धनका ध्यान केवल संचालकोंको ही नहीं है, सिनेमाओंसे संलग्न प्राय: सभी लोगोंको है। नहीं तो गंदे साहित्यके द्वारा गंदे फिल्म कैसे बनते और क्योंकर उनका प्रदर्शन सम्भव होता? खेदकी बात है कि इस समय भले घरोंकी शिक्षिता कहलानेवाली महिलाएँ भी अपनी आर्योचित उच्च कुलमर्यादाको त्यागकर सिनेमाओंमें पर-पुरुषोंके साथ मिलकर अभिनय करनेमें गौरवका अनुभव तथा उन्नतिका गर्व करने लगी हैं। यह पतनका प्रत्यक्ष चिह्न है। पता नहीं वे किसी भुलावेमें आकर ऐसा कर रही हैं या कलाकी आड़में आर्थिक प्रलोभनमें पड़कर! अभी कुछ दिनों पहले एक एक्ट्रेसका अनुभव पत्रोंमें छपा था; उसके अनुसार यह कहा जा सकता है कि एक्ट्रेस बनकर सिनेमामें अभिनय करनेवाली नारियोंका चरित्रवान् रहना अत्यन्त ही कठिन है। प्राय: यही हाल पुरुष एक्टरोंका समझना चाहिये। अधिकांश संचालकोंके लिये भी कुसंगतिका शिकार होना अनिवार्य है। समाजका दुर्भाग्य है कि स्कूल-कॉलेजोंके छात्र-छात्राओंका सिनेमा-शौक दिनोंदिन बढ़ रहा है और वे बुरी तरह कुप्रवृत्तियोंके शिकार हो रहे हैं। सिनेमाके साथी शराब और वेश्याओंके फेरमें पड़कर उनका सर्वनाश हो रहा है? गतवर्ष कुछ धर्मशीला युवती स्त्रियोंने पूछा था कि हमारे शिक्षित पति हमें जबरदस्ती सिनेमाओंमें और क्लबोंमें ले जाकर गंदे खेल दिखलाना और मांस-शराब खिलाना-पिलाना चाहते हैं, ऐसी अवस्थामें हम क्या करें!!
आजकल पत्रोंके द्वारा भी इन सिनेमाओंके प्रचारमें काफी सहायता मिल रही है। विज्ञापनोंकी आमदनीके प्रलोभनसे पत्र-पत्रिकाओंके संचालक, सम्पादकगण भी सिनेमासम्बन्धी साहित्य और सिनेमाके पात्र-पात्रियोंके चित्र खास करके पात्रियोंके आकर्षक चित्र छापकर जनताका चित्त उधर खींच रहे हैं। मैं अपने सम्मान्य पत्र-सम्पादक भाइयोंको उनके नैतिक दायित्वकी बात याद दिलाकर प्रार्थना करना चाहता हूँ कि वे इस ध्वंसकारी प्रवाहके रोकनेमें सहायक हों। जो साहित्य कोमलमति बालकोंके और प्रबल इन्द्रियोंके वेगको न सह सकनेवाले अनुभवहीन नयी उम्रके युवक-युवतियोंके हृदयमें कलाके नामपर जघन्य वृत्तियोंको जाग्रत् कर देता है, जो उनके हृदयमें कुवासना और कुप्रवृत्तियोंकी आग सुलगाकर उनमें बार-बार ईंधन डालकर उसे भड़काता है, वह साहित्य कदापि हितकर नहीं हो सकता। समाजरूपी वाटिकामें खिलते हुए तरलमति युवक-युवतियोंके कोमल हृदयमेंसे दैवी सद्भावोंको हटाकर उनकी जगह आसुरी भावोंको पैदाकर उसमें नरककी आग जला देनेवाली कला तो प्रत्यक्ष काल ही है। साहित्यकारोंको चाहिये कि नवयुवक और नवयुवतियोंके सामने पवित्र वस्तुएँ रखें। उनके हृदयमें वीरता, धीरता, संयम और सदाचारकी वृद्धि हो, ऐसा साहित्यामृत उन्हें पिलावें। हमारी प्राचीन गुरुकुलकी शिक्षापद्धतिके अनुसार तो किसी भी छात्र युवकके सामने शृंगारी साहित्य नहीं आना चाहिये। मलयसमीर, मधुयामिनी, कुसुमसायक और नायक-नायिकाओंके तथा कामकलाके भेद जाननेकी उन्हें आवश्यकता नहीं है। उनके सामने तो पवित्र इन्द्रियसंयमका पाठ रखना चाहिये। क्या मैं आशा करूँ कि कृपालु साहित्यिक महानुभाव मेरी इस प्रार्थनापर नाराज न होकर, सच्चे हृदयसे कुछ ध्यान देंगे? मुझे तो ऐसा लगता है कि वर्तमान चित्रपट एक प्रकारका मधुर विष है, जो समाजशरीरमें सुखपूर्वक पहुँचकर अंदर-ही-अंदर बड़े जोरसे फैल रहा है और उसे विषाक्त कर रहा है। स्त्रियोंको खास तौरपर इस विषयसे बचना चाहिये था; परंतु खेद है कि आज वही खास तौरपर इसका शिकार बनने जा रही हैं।