क्षमा-प्रार्थना

दोष देखना एक घृणित कार्य है और इसलिये कर्तव्यवश इस कार्यको करनेवाला मैं अपना दोष स्वीकार करता हूँ और उन महानुभावोंसे सविनय क्षमा चाहता हूँ जिनको इस लेखके पढ़नेपर कुछ भी मेरा अपराध जान पड़े। एक बात और है, इस लेखसे मेरा यह मतलब कदापि नहीं है कि मैं पाश्चात्य शिक्षाप्राप्त पुरुष और स्त्रीमात्रको ही उपर्युक्त दोषोंसे युक्त मानता हूँ। मुझे ऐसे बहुत-से नर-रत्नों और पूज्य पुरुषोंसे परिचय करनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है जो इस शिक्षामें बहुत आगे बढ़े हुए होनेपर भी सब तरहसे आदर्श हैं और तपस्वी-जीवन बिता रहे हैं। ऐसी माताओं और बहिनोंको भी मैं जानता हूँ जो पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त होनेपर भी परम सती-साध्वी हैं और ईश्वर, धर्म तथा सदाचारमें परम श्रद्धा रखती हैं। परिचय तो थोड़ेसे ही होता है। मुझसे अपरिचित पाश्चात्य शिक्षाप्राप्त पुरुषोंमें ऐसे अनेकों शुद्ध संस्कारी, महानुभाव और अनेकों पवित्रहृदया बहिनें होंगी जिनके सामने मुझे श्रद्धापूर्वक सिर झुका देना चाहिये; परंतु मेरी समझसे इनमें अधिकांश वही हैं जो अधिक उम्रके हैं या जो सौभाग्यसे घरके या सत्संगके शुद्ध वातावरणमें रहे हैं और माता-पिताके शुद्ध आदर्शको लड़कपनमें देखा है। तरुणवयस्क आजके छात्रों और छात्राओंमें तो ऐसे पुरुषों और स्त्रियोंकी संख्या क्रमश: घटती ही जा रही है, यह सभी स्वीकार करेंगे और प्रत्यक्ष प्रमाणसे भी यही सिद्ध है।

मैं जानता हूँ कि शिक्षाक्षेत्रके पूज्य पुरुष और मनीषीगण इनसे भी अच्छी-अच्छी बातोंको सोचते-विचारते हैं और उन्हें कार्यरूपमें परिणत करनेकी चेष्टा भी करते हैं। कहना सहज है, परंतु परिस्थितिका सामना करते हुए वैसा करना बहुत ही कठिन है, इस बातका मैं भी अनुभव करता हूँ तथापि अपनी ओरसे बालककी भाँति पूज्य पुरुषोंके चरणोंमें नम्रताके साथ विचारार्थ उपर्युक्त बातें रखता हूँ। आशा है वे मेरी इस अनधिकार चेष्टा और धृष्टतापर क्षमा करेंगे।